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गद्य

तालमेल
आलेख

तालमेल

माधवी तारे लंदन ******************** सब देवी देवताओं के आग्रह और नम्र निवेदन पर ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण करने की जिम्मेदारी अपने पर ली। परंतु भागवत कह कर जैसे श्री व्यास मुनि को कार्य की सार्थकता नहीं लग रही थी। मन में लगता रहा कि इसमें कुछ कमी रह गई है। बाद में जब सुकदेव मुनि ने नैमिषारण्य में परीक्षित राजा जो भागवत कथा सुनाना शुरू किया तब उन्हें अपने कृतित्व की सार्थकता लगने लगी। ऐसी ही स्थिति ब्रह्मा की सृष्टि निर्माण करने के बाद हुई होगी, जब तक सरस्वती की वीणा की झंकार प्रकृति में नहीं गूंजी और पक्षियों का कलरव और नदी की कलकल उन्हें नहीं सुनाई दी, तब तक ब्रह्माजी को आनंद की प्राप्ति नहीं हुई। झरनों से बहते, कलकल करती नदियों के संगीत से पूरी प्रकृति रममाण हुई। मनुष्य और प्रकृति के तालमेल की शुरुआत हुई। अनेक वर्ष यह तालमेल बढ़िया चल रहा था लेकिन लालच ने जब मनुष्य की बुद्धि को छुआ तो ...
सतरंगी दुनिया- २३
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- २३

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  जो लोग आपको नहीं समझते- उन्हें मत सममझाइए। समुंदर खारा है-खारा ही रहेगा, उसमें शक्कर मत मिलाइए। हम अक्सर खून की जांच करवाकर देखते हैं, कि शरीर में कैल्शियम और विटामिन घट तो नहीं रहे हैं। मेरे ख्याल से कभी ऐसे अपने व्यक्तित्व की भी जाँच करवा लेनी चाहिए। क्या पता दया, करुणा, मानवता, दोस्ती और इंसानियत भी घट रही हो। याद रखिए- तारीफ करने वाला आपकी स्थिति देखता है और परवाह करने वाला आपकी परिस्थिति देखता है। *भुट्टा बेचने वाला फूट-फूट कर रोया, जब एक एक मार्डन लड़‌की ने कहा- अंकल एक हैंडिल वाला पापकॉर्न देना।* हमारे साथ अक्सर वही लोग चलते हैं, जिन्हें हमसे फायदा नहीं बल्कि हमारी फिक्र होती है। १९९० में लड़कियाँ डरती थी कि सास कैसी मिलेगी ? २०२० में सास डर रही है, कि बहू कैसी मिलेगी ? देखिए अजीब संजोग कि जो लड़‌कियाँ १९९० ...
अगले जनम मोहे एनआरआई कीजे
व्यंग्य

अगले जनम मोहे एनआरआई कीजे

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आजकल का सबसे बड़ा अचीवमेंट क्या है? बस यही कि एनआरआई बन जाओ, या कोई एनआरआई दामाद घर ले आओ। मन में पहले कभी ऐसा कोई भाव नहीं था, पर पड़ोसी और रिश्तेदारों ने इतनी बार टोंट बाजी की कि मन में एक टीस-सी बस गई। हर तीसरे दिन कोई न कोई टोक देता, “यार, तुम एनआरआई क्यों नहीं बने? वहां डॉक्टरी में ज्यादा पैसा, ज्यादा ठाठ है !” कॉलेज के दिनों में देखा, कई साथी युएस एम्एलए की तैयारी ऐसे करते थे जैसे भारत की हवा से उन्हें अचानक एलर्जी हो गई हो। शरीर उनका भले यहाँ हो, पर आत्मा अमरीका-यूरोप की सड़कों पर ही टहलती रहती थी। शायद उनकी आत्मा को ग्रीन कार्ड पहले ही मिल चुका था। हमारी आत्मा जिद्दी निकली, इसे तो हमसे अलग होना ही नहीं था। हमने लाख मनाया, “जरा बाहर घूम आओ, कम से कम तुमको तो वीज़ा नहीं चाहिए।” आ...
भोजशाला : केवल एक स्मारक नहीं, भारत की आत्मा का स्वर
आलेख

भोजशाला : केवल एक स्मारक नहीं, भारत की आत्मा का स्वर

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत केवल भूगोल का एक टुकड़ा नहीं है, यह हजारों वर्षों की संस्कृति, ज्ञान, साधना और अध्यात्म की जीवित चेतना है। इस चेतना को यदि कहीं मूर्त रूप में देखा जा सकता है, तो वह हमारी प्राचीन शिक्षण परंपराओं, मंदिरों और सांस्कृतिक धरोहरों में दिखाई देती है। मध्यप्रदेश की पावन धरती पर स्थित धार की भोजशाला भी ऐसी ही एक अमूल्य धरोहर है, जो केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, माँ सरस्वती की आराधना और राजा भोज के सांस्कृतिक वैभव की जीवंत गाथा है। मालवा की ऐतिहासिक नगरी धार सदियों से विद्या, कला और संस्कृति का केंद्र रही है। परमार वंश के महान प्रतापी राजा भोज ने इस भूमि को केवल शासन का केंद्र नहीं बनाया, बल्कि इसे ज्ञान की राजधानी के रूप में स्थापित किया। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि जिस प्रकार तक्षशिला औ...
रहमदिल
लघुकथा

रहमदिल

अमिता मराठे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** अरे! अब इस बहरे को कैसे समझाऊँ कि कचरा ठीक से साफ करे। अजी सुनते हो! मैं परेशान हो गई हूँ। अपने बंगले में जरा ढंग के नौकर रखो। कहते-कहते थक गई हूँ। श्रीमती वर्मा झुँझलाकर वर्मा जी की ओर देखने लगीं, जो आराम से समाचार-पत्र पढ़ने में मग्न थे। “माली अपंग है, सफाई करने वाला गूंगा-बहरा। और रसोई वाली गंगा- जितना कहो, उतना ही काम करती है बस। देखो जी, आज ही इन सबको हटाओ और स्वस्थ, समझदार लोग रखो।” गुस्से में बड़बड़ाती हुई वे बाहर आ गईं। उन्होंने देखा, सभी कर्मचारी हाथ जोड़े खड़े थे। “रहम करो माताजी,” गंगा बोली, “बाबूजी हमारे लिए देवता हैं। उन्हीं की बदौलत हमारे घरों के चूल्हे जलते हैं।” तभी वर्मा जी धीरे से उठे और उन्होंने अपना दुर्घटना में क्षतिग्रस्त हाथ आगे बढ़ाया और मुस्कराकर बोले- माताजी, “समय कब किसे दूसरों के सहारे खड़ा कर दे, ...
रिटामटमेंट
लघुकथा

रिटामटमेंट

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  रामशरण जी कालेज में प्रोफेसर थे। स्वभाव के मस्त-मौला थे। अपने काम से मतलब रखते थे, अपने कर्तव्य के प्रति हमेशा जागरूक रहते थे, इसलिए छात्रों में भी वे लोकप्रिय थे। समय बीतता गया, आखिर उनके रिटामटमेंट का समय भी आ गया। रिटायरमेन्ट के बाद उन्होंने एक बड़ी पार्टी का आयोजन किया, जिसमें उनके प्रोफेसर साथी, कालेज का स्टॉफ, पूर्व छात्रों तथा अपने दोस्तों और रिश्तेदारों सभी को आमंत्रित किया। पार्टी आराम से चल रही थी। अचानक उनकी पत्नी शीला चक्कर खा कर गिर पड़ी। रंग में भंग पड़ गया गया। शीला जी को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने जाँच करके कहा, "ये अब जिन्दा नहीं हैं।" खुशी का माहौल दु:ख में बदल गया। देखिए, प्रकृति का खेल-रामशरण जी कालेज से रिटायर हो गए और उनकी पत्नी इस दुनिया से रिटायर हो गयी। असली रिटामटमेंट किसका था, म...
श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज- वह ज्वाला जिसे यातनाएँ भी बुझा न सकीं
आलेख

श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज- वह ज्वाला जिसे यातनाएँ भी बुझा न सकीं

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारतीय इतिहास का गगन अनेक वीरों की गाथाओं से आलोकित है, किंतु कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि राष्ट्र की आत्मा में सदैव जीवित रहते हैं। श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज ऐसे ही एक अमर व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन साहस, स्वाभिमान, विद्वता और बलिदान का अद्वितीय संगम था। दुर्भाग्य से इतिहास के अनेक पन्नों में उनके व्यक्तित्व को उतनी व्यापकता नहीं मिली, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। उनके जीवन को केवल युद्धों और बलिदान तक सीमित कर दिया गया, जबकि सत्य यह है कि संभाजी महाराज केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना के प्रखर प्रहरी थे। आज जब समाज वैचारिक भ्रम, सांस्कृतिक विस्मृति और इतिहास की अधूरी व्याख्याओं से जूझ रहा है, तब संभाजी महाराज का जीवन हमें यह स्मरण कराता है कि राष्ट्र केवल तलवारों से नहीं...
जन सेवक- जनता
व्यंग्य

जन सेवक- जनता

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** हम जनता है, जन सेवक बनाना हमारा मौलिक अधिकार है ।जन सेवक बनने के लिए किसी को भी कोई विश्व विद्यालय की डिग्री की आवश्यकता नहीं है। जन सेवक बनने की शुरुआत अपने क्षेत्र मे छोटे-छोटे अपराधों जैसे कोई मारपीट या छेड़खानी आदि से शुरू कर सकते है। आप को कुछ माह की जेल भी हो सकती है लेकिन आपको कोई चिंता नहीं करनी चाहिये क्योंकि जेल मे रहकर वहाँ का अनुभव आप को आगे भी काम आयेगा। जेल मे रहने से आपकी पहचान पुलिस महकमे के साथ साथ बड़े अपराधियों से भी होगी जिससे आप को हौसला मिलेगा और आप आगे बढ़ेंगे। आप बड़े अपराध जेसे हप्ता वसूली शहर के बड़े लोगों को डराने, भू माफियाओं आदि के काम से आपका नाम अख़बारों मे व टीवी चैनलों के माध्यम से फेमस होगा। यदि आप लोगों की भावनाएं भड़का कर दंगा फसाद करवाते है तो इससे भी आप को कोई परेशानी नहीं होगी क्योंकि पुलिस आ...
मेरी माँ ने ही मुझे कविता-प्रेम दिया
संस्मरण

मेरी माँ ने ही मुझे कविता-प्रेम दिया

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मैं मध्यप्रदेश के गुना जिले (अब अशोकनगर) की चन्देरी तहसील के गाँव प्राणपुर का रहने वाला हूँ। छोटा-सा गाँव है। तब तो बहुत ही छोटा था।उन दिनों गाँव में भौतिक तरक्की तो बिल्कुल नहीं थी, पर प्रेम व अपनापन बहुत था। लोग बहुत ही हिल-मिलकर रहते थे। मेरे पिताजी शासन की राजस्व सेवा में थे, और माताजी गृहिणी थीं। हालांकि माताजी मात्र आठवीं तक ही पढ़ी थीं, पर उनकी नोलेज ज़बरदस्त थी। रामायण, महाभारत, वेद-पुराणों सबका उन्हें गहरा ज्ञान था। मुझे वे पौराणिक गाथाएँ व प्रसंग सुनाती रहती थीँ। उन्हें भजन व कविताएं भी बहुत सारी याद थीं। माँ ख़ुद भी कविताओं को गढ़ लेती थीं, और तुक मिलाकर मुझे सुनाया करती थीं। जिससे मेरा सहज ही कविता के प्रति अनुराग हो गया। माँ के निर्देश पर मैं रोज़ाना शाम को रामायण भी पढ़ता था, जिससे मुझे धर्म के प्रति अनु...
सतरंगी दुनिया- २२
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- २२

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *ज़िंदगी को ठंड और घमंड दोनों से बचाकर रखना चाहिए, क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों में आदमी अकड़ जाता है।* हम लोग घर के दरवाजे पर शुभ-लाभ लिखते हैं। केवल शुभ-लाभ लिखने से कुछ नहीं होगा। शुभ विचार रखिए अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी, फिर लाभ ही लाभ होगा। भगवान ने हर इंसान को किसी वजह से बनाया है, इसलिए खुद को स्पेशल समझना शुरू कर दो। *वाणी और विचार ये दोनों प्रोडक्ट हमारी खुद की कम्पनी के हैं। इनकी क्वालिटी जितनी अच्छी रखेंगे, कीमत उतनी ही ज्यादा मिलेगी।* भिखारी भी कभी-कभी विशेष जवाब देकर सोचने को मजबूर कर देते हैं। एक व्यक्ति प्रतिदिन भिखारी को दस रुपए देता था। अचानक पिछले कुछ दिनों से उसने भिखारी को एक रूपया प्रतिदिन देना शुरू कर दिया। भिखारी ने कारण पूछा तो उस व्यक्ति ने बताया कि अब उसकी शादी हो गयी है। तब भिखारी न...
नेताजी कर्मदास की कैंची लीला
व्यंग्य

नेताजी कर्मदास की कैंची लीला

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** नेताजी कर्मदास बड़े कर्मयोगी हैं। कर्म और कर्मफल, दोनों में उनका अटूट विश्वास है। बस फर्क इतना है कि उनके कर्म का केंद्र न राष्ट्र है, न जनकल्याण, वे तो एक ही महान कर्म के लिए अवतरित हुए हैं, वो कर्म है ‘फीता काटना।‘ दिन में दो-चार फीते न कटें तो उनकी उंगलियाँ ऐसे फड़कती हैं जैसे बिना दाना देखे कबूतर बेचैन हो उठे। जेल हो या जिम, अस्पताल हो या शोरूम,बस मंच सजा हो, फीता तना हो और कैमरे तैयार हों, नेताजी अपने कर्म-प्रदर्शन के लिए तत्पर खड़े मिलेंगे। उनके अनुसार फीता काटना पतंग के पेंच लड़ाने से भी अधिक कौशलपूर्ण कार्य है। वे न सुई से, न तलवार से, सिर्फ कैंची से, एक दिन राजनीति की चाँदी काटने का सपना संजोए बैठे हैं। एक बार किसी कार्यक्रम में उन्हें भोंथरी कैंची थमा दी गई। फीता झटके से न कटा ...
कैसे बताऊँ …?
संस्मरण

कैसे बताऊँ …?

डॉ. आभा माथुर उन्नाव (कानपुर) ********************  न जाने मुसीबतें स्वयं मुझे ढूंढ लेती हैं या मैं उन्हें बुला लेती हूं. यह घटना १९६५ या १९६६ की है । मैंने १९६५ में लखनऊ विश्वविद्यालय से एम्.एड किया था. आगे एम .एड. करने की इच्छा थी परंतु लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.एड नहीं करना चाहती थी क्योंकि लखनऊ विश्वविद्यालय से एम्.एड. करने वालों को अधिकतर तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण होते देखा था। इसी ऊहापोह में एडमिशन का समय निकल गया। मैंने अगले वर्ष एम्.एड करने का मन बना लिया था, तभी एक परिचित लड़की मेरे पास आई। उसने बताया कि एक जूनियर हाई स्कूल उसी वर्ष हाई स्कूल कक्षाएं चालू करना चाहता था। परंतु उन्हें ऐसी शिक्षिका नहीं मिल रही थी जो ट्रेंड भी हो और उसके पास बी.ए. में अंग्रेजी विषय भी हो। बता दूं कि वह छोटा नगर अर्थात बदायूं था। उस जमाने में वहां केवल इंटरमीडिएट तक कॉलेज उपलब्ध थे। अतः अच्छ...
लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन
आलेख

लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** सूचना के विस्फोट के इस दौर में पत्रकारिता पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। स्मार्टफोन की स्क्रीन पर उभरती एक खबर कुछ ही पलों में जनमत तैयार कर देती है, सरकारों पर दबाव बना देती है और समाज की दिशा तक तय कर देती है। लेकिन इस तेज़, तात्कालिक और प्रतिस्पर्धा पत्रकारिता के बीच एक मूल प्रश्न बार-बार उभरता है, क्या हम अपने मूल उद्देश्य से भटक रहे हैं? यदि भारतीय परंपरा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो संचार और संवाद की अवधारणा कोई नई नहीं है। हमारे पुराणों में देवऋषि नारद जी का चरित्र इस बात का प्रमाण है कि सूचना का आदान-प्रदान केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व था। नारदजी केवल संदेशवाहक नहीं थे, वे संवाद के वाहक थे। उनका हर हस्तक्षेप किसी न किसी रूप मेंलोककल्याण से जुड़ा होता ...
यादों का घर
कहानी

यादों का घर

देवेन्द्र देव "मिर्जापुरी" बुलंदशहर (उ.प्र.) ******************** शाम ढल चुकी थी। आकाश में धूप का अंतिम रंग जैसे धीरे-धीरे सिमटकर अँधेरे में खो रहा था। घर के आँगन में खड़ा पुराना नीम का पेड़ अब भी वैसे ही खड़ा था, पर उसके नीचे बैठने वाला आज कोई नहीं था। अजय बरामदे में रखी उसी कुर्सी पर बैठा था, जहाँ कभी उसके पिता जी अख़बार पढ़ते हुए उसे जीवन की बहुत-सी छोटी-छोटी सीखें दिया करते थे। आज कुर्सी खाली थी, पर उस पर जैसे अब भी किसी के होने का अहसास बाकी था। हवा का एक झोंका आया और पास रखे अख़बार के पन्ने अपने आप फड़फड़ा उठे। अजय ने चौंककर देखा। “पिताजी…?” उसके होंठों से अनायास निकल पड़ा। कुछ क्षण के लिए उसे लगा जैसे वही परिचित आवाज सुनाई देगी- “अरे, ऐसे चौंकते क्यों हो? बैठो, कुछ बातें करते हैं…” पर वहाँ सिर्फ खामोशी थी। पिता जी को गए हुए कई महीने बीत चुके थे, लेकिन हर शाम...
उत्तर वाहिनी नर्मदा परिक्रमा
संस्मरण

उत्तर वाहिनी नर्मदा परिक्रमा

माधवी तारे लंदन ******************** उत्तरवाहिनी नर्मदा की परिक्रमा करते हुए मन लहरों की तरह हिलोरें ले रहा था। हर आती जाती लहर के साथ स्मृतियां कौंध रही थी। १९९८ से मैंने पारिवारिक कारणों से जो विदेश यात्राएं शुरू की वह आज भी अनवरत जारी हैं। करीब इतने ही वर्षों से मैं मन में नर्मदा परिक्रमा का सपना लिये हुए थी। लेकिन इतने वर्षों में लंदन, पेरिस, बर्लिन जैसे अनेक मशहूर शहर और देश देखे लेकिन नर्मदा मैया अपने पास बुलाने को तैयार नहीं थी। कभी-कभी मन को निराशा घेर लेती कि शायद यह स्वप्न कभी पूरा नहीं होगा। कभी यात्रा की तिथियां पता चलने से पहले ही फुल हो जातीं तो कभी किसी और कारण से जा नहीं पाती। इस बार फरवरी में फिर जाने का मौका लगा था लेकिन जब तक मैं हां कह पाती जगहें भर गई थी। फिर मैंने गुरु महाराज से कहा कि अब आप ही मेरा सपना पूरा करने में मेरी मदद कर सकते हो। यह कह कर मैंने महाराज के ...
हिमाचल प्रदेश और केरल की संस्कृति, भूगोल और परंपराओं की तुलनात्मकता
आलेख

हिमाचल प्रदेश और केरल की संस्कृति, भूगोल और परंपराओं की तुलनात्मकता

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हिमाचल प्रदेश और केरल भारत के दो विविध राज्यों हैं, जहाँ पहाड़ी ठंडक और उष्णकटिबंधीय समुद्र तट अपनी-अपनी संस्कृति, भूगोल और परंपराओं को समृद्ध करते हैं। ये राज्य प्रकृति, त्योहारों और लोक जीवन से भरे हैं। हिमाचल प्रदेश (उत्तर भारत) और केरल (दक्षिण भारत) की संस्कृति और भूगोल एकदम भिन्न हैं। हिमाचल ठंडी घाटियों, ऊनी वस्त्रों, सेब के बागानों और लोक नृत्यों (नाटी) के लिए जाना जाता है, जबकि केरल गर्म तटीय जलवायु, सूती परिधानों, नारियल/मसालों और शास्त्रीय कलाओं (कथकली) का केंद्र है। दोनों राज्य उच्च साक्षरता और पर्यटन के लिए प्रसिद्ध हैं। हिमाचल प्रदेश और केरल की भौगोलिक स्थिति :- हिमाचल प्रदेश हिमालय की गोद में बसा पहाड़ी राज्य है, जिसका क्षेत्रफल लगभग ५५,६७३ वर्ग किलोमीटर है। यह उत्तर में जम्मू-कश्मीर, पूर्व में तिब्ब...
संतरंगी दुनिया- २०
व्यंग्य

संतरंगी दुनिया- २०

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** यदि आप अपनी पत्नी को खुश रखना चाहते हैं तो अपने पर्स का मुँह खुला रखें और अपना मुँह बंद रखें। वक़्त बदल गया है, पहले लड़कियाँ सफेद घोड़े पर राजकु‌मार की कल्पना किया करती थी, आजकल बीएमडब्ल्यू में गधा भी आ जाए तो चलता है। *दुनिया में सिर्फ एक दिल ही है, जो बिना रूके काम करता है; इसलिए दिल को खुश रखो, वो आपका हो या पराया।* कोई इंसान अगर आपको केवल जरूरत पड़‌ने पर याद करता है, तो उस बात का बुरा मत मानिए, क्योंकि जब अंधेरा हो जाता है, तभी दीए की याद आती है। डाकू और नेता दोनों ही डाका डालते हैं, पर देखिए- डाकू को कारावास मिलता है और नेता को कार-आवास !! *हमारे देश में लॉजिक कोई नहीं मानता, सबको मैजिक चाहिए, इसलिए यहाँ साइंटिस्ट के बजाय बाबा फेमस है।* मैं नास्तिक हूँ, क्योंकि मैंने धर्म की आड़ में धंधे देखे हैं; ईश्वर नहीं। हमार...
चुनाव में खड़े होने का नहीं, बैठने का मज़ा है
व्यंग्य

चुनाव में खड़े होने का नहीं, बैठने का मज़ा है

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आप कहेंगे, चुनाव तो खड़े होने के लिए होते हैं। बिल्कुल होते हैं, पर जनाब, चुनावी गणित यूँ ही नहीं जमता। यहाँ असली खेल यह नहीं कि कौन खड़ा है, बल्कि यह है कि कौन किसे बैठा सकता है। जो जितने ज़्यादा प्रत्याशियों को अपने पक्ष में “बैठा” ले, वही असली विजेता होता है। कई नेता तो जनता से वोट माँगने से पहले ही आधे प्रत्याशी खड़े कर लेते हैं,ताकि समय आने पर उन्हें अपने पक्ष में बैठा सकें। और कुछ को जानबूझकर खड़ा रहने दिया जाता है, ताकि वे विरोधी के वोट काट सकें। यह भी लोकतंत्र का एक सूक्ष्म, किंतु सशक्त गणित है। इसी गणित के स्थायी अध्यापक हैं हमारे मोहल्ले के बब्बन चाचा,चुनाव चाहे विधानसभा का हो, संसद का, पार्षद का या सरपंच का,चाचा हर बार खड़े मिलेंगे। ऐसे खड़े जैसे बगुला ध्यान लगाए किसी शिकार ...
सेवा निवृत्त और छड़ी
संस्मरण

सेवा निवृत्त और छड़ी

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** सेवा निवृत्त होने पर मन अत्यंत प्रसन्न था। सुबह से शाम तक रोज़ाना की भागदौड़ से छुटकारा मिलने की ख़ुशी के साथ यह सोचते हुए घर लौट रहा था कि आज घर मे सब लोग बहुत ख़ुश होगे किन्तु रोज़ आफिस से घर लौटने पर चाय पानी से स्वागत करने वाले आज कोई भी चाय व पानी के लिये नहीं पूछ रहा था। घर का वातावरण एकदम शांत लगने पर मेने पत्नी से पूछा सब ठीक है, उसने भी हाँ मे अपना सिर हिला दिया। ईश्वर कृपा से बच्चे शिक्षा पूरी कर अच्छे ओहदे पर नौकरी कर रहे थे। घर की समसत रुप से ज़िम्मेदारी पूरी कर भविष्य के जीवन यापन के लिये पर्याप्त धन संचय के साथ किसी प्रकार की चिंता फ़िक्र नहीं थी। समय के इस बदलाव के साथ सुबह देरी से उठना, अनियमित समय भोजन करना, टीवी के सामने दिन गुजारना व देर रात तक जागने के कारण स्वभाव मे चिड़चिड़ापन के साथ स्वास्थ्य भी कुछ ख़राब र...
भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश
आलेख

भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत की सांस्कृतिक चेतना विविधताओं से परिपूर्ण है, जहाँ प्रत्येक क्षेत्र अपनी विशिष्ट पहचान और आध्यात्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र इसी परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है। यह भूमि केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध रही है। इसी क्षेत्र (जानापाव) से जुड़ी भगवान परशुराम की परंपरा इसे एक विशिष्ट गौरव प्रदान करती है। भगवान परशुराम का व्यक्तित्व भारतीय चिंतन में शक्ति, तप, ज्ञान और न्याय का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। उनका जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के यहाँ हुआ। वे भृगु वंश के थे और विशेष बात यह है कि वे एकमात्र ऐसे अवतार हैं, जिन्होंने ऋषि कुल में जन्म लेकर भी क्षत्रिय धर्...
जाति श्रम का विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है
आलेख

जाति श्रम का विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है

आरुषि कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** ऐसा कोई एक निश्चित वर्ष नहीं है जब जातिगत भेदभाव "शुरू" हुआ हो। यह बहुत लंबे समय के दौरान धीरे-धीरे विकसित हुआ। यह १५००–१००० ईसा पूर्व का समय था। इसकी जड़ें अक्सर ऋग्वेद के समय (लगभग १५००–१००० ईसा पूर्व) से जोड़ी जाती हैं। 'पुरुष सूक्त' नामक एक भजन में चार वर्णों (सामाजिक श्रेणियों) का वर्णन किया गया है। हालाँकि, इस चरण में, यह व्यवस्था उतनी कठोर या जन्म-आधारित नहीं थी, जैसी कि बाद के जातिगत भेदभाव में देखने को मिली। लेकिन धीरे-धीरे, ५०० ईसा पूर्व और ३०० ईसा पूर्व के बीच, 'मनुस्मृति' जैसे ग्रंथों ने सामाजिक पदानुक्रम को औपचारिक रूप देना शुरू कर दिया। इस दौरान, जाति व्यवस्था उत्तरोत्तर वंशानुगत और प्रतिबंधात्मक होती गई। शुद्धता, अपवित्रता और सामाजिक अलगाव की धारणाएँ और अधिक प्रबल हो गईं। यहाँ इसके कुछ सबसे क्रूर पहलू दिए गए ...
सड़कछाप सड़क का दर्शनशास्त्र
व्यंग्य

सड़कछाप सड़क का दर्शनशास्त्र

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सड़क का भी एक दर्शन होता है खासकर उस सड़क का, जो खुद सड़कछाप हो। वह सड़क जो कहीं टिककर नहीं रहती, हर मोहल्ले, हर मोड़, हर चुनावी वादे में आवारगी करती मिल जाती है। आजकल ऐसी सड़कें खूब चलन में हैं- चलन में इसलिए कि चलने लायक कम और दिखने लायक ज़्यादा होती हैं। सड़क साम्यवाद का जीवंत, धूल-धूसरित उदाहरण है। यहाँ गधे और घोड़े एक ही ताल में चलते हैं कभी-कभी तो पहचान ही गड़बड़ा जाती है कि कौन सा किस श्रेणी में है। पशु, पक्षी, मानव सबको सड़क समान भाव से अपनाती है। सड़क सबकी माँ है। अब अगर माँ की गोद में बैठकर कोई पूछे कि गधे-घोड़े का फर्क क्यों नहीं दिख रहा, तो इसमें माँ का क्या दोष! सड़क तो बस बनी है आओ, चलो, दौड़ो, गिरो, रौंदो जो लिखा लाए हो, वही होगा। आप सड़क पर हैं या सड़क पर लाए गए हैं यह नि...
हमारी संस्कृति
आलेख

हमारी संस्कृति

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** बचपन से अब तक यह हमारी संस्कृति है सुनता आ रहा हूँ किन्तु हमारी संस्कृति क्या है यह आज तक समझ नहीं पाया हूँ। हमारी संस्कृति कोई कला, विज्ञान, वस्तु अथवा क़ानून है जिसके अनुसार हमें चलना चाहिए। संस्कृति के विषय में कोई ग्रन्थ या नियमावली हो तो उसका मुझे ज्ञान नहीं। संस्कृति के विषय मे विभिन्न धर्मों के मठाधीश, स्वयंभू संस्कृति बचाओ रक्षक व हमारे देश के कर्णधार नेताओं के द्वारा समय समय पर चलाए गए आंदोलन और हमारे देश के शुभचिंतक समाचार माध्यमों से पक्ष विपक्ष में कराई जाने वाली बहस के माध्यम से ही संस्कृति बारे में जानकारी प्राप्त होती है ।मैने एक परिचित बुजुर्ग व्यक्ति जो आध्यात्मिक विषय में अधिक रूचि रखते हैं ,उनसे जिज्ञासा वश पूछा संस्कृति क्या है? यदि कोई जानकारी हो तो बताएँ। उनके मतानुसार जो हमारे ऋषि मुनियों व पूर्वजों ने अतीत ...
डॉक्टर हड़ताल पर हैं
व्यंग्य

डॉक्टर हड़ताल पर हैं

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज का दिन मेरी ज़िंदगी के सबसे मनहूस दिनों में बाकायदा दर्ज किए जाने लायक है। अब आप व्यंग्यप्रिय पाठक यह मत पूछ बैठिए कि क्या आज शादी की सालगिरह है। जनाब, मनहूसियत के लोकतंत्र में और भी कई अवसर होते हैं। आज डॉक्टरों की हड़ताल है। जी हाँ, धरती के भगवानों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में सारे भगवान बाकायदा हड़ताल पर हैं। अब आप सोचेंगे, इसमें मनहूस होने जैसा क्या है? हड़ताल का मतलब न ओपीडी की खटर-पटर, न इमरजेंसी की धमा-चौकड़ी ना ह मरीज़ों के रिश्तेदारों की। यानी एक दिन की खुली साँस। पर भाई साहब, इस बार डॉक्टर यूनियन ने हड़ताल को हड़ताल नहीं, नजरबंदी बना दिया है। फरमान हुआ है कि कोई शहर नहीं छोड़ेगा, कोई आउटिंग पर नहीं जाएगा। बस घर में बंद रहो और सामूहिक रूप से एक बार कलेक्ट्रेट जाकर ज्ञा...
एक माँ की कसक
लघुकथा

एक माँ की कसक

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** रोहित शर्मा, एक सम्मानित व्यवसायी, ने अपनी तेइस वर्षीय बेटी आन्या का रिश्ता एक ऐसे संपन्न संयुक्त परिवार में तय कर दिया था, जो अपने फलते-फूलते व्यापार साम्राज्य के लिए मशहूर था। उनके लिए यह किसी सपने जैसा रिश्ता था- सुरक्षा, प्रतिष्ठा और मान-सम्मान, सब एक ही प्रस्ताव में समाए हुए। कॉलेज से नई-नई निकली आन्या बेहद उत्साहित थी। भव्य समारोह, महंगे तोहफ़े और बड़े परिवार में कदम रखने का ख्याल उसके लिए किसी रोमांच से कम नहीं था। उसने मासूमियत से कहा- “माँ, वहाँ तो मेरे पास हमेशा कज़िन्स रहेंगे! मुझे कभी अकेलापन नहीं लगेगा। उनका इतना बड़ा बंगला है मां… ढेर सारे नौकरानी-नौकर हैं तो काम की भी दिक्कत नहीं होगी।” उसकी आँखों में मासूम चमक थी। पर माँ, मीरा अनुभवी थी, उसके चेहरे की मुस्कान गायब थी। उसने उस परिवार के बारे में बड़े किस्से सुने थे- जह...