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छंद

ममता की वो खान है
कुण्डलियाँ, छंद

ममता की वो खान है

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** कुण्डलिया छंद ममता की वो खान है, मानें हम संताप। अपने निज व्यवहार से, करते हम सब पाप।। करते हम सब पाप, सभी हम जो हैं भरते। उसकी पीड़ा आज, देख क्यों नहीं समझते। कहें मित्र यमराज, समझिए इतनी समता। प्यारे पढ़ लो आप, मित्र लाचारी ममता।। मानो ज्ञान भंडार का, निज जीवन आयाम। अज्ञानी बन बैठना, बदनामी तव नाम।। बदनामी तव नाम, भलाई आखिर किसमें। करना वो ही काम, भाव सुखदा हो जिसमें। आप बढ़ाओ कोष, मित्र अब इतना जानो। बाकी सबकुछ आप, सोच समझकर मानो।। जिनकी होती है नहीं, स्वाभिमान पहचान। हम सब उनको जानते, इतना होता ज्ञान।। इतना होता ज्ञान, व्यर्थ है चर्चा करना। होशोहवास में आप, मित्र संभलकर रहना। दूरी रखिए आप, कहानी जो है इनकी। क्यों उनकी पहचान, शोर है चहुँदिश जिनकी।। परिचय :- सुधीर श्रीवास्तव जन्मतिथि :...
क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है
छंद

क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** (पीयूष वर्ष छ्न्द) २१२२ २१२२ २१२ पास जिसके माँ वही धनवान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। सृष्टि में माँ का सृजन अनमोल है। कष्ट हर लेता जननि का बोल है। सर्व सुख माँ के लिए संतान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। गोद में संसार भर का सुख मिला। स्नेह सिंचन से कली-सा मन खिला।। नित्य तन-मन से करें फिर सम्मान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। इस जगत की राह में सब शूल हैं। एक माँ की गोद में बस फ़ूल हैं। माँ खिलाती हाथ से पकवान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। शीश चरणों में झुकाया है जिसे। कष्ट जीवन में कहाँ फिर है इसे। तीर्थ का पावन वही गृह स्थान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। सर्व सुख संपत्ति की माँ नाव है। ग्रीष्म की दोपहर में वह छाँव है। माँ हमेशा चाहती उत्थान है। क्योंक...
कुण्डलिया छंद
कुण्डलियाँ, छंद

कुण्डलिया छंद

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** कुण्डलिया छंद सबसे ज्यादा आजकल, अपने लगते भार। कलयुग का यह सार है, लगभग हर परिवार। लगभग हर परिवार, सुनें हम यही कहानी। सभी सुनाते आज, कथाएं आप जुबानी। कहें मित्र यमराज, शिकायत नहीं किसी से। सभी दुखी हैं आज, मगर हम अच्छे सबसे।। अंर्तमन की पीर का, होता गहरा घाव। आज छोड़कर कल उसे, आप दीजिए भाव। आप दीजिए भाव, रंग चेहरे मत लाना। नाहक उसको आज, नहीं दो पानी दाना। इसका रौरव छंद, तोड़ देता है हर तन। कहें मित्र यमराज, गजब होता अंर्तमन।। दिखता है दृश्यमान जो, करता सबको तंग। जो हो रहा समाज में, आज बहुत बदरंग।। आज बहुत बदरंग, जमाना कैसा आया। कलयुग के दौर ने, जगत को है भरमाया।। कहें मित्र यमराज, सत्य भी खूब है बिकता। मान लीजिए आप, झूठ ही आगे दिखता।। आया मुश्किल समय है, होते सब बेहाल। सूर्यदेव इतने कुपित, तप...
राम वनगमन (आल्हा/वीर छंद)
छंद

राम वनगमन (आल्हा/वीर छंद)

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** (आल्हा/वीर छंद) राम संग भी लक्ष्मण सीता, वन में जाने को तैयार। कौशल में सब लगे विलखने, छाती मुक्का दे-दे मार।। कैसे अब तो राज चलेगा, बुरा नगर का होगा हाल। यही सोचकर जनता प्यारी, रो-रो कर हो रही निढाल।। उधर महल में राजा दशरथ, हाय राम कर रहे पुकार। अंतिम साँसे गिन-गिन राजा, भोग रहे थे कष्ट अपार।। जीव-जंन्तु भी चौंक रहे थे, झेल रहे सदमे की मार। कोहराम सर्वत्र मचा था, सबके नयन बहाये धार।। इक कैकेई का मुखमंडल, चमक रहा था मानो खास। कुल कलंकिनी चहक रही थी, मानो उसके उर उल्लास ।। मना रही थी जल्दी वह तो, राम चले जाए वनवास। राज तिलक हो शीघ्र भरत का, कोई बाधा रहे न पास।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (प...
पद का मद
छंद

पद का मद

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** सरसी (कबीर) छंद पद के मद में चूर हुआ जो, उससे रहिए दूर। भूल गया वो कल तक क्या था, आज हुआ मगरूर।। खुद को खुदा समझ बैठा है, हुआ बहुत अभिमान। तनिक नहीं अब शेष बचा है, उसके भीतर ज्ञान।। कल को जब ठोकर खायेगा, संग पीटेगा माथ। कहाँ समझता आज भला वो, नहीं मिलेगा साथ।। बँधी हुई आँखों पर पट्टी, उड़ता है आकाश। अपने हाथों स्वयं लिख रहा, खुद के आप विनाश।। शिकवा और शिकायत सबकी, चढ़े शीश बन पाप।। अपने पैरों मार कुल्हाड़ी, लेता है अभिशाप।। ईर्ष्या द्वेष दंभ में प्राणी, कहाँ कभी खुशहाल। अपनी स्वयं प्रशंसा कर ले, चलकर टेढ़ी चाल।। हाल-चाल कोई जब पूछे, मुँह बिचकाता जोर। नहीं किसी की वो है सुनता है, लगे व्यर्थ का शोर।। ऐसे लोगों का नहीं भरोसा, करें मित्र हम आप। ईश भरोसे आगे बढ़िए, मिटे सभी संताप।। अपने पथ से आप भटकक...
बिसुआ
चौपाई, छंद

बिसुआ

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** आज पर्व है सत्तूयानी। इसे पवित तिथि कहते ज्ञानी।। आज जगे जो रवि से आगे। किस्मत तुरंत उसकी जागे।। नमन करो पहले धरनी का। लेना असीस पितु-जननी का।। नित्य क्रिया से निवृत्त होकर। करो स्नान सारे तन धोकर।। तब जपना प्रभु को हे प्राणी। मंत्र पढ़ो निकले मृदु वाणी।। दान-पुण्य करना सब भाई। जीवन की ये असली कमाई।। फिर सत्तू का भोग लगाना। बिसुआ का ये पर्व मनाना।। घी-शक्कर संग दूध सानो। आम टिकोला को शुभ मानो।। बिसुआ जो भी लोग मनाता। पाप-पुंज जो हो कट जाता।। ग्रह गोचर उसके मिट जाते। आज मनुज जो सत्तू खाते।। लगन आज से उत्तम जानो। शादी का शुभ मुहूर्त मानो।। लगी गूँजने अब शहनाई। अशुभ मास की हुई विदाई।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिव...
जोगिरा छंद (कबीर छंद)
छंद

जोगिरा छंद (कबीर छंद)

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** जोगिरा छंद (कबीर छंद) पवन फागुनी बहे सुहानी, मन में भरे उमंग। झूम रही खिल के तरुणाई, घुली हवा में भंग।। जोगीरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... आया फागुन लेकर खुशियाँ, मन में भरा उमंग। ब्रज की होली देख सभी का, मनवा होता चंग।। जोगिरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... गोप-गोपियाँ राधा रानी, कृष्ण कन्हैया संग। भर पिचकारी रंग लगायें, बरसा प्रेमिल रंग।। जोगीरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... बरसाने की मस्त गुजरियाॅं, ढूॅंढ रहीं गोपाल। आज नहीं छोड़ें कान्हा को, रंग दें दोनों गाल। जोगीरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... वृंदावन बरसाने देखो, मची हुई हैं धूम। अद्भुत प्रेम समर्पण गाथा, हिय को लेती चूम। जोगीरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... निर्मल मन से हम भी खेलें, होली सबके संग। मानवता की भर पिचकारी, डा...
आया फागुन झूम के
छंद

आया फागुन झूम के

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** (उल्लाला छंद) रंगों की बौछार है, खुशियों का त्यौहार है। पिचकारी भर रंग की, होली है आनंद की। नीला पीला लाल है, हरा गुलाबी गाल है। आया फागुन झूम के, रंग उड़ाता धूम के।। मस्ती में सब एक है, पहल बहुत ही नेक है। फागुन का जो राज है, लेकर आया आज है।। बजे नगाड़ा फाग का, अपनों के अनुराग का। आया फागुन झूम के, नाचो सारे घूम के।। इंद्रधनुष का रंग हो, रिश्ते सारे संग हो। ढोल नगाड़ा शोर है, नाचे मन का मोर है।। मिलकर सखी सहेलियांँ, करती है अठखेलियाँ। आया फागुन झूम के, सात रंग को चूम के।। भींगा तन मन साज है, खुशियों पर जो नाज़ है। रंग भरे संदेश है, रंगें सबके वेश है ।। बाजा भी है बाजता, जन-जन मन भर नाचता। आया फागुन झूम के, गाता मनवा घूम के।। आता जब मधुमास है, मन में तब उल्लास है। कोयल सुमधुर बोलती, मीठा र...
सरस्वती वन्दना : पञ्चचामर छ्न्द
छंद

सरस्वती वन्दना : पञ्चचामर छ्न्द

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** पञ्चचामर छ्न्द तुम्हें करूँ प्रणाम आठ याम मैं सुहासिनी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी। विमोहिनी सुतान छेड़ दो कि जो सुधा बने। नया-भावयुक्त गीत, छन्द प्रेम से सने ।। हरो समाज के विकार, शीघ्र कष्ट नाशिनी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी।। रुके न लेखनी कभी कृपा मनाक कीजिए। समाज में सप्रेम मान हो प्रसाद दीजिए। मिले अपार प्यार नित्य वेदहस्त- धारिणी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी । सरस्वती, कृपा सदैव दिव्य ज्ञान की करो।। तुम्हीं दयालु कोष, वर्ण, शब्द, भाव से भरो। उबार दीजिए हमें सनेह नाव-तारिणी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी।। अपार शक्ति दो समाज के विकास के लिए। दरिद्र-दीन के सहाय के लिए सदा जिए। रखो विशुद्ध भाव युक्त मर्म ज्ञान दायिनी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी।। प...
हरिगीतिका छंद
गीतिका, छंद

हरिगीतिका छंद

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** हरिगीतिका छंद गीतिका छंद मापनी - २२१२ २२१२, २२१२ २२१२ ब्रह्मा सुता मॉं शारदे मम, स्वर सुवासित कीजिए। हिय भाव -पंकज हों सदा मन, प्राण भाषित कीजिए।। संचार आशा का करो हो, दूर पीड़ा अंक से। शुचि शिष्टता ही शीर्ष पर हों, दुष्ट दुर्जन रंक से।। शब्दावली हो भाव भूषित, लेखनी में बास हो। रचती रहूॅं नित छंद नूतन, मातु उर आवास हो। द्युतिमान दे संज्ञान दे हम, मान के पालक बनें। आए शरण में मॉं भवानी, ज्ञान के याचक बनें।। पुष्पित सुमन अलि डोलते हैं, सुभग पीले रंग में। आई धरा मॉं शारदे शुचि, भारती की गंग में।। विनती करूँ कर जोड़ कर माँ, शब्द का शृंगार दे। तेजस्विनी आभामयी मॉं, नित प्रभा संसार दे।। पावन हृदय कमलासिनी मन, भाव निर्मल कीजिए। आनंद हिय बरसे सदा मॉं, वेदना हर लीजिए।। तेजस्विनी, राजेश्वरी माँ,...
भारत की हिय वासिनी – प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान प्राप्त रचना
छंद, दोहा

भारत की हिय वासिनी – प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान प्राप्त रचना

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान प्राप्त रचना भारत की हिय वासिनी, हिन्दुस्तान की शान। हिन्दी के आँचल तले, अर्जित उत्तम ज्ञान।। अक्षर -अक्षर कर रहा, सतत राष्ट्र उत्थान। हिन्दी माता हिन्द की, भारत का अभिमान।। हिन्दी में साहित्य है, माँ का गौरव भाल। छन्द गीत देते सदा, सुभग सुधा शुचि चाल।। अलग -अलग भाषा करें, हिन्दी से मृदु योग। एक सूत्र में बाँधती, भिन्न प्रान्त के लोग।। भाते मन को हैं सदा, हिंदी कविता गीत। सरस प्यार के बोल से, लेती मन को जीत।। पूर्ण राष्ट्रभाषा बने, मिलकर लो संज्ञान। हिन्दी के उत्थान का, लक्ष्य सभी लो ठान।। परिचय :- श्रीमती शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" निवासी : ग्वालियर (मध्यप्रदेश) रुचि : गद्य/पद्म लेखन एवं गाय...
दिव्य दिवाकर
छंद

दिव्य दिवाकर

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** (मदिरा सवैया छंद) दिव्य दिवाकर मंद हुए, यह ठंड भयंकर रूप धरे। शीत हवा कुहरा बिखरा, अब पीत परे सब पात हरे। तुंग हिमालय श्वेत हुए, हिम सागर शीत बिहार झरे। शीत प्रभाव सु-प्रीति फले, मन यौवन अंग उमंग भरे। परिचय :- श्रीमती शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" निवासी : ग्वालियर (मध्यप्रदेश) रुचि : गद्य/पद्म लेखन एवं गायन घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आप सभी को नववर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएँ। आशा है इस अवसर पर आप को प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना लिंक को टच कर पढ़ने का कष्ट कर प्रोत्साहित करेंगे एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करेंगे ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, ...
आज ऐसे क्रान्तिकारी चाहिए
गीतिका, छंद

आज ऐसे क्रान्तिकारी चाहिए

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** गीतिका छ्न्द में जो स्वयं कर्तव्य पथ की, साधना को साध लें। आपदा की आँधियों को, मुट्ठियों में बाँध लें। थरथरा उट्ठें कलेजे, नाम सुनकर पाप के। शब्द अपने आप उल्टे, लौट जाएँ शाप के।। क्रूर होकर जो अहं को, खूँटियों पर टाँग दें। हर प्रहर मुर्गे सरीखी, जागने की बाँग दें। जो हृदय इंसानियत के, राग के आगार हों। देश पर हर हाल मिटने, के लिए तैयार हों। वे पुरुष हों या कि नारी, चाहिए इस देश को। आज ऐसे क्रान्तिकारी, चाहिए इस देश को।। दूसरों के मुँह न ताकें, साथियों को साथ दें। जो गिरें उनको उठा लें, हाथ को निज हाथ दें। भारती माँ की न निन्दा, भूलकर भी सह सकें। देख कर बेचैन धरती, खुद न जिन्दा रह सकें । प्रेम को पूजा समझ कर, धर्म को आधार दें। जो हृदय की बीथियों में, व्योम सा विस्तार दें। क्या घृणा क्या...
शक्ति के पर्व पर क्या करें … गीतिका छ्न्द
छंद

शक्ति के पर्व पर क्या करें … गीतिका छ्न्द

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** गीतिका छ्न्द शक्ति का त्यौहार है हम शक्ति का संचय करें। शक्ति के अस्तित्व को हम भक्ति से अक्षय करें।। लक्ष्य क्या उपलक्ष्य क्या है हम प्रथम यह तय करें। ध्यान से चिन्तन करें फिर पन्थ का निर्णय करें।।१।। कर्म को निष्काम सेवा मानकर तन्मय करें। बात अनुभव सिद्ध गहरी है न कुछ संशय करें।। भाग्य का निर्माण करता कर्म है निश्चय करें। धर्म की हर धारणा में कर्म है सविनय करें।।२।। आइए स्वागत सहित संसार से परिचय करें। तामसी व्यवहार‌ छोड़ें दम्भ तज विनिमय करें।। द्वेष त्यागें शुभ हृदय अनुराग का आलय करें। आपसी सम्बन्ध गाढ़े और करुणामय करें।।३।। ज्ञान को उपसर्ग कर लें मान को प्रत्यय करें। स्वयं को जीतें स्वयं से दुष्ट पर फिर जय करें।। बाहुबल रण-योजना कौशल-कला लयमय करें। बुद्धि-बल तन-शक्ति मन-संकल्प का अन...
भारत का कीर्ति नाद
छंद

भारत का कीर्ति नाद

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** ऋषि मुनियों का देश यहाँ पर मेघ सुधा बरसाते। स्वर्ग त्याग देवता कुटी में बसने को ललचाते।। कवियों की यह धरा जहाँ भावना अछल उठती है। यहाँ सृजन के लिए स्वयं लेखनी मचल उठती है।। अविनाशी वह ब्रह्म यहाँ नव लीलाएँ रचता है। ले-ले कर अवतार स्वयं माँ की गोदी भरता है।। नदियाँ गातीं गीत यहाँ हर झरना भजन सुनाता। इसीलिए प्राणों से प्यारी लगती भारत माता।।१।। जिसके बच्चे बचपन से ही रण रचना करते हैं। जबड़े पकड़ बबर सिंहों के दाँत गिना करते हैं।। कच्ची कली खेलती हँसती मर्दानी बन जाती। अबला बाला रण में झाँसी की रानी बन जाती।। मरे हुए पति को जीवित करने को अड़ जातीं हैं। यहाँ नारियाँ सत के बल पर यम से भिड़ जातीं हैं।। यहाँ प्रकृति की हंँसी देखकर मुकुलित मन इतराता। इसीलिए प्राणों से प्यारी लगती भारत म...
महत्व सिंदूर का
छंद

महत्व सिंदूर का

राधेश्याम गोयल "श्याम" कोदरिया महू (म.प्र.) ******************** महत्व सिंदूर का समझ वो सके न कभी, सैलानियों का पूछ धर्म चुन-चुन मार रहे। बार बार खाके मार अक्ल न आई कभी, आतंकी ठिकानो में अब ढूंढ ढूंढ मार रहे। प्रहार सिंदूर का वो सह न सके कभी भी, नंगे, भूखे हरकतें अब, कायराना कर रहे। अब तक बच रहे, अब बच न पाएंगे कभी, सिंदूर का बदला "श्याम" सिंदूर से कर रहे। परिचय :- राधेश्याम गोयल "श्याम" निवासी - कोदरिया महू (म.प्र.) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख...
हिंद वतन आजादी है
छंद

हिंद वतन आजादी है

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** (ताटंक छंद, देश प्रेम) संस्कारों के महा वतन में, कर्म-धर्म आजादी है। बस देश प्रगति की गाथा ही, हिंद वतन आजादी है। पत्ते, डाली, तना, जड़ यात्रा, हरियाली जता रही है। संकल्प से सिद्धि के प्रकल्प, दीवाली दिखा रही है। आजाद राष्ट्र आवाम को, स्वाभिमान सिखा रही है। दिया तले तम साबित करने, बैठे कुछ जल्लादी है। उनको विरोध द्रोह तर्क की, कड़वी दवा पिला दी है। संस्कारों के महा वतन में, कर्म-धर्म आजादी है। बस देश प्रगति की गाथा ही, हिंद वतन आजादी है। दोनों आंख सलामत फिर भी, विकास गर्व नहीं भाता। पर काने अंधे मानव भी, माटी में पर्व मनाता। पड़ोसी गोद में पलते जो, दंभ शान ही दिखलाता। स्वाभिमान भारत दर्शन से, उनको क्या पाबंदी है। सुनो! विश्व सम्मान से भारत, अव्वल पथ आसंदी है। संस्कारों के महा वतन में, कर्म-धर्म आजादी...
चेतावनी
छंद

चेतावनी

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** हर ओर धुँआँ ही धुँआँ मात्र संयोग नहीं, परिणाम निकल कर आए हैं आजादी के। चल पड़ी तोड़ कर अनुशासन यह आबादी, जिस पथ पर पसरे राग बड़ी बर्बादी के।। कहने को कुछ भी कहो आपकी मर्जी है, शायद कुछ भाग्य उदित हों अवसरवादी के। पर हम सचेत करते हैं तुम को यह कहकर, ये लक्षण हैं उन्मादी और फसादी के।। यूँ स्वतन्त्रता का अर्थ नहीं स्वच्छन्द रहो, जीवन संयम के साथ बिताना जीवन है। खुद पर कानूनों नियमों का अंकुश न रखा, तो पराधीन बाहों में जाना जीवन है।। सुनने में कड़ुआ लगे-लगे तो लग जाए, जनता के हक का हरण, बहाना जीवन है। चल रहीं चालबाजियाँ उधर अपने हित में, युग के सुधार का नाम निशाना जीवन है।। नीतियाँ अधमरीं पड़ीं स्वार्थ के वशीभूत, इस त्याग भूमि पर क्या जाने क्या हवा चली। भर लिए खजाने लोगों ने कर लूटमार,...
विश्व जल दिवस पर चौपाई-छंद
चौपाई, छंद

विश्व जल दिवस पर चौपाई-छंद

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** आज विश्व जल दिवस मनाओ, सब जनता को यह परखाओ। अब जन जागरूकता लाओ, गली खोर अभियान चलाओ।। जल बिन मछली तड़पे कैसे, प्राण वायु बिन मरते जैसे। एक बूँद का कीमत जानो, कितना महत्व इसको मानो।। आओ प्यारे सब मिल गाओ, बचाने का संकल्प उठाओ। अब जन जागरूक हो जाओ, जल संरक्षण मिशाल लाओ।। पानी के बिन यह जग सूना, जीव जंतु है प्रकृति नमूना। बेकार की अब इसे न बहाओ, आसपास को स्वच्छ बनाओ।। जल बचाव का नियम बनाओ, जल-जंगल-जमीन महकाओ। पेड़ लगाकर छाया पाओ, खुशहाली जीवन हर्षाओ।। जल बिन सावन भादो कैसा, धरा तृषित अनावृष्टि जैसा। धरती मैय्या हरियाली पाओ, पानी बचाने घर-घर समझाओ।। *श्रवण* मनन कर लिख चौपाई, जल ही जीवन समझो भाई। हँसी खुशी महोत्सव मनाओ, अब प्रतिज्ञाबद्ध हो जाओ।। परिचय :- धर्मेन्द्र कुमार श...
होली फागुन का त्योहार
गीत, छंद

होली फागुन का त्योहार

राधेश्याम गोयल "श्याम" कोदरिया महू (म.प्र.) ******************** होली- छंद होली फागुन का त्योहार, फागुन आवे रंग जमावे चलत बसंती बयार........ होली फागुन का..... पतझरे पेड़ पल्लवित हो रहे, बागों में फूल प्रफुल्लित हो रहे। महुए मद में रहे गदराए, आई अमराई में बहार........ होली फागुन का...... सरसों पीली फूल रही है, गेहूं की बाली झूल रही है। लाली पलास की मन को मोहे, किया सृष्टि ने श्रंगार........ होली फागुन का....... नव यौवन मन में हरशावे, होली को आनंद मनावे। एक दूजे पर रंग डाल, करे खुशियों का इजहार........ होली फागुन का....... पेड़ों को कटने से बचाए, पर्यावरण को स्वच्छ बनाए। डाल बुराई सब होली में, जलाएं होली अबकी बार......... होली फागुन का त्योहार फागुन आवे रंग जमावे चलत बसंती बयार। होली फागुन का त्योहार। परिचय :- राधेश्याम गोयल "श्याम" निवासी - कोदरिया म...
श्याम करी बरजोरी
छंद

श्याम करी बरजोरी

राधेश्याम गोयल "श्याम" कोदरिया महू (म.प्र.) ******************** होली- छंद होरी पे श्याम करी बरजोरी, बहियां मोरी झटकी चुनर रंग बोरी। मैं बोली की श्याम करो न ठिठोली, अंगिया संग भीग गई मेरी चोली। वो बोले प्रिये अब होली सो होली, मन काहे मलाल करो हमजोली। गर बीत गए दिन यूं ही रंगीले तो, अगले बरस फिर आएगी होली। रंग डार के आज भिगोए गयो, अंग मसक गयो सखी मोर अनारी। मुख लाल गुलाल लगाय गयो, मोरी फारी गयो सखी पचरंग सारी। फाग में आग लगाय गयो, ऐसी नैनन मार गयो वो कटारी। मो संग नेह बढ़ाई गयो सखी, मारी के श्याम प्रित पिचकारी। परिचय :- राधेश्याम गोयल "श्याम" निवासी - कोदरिया महू (म.प्र.) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अ...
मातु शारदे
छंद

मातु शारदे

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** सरसी छंद (१६, ११) मातु शारदे मैया मेरी, देती मन को जान। शीश हाथ पर उसका मेरे, बढ़ता मेरा ज्ञान।। सच्चाई के पथ चलने की, देती हमको सीख। निज के श्रम से सब मिलता है, दे ना कोई भीख। मानवता का पथ ही आगे, करता नव निर्माण। सुख सुविधाएँ बढ़ती जाती, होता सबका त्राण। माना मैं मूरख अज्ञानी, इसमें क्या है दोष। कभी कहाँ मुझको आता है, इस पर कोई रोष। दूर करेगी हर दुविधा माँ, इसका मुझको बोध। जिसको भी चिंता करना है, वो ही कर लें शोध।। ज्ञान ज्योति माँ सदा जलाती, नित नित देती ज्ञान। समझ रही है मैया मेरी, मैं मूरख अंजान। कालिदास मूरख को भी तो, बना दिया विद्वान । घटा मान विद्योतमा का, सभी रहे हैं जान।। दंभी रावण की मति फेरी, उसका हुआ विनाश। और विभीषण को मैया पर, था पूरा विश्वास। कंस और श्री कृष्ण कथा ...
शक्ति का त्यौहार
गीतिका, छंद

शक्ति का त्यौहार

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** गीतिका छ्न्द शक्ति का त्यौहार है हम शक्ति का संचय करें। शक्ति के अस्तित्व को हम भक्ति से अक्षय करें।। लक्ष्य क्या उपलक्ष्य क्या है हम प्रथम यह तय करें। ध्यान रखकर शुभ-अशुभ का पन्थ का निर्णय करें।। साधना का एक ही यह मूल है निश्चय करें। कर्म को निष्काम सेवा मानकर तन्मय करें।। बात अनुभव सिद्ध गहरी है न कुछ संशय करें। धर्म की बस धारणा हर कर्म है निर्भय करें।। आइए स्वागत सहित संसार से परिचय करें। तामसी व्यवहार‌ को सब दम्भ तज विनिमय करें।। द्वेष त्यागें शुभ हृदय अनुराग का आलय करें। आपसी सम्बन्ध गाढ़े और करुणामय करें।। आइए करबद्ध परहित के लिए अनुनय करें। पुण्य को बोएँ परस्पर पापियों का क्षय करें।। देश दुर्गुण से बचे अच्छाइयांँ अतिशय करें। विश्व का कल्याण करते "प्राण"‌ ज्योतिर्मय करें।। प...
गोष्ठी बुखार
छंद

गोष्ठी बुखार

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** एक काव्य गोष्ठी में पिछले दिनों एक कवि मुख से उच्चारित हुआ, गोष्ठी से कुछ बुखार कम हो जाता है। विजय गुप्ता ने इस भाव को काव्य सूत्र में ताटंक छंद विधा में सृजित किया। कवि लेखक अपने चिंतन से, चाल चलन दरशाता है संभव समर्थ समाधान तक, कलम खूब चलवाता है। जनता सत्ता आइना देखे, साधक बनकर गाता है। फिर गोष्ठी हलचल होने में, बुखार कम वो पाता है। कवित्व गुण का आधार यही, कई विधा का संगम हो। सृजन सेवा साधना तीर, से कुपथ्य का निर्गम हो। विवाद आंकड़े बने जमघट, कई वर्ग से उदगम हो। दशा दिशा के नेक तर्क में, फूहड़ बोली आलम हो। कविता धारा अब बहे कहां, उत्थान जहां गिराता है। कहने सुनने युग गुजर चुका, काव्य शोर मचाता है। कवि लेखक अपने चिंतन से, चाल चलन दरशाता है। संभव समर्थ समाधान तक, कलम खूब चलवाता है। आचार्यद्रोण शिक्षा समान, अल...
पहले मतदान … फिर जलपान
छंद

पहले मतदान … फिर जलपान

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** सरसी छन्द **** देखो तो चुनाव है आया, करें सभी मतदान। पहले अपना कर्म निभाएँ, फिर ही हो जलपान।। ******* अब चुनाव तो पावन आया, जाएँ सब ही जाग। रखना सबको वोटिँग के प्रति, सतत गहन अनुराग।। ********* निर्वाचन का शंख बजा है, बेशक़ीमती वोट। अपना कर्म नहीं कर पाए, तो ख़ुद पर ही चोट।। *********** चलो उठो सबको है जाना, बुला रहा मतदान। अपना वोट सही को देंगे, करें पूर्ण अरमान।। ******** सबको ही तो फर्ज़ निभाना, लेकर के उल्लास। तभी सभी की निश्चित होगी, मन की पूरी आस।। ******** मम्मी-पापा को करना है, अब की फिर मतदान। दर्ज़ हो गए जो सूची में, उनका हो जयगान।। ********* युवा,प्रौढ़ सारे नर-नारी, करें सुपावन कर्म। लोकतंत्र ताक़त पायेगा, वोट बना है धर्म।। ******* आलस्य को सारे ही त्यागें, बूथ नहीं है दूर। शत-प्रतिशत ...