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माता कैकेई – चरित्र वर्णन

आशा शर्मा
धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश)
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सूक्ष्म परिचय-
माता कैकेई कैकय देश की राजकुमारी थी। वे शास्त्र और शस्त्र विद्या में निपुण थीं। उन्हें राजनीति का भी सम्यक ज्ञान था। इसीलिए वे देवासुर संग्राम में राजा दशरथ की सारथी बनकर उनके साथ रहीं। जब महाराज दशरथ घायल हो गए, तो कुशल राजनीतिज्ञ की भांति उन्हें सुरक्षित बचाकर ले आई थी।
एक युद्ध में रावण ने जब उनके रुप और सौंदर्य पर कटाक्ष किया तो, उन्होंने कहा कि इक्ष्वाकु वंश में जन्मा बालक ही तुझे मृत्यु की गोद में सुलाएगा। मेरा यह वचन है। तेरे समूल वंश को मिटा देगा और इस अपमान का जवाब तुझे अवश्य देगा।

समय बीतता गया जब भगवान राम का अवतार हुआ कैकयी की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। वे जानती थी कि यह नारायण हैं। माता कौशल्या से भी अधिक प्रेम वे राम से करती थी। जब रामजी के राज तिलक की घोषणा हुई तो वे माता कैकेई से बोले मां आप मुझसे कितना प्रेम करती हैं। मैं कुछ मांगूं तो मना तो नहीं करोगी। मां ने कहा राम तुम मेरे प्राण भी मांगों तो मैं सहर्ष स्वीकार कर लूंगी। मेरा राम मूझसे मांगे तो सही।
भगवान राम ने कहा मां मैं उससे भी अधिक मांगूं तो, उससे आपका संसार में अपयश होगा, हो सकता है आपको वैधव्य सहना पड़े, भरत के कटु वचन सहना पड़े और भी तिरस्कार सहना पड़े, क्या फिर भी आप मेरी मांग पूरी करेंगी।
कैकेई सब जानती थी कि रावण का वध राम ही के हाथों होगा, यदि राजा बन गये तो मेरा वचन मिथ्या हो जाएगा। वे मुस्कुराते हुए बोली राम मुझे तुम्हारे लिए सब स्वीकार है, तूम मांगों तो सही। भगवान राम जानते थे कि मां को बहुत दुःख होगा इसलिए पहले मां सरस्वती से मन-ही-मन प्रार्थना की हे मां आप माता की जिव्हा पर विराजमान हो कर मेरा कार्य कीजिए। वे मेरे लिए वनवास और भरत के लिए राज्य मांग लें, तभी मेरे जन्म का उद्देश्य और माता कि वचन पूरा हो सकेगा।
फिर मां शारदा ने बहुत विचार किया कैकयी से यह करवाया जाना कठिन है। तब उन्होंने मंथरा की सहायता से कैकेई की बुद्धि पर ताला लगा दिया और कैकयी ने दो वरदान जो देवासुर संग्राम में राजा दशरथ ने उन्हें दिए थे मांग लिए। भरत को राज्य और राम को चौदह वर्ष का वनवास, इस प्रकार कैकयी ने भगवान राम की लीला में सहयोग किया है। वे आदरणीय हैं। वे लोग जो उन्हें दोषी कहते हैं नादान हैं। इतना बड़ा त्याग तो तपस्या से भी बढ़कर है। यही उनके आदर्श जीवन का सत्य है। इसीलिए कैकेई के बाद दूसरी कोई कैकेई हो ही नहीं सकती थी।
सत्य वचन है रामायण में वर्णित है।

परिचय : आशा शर्मा
पति : श्रीहनुमान प्रसाद शर्मा
निवासी : धरमपुरी सांवेर रोड इंदौर (मध्य प्रदेश)
सम्प्रति : शिक्षिका हायरसैकैंडरी स्कूल
साहित्यिक परिचय : कविता, भजन, लघुकथा, लेख, आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। शिक्षण कार्य में निबंध लेखन किया है।
अन्य : विश्व रचनाकार मंच, शारदा साहित्य मंच, मनपसंद हास्य योग कला साहित्य मंच, शब्दसागर समूह, शुभ संकल्प समूह, आदि मंचों पर निरंतर लेखन कार्य। एवं पूर्व में आडियो कैसेट के लिए लेखन। अंतरराष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ अयोध्या मंच, पर संचालन, शुभ संकल्प समूह प्रकाशन से एवं अनेक मंचों से श्रेष्ठ लेखन के लिए सम्मानित।
प्रकाशन : “मैं कणिका मेरी कथा” आत्मकथा का प्रकाशन।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।


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