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गद्य

मानसून का सरकारी आवंटन
व्यंग्य

मानसून का सरकारी आवंटन

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “सोचिए, अगर ऊपरवाले ने मानसून का ज़िम्मा नीचेवाले सरकारी तंत्र को सौंप दिया होता तो...?” सरकारी तंत्र! बाप रे बाप... यह व्यवस्था नहीं, कोई चमत्कारी प्रयोगशाला लगती। बारिश की बूँदें नहीं, नोटशीटें टपक रही होतीं-एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर तक! मानसून सीधे कैसे आ जाता? पहले फ़ाइलों की मार्किंग होती, फिर रीमार्किंग। अतिरिक्त टिप्पणियाँ लगतीं, और फ़ाइलों की घुड़दौड़ शुरू हो जाती - तहसील से पटवारी, पटवारी से एस.डी.एम., एस.डी.एम. से कलेक्टर और कलेक्टर से लेकर चायवाले तक सभी से सुझाव लिए जाते। जनमत सर्वेक्षण कराए जाते। फिर नेता लोग यह तय करते कि किस क्षेत्र में उन्हें कितने वोट मिले हैं - उसी अनुपात में वहाँ मानसून आवंटित होता। टेंडर भरे जाते, सिफ़ारिशी पत्र लगाए जाते, उन पर वजन डाला जाता। फिर जा...
सतरंगी दुनिया- ३८
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३८

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *डकार और गैस एक ही माँ के २ बेटे हैं, मगर गैस ने गलत रास्ता चुन लिया है, इसलिए उसकी कोई इज्जत नहीं करता है।* बहुत आसान है किसी पर अंगुली उठाना, परंतु बहुत मुश्किल है किसी को उठाने के लिए उसकी अंगुली पकड़‌ना। ज़िंदगी में इतनी गलतियाँ न करें कि पेन्सिल से पहले रबर घिस जाए और रबर को इतना मत घिसिए कि ज़िंदगी के पेज ही फट जाएं। रंग छोड़ते कपडे और रंग बदलते इंसान चाहे कितने ही ब्रांडेड हों, उनकी कोई इज्जत नहीं करता है। किसी के गुस्से को उसकी नफरत समझने की भूल ना करें, क्योंकि गुस्सा वही करता है; जो आपकी फिक्र करता है। स्टीकर और विश्वास दोनों एक समान है। दोबारा जरूरत पड़ने पर काम कम करते हैं। 'पत्थर' तब तक सलामत है, जब तक वो पर्वत से जुड़ा है। 'पत्ता' तब तक सलामत है जब तक वो पेड़ से जुड़ा है और 'इंसान' तब तक सलामत है, जब तक वो...
रक्षा-सूत्र
लघुकथा

रक्षा-सूत्र

डॉ. राम रतन श्रीवास बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ******************** "राधे" को सुबह-सुबह आँगन में खड़ा वह आम का पेड़ आज कुछ अधिक ही अपना-सा लग रहा था। उसकी शाखाओं पर चिड़ियाँ चहचहा रही थीं और पत्तियाँ हवा के साथ ऐसे झूम रही थीं, जैसे किसी उत्सव की तैयारी कर रही हों। "राधे" पेड़ के तने पर हाथ फेरा और धीरे से बोला.... “तूने हमारे परिवार को वर्षों से छाया देते आ रहे हो!... सु स्वादिष्ट फल देते हो!... साँसों के लिए शुद्ध हवा दे रहे हो!… आज मैं तेरी भी रक्षा का वचन देता हूँ।” "राधे" ने आम की कलाई पर (राखी) रक्षा सूत्र बाँधा और मन में एक अनोखा बंधन का अहसास.... पास खड़ा "आर्यन" बेटा आश्चर्य से पूछ बैठा!... “पापा! राखी तो भाई की कलाई पर बाँधी जाती है, फिर पेड़ को क्यों?” "राधे" मुस्कुराया!.. पेड़ की ओर देखते हुए बोला... “बेटा!.. जो हमारी रक्षा करे, उसकी रक्षा करना भी तो हमारा धर्म है। बहन-भाई...
सतरंगी दुनिया- ३७
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३७

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  ईमानदारी से काम करने वालों के शौक भले पूरे ना हों, लेकिन नींद जरूर पूरी होती है। पैसा सिर्फ आपकी लाईफ-स्टाईल बदल सकता है- दिमाग, नीयत और किस्मत नहीं। इस दुनिया में आपकी कद्र तब तक है, जब तक आप किसी की जरूरत बने रहते हैं। जिस दिन जरूरत खत्म हो जाती है, उस दिन कई रिश्तों का असली रंग भी सामने आ जाता है। *हमारी पड़ोसन ने अपने घर में एक बोर्ड लगा रखा था, जिस पर लिखा था- कृपया अपनी चप्पलों के साथ-साथ अपनी गलत सोच... गलत हरकत... सास-बहू... देवरानी-जेठानी और ननद की चुगली... बाहर ही उतार कर आएं और एक महत्वपूर्ण बात- अपनी तिरछी नजरों से मेरे पति को ना देखें, वो बहुत सीधे हैं; किसी के भी बहकावे में आ जाते हैं।* हमें वो ही लोग अच्छे लगते हैं, जो हमारी हाँ में हाँ मिलाते हैं। जो सही को सही और गलत को गलत बोलते हैं, ऐसे लोग सबकी ...
राखी का दीप
लघुकथा

राखी का दीप

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** "भैया तुम कितनी देर में आओगे?" आता हूँ जरा बिजी हूं। "भैया बहुत देर हो गई, अब तो आ जाओ।" "ट्रिन ट्रिन......" "........" "ट्रिन ट्रिन......" "........" "अरे तुम क्यों परेशान हो रही हो? तुम्हारा मिनिस्टर भाई विधवा आश्रम की महिलाओं से राखी बँधवाने में व्यस्त होगा न?" पति ने भाई को राखी बाँधने के लिए व्याकुल हो रही अपनी पत्नी से कहा, जो बार-बार भाई को फोन कर रही थी। "दरअसल बात यह है कि हम दोनों साल भर के अंतर वाले बहन-भाई हैं। साथ ही खेल-कूदकर बड़े हुए हैं। चूँकि भाई शुरू में छात्र राजनीति में रहा। कालेज का प्रेसीडेंट रहा, फिर छात्र संगठनों में शामिल होकर पार्टी पोलिटिक्स में चला गया...और फिर विधायक बनकर मिनिस्टर बन गया, पर भैया ने मुझे वचन दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, कैसे भी हालात हों, वह मुझसे राखी बँधवाने मेरे ...
पुरुष्कार का दर्शन शास्त्र
व्यंग्य

पुरुष्कार का दर्शन शास्त्र

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** हर ‘पुरस्कार’ को नमस्कार है… पुरस्कार- नाम ही ऐसा है, जैसे पुरुषत्व की विजयघोषणा हो। सुनते ही लगता है मानो पितृसत्ता का तमगा पहन लिया हो। अब तो महिलाएं भी कहने लगी हैं- “ये पुरस्कार क्यों? कुछ तो ‘महिलाकार’ जैसा होना चाहिए!” सही पूछें तो कई साहित्यकारों को पुरुष्कार की फांक लेते ही साहित्यिक मर्दानगी के लक्षण प्रकट होने लगते हैं! बिना पुरस्कार के देखो न साहित्यकार की हालत, बिल्कुल नामर्दी के शिकार मरीज़ की तरह, जो अपनी मर्ज़ का इलाज ढूंढते हुए इधर-उधर काशी, कलकत्ता, कराची, हर चांदसी, देसी और नकली आयुर्वेदिक दवाखाने की खाक छान चुका है । मिल ही जाएंगे ऐसे लोग... हाँ, आजकल इसका इलाज शर्तिया गारंटी के साथ पुरस्कार की चटनी-चूर्ण से होने लगा है! जगह-जगह लग गए हैं पुरुष्कार के ऐसे ही लंगर, खु...
लोकतंत्र की पहली पाठशाला में लौटती रौनक
आलेख

लोकतंत्र की पहली पाठशाला में लौटती रौनक

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** संदर्भ छात्रसंघ चुनाव- विश्वविद्यालयों केवल डिग्रियाँ नही गढ़ते, वे राष्ट्र का भविष्य गढ़ते हैं। करीब नौ वर्षों के लंबे मौन के बाद मध्यप्रदेश के महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनावों की आहट फिर सुनाई दे रही है। कैंपस एक बार फिर जीवंत हैं। गलियारों में चुनावी नारों की गूंज है, कक्षाओं में प्रत्याशी विद्यार्थियों से संवाद कर रहे हैं,छात्र अपने भविष्य के प्रतिनिधियों पर चर्चा कर रहे हैं और परिसर का वातावरण लोकतांत्रिक ऊर्जा से भर उठा है। यह दृश्य केवल चुनावी गतिविधियों का नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक संस्कृति की वापसी का प्रतीक है, जिसकी शुरुआत शिक्षा संस्थानों से होती है। मेरे लिए यह दृश्य केवल वर्तमान नहीं, बल्कि स्मृतियों का भी हिस्सा है। छात्र जीवन के वे दिन अनायास ही सामने आ खड़े होते हैं, जब मैं स्वयं छात्रसंघ...
सतरंगी दुनिया- ३६
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३६

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** एक बात समझ में नहीं आ रही है कि सर में दर्द होता है तो उसे सरदर्द कहते हैं और अगर नाक में दर्द होगा तो उसे 'दर्दनाक' कहेंगे क्या? *हर दवा में एक्सपायरी डेट लिखी रहती है, पर शराब क्या अमृत है कि उसमें एक्सपायरी डेट नहीं लिखी रहती है। विश्व का सबसे बड़ा आश्चर्य- यहाँ 'लेबर रूम' में 'लेबर' नहीं रहते हैं।* एक लड़का बड़ी उम्र की औरत को बार-बार घूरकर देख रहा था तो उस औरत ने कहा-कुछ तो शर्म करो मैं तुम्हारी माँ की उम्र की हूँ। लड़के ने उत्तर दिया- मैं भी अपने लिए नहीं, अपने अब्बू के लिए लड़‌की देख रहा हूँ। जो चीज मन की शांति को छीन ले, उसे छोड़ देना ही समझदारी है-चाहे वह आदत हो, सोच हो या कोई रिश्ता। झूठे लोगों के मुँह मत लगिए, आप बहस में उनसे कभी जीत नहीं पाएंगे, क्योंकि यह कलियुग है। यहाँ सच अकेला चलता है और झूठ बारात लेक...
आलमारियों का दर्शन शास्त्र
व्यंग्य

आलमारियों का दर्शन शास्त्र

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** वैवाहिक जीवन में सुख का सबसे सरल सूत्र मैं आपको बता देता हूँ, पत्नी के वॉलेट में पासवर्ड सहित एकप्लैटिनम क्रेडिट कार्ड रख दीजिए और घर में भरपूर आलमारियाँ बनवा दीजिए। या यूँ कहें कि घर नहीं, आलमारियों का ही घर बना दीजिए। वे सभी दंपत्ति सचमुच सुखी हैं, जिन्होंने मकान बनवाते समय पत्नी की आलमारी-दृष्टि को गंभीरता से लिया। डिज़ाइन पत्नी की पसंद का, ऊँचाई छत तक, और संख्या इतनी कि गिनती भूल जाए। दिन में दस बार डिज़ाइन बदलवाने पर यदि आप परेशान हो रहे हैं, तो समझ लीजिए आप अभी गृहस्थी के प्रारंभिक चरण में हैं। मेरे यहाँ तो दो आर्किटेक्ट केवल इस प्रश्न पर बदले जा चुके हैं कि “बाथरूम में आलमारी कैसे निकालें?” एक ने तो यह भी कह दिया कि ड्रॉइंग रूम में एक ही आलमारी काफी होगी। उस दिन से वह आर्किटेक्ट ह...
स्वतंत्रता का उत्सव नहीं, कर्तव्य का संकल्प भी
आलेख

स्वतंत्रता का उत्सव नहीं, कर्तव्य का संकल्प भी

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** शहीदों के सपनों का भारत नारों से नहीं, नागरिकों के चरित्र और कर्म से बनेगा १५ अगस्त केवल तिरंगा फहराने,राष्ट्रगान गाने और देशभक्ति के नारों का दिन नहीं है। यह वह अवसर है, जब राष्ट्र को अपने अतीत के बलिदानों को स्मरण करते हुए वर्तमान का आत्ममंथन और भविष्य का संकल्प करना चाहिए। स्वतंत्रता हमें संघर्ष, त्याग और असंख्य बलिदानों के बाद मिली। इसलिए यह सवाल आज भी प्रासंगिक है कि जिस भारत का सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था, क्या हम उसके निर्माण की दिशा में उतनी ही ईमानदारी से आगे बढ़ रहे हैं? भगत सिंह का साहस, चंद्रशेखर आजाद का आत्मविश्वास, नेताजी सुभाष चंद्र बोस का राष्ट्रसमर्पण, महात्मा गांधी का सत्य-अहिंसा का मार्ग और सरदार पटेल की राष्ट्रीय एकता के प्रति प्रतिबद्धता केवल इतिहास के अध्याय नहीं हैं। वे स्वतंत...
रिकॉर्ड तोड़ने नहीं आई बारिश
व्यंग्य

रिकॉर्ड तोड़ने नहीं आई बारिश

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** इस बार बड़ी मायूसी से बरसात का इंतजार हो रहा है। लगता है, बारिश अपना वादा भूल गई है। मौसम विभाग, अखबार, समाचार चैनल, सरकार और बाढ़ नियंत्रण विभाग, सबको उसने भरोसा दिलाया था कि इस बार भी वह पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी। लगता है, इस बार उसने किसी चुनावी घोषणा-पत्र से प्रेरणा नहीं ली कि बारिश और वादे में रिकॉर्ड तथा उम्मीदों को तोड़ना जायज है। वैसे भी रिकॉर्ड और वायदों में गहरा रिश्ता होता है। दोनों बनते ही टूटने के लिए हैं। हमारे यहाँ तो रिकॉर्ड ही क्या, सरकारें, गठबंधन, सड़कें, पुल और सरकारी इमारतें तक सिर्फ टूटने के लिए ही बनती हैं। कई बार उद्घाटन की पट्टिका मजबूत रह जाती है और उसके पीछे की पूरी इमारत धराशायी हो जाती है। रेलवे विभाग का एक टिकटघर, जिसका अभी उद्घाटन भी नहीं हुआ और सुना है...
सतरंगी दुनिया – ३५
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया – ३५

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *अच्छे जरूर बनें, परन्तु जरूरत से ज्यादा नहीं। अगर ज्यादा अच्छे बनेंगे तो नीम्बू की तरह निचोड़ दिए जाओगे।* याद रखिए, जहां से छल शुरू होता है, वहां से महाभारत शुरू होता है। *जो चीज मन की शांति को छीन ले-उसे छोड़ देना ही समझदारी है; चाहे वह आदत हो, सोच हो या कोई रिश्ता।* एक बार थानेदार, कलेक्टर और मास्टर बैठे हुए थे। तब थानेदार ने शेखी बघारते हुए कहा-मेरा बहुत रौब है, जब जी चाहे, किसी को भी पीट सकता हूँ। इसका समर्थन करते कलेक्टर ने कहा- मैं भी जिले का राजा हूँ, मैं जो चाहे कर सकता हूँ। आखिरी में मास्टर ने कहा- मेरा तो काई रौब नहीं है, सारा दिन छात्रों को चाँटे मारता हूँ, आगे उनकी किस्मत-कलेक्टर बनें या थानेदार। शादीशुदा व्यक्ति की गर्लफ्रेन्ड उसके घर आई। उसको देखकर बीबी चिल्लाई और बोलने लगी- एक म्यान में २ तलवार नहीं र...
आहा ग्राम्य जीवन! सुनो, सुनो मेरे विकास की कहानी…
व्यंग्य

आहा ग्राम्य जीवन! सुनो, सुनो मेरे विकास की कहानी…

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** हे पथिक, ज़रा ठहर। हाँ, तू शहर से आया है, मुझे पता है क्यों आया है। “आहा ग्राम्य जीवन” की पीएचडी करने निकला होगा। आ, मेरी छाँव में बैठ जा। जुगाड़ की सवारी ने तेरी रीढ़ की हड्डी को लोकतंत्र की तरह ढीला कर दिया होगा। मैं इस गाँव का बरगद हूँ,पुराना, अनुभवी और वक्त के थपेड़ों से घायल होकर बेकार घोषित हो चुका हूँ। पहले मेरे नीचे प्रेम कहानियाँ पनपती थीं, अब योजनायें और घोषणाओं के पोस्टर चिपकते हैं। प्रेम के नाम मिट गए, विकास के वादे चिपक गए, दोनों का हश्र लगभग एक जैसा ही है। तू पूछेगा, गाँव कितना बदला? तो सुन, गाँव बदला नहीं, बदलने की घोषणाएँ बार-बार हुई हैं। यहाँ “विकास” कम, “बदला” ज़्यादा चलता है। लोग बच्चे इसलिए पैदा करते हैं कि कोई तो पुरखों की दुश्मनी का ईएमआई चुकाए। परिवार, मोहल्ला, पू...
सतरंगी दुनिया – ३४
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया – ३४

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  यदि इंसान शिक्षा से पहले संस्कार, व्यापार से पहले व्यवहार, भगवान से पहले माता-पिता को पहचान ले हो तो ज़िंदगी में कभी कोई कठिनाई आ ही नहीं सकती। हैसियत का परिचय हमें तब देना चाहिए, जब बात आत्म सम्मान की हो। अन्यथा सादगी ही सबसे बड़ा परिचय है। *सुख में शांति है, यह हमारा भ्रम है। शांति में सुख है, यह वास्तविकता है।* हम लोग उस जमाने की पैदाइश हैं, जब रोते हुए को चुप कराने के लिए दोबारा पीटा जाता था। कभी-कभी कुछ लोग ज़िंदगी में सबक बनकर आते हैं। आँखों में ऐसी धूल झोंक जाते हैं, कि पहले से ज्यादा साफ नजर आने लगता है। भले ही आप अलग रहिए, मगर अपने माता-पिता और भाइयों से जुड़े रहिए, क्योंकि मुसीबत में यही अपने आपके आसपास नजर आएँगे, बाकी की दुनिया हाल पूछने भी नहीं आएगी। समय, सेहत, दोस्त और और व्यापार ऐसे कीमती निवेश हैं, जो...
भावनात्मक और आध्यात्मिक पवित्र माह- सावन
आलेख

भावनात्मक और आध्यात्मिक पवित्र माह- सावन

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** जब तपती धरती वर्षा की पहली बूंदों से शीतल होती है, जब सूखे वृक्षों पर फिर से हरियाली लौट आती है और जब वातावरण में मिट्टी की सोंधी सुगंध जीवन के पुनर्जन्म का एहसास कराती है, तभी भारतीय संस्कृति का सबसे भावनात्मक और आध्यात्मिक पवित्र माह-सावन आरंभ होता है। यह केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि मनुष्य, प्रकृति और परमात्मा के बीच संतुलन स्थापित करने का काल है। भारतीय परंपरा ने सावन को मात्र धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं माना, बल्कि आत्मशुद्धि, सामाजिक अनुशासन, स्वास्थ्य-संरक्षण और पर्यावरण चेतना का जीवंत पर्व बनाया है। यही कारण है कि सहस्राब्दियों बाद भी सावन की प्रासंगिकता अक्षुण्ण बनी हुई है। आज जब मनुष्य अभूतपूर्व भौतिक प्रगति के बावजूद मानसिक तनाव, सामाजिक विखंडन और पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है, तब सावन का ...
चार लोग कुछ नहीं कहेंगे तो क्या होगा
व्यंग्य

चार लोग कुछ नहीं कहेंगे तो क्या होगा

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** चार लोगों की चिंता इस दुनियादारी में सभी को है। सभी एक-दूसरे को बस यही नसीहत देने में लगे रहते हैं, "देखो, ऐसा मत करो। अगर ऐसा किया तो चार लोग क्या कहेंगे, पता है? चार लोग देख लेंगे तो... अरे, चार लोगों का तो ख्याल करो!" लेकिन सोशल मीडिया ही एक ऐसी जगह है, जहाँ इसके उलट, इन चार लोगों का इंतजार किया जाता है। सोशल मीडिया में वही चार लोग अचानक देवता बन जाते हैं। हसरत भरी निगाह से बस चार लोग आ जाएँ मेरी पोस्ट पर... कुछ कह जाएँ, और कुछ नहीं तो कम से कम लाइक का बटन ही दबा जाएँ। वरना पोस्ट की आत्मा अधर में लटक जायेगी मित्र । पोस्ट डालते ही मन की स्थिति किसी मछुआरे जैसी हो जाती है। काँटा पानी में फेंका और आँखें लहरों पर टिकीं हुई, कब कोई कमेंट रूपी मछली फँसे। मोबाइल स्क्रीन उस तालाब का पानी है,...
नारे नहीं, राष्ट्र चाहिए : नीट विवाद और व्यवस्था परिवर्तन का समय।
आलेख

नारे नहीं, राष्ट्र चाहिए : नीट विवाद और व्यवस्था परिवर्तन का समय।

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** किसी भी राष्ट्र का भविष्य संसदों में जितना तय होता है, उससे कहीं अधिक उन परीक्षा-कक्षों में निर्धारित होता है, जहाँ करोड़ों युवा अपने श्रम, संयम और स्वप्नों के साथ बैठते हैं। वहाँ केवल प्रश्नपत्र नहीं खुलते, वहाँ भविष्य के चिकित्सक, वैज्ञानिक, शिक्षक और राष्ट्रनिर्माता आकार लेते हैं। इसलिए जब किसी राष्ट्रीय परीक्षा की पवित्रता पर प्रश्न उठता है, तब आहत केवल एक परीक्षा नहीं होती, घायल राष्ट्र का विश्वास होता है। भारत की संस्कृति ने ज्ञान को कभी व्यापार नहीं माना। हमारे यहाँ विद्या को "सरस्वती" कहा गया, क्योंकि वह केवल जीविका का साधन नहीं, जीवन का संस्कार है। नालंदा और तक्षशिला की परंपरा से लेकर आधुनिक भारत की प्रतियोगी परीक्षाओं तक एक सूत्र निरंतर दिखाई देता है प्रतिभा का सम्मान। यदि यह सूत्र टूटता है, तो केवल व्य...
सतरंगी दुनिया- ३३
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३३

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  *हमारे समाज को सब पता है कि कौन किसके साथ घूम रहा है, किसकी बहू, बेटी कहाँ जा रही है, और किसके बेटे का कहाँ लफड़ा है ? लेकिन किसके घर आज खाना नहीं बना, ये समाज को नहीं पता और न ही जानना चाहते हैं।* शेर को पकड़ने के ३ तरीके हैं। (१) न्यूटन का तरीका- शेर को अपने पास आने दो जैसे ही हमारे पास आ जाए, उसे पकड़ लो। (२) आइंस्टाइन का तरीका-शेर का तब तक पीछा करो, जब तक कि वह थक न जाए, जैसे ही वह थक जाए, उसे पकड़ लो और अंतिम तरीका पुलिस का-खरगोश को पकड़ो और उसे तब तक पीटते रहो; जब तक कि वह स्वीकार न कर ले कि वही शेर है। कलियुग चल रहा है गलत को गलत ही रहने दो। अगर गलत को गलत साबित करने जाओगे तो खुद ही गलत साबित कर दिए जाओगे। सुबह पत्नी चाय-नाश्ता पूछने आई तो मैंने कहा-बना दो। फिर रुक कर पूछने लगी- ये मोदी जी १ दिन में तीन देश कैस...
मानसून का सरकारी आवंटन
व्यंग्य

मानसून का सरकारी आवंटन

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “सोचिए, अगर ऊपरवाले ने मानसून का ज़िम्मा नीचेवाले सरकारी तंत्र को सौंप दिया होता तो...?” सरकारी तंत्र! बाप रे बाप... यह व्यवस्था नहीं, कोई चमत्कारी प्रयोगशाला लगती। बारिश की बूँदें नहीं, नोटशीटें टपक रही होतीं-एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर तक! मानसून सीधे कैसे आ जाता? पहले फ़ाइलों की मार्किंग होती, फिर रीमार्किंग। अतिरिक्त टिप्पणियाँ लगतीं, और फ़ाइलों की ड़दौड़ शुरू हो जाती- तहसील से पटवारी, पटवारी से एस.डी.एम., एस.डी.एम. से कलेक्टर और कलेक्टर से लेकर चायवाले तक सभी से सुझाव लिए जाते। जनमत सर्वेक्षण कराए जाते।फिर नेता लोग यह तय करते कि किस क्षेत्र में उन्हें कितने वोट मिले हैं- उसी अनुपात में वहाँ मानसून आवंटित होता। टेंडर भरे जाते, सिफ़ारिशी पत्र लगाए जाते, उन पर वजन डाला जाता। फिर जाकर म...
सतरंगी दुनिया- ३२
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३२

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *गिरगिट ने आत्महत्या कर ली और सुसाईड नोट में लिखा-इंसान से ज्यादा मैं रंग नहीं बदल सकता।* हमें हमेशा अपने लिए अच्छा सोचना चाहिए, क्योंकि गलत सोचने के लिए तो दुनिया बैठी है। *कभी भी अफवाहों पर ध्यान मत दीजिए, क्योंकि अफवाह जलने वाले पकाते हैं, इसे मूर्ख परोसते हैं और बेवकूफ उसे खाते हैं।* 'सब्र का फल मीठा होता है', इसी कहावत के चक्कर में मेरे २ सब्र के फलों की शादी हो गई और कल एक और की सगाई होने वाली है। *जमाने का सच देखिए- "अफवाहें बिना पैर के दौड़ती है और सच लंगड़ाकर चलता है।* अगर आपको उपवास करने का शौक है तो विचारों का करें, अगर भूखे रहने से भगवान खुश होते तो गरीब सबसे सुखी होते। *आजकल रोटी गैस पर बनती है, इसलिए खाने के बाद पेट में गैस बनती है।* आजकल रिश्तेदार भी बदल गए हैं, बचपन में जब वो हमारे घर आते थे तो पैसे द...
मरने की फुर्सत नहीं
व्यंग्य

मरने की फुर्सत नहीं

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** डेस्कटॉप पर वे सारे काम खुले पड़े थे, जिनकी उम्मीद सामान्यतः किसी डॉक्टर से नहीं की जाती- सोशल मीडिया, लेखन, फोटोशॉप, कैनवा और न जाने कितनी रचनात्मक टैबें। तभी श्रीमतीजी का चिर-परिचित ताना कानों में पड़ा- “कंप्यूटर पर आँखें गड़ाए रहते हो, कभी हॉस्पिटल पर भी ध्यान दे लिया करो!” रोज़ ऐसे वाक्य चाय के साथ निगल जाता हूँ, लेकिन उस दिन चाय पहले ही समाप्त हो चुकी थी, इसलिए ताना गले में अटक गया। मैंने निश्चय किया कि आज दुनिया को दिखाऊँगा कि मैं भी एक गंभीर और व्यस्त डॉक्टर हूँ। बाथरूम में चिड़िया-स्नान किया, गीला तौलिया बिस्तर पर छोड़ा, अधोवस्त्र फर्श पर और अलमारी से एक जोड़ी कपड़े निकालते हुए चार जोड़ियाँ नीचे गिरा दीं। डॉक्टर होने में भले कमी रह गई हो, पतिपन के संस्कारों का प्रदर्शन पूरे मनो...
कठपुतली
आलेख

कठपुतली

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कठपुतली एक कला है। काठ का अर्थ है लकड़ी, और पुतली अर्थात गुड़िया। पहले मनोरंजन केलिए कलाकार काठ की गुड़िया ऐसी बनाते कि उनके हाथ पैर सब हिला सकते थे और उनमें डोरियां बांधकर तमाशा दिखाकर लोगों का मनोरंजन किया करते थे। कोई भी कहानी हो इन गुड़ियों के माध्यम से समझा दिया करते थे। जब सिनेमा का दौर आया तो यह कला छुप गयी। अब तो शोपीस की तरह घरों में इन्हें सजाया जाता है। बनाई तो आज भी जाती है, पर नचाई नहीं जाती है। कुछ निजी जीवन भी ऐसा ही है। पहले नारी शक्ति थी। मुगलों की संस्कृति का अनुसरण कर भारत में नारी को घर में बंद कर दिया गया। शिक्षा का अधिकार छीन लिया। पुरुष प्रधान समाज का निर्माण हुआ, नारी उसकी इच्छानुसार चलने वाली कठपुतली बन कर रह गई। आज जब उसे शिक्षा और सुरक्षा के मायने समझने लगे तो वह सारे बंधन तोड़ निरंकुश हो...
प्रयागराज का महाकुम्भ- २०२५ आस्था का ‘महामेला’
पुस्तक समीक्षा

प्रयागराज का महाकुम्भ- २०२५ आस्था का ‘महामेला’

समीक्षक- सुधीर श्रीवास्तव 'प्रयागराज का महाकुम्भ २०२५- आस्था का महामेला' महाकुम्भ के बहुआयामी स्वरूप के काव्यात्मक/ चित्रात्मक अभिव्यक्ति को सैद्धांतिक/वैचारिक और आध्यात्मिकता का अनुपम उदाहरण है। वरिष्ठ कवयित्री डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय "पूर्णा" द्वारा रचित प्रस्तुत संग्रह कविताओं का संकलन नहीं, अपितु महाकुंभ का आँखों देखा हाल जैसा महसूस कराता है। महाकुम्भ २०२५ जीवंत अनुभवों, आस्था, अध्यात्म, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त, संग्रहणीय दस्तावेजी, ग्रंथ स्वरुप में महाकुम्भ के विभिन्न आयामों का खूबसूरत और प्रभावी चिंतन पूरे मनोयोग से चित्रित किया गया है। विविध रचनाओं यथा गंगा मैया, आध्यात्मिक चेतना का पर्व, सफाईकर्मी, संगम ही संगम, विदेशी मेहमान, किन्नर अखाड़ा, मकर संक्रांति, कल्पवास, दंडी स्वामी, रुद्राक्ष वाले बाबा, कांटे वाले बाबा, हे महाकुंभ, कल्पवास में पाया, नागवासुकी मंदिर, पुलिस का...
अंतर विश्वास
सत्यकथा

अंतर विश्वास

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जब सारे सहारे खत्म हो जाएंगे, तब ईश्वर का विश्वास ही सहारा देकर आगे बढ़ते रहने की शक्ति प्रदान करेगा। यह सत्य प्रमाणित है। इंदौर ऐसे ही बस बच्ची को लेने जाना था, उसका फ़ोन आया दादी मेरी परीक्षा हो गई है। मुझे लेने आ जाओ। मैं बिना पर्स चैक किए निकल गई, क्योंकि १००-५० रुपये तो पड़े ही रहते हैं। कहीं और कुछ काम था नहीं। बच्ची को लेकर रोड़ पर रिक्शा का रास्ता देख रही थी। एक वृद्ध दंपति आकर सामने खड़े हो गए, और कहा-हमें कुछ खाने को मिल सकता है क्या मेरे पति को मैं अस्पताल से छुट्टी दिलाकर लाई हूं, दवाई से पहले खाना जरुरी है। मेरे पास चार पांच चने के परांठे थे। बेटे ने रख दिए थे। मैंने देखा पैसे इतने नहीं कि दोनों का पेट भर जाए। मैंने कहा आप यह परांठे रखिए और इन्हें खिलाकर दवाई दीजियेगा। कुछ व्यवस्था आपकी करते हैं। वह कहने ल...
सतरंगी दुनिया- ३१
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३१

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  एक कंजूस महिला ने अपनी वसीयत तैयार की, लिखा-मैं पुर्नजन्म में विश्वास करती हूँ, इसलिए यह वसीयत अपने नाम कर रही हूँ, ताकि मेरे द्वारा छोड़ी हुई सम्पत्ति अगले जन्म में मुझे ही मिले। बूंद-सा जीवन है इंसान का ? लेकिन अहंकार सागर से भी बड़ा है। *ये ज़िंदगी तब तक हल्की है, जब तक सारे बोझ माँ-बाप ने उठाए होते हैं।* केवल खून के रिश्ते ही महत्वपूर्ण नहीं होते। मुसीबत में हाथ थाम लेने से बड़ा कोई रिश्ता नहीं। सच बोलना तो दूर की बात, आजकल लोग सच सुनना भी पसंद नहीं करते हैं। नियंत्रण जरूरी है यदि आमदनी कम हो तो खर्चों पर और जानकारी कम हो तो शब्दों पर। *बहुत पढ़ाई कर ली, पर मैं भी कुछ सवाल हल नहीं कर पाया। यदि आपके पास इनके जवाब हों तो अवश्य बताइए-यदि भाड़ में जाना हो तो किससे जाय पैदल, आटो या रेलगाड़ी से ? यदि किसी के पाप का घड़ा भर...