
श्रीमती विभा पांडेय
पुणे, (महाराष्ट्र)
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सबने कहा माँ
कि तू चली गई है,
कभी ना लौटने के लिए।
इस जहांँ से दूर
उस दीनबंधु के पास
तू चली गई है ।
पर मैं कैसे मान लूँ ?
तू ही बता माँ
इन बातों पर
विश्वास मैं कैसे करूँ?
जबकि मुझे पता है
कि तू यहीं है।सामने जो तुमने
पौधे लगाए थे,
जो कभी तेरी ममता
पाकर मुस्कुराए थे,
वे अब लहलहा रहे हैं।
जैसे तेरा स्नेहिल स्पर्श
उन्हें आज भी मिल रहा है।
फिर कैसे मान लूँ
कि तू चली गई है?तेरे आँचल में जो स्नेह,
दुलार और संस्कार
मैंने भर-भर के पाए थे,
मुझसे होते हुए वे
बच्चों तक पहुंँच रहे हैं ।
तेरी दी हुई उन्हीं
सीखों को अपनाकर
वे पुष्पित,
पल्लवित हो रहे हैं।
ये सत्य दिख रहा
हर पल मुझे।
फिर कैसे स्वीकार लूँ
कि तू चली गई है?मायके की हर एक
दीवार को छूने से
तेरे मृदुल स्पर्श का
अहसास होता है।
और वहाँ हर कोने में गुजरे
बचपन के लम्हों
को बिखेर देता है।
उन्हीं यादों के बदौलत
मेरा वो घर
गुलज़ार रहता है।
फिर कैसे मान लूँ
कि तू चली गई है?सत्य जो भी हो पर
लोग कुछ भी
कहते रहें, पर
मुझे पता है माँ,
तू यहीं कहीं है।
बस प्रत्यक्ष दिखती नहीं,
शायद मुझमें ही
एकाकार हो गई है।
परिचय :- श्रीमती विभा पांडेय
शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी एवं अंग्रेजी), एम.एड.
जन्म : २३ सितम्बर १९६८, वाराणसी
निवासी : पुणे, (महाराष्ट्र)
विशेष : डी.ए.वी. में अध्यापन के साथ साथ साहित्यिक रचनाधर्मिता में संलग्न हैं ।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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