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सत्यकथा

अंतर विश्वास
सत्यकथा

अंतर विश्वास

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जब सारे सहारे खत्म हो जाएंगे, तब ईश्वर का विश्वास ही सहारा देकर आगे बढ़ते रहने की शक्ति प्रदान करेगा। यह सत्य प्रमाणित है। इंदौर ऐसे ही बस बच्ची को लेने जाना था, उसका फ़ोन आया दादी मेरी परीक्षा हो गई है। मुझे लेने आ जाओ। मैं बिना पर्स चैक किए निकल गई, क्योंकि १००-५० रुपये तो पड़े ही रहते हैं। कहीं और कुछ काम था नहीं। बच्ची को लेकर रोड़ पर रिक्शा का रास्ता देख रही थी। एक वृद्ध दंपति आकर सामने खड़े हो गए, और कहा-हमें कुछ खाने को मिल सकता है क्या मेरे पति को मैं अस्पताल से छुट्टी दिलाकर लाई हूं, दवाई से पहले खाना जरुरी है। मेरे पास चार पांच चने के परांठे थे। बेटे ने रख दिए थे। मैंने देखा पैसे इतने नहीं कि दोनों का पेट भर जाए। मैंने कहा आप यह परांठे रखिए और इन्हें खिलाकर दवाई दीजियेगा। कुछ व्यवस्था आपकी करते हैं। वह कहने ल...
संवेदना
सत्यकथा

संवेदना

उमेश्वरी साहू धमतरी (छतीसगढ़) ********************  आज से लगभग तीन महीने पहले रेलवे स्टेशन में बड़ी ही विचित्र घटना घटी। यह घटना मुझे आज भी झकझोर देती हैं। यह उस समय की बात है जब मैं अपने पति के साथ शिर्डी घूमने जा रही थी। लगभग ४:०० बजे हम लोग रेलवे स्टेशन पहुंचे। उसके बाद मेरे पति ने मुझे गेट पर ही छोड़कर गाड़ी पार्किंग करने के लिए चले गए। मैं वही किनारे पर खड़ी होकर उनका इंतजार करने लगी। ठीक उसी समय एक बीमार अपाहिज आदमी एकदम गन्दे, मैले-कुचैले कपड़े पहने हुए लगभग ४-५ साल की बच्ची के साथ सामने से आता हुए दिखाई दिया। बच्ची बहुत रो रही थी जिसके कारण मेरा ध्यान बरबस उसके तरफ चला गया। इतने में वह आदमी अपनी बच्ची को चुप कराने की कोशिश करने लगा फिर उसने बच्ची से कुछ पूछा। मैं दूर खड़ी थी इसलिए मुझे कूछ भी सुनाई नही दिया की उस बच्ची ने क्या कहा? पर ऐसे लगा जैसे बच्ची को बहुत भूख लग रही ...
मजबूरी
सत्यकथा

मजबूरी

माधवी तारे लंदन ******************** (सत्य घटना पर आधारित) “बेटा मेरी उम्र अब ८०-८२ साल के ऊपर हो गई है शरीर भी दिन-ब-दिन थकता जा रहा है... और तू है कि सवेरे शाम धंधे में लगा रहता है। तेरे बेटा और बेटी भी नौकरी पानी के लिए दूर रहते हैं, तुम्हारी बेटी तो ससुराल में अपनी नौकरी और घर के कामकाज में व्यस्त रहती है तू रोज़ नौकर के हाथों जमा पूंजी और कमाए हुए रकम बैंक में भेजता रहता है तुमने बैंक में नॉमिनेशन करके रखा है कि नहीं? सुबह से रात के ८-९ बजे तक दुकान पर ही बैठा रहता है एकाध दिन फुर्सत निकालकर बैंक का काम जरूर कर लेना” “हाँ माँ तू चिंता मत कर मेरा ध्यान है इस तरफ” “बेटा, समय बताकर नहीं आता है, समझ रहा है ना” “माँ मत घबरा मैं सब कर लूंगा” माँ का रोज-रोज कहना बेटे का हामी भरना ये सिलसिलेवार चलता रहा। एक दिन संध्या बेला थी, घर के पास धीरे-धीरे लोगों की भीड़ इकट्ठा होने लगी, आने ...
वो प्यारी सी मुस्कान लिए
लघुकथा, सत्यकथा

वो प्यारी सी मुस्कान लिए

स्वप्निल जैन छिन्दवाड़ा (मध्य प्रदेश) ******************** दीवाली के कुछ दिन बाद की बात है, मैं अपनी दुकान पर बैठा था, तभी कुछ ९-१० साल की उम्र के आस-पास की वो प्यारी सी मुस्कान लिए दिल में कुछ अरमान लिए हाथों में सिर्फ हां सिर्फ दो गुब्बारे लिए मेरे पास आई। मैंने पूछा हां बेटा बोलो, वो बिटिया बोली भैया मेरे गुब्बारे खरीद लो, मुझे जरूरत नही थी बलून की पर वो मासूम सी बच्ची निरास स्वर में उम्मीदों से बोली थी, उस समय तो मै सोच में पड़ गया कि इस बच्ची को क्या कहूँ। फिर आखिर मैंने उससे पूछ ही लिया बेटा क्या आप पढ़ाई भी करते हो, वो बोली नहीं मुझे खाने के लिये गुब्बारे बेचने जाना होता है, उस मासूम की इतनी बातें सुनते ही मेरा हृदय पसीज सा गया मैंने एक पल भी देर ना कि और उस बच्ची के दोनों गुब्बारे खरीद लिये, उसका चेहरा मंद-मंद खिल सा गया। वो प्यारी सी मुस्कान लिए कुछ बोली, भैया यदि आपके पा...
पिता का श्राप
सत्यकथा

पिता का श्राप

रमेशचंद्र शर्मा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मालगुजारी का समय। पटवारी रामशंकर। खानदानी पटवारी। पुरानी मैट्रिक पास। ७० बीघा के काश्तकार। गीता पाठी, शास्त्रों के जानकार। इकलौती संतान होने से नौकरी नहीं की। पिता के स्वर्गवासी हो जाने पर पटवारी बन गए। पूरा गांव उन्हें पटवारी जी कह कर बुलाता। बड़ी मान मन्नत के बाद लड़का हुआ। पूरे गांव में मिठाइयां बांटी। समय गुजरने लगा। पटवारी जी के पिता शांत हो गए। कुछ समय बाद पटवारी जी की पत्नी भी शांत हो गई। बेटा सुरेश २० वर्ष का हो गया था। पटवारी जी ने पास के ही गांव के प्रतिष्ठित परिवार में सुरेश की शादी कर दी। सुरेश की पत्नी उषा स्वभाव से तेज थी। समय के साथ साथ पटवार जी थक गए। पटवारी जी को आंखों से कम दिखाई देने लगा। पटवारी जी मीठा खाने के शौकीन थे। उनकी माली हालत भी ठीक थी। सुरेश स्वाभाव से चिड़चिड़ा था। खेती-बाड़ी का सारा कारोबार सुरेश...
छुटकी
सत्यकथा

छुटकी

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, जिला-गोण्डा, (उ.प्र.) ********************                               दिसंबर २०२० के आखिरी दिनों की बात है। सुबह-सुबह एक फोन काल आता है। नाम से थोड़ा परिचित जरूर लगा, परंतु कभी बातचीत नहीं हुई था, क्योंकि ऐसा संयोग बना ही नहीं। उधर से जो आवाज सुनाई दी कि मन भावुक सा हो गया। उस आवाज में गजब का आत्मविश्वास ही नहीं, बल्कि अपनत्व का ऐसा पुट था कि सहसा विश्वास कर पाना कठिन था कि वो मुझे जानती न हो। जिस अधिकार से उसनें अपनी बात रखी, उससे उसका हर शब्द यह सोचने को विवश कर रहा था कि किसी न किसी रुप में हमारा आत्मिक/पारिवारिक संबंध जरूर रहा होगा, भले ही वह पिछले जन्म का ही रहा हो। उससे बात करने के बाद मन इस बात को मानने को तैयार नहीं था कि उससे किसी न किसी रुप में मेरे साथ माँ, बहन या बेटी जैसा रिश्ता नहीं रहा होगा। अब तो मेले में बिछुड़े भाई बहन सरीखे किस्से कहानियो...