Monday, April 20राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

व्यंग्य

सड़कछाप सड़क का दर्शनशास्त्र
व्यंग्य

सड़कछाप सड़क का दर्शनशास्त्र

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सड़क का भी एक दर्शन होता है खासकर उस सड़क का, जो खुद सड़कछाप हो। वह सड़क जो कहीं टिककर नहीं रहती, हर मोहल्ले, हर मोड़, हर चुनावी वादे में आवारगी करती मिल जाती है। आजकल ऐसी सड़कें खूब चलन में हैं- चलन में इसलिए कि चलने लायक कम और दिखने लायक ज़्यादा होती हैं। सड़क साम्यवाद का जीवंत, धूल-धूसरित उदाहरण है। यहाँ गधे और घोड़े एक ही ताल में चलते हैं कभी-कभी तो पहचान ही गड़बड़ा जाती है कि कौन सा किस श्रेणी में है। पशु, पक्षी, मानव सबको सड़क समान भाव से अपनाती है। सड़क सबकी माँ है। अब अगर माँ की गोद में बैठकर कोई पूछे कि गधे-घोड़े का फर्क क्यों नहीं दिख रहा, तो इसमें माँ का क्या दोष! सड़क तो बस बनी है आओ, चलो, दौड़ो, गिरो, रौंदो जो लिखा लाए हो, वही होगा। आप सड़क पर हैं या सड़क पर लाए गए हैं यह नि...
डॉक्टर हड़ताल पर हैं
व्यंग्य

डॉक्टर हड़ताल पर हैं

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज का दिन मेरी ज़िंदगी के सबसे मनहूस दिनों में बाकायदा दर्ज किए जाने लायक है। अब आप व्यंग्यप्रिय पाठक यह मत पूछ बैठिए कि क्या आज शादी की सालगिरह है। जनाब, मनहूसियत के लोकतंत्र में और भी कई अवसर होते हैं। आज डॉक्टरों की हड़ताल है। जी हाँ, धरती के भगवानों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में सारे भगवान बाकायदा हड़ताल पर हैं। अब आप सोचेंगे, इसमें मनहूस होने जैसा क्या है? हड़ताल का मतलब न ओपीडी की खटर-पटर, न इमरजेंसी की धमा-चौकड़ी ना ह मरीज़ों के रिश्तेदारों की। यानी एक दिन की खुली साँस। पर भाई साहब, इस बार डॉक्टर यूनियन ने हड़ताल को हड़ताल नहीं, नजरबंदी बना दिया है। फरमान हुआ है कि कोई शहर नहीं छोड़ेगा, कोई आउटिंग पर नहीं जाएगा। बस घर में बंद रहो और सामूहिक रूप से एक बार कलेक्ट्रेट जाकर ज्ञा...
“कवि, कविता और वो …”- कवि शब्दशेखर ‘उन्मुक्त’
व्यंग्य

“कवि, कविता और वो …”- कवि शब्दशेखर ‘उन्मुक्त’

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** कवि के लिए कविता जैसे चौथ का चाँद, और कवि जैसे चकोर- एकटक निहारता हुआ अपनी कविता को... कविता ही उसकी ओढ़नी, बिछावन, सब कुछ। कवि महोदय की रातें और पत्नी की नींद के बीच छिड़ जाती है छंदों की जंग। बस दिख जाए कविता- विचारों के उमड़ते-घुमड़ते बादलों के बीच कहीं एक झलक मिल जाए, एक पूँछ सी ही नजर आ जाए, फिर तो खींच के निकाल लेंगे बाहर! कवि बेचारा, कविता का मारा- मारा-मारा फिरता है जंगल में। कविता जैसे बाघिन- दिखेगी तभी ‘साइटिंग’ होगी। ‘दिखेगी तनिक गम्म तो खाओ! कवि अपनी लेखनी की बंदूक ताने बस फिरता है दिखे कहीं, तो करे शिकार। पूरी कविता नहीं तो पूँछ ही मिल जाए, उसी को ले जाकर दिखा देंगे! कविता की पूँछ पकड़ना भी बहुत ही "कवियोचित", काम है, मित्र। इधर कवि से अग्निसमक्ष सात फेरे लेकर आयी वो ..यानी...
जूता शास्त्र
व्यंग्य

जूता शास्त्र

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ******************** पता नहीं लोग कहां से टूटे-फटे पुराने जूते उठा लाते हैं और मंचों पर फेंकने लगते हैं। कुछ को जूते लग भी जाते हैं तो कुछ माइक स्टैंड का सहारा लेकर बच भी जाते हैं। जोश में कुछ लोग अपने नए जूते भी उछाल देते हैं। मैं भी बचपन में कई बार इमली और अमिया तोड़ने के लिए पत्थर की जगह चप्पल उछाल देती थी। पर जब भी चप्पल पेड़ की फुनगी पर अटक गई और लाख कोशिशें के बाद भी नीचे नहीं गिरी तो चप्पल उछालना छोड़ दिया क्योंकि चप्पलों का उछालना कई बार बड़ा महंगा पड़ा। लोग चप्पल जूते की जगह सड़े टमाटर और सड़े अंडे उछालते हैं जो सामने वाले को घायल कम रंगीन अधिक कर देते हैं। महंगाई का जमाना है पुराने जूते काम आ सकते हैं पर सड़े टमाटर फेंकने के अलावा और किसी काम के नहीं रहते। अब इन्हें कहां फेंका जाए यह आपकी जरूरत पर निर्भर करता है। सड़कों पर जूते चलना आम बात ...
आश्वासन पुराण
व्यंग्य

आश्वासन पुराण

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सभा-मण्डप में धूप के छिन्न-भिन्न कण थिरक रहे थे। मध्य आसन पर विराजित महामुनि ने दीर्घ श्वास लेकर अपनी दृष्टि उस नवदीक्षित राजकुमार पर स्थिर की, जो राजनीति के रणक्षेत्र में प्रविष्ट होने के लिए अभिमन्यु- सा उत्साह लेकर आया था। राजकुमार ने करबद्ध होकर निवेदन किया “गुरुदेव, राजनीति का मार्ग कठोर और दुर्गम कहा गया है। कृपा कर वह दिव्य अस्त्र बताइए जिसके बल पर जनमानस जीता जा सके और सिंहासन की अक्षुण प्राप्ति हो।” मुनि के अधरों पर मंद मुस्कान उदित हुई; बोले- “वत्स, राजनीति में न शस्त्र काम आता है, न शास्त्र का गहन अध्ययन। यहाँ एक ही महामंत्र है आश्वासन। यही वह अदृश्य अस्त्र है जिसके बल पर राजसिंहासन डोलता भी है और टिका भी रहता है।” मुनि का स्वर गंभीर हुआ, “लोकतंत्र की भूमि में जो सबसे हरी-भरी...
बाप रे बाप
व्यंग्य

बाप रे बाप

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज हम बात करेंगे ‘बाप’ की। भगवान ने सबको एक ही बाप दिया, लेकिन दुनिया में तो बापों की बाढ़ आई हुई है। हर कोई ‘बाप’ बनने पर तुला है, कोई ‘बेटा’ बनना नहीं चाहता। एयरपोर्ट, ट्रैफिक लाइट या रेलवे लाइन पर झगड़ते लोग अक्सर चिल्लाते मिलते हैं- “तू जानता है, मेरा बाप कौन है?” और कई बार कोई सीधा-सादा आदमी उन्हें जूतों से याद भी दिला देता है कि उनका बाप कौन है। जिसका बाप विधायक है, वो मोहल्ले में कोतवाल बनकर घूमता है। ‘बाप का आशीर्वाद’ लेकर गालियाँ बाँटता है, लोगों को डराता है। बाप बेचारा अपने बेटों की परवरिश में खुद कूट-कूटकर संस्कार भरता है और बदले में वही बेटे उसके सिर पर सवार होकर बाप के बाप बन जाते हैं। कहते है- “गुरु गुड़ रह गया, चेला चीनी हो गया”, और अब तो बेटा बाप का भी बाप बन गया है, ज...
मेरे दोस्त दुखीचंद
व्यंग्य

मेरे दोस्त दुखीचंद

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** "यह संसार दुखालय कहा गया है। दुख इस संसार का सबसे बड़ा प्रेरक बल है। दुःख न हो तो बाबाओं की, नेताओं की, अधिकारियों की दुकानदारी नहीं चले। दुःख है तो दुःख को रोने वाले हैं, दुःख प्रकट करने वाले हैं, विलाप करने वाले हैं! दुःख ही है जो आदमी के साथ जीवन भर चिपका रहता है। सुख क्या है? चार दिन की चांदनी- ऐसे गायब होती है जैसे चुनाव के बाद नेताजी, मतलब निकल जाने के बाद दोस्त।" ये विचार यूँ ही नहीं आए। इनके पीछे एक ठोस वजह है- मेरा मित्र विनोद, जिसे मैं प्रेम से दुखीचंद कहता हूँ। नाम उसका विनोद है, पर विनोद से उसका संबंध उतना ही है जितना संसद से शांति का। उसके चेहरे पर दुख का स्थायी भाव रहता है- मानो भगवान ने सारे दुखों का ठेका उसी को दे दिया हो। हम एक ही मोहल्ले में रहते हैं, इसलिए उससे बचना उ...
सतरंगी दुनिया- १९
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- १९

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** भगवान ने हथेली के आगे अंगुलियाँ इसलिए बनाई है कि पहले आप कर्म करें, फिर भाग्य को महत्व दें। बिना कर्म के आपका अच्छा भाग्य नहीं बन सकता है। इंसान कितना भी गोरा क्यों न हो, परन्तु उसकी परछाई काली ही होती है। *मरने के बाद अर्थी को चार लोग कंधा देते हैं, अर्थात सहारा देते हैं। अगर इन चारों में से किसी एक ने जिन्दा रहते हुए उस व्यक्ति को सहारा दिया होता तो शायद मरने की नौबत नहीं आती।* एक बात गाँठ बांधकर रखिए- ज़िंदगी की दौड़ में जो आपको दौड़ कर नहीं हरा सकते, वे आपको तोड़ कर हराने की कोशिश जरूर करते हैं। उम्र के इस दौर में मैं क्या 'वैलेन्टाईन डे' मनाऊँगा, क्योंकि अब 'टेडी बियर' भी 'ठंडी बियर' सुनाई देता है। ज़िंदगी का यह कड़‌वा सत्य है कि हम पहला स्नान भी स्वयं नहीं कर पाते हैं और अंतिम स्नान भी हमें दूसरे लोग कराते हैं। ज़िं...
महिला उत्थान कार्यक्रम
व्यंग्य

महिला उत्थान कार्यक्रम

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** यहाँ एक ठरकी महाशय की महागाथा प्रस्तुत है, जिनकी ठरक किसी मनचले तूफान की तरह है कब, कहाँ, किसे उड़ा ले जाए, इसका कोई भरोसा नहीं। वैसे तो ये सरकारी नौकरी में हैं, लेकिन इन्हें लगता है कि समाज के इस आधे तबके के प्रति भी इनका दायित्व बनता है- जैसे भी, जहां भी, जितना भी बन पड़े… महिला उत्थान करना अनिवार्य है! तो ये खुद को "महिला सशक्तिकरण" का स्वयंभू मसीहा मान बैठे हैं। इनका दर्शन बड़ा स्पष्ट है जितनी अधिक महिलाओं का "उत्थान" करेंगे, उतनी ही अधिक इनकी आत्मा को तृप्ति मिलेगी। यूँ तो शादी-शुदा हैं, लेकिन सिर्फ घर की मुर्गी का ही उत्थान करें इस वहम से कोसों दूर हैं। इनका ध्येय वाक्य है- शादी-वादी सब ढकोसला है, असली मकसद तो महिलाओं के उद्धार में जीवन अर्पित करना है! महिला दिवस नज़दीक आते ही इन्...
सतरंगी दुनिया-१८
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया-१८

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** ईमानदारी का महत्व इसी बात से समझ में आता है, कि जो व्यक्ति स्वयं गलत काम करता है, परंतु अपने नौकर से ईमानदारी की अपेक्षा करता है। वफादार सभी कोई चाहते हैं, परन्तु स्वयं कोई बनता नहीं चाहता। *हमारे देश में सरकारी अस्पताल का मतलब है- जान से हाथ धोना, और प्राईवेट अस्पताल का मतलब है-जायदाद से हाथ धोना, इसलिए समझदार बनिए और अपनी सेहत का ध्यान रखिए, ताकि आपको अस्पताल के चक्कर काटने पड़ें।* जो दूसरों को इज्जत देता होता है, असल में वो इज्जतदार होता है, क्योंकि इंसान दूसरों को वही दे पाता है, जो उसके पास होता है। *एक बात समझ से परे है कि 2 अक्टूबर गांधी जयंती पर शराब के ठेके बंद रहते हैं और ३० जनवरी गांधी जी की मृत्यु के दिन शराब के ठेके खुले रहते हैं।* रुद्राक्ष हो या इंसान, एकमुखी बहुत कम ही मिलते हैं। उपदेश और सलाह हमारे ...
इलाज का टेंडर
व्यंग्य

इलाज का टेंडर

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** "डॉक्टर साहब, आप तो ये बताओ, इलाज में कुल खर्चा कितना बैठेगा?" मरीज़ एक्सीडेंट का है। जाहिर है, मरीज़ के सभी अटेंडेंट डील ब्रेकर बनकर आए हैं। इनमें असली घरवाले कौन हैं, यह पता लगाना मुश्किल है। भीड़ देखकर लगता है कि मामला एक्सीडेंट का है और एक्सीडेंट करने वाले को पकड़ लिया गया है। मरीज़ को अस्पताल के हवाले कर दिया गया है, और बाहर एक्सीडेंट करने वाले का गिरेबान पकड़कर गालियां दी जा ही हैं, धमकाया जा रहा है। पुलिस केस की धमकी से जितना ऐंठ सकते हैं, उतना ऐंठने की कोशिश में लोग लगे हुए हैं। इस बीच, कुछ ऐसे मामलों के दलाल, जो इस मौके का निवाला खाने के आदी होते हैं, तुरंत सूंघकर आ जाते हैं। ये वो लोग होते हैं जो दोनों पार्टियों से अपनी जान पहचान बना लेते हैं। कुछ वकील, जिनकी रोज़ी-रोटी ऐसे ह...
सरसों के चेपे और मेरी पीली टी-शर्ट
व्यंग्य

सरसों के चेपे और मेरी पीली टी-शर्ट

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज मौसम ने जाने किस ज्योतिषीय गणना के बाद यह तय किया कि अब ठिठुरन को रिटायरमेंट दे देना चाहिए। सुबह की धूप में वह पुरानी खीझ नहीं थी, जो हड्डियों में उतरकर ऑर्थोपेडिक चेतना को भी कंपा दे। आज की धूप में वसंती उष्णता थी- हल्की, लुभावनी, आत्मविश्वासी। जैसे बसंत ऋतु ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर घोषणा कर दी हो- “मैं आ चुकी हूँ, कृपया पीला परिधान धारण करें।” वसंती स्वर्णिम रंग ने मुझे भी अपने प्रभाव में ले लिया। अलमारी खोली तो महीनों से अंदर-बाहर होती, मौसम विभाग की अनिश्चितताओं की शिकार, एक आग्नेय वर्ण की पीली टी-शर्ट कोने से झाँकती मिली। वह मुझे देख रही थी- थोड़ी उम्मीद, थोड़ी शिकायत भरे लहजे के साथ। जैसे कह रही हो- “कब तक मुझे सिर्फ बसंत पंचमी की प्रतीक्षा में रखोगे? मैं भी सार्वजनिक जीवन चाहती...
बधाई हो… शर्मा जी अंकल बन गए
व्यंग्य

बधाई हो… शर्मा जी अंकल बन गए

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** बधाई हो... शर्मा जी आख़िरकार अंकल बन ही गए। मोहल्ले में आज यही बड़ी खबर है। कल ही गली में खेलती एक बच्ची ने मुस्कराकर उन्हें पुकारा “अंकल!” और शर्मा जी के जीवन में उम्र का यह प्रमोशन स्थायी रूप से दर्ज हो गया। यह बात जैसे ही उनकी पत्नी तक पहुँची, वह हँसते-हँसते दोहरी हो गईं। बोलीं- “मैं तो कब से कह रही हूँ कि आपकी उम्र ‘भैया’ वाली नहीं रही, पर आप ही मानते नहीं।” शर्मा जी ने दर्पण में खुद को देखने की कोशिश की वही रंगी हुई मूँछें, गहरे श्याम रंग की डाई से रंजित बालों की अंतिम बस्ती खुले दालान के किनारे बसी हुई। मगर सच्चाई यह कि जवानी के रंग-रोगन का असर अब शरीर की दीवारों पर नहीं टिकता। समय अपने हस्ताक्षर छोड़ ही देता है। उन्होंने जवानी को बचाए रखने के क्या-क्या जतन नहीं किए विदेशी डाई, घ...
सतरंगी दुनिया- १७
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- १७

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** आपका भव्य महल हो या छोटी-सी झोपड़ी, घर उसी को कहते हैं जहां शांति और सुकून मिले। *यदि आप खुश रहना चाहते हैं तो दूसरों के जीवन में अपनी जगह ढूंढना बंद कर दो।* हमें अपनी ज़िंदगी का आनंद अपने तरीके से लेना चाहिए, लोगों की खुशी के चक्कर में तो शेर को भी सर्कस में नाचना पड़ता है। स्टेटस ज़िंदगी का हो या मोबाईल का, स्टेटस ऐसा रखें कि लोग कॉपी करने पर मजबूर हो जाएँ। जब बुरा करने के बाद भी बुरा ना लगे तो समझना चाहिए कि बुराई अब हमारे चरित्र में आ गई है। आज तो मेरा तकिया और बिस्तर भी बोल पड़ा, "मालिक थोड़ा उठकर बैठ जाओ या छत पर घूम लो, हमें भी थोड़ा साँस लेने दो। एक नगर सेठ के यहाँ इन्कमटैक्स का छापा पड़ा। सारे खातों की जांच हुई। एक जगह सेठ ने लिख रखा था कि पाँच लाख की जलेबियाँ कुत्तों को खिलाई। इन्कम टैक्स वालों ने इस खर्च के लिए...
मीटर टेप के साये में – दो पहाड़ों का संवाद
व्यंग्य

मीटर टेप के साये में – दो पहाड़ों का संवाद

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** दो पहाड़ एक बड़का भैया, एक छुटका भैया बरसों से बगल-बगल खड़े थे। एक ही माँ, पृथ्वी, की संतान, क़द-काठी में फर्क, पर दायित्व में बराबरी। दोनों ने ही धरती को थामे रखा, हरियाली की चादर ओढ़ाए रखी। मगर इंसान की आदतें कहाँ बदलती हैं। उसने छुटके के कान भरने शुरू किए- तेरी जगह अब यहाँ नहीं; तुझे जान-बूझकर छोटा रखा गया; असली बेटा तो बड़का है। चल, तुझे शहर ले चलते हैं वहाँ नाम बदलेगा, पहचान बनेगी। छुटका बातों में आ गया। उसे भरोसा दिलाया गया कि “पहाड़” नाम का कलंक हटेगा। कहा गया तू नव-निर्माण की नींव है; तेरे ऊपर इमारतें उठेंगी; तू काम आएगा। पहली बार उसे लगा कि खड़ा रहना नहीं, उपयोगी होना ज़रूरी है। “बड़के भैया… सुना है हम दोनों का बिछोह होने वाला है,” छुटका चुप्पी तोड़ता है। आवाज़ में उत्सुकता है...
हुक्का-वार्ता
व्यंग्य

हुक्का-वार्ता

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** चौपाल पर दो हुक्के पड़े थे। दोनों पुराने थे इतने पुराने कि इतिहास उन्हें पहचानता था, पर वर्तमान उनसे कतराता था। एक की चिलम में बीते ज़माने की राख जमी थी, दूसरे की नली में राजनीति की नमी। हवा ठंडी थी, पर माहौल में गरमाहट थी वो गरमाहट जो सिर्फ जाति और सत्ता के मेल से पैदा होती है। हुक्का नंबर एक ने गला साफ़ किया- “सुना है भाई, सरकार फिर से लोगों को उनकी जाति याद दिलाने में लगी है।” हुक्का नंबर दो ने गुड़गुड़ाहट भरी- “तो इसमें नई बात क्या है? भूल गए थे क्या लोग?” हुक्का नंबर एक भावुक हो उठा- “हाँ यार, लगता है हमारे दिन फिरेंगे। एक ज़माना था जब हमारी कितनी पूछ थी! हर जाति का अलग हुक्का, अलग शान। ऊँची जात वालों के हुक्के तो जैसे राजमहल की शोभा मीनाकारी, फुँदे, चाँदी की नली। जमींदार जब म...
सतरंगी दुनिया- १६
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- १६

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  आप गलती करके सुन रहे हैं तो आप ऑफिस में हैं, और अगर आप बिना गलती के सुन रहे हैं तो आप निश्चय ही घर पर हैं। दुनिया की हर चीज ठोकर लगने से टूट जाती है, लेकिन कामयाबी एक ऐसी चीज है जो कि ठोकर खाकर ही मिलती है। गरीब मांगे तो भीख, अमीर मांगे तो चंदा, करोड़पति मांगे तो डोनेशन और अरबपति मांगे तो सब्सिडी। यहाँ सभी लोग अपने हिसाब से भीख मांगते हैं। मुहुर्त के चक्कर में मत पड़िए, बिना मुहुर्त के पैदा होकर जीवनभर 'शुभ मुहुर्त' के चक्कर में फंसा इंसान एक दिन बिना मुहुर्त के प्राण त्याग देता है। पुरूष की आदत होती है हमेशा महिलाओं के बीच घुसने की, इसलिए शायद 'फीमेल' शब्द में 'मेल' आता है और 'वुमेन' में 'मेन' आता है। झूठ बोलने से पाप लगता है और सच बोलने से आग। अब आप ही बताइए, आप क्या बोलेंगे ? जिसका कोई नहीं होता, उसका खुदा होता ह...
खेल शुरू बजाओ ताली, खेल ख़त्म बजाओ ताली
व्यंग्य

खेल शुरू बजाओ ताली, खेल ख़त्म बजाओ ताली

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** एक कवि सम्मेलन में हमें आगे की पंक्ति में बैठा दिया गया। यह आयोजकों की कृपा कम और हमारी जुगाड़-साधना का प्रतिफल अधिक था। वीआईपी दीर्घा का टिकट हमने कबाड़ से खोज निकाला था, पर मंच पर बैठे कवि महोदय ने हमारे भीतर का सारा वीआईपी-पन झाड़कर बाहर कर दिया। इतनी तालियाँ बजवाई गईं कि क्षण भर को आत्मा कांप उठी कहीं पिछले जन्म में हम पेशेवर तालीबाज़ तो नहीं थे? फिर सांत्वना मिली नहीं, वीआईपी दीर्घा में वही बैठ सकता है जो समय-असमय ताली बजाने में पारंगत हो। मन में यह भी संतोष रहा कि यदि इस जन्म में ठीक से तालियाँ बजा दीं, तो शायद अगले जन्म में घर-घर ताले बजाने वाली योनि में जन्म न लेना पड़े। कवि ने इशारों-इशारों में यह आश्वासन भी दिया था। नेता और कवि में एक अद्भुत समानता है दोनों तालियों के भूखे होते...
तांत्रिक चौराहा
व्यंग्य

तांत्रिक चौराहा

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “ज़रा बचकर चलो… कितनी बार कहा है, चौराहे के बीच से मत जाया करो!” यह वाक्य मेरे कानों में हर सुबह वैसे ही पड़ता है, जैसे अलार्म बस फर्क इतना है कि अलार्म बंद किया जा सकता है, श्रीमती जी को नहीं। मॉर्निंग वॉक पर आगे-आगे मैं और पीछे-पीछे चौकन्नी निगाहों से मेरी चाल पर नज़र रखती हुई श्रीमती जी मानो मैं किसी आतंकी संदिग्ध गतिविधि से घिरा हुआ हूँ। हमारी वॉकिंग रोड के बीचोंबीच एक चौराहा है। नगर पालिका ने उसका कोई नाम नहीं रखा, इसलिए हमने रख दिया “तांत्रिक चौराहा”। शहर के तमाम भूत-प्रेत, बाधाएँ, टोटके, यंत्र-तंत्र और अतृप्त आत्माएँ यहीं आकर लोकतांत्रिक ढंग से डंप की जाती हैं। जैसे रेलवे कॉलोनी को जनता ने अनधिकृत रूप से मॉर्निंग वॉक ट्रैक बना लिया, वैसे ही इस चौराहे को तांत्रिकों ने अधिकृत कर्मस्...
खेद है – एक राष्ट्रीय भावना का आधुनिक संस्करण
व्यंग्य

खेद है – एक राष्ट्रीय भावना का आधुनिक संस्करण

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** बड़े खेद की बात है कि इस संसार में दो ही चीज़ें सर्वत्र उपलब्ध हैं सड़कों पर खुदा और लोगों की ज़ुबान पर खेद। आजकल खेद बड़े ठसक के साथ प्रकट किया जा रहा है। जहाँ देखो, वहीं खेद। ट्रेन लेट हो जाए तो खेद, ट्रेन रद्द हो जाए तो गहरा खेद, और अगर समय पर आ जाए तो भी एहतियातन खेद क्योंकि इतनी चमत्कारी घटना पर शक होना स्वाभाविक है। रेलवे विभाग तो तब तक आपको डिब्बे में बैठने ही नहीं देता, जब तक सौ बार खेद प्रकट न कर ले। यात्री को भरोसा दिलाना ज़रूरी है कि लापरवाही हुई है, पर भावना सच्ची है। सोशल मीडिया ने खेद को लोकतांत्रिक बना दिया है। पहले खेद करने के लिए घटना चाहिए थी, अब बस नेटवर्क चाहिए। कोरोना काल में तो खेद की ऐसी बाढ़ आई कि कोई अगर गलती से मुस्कुराता हुआ फोटो डाल दे, तो लोग टिप्पणी में RIP ...
लेखकों की पिकनिक
व्यंग्य

लेखकों की पिकनिक

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** इस बार पुस्तक मेले में किताबों की नहीं, लेखकों की पिकनिक तय हुई। निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया प्रगतिशील, प्रगतिवादी, प्रतिक्रियावादी, विवादप्रिय, सर्ववादी और सर्वनाशवादी सभी लेखक संघों ने मिलकर ठाना कि जब साल भर साहित्य में एक-दूसरे को स्वाद चखाते ही रहते हैं, तो क्यों न एक दिन सचमुच स्वाद खुद भी चखा जाए। अध्यक्षता का भार स्वाभाविक रूप से परम श्रद्धेय परसादी लाल जी ‘जुगाड़ी’ को सौंपा गया जो एक साथ परजीवी, बहुजीवी, बुद्धिजीवी, आलोचक, समीक्षक और विमोचक हैं। पहले उन्होंने अपनी मरणासन्न व्यस्तता का हवाला देकर आने से इनकार किया, पर प्रथम श्रेणी यात्रा-भत्ते की अग्रिम राशि ने उनमें तुरंत साहित्यिक प्राण फूँक दिए। नियम तय हुआ हर लेखक घर से बना खाना लाएगा। खुद न बना सके तो किसी और का उठा लाए, ...
वर्ष २०२६ में बारह राशियों का हास्यफल (राशिफल)
व्यंग्य

वर्ष २०२६ में बारह राशियों का हास्यफल (राशिफल)

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** मेष राशि : हर साल की तरह २०२६ भी तुम से मजे ही लेकर जाएगा...अमीर बनने का सपना तुम्हारा केवल सपना ही रह जाएगा। तुम बस आमिर खान की फिल्में देखो, आमिर खान भी इसी लिए फ्लॉप हो रहा है क्योंकि तुम्हारे जैसे पनौती दर्शक हैं उसके ....प्रेम संबंधों के मामलो में लकी रहोगे कोई रुचि ही नहीं लेगी तो ब्रेकअप का भी दूर दूर तक आसार नहीं है...खैर तुम्हारी वाली ऐसा होने भी नहीं देगी....सबको तुम्हारी बहन बना देगी....स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना, शनि की तीसरी दृष्टि के कारण किसी कन्या पर दृष्टिपात करते हुए धरे पकड़े जाओगे और बुरी तरह जुतियाए भी जा सकते हो.!! वृषभ राशि : जैसी राशि वैसे ही बैल जैसी पर्सनालिटी है और बुद्धि भी। कर्म करने जाते हो और कांड करके आते हो। अच्छा बनने के प्रयास में हमेशा गोबर कर आते हो...आर्थिक स्थिति में सुधार के आस...
कंजूस मक्खीचूस
व्यंग्य

कंजूस मक्खीचूस

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** अख़बार में ख़बर आई कि एक अमीर महिला को “दुनिया की सबसे कंजूस करोड़पति” घोषित किया गया है। करोड़ों की मालकिन, मगर खाने-पीने पर खर्च जैसे उसकी जान निकल जाए। कंजूस शब्द का अर्थ तो सब जानते हैं, पर कंजूसी का दर्शन वही समझे जिसने ऐसे जीवों को पास से देखा हो। मानो इनके डीएनए में ही ‘सेविंग’ का जीन बैठा हो। कंजूस लोग धन को संग्रह करते हैं, उपभोग नहीं। मगर यह भी कहना होगा कि ये लुटेरों और सूदखोरों से फिर भी भले हैं- क्योंकि कम से कम किसी का लूट नहीं करते, बस खुद को ही नहीं खिलाते। इनका आदर्श वाक्य है- “चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए।” गाँव में हमारे एक मास्टर साहब थे, जिनकी कोई संतान नहीं थी। अमीरी ऐसी कि सूद पर सोना गिरवी रखते, पर मिठाई सिर्फ़ दिवाली पर। एक किलो इमरती सालभर के लिए पर्याप्त। जैसे ही ...
लोकतंत्र का रक्षा-बंधन पर्व
व्यंग्य

लोकतंत्र का रक्षा-बंधन पर्व

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** हमारे यहाँ त्योहारों के पीछे ज़रूर कोई कथा होती है- कभी देवता-पिशाच की लड़ाई, कभी रानी-पुत्र की करुणा। राखी की भी कई कथाएँ हैं, पर लोकतंत्र की एक कहानी ऐसी है जो इतिहास में दर्ज नहीं हुई- क्योंकि यह आज भी हर साल घट रही है। इसे कहते हैं- लोकतंत्र का रक्षा-बंधन। इस पावन पर्व की शुरुआत तब हुई जब स्वतंत्रता के बाद भ्रष्टाचार पहली बार अपनी शीतनिद्रा से बाहर निकला। जन्म तो इसका प्राचीन भारत में ही हो चुका था, पर तब यह एक दुबला-पतला, डरपोक-सा साँप का संपोला था। देवी-देवता, ऋषि-मुनि इसे कभी-कभार डाँटकर भगा देते। आज़ादी के बाद सत्ता के नए पालकों ने इसे देखा- काला, कलूटा, पर उपयोगी। बस, उठा लाए आस्तीन में। कालांतर में यह साँप अपने पालनहारों से भी ज़्यादा ताकतवर हो गया। पर भ्रष्टाचार अकेला नहीं थ...
शरीर की ओवरहॉलिंग का राष्ट्रीय पर्व : रविवार
व्यंग्य

शरीर की ओवरहॉलिंग का राष्ट्रीय पर्व : रविवार

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** रविवार! वो दिन जब देश के बहुसंख्यक पुरुष अपने शरीर रूपी वाहन की सर्विसिंग, डेंटिंग-पेंटिंग और फेस एलाइनमेंट की कोशिश करते हैं- और फिर थककर वापस उसी पुराने स्टार्टिंग ट्रबल वाले मोड में लौट जाते हैं। सुबह शीशे में झाँका तो माथे पर दो-चार सफ़ेद बाल ऐसे अठखेलियाँ करते मिले, जैसे मोहल्ले की गली में खड़ी बाइक को किसी मनचले ने ‘की-की’ करते हुए खरोंच मार दी हो। कभी जिन बालों को नजर न लगे, इसलिए बचपन में काजल का टीका लगाया जाता था- अब वही बाल इसलिए सफ़ेद हो रहे हैं कि किसी की नजर पड़ ही  जाए! कभी अपने बालों पर करते थे नाज़, अपना रंग जमाए रहते थे महफ़िलों में- और आज वही बाल अपना रंग बदल रहे हैं! सच कहें तो अब यह काया नामक गाड़ी, आर.टी.ओ. की अयोग्य वाहनों की सूची में और ज़िन्दगी के खेल में “एक्स...