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व्यंग्य

मानसून का सरकारी आवंटन
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मानसून का सरकारी आवंटन

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “सोचिए, अगर ऊपरवाले ने मानसून का ज़िम्मा नीचेवाले सरकारी तंत्र को सौंप दिया होता तो...?” सरकारी तंत्र! बाप रे बाप... यह व्यवस्था नहीं, कोई चमत्कारी प्रयोगशाला लगती। बारिश की बूँदें नहीं, नोटशीटें टपक रही होतीं-एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर तक! मानसून सीधे कैसे आ जाता? पहले फ़ाइलों की मार्किंग होती, फिर रीमार्किंग। अतिरिक्त टिप्पणियाँ लगतीं, और फ़ाइलों की घुड़दौड़ शुरू हो जाती - तहसील से पटवारी, पटवारी से एस.डी.एम., एस.डी.एम. से कलेक्टर और कलेक्टर से लेकर चायवाले तक सभी से सुझाव लिए जाते। जनमत सर्वेक्षण कराए जाते। फिर नेता लोग यह तय करते कि किस क्षेत्र में उन्हें कितने वोट मिले हैं - उसी अनुपात में वहाँ मानसून आवंटित होता। टेंडर भरे जाते, सिफ़ारिशी पत्र लगाए जाते, उन पर वजन डाला जाता। फिर जा...
सतरंगी दुनिया- ३८
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सतरंगी दुनिया- ३८

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *डकार और गैस एक ही माँ के २ बेटे हैं, मगर गैस ने गलत रास्ता चुन लिया है, इसलिए उसकी कोई इज्जत नहीं करता है।* बहुत आसान है किसी पर अंगुली उठाना, परंतु बहुत मुश्किल है किसी को उठाने के लिए उसकी अंगुली पकड़‌ना। ज़िंदगी में इतनी गलतियाँ न करें कि पेन्सिल से पहले रबर घिस जाए और रबर को इतना मत घिसिए कि ज़िंदगी के पेज ही फट जाएं। रंग छोड़ते कपडे और रंग बदलते इंसान चाहे कितने ही ब्रांडेड हों, उनकी कोई इज्जत नहीं करता है। किसी के गुस्से को उसकी नफरत समझने की भूल ना करें, क्योंकि गुस्सा वही करता है; जो आपकी फिक्र करता है। स्टीकर और विश्वास दोनों एक समान है। दोबारा जरूरत पड़ने पर काम कम करते हैं। 'पत्थर' तब तक सलामत है, जब तक वो पर्वत से जुड़ा है। 'पत्ता' तब तक सलामत है जब तक वो पेड़ से जुड़ा है और 'इंसान' तब तक सलामत है, जब तक वो...
सतरंगी दुनिया- ३७
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सतरंगी दुनिया- ३७

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  ईमानदारी से काम करने वालों के शौक भले पूरे ना हों, लेकिन नींद जरूर पूरी होती है। पैसा सिर्फ आपकी लाईफ-स्टाईल बदल सकता है- दिमाग, नीयत और किस्मत नहीं। इस दुनिया में आपकी कद्र तब तक है, जब तक आप किसी की जरूरत बने रहते हैं। जिस दिन जरूरत खत्म हो जाती है, उस दिन कई रिश्तों का असली रंग भी सामने आ जाता है। *हमारी पड़ोसन ने अपने घर में एक बोर्ड लगा रखा था, जिस पर लिखा था- कृपया अपनी चप्पलों के साथ-साथ अपनी गलत सोच... गलत हरकत... सास-बहू... देवरानी-जेठानी और ननद की चुगली... बाहर ही उतार कर आएं और एक महत्वपूर्ण बात- अपनी तिरछी नजरों से मेरे पति को ना देखें, वो बहुत सीधे हैं; किसी के भी बहकावे में आ जाते हैं।* हमें वो ही लोग अच्छे लगते हैं, जो हमारी हाँ में हाँ मिलाते हैं। जो सही को सही और गलत को गलत बोलते हैं, ऐसे लोग सबकी ...
पुरुष्कार का दर्शन शास्त्र
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पुरुष्कार का दर्शन शास्त्र

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** हर ‘पुरस्कार’ को नमस्कार है… पुरस्कार- नाम ही ऐसा है, जैसे पुरुषत्व की विजयघोषणा हो। सुनते ही लगता है मानो पितृसत्ता का तमगा पहन लिया हो। अब तो महिलाएं भी कहने लगी हैं- “ये पुरस्कार क्यों? कुछ तो ‘महिलाकार’ जैसा होना चाहिए!” सही पूछें तो कई साहित्यकारों को पुरुष्कार की फांक लेते ही साहित्यिक मर्दानगी के लक्षण प्रकट होने लगते हैं! बिना पुरस्कार के देखो न साहित्यकार की हालत, बिल्कुल नामर्दी के शिकार मरीज़ की तरह, जो अपनी मर्ज़ का इलाज ढूंढते हुए इधर-उधर काशी, कलकत्ता, कराची, हर चांदसी, देसी और नकली आयुर्वेदिक दवाखाने की खाक छान चुका है । मिल ही जाएंगे ऐसे लोग... हाँ, आजकल इसका इलाज शर्तिया गारंटी के साथ पुरस्कार की चटनी-चूर्ण से होने लगा है! जगह-जगह लग गए हैं पुरुष्कार के ऐसे ही लंगर, खु...
सतरंगी दुनिया- ३६
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सतरंगी दुनिया- ३६

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** एक बात समझ में नहीं आ रही है कि सर में दर्द होता है तो उसे सरदर्द कहते हैं और अगर नाक में दर्द होगा तो उसे 'दर्दनाक' कहेंगे क्या? *हर दवा में एक्सपायरी डेट लिखी रहती है, पर शराब क्या अमृत है कि उसमें एक्सपायरी डेट नहीं लिखी रहती है। विश्व का सबसे बड़ा आश्चर्य- यहाँ 'लेबर रूम' में 'लेबर' नहीं रहते हैं।* एक लड़का बड़ी उम्र की औरत को बार-बार घूरकर देख रहा था तो उस औरत ने कहा-कुछ तो शर्म करो मैं तुम्हारी माँ की उम्र की हूँ। लड़के ने उत्तर दिया- मैं भी अपने लिए नहीं, अपने अब्बू के लिए लड़‌की देख रहा हूँ। जो चीज मन की शांति को छीन ले, उसे छोड़ देना ही समझदारी है-चाहे वह आदत हो, सोच हो या कोई रिश्ता। झूठे लोगों के मुँह मत लगिए, आप बहस में उनसे कभी जीत नहीं पाएंगे, क्योंकि यह कलियुग है। यहाँ सच अकेला चलता है और झूठ बारात लेक...
आलमारियों का दर्शन शास्त्र
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आलमारियों का दर्शन शास्त्र

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** वैवाहिक जीवन में सुख का सबसे सरल सूत्र मैं आपको बता देता हूँ, पत्नी के वॉलेट में पासवर्ड सहित एकप्लैटिनम क्रेडिट कार्ड रख दीजिए और घर में भरपूर आलमारियाँ बनवा दीजिए। या यूँ कहें कि घर नहीं, आलमारियों का ही घर बना दीजिए। वे सभी दंपत्ति सचमुच सुखी हैं, जिन्होंने मकान बनवाते समय पत्नी की आलमारी-दृष्टि को गंभीरता से लिया। डिज़ाइन पत्नी की पसंद का, ऊँचाई छत तक, और संख्या इतनी कि गिनती भूल जाए। दिन में दस बार डिज़ाइन बदलवाने पर यदि आप परेशान हो रहे हैं, तो समझ लीजिए आप अभी गृहस्थी के प्रारंभिक चरण में हैं। मेरे यहाँ तो दो आर्किटेक्ट केवल इस प्रश्न पर बदले जा चुके हैं कि “बाथरूम में आलमारी कैसे निकालें?” एक ने तो यह भी कह दिया कि ड्रॉइंग रूम में एक ही आलमारी काफी होगी। उस दिन से वह आर्किटेक्ट ह...
रिकॉर्ड तोड़ने नहीं आई बारिश
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रिकॉर्ड तोड़ने नहीं आई बारिश

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** इस बार बड़ी मायूसी से बरसात का इंतजार हो रहा है। लगता है, बारिश अपना वादा भूल गई है। मौसम विभाग, अखबार, समाचार चैनल, सरकार और बाढ़ नियंत्रण विभाग, सबको उसने भरोसा दिलाया था कि इस बार भी वह पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी। लगता है, इस बार उसने किसी चुनावी घोषणा-पत्र से प्रेरणा नहीं ली कि बारिश और वादे में रिकॉर्ड तथा उम्मीदों को तोड़ना जायज है। वैसे भी रिकॉर्ड और वायदों में गहरा रिश्ता होता है। दोनों बनते ही टूटने के लिए हैं। हमारे यहाँ तो रिकॉर्ड ही क्या, सरकारें, गठबंधन, सड़कें, पुल और सरकारी इमारतें तक सिर्फ टूटने के लिए ही बनती हैं। कई बार उद्घाटन की पट्टिका मजबूत रह जाती है और उसके पीछे की पूरी इमारत धराशायी हो जाती है। रेलवे विभाग का एक टिकटघर, जिसका अभी उद्घाटन भी नहीं हुआ और सुना है...
सतरंगी दुनिया – ३५
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सतरंगी दुनिया – ३५

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *अच्छे जरूर बनें, परन्तु जरूरत से ज्यादा नहीं। अगर ज्यादा अच्छे बनेंगे तो नीम्बू की तरह निचोड़ दिए जाओगे।* याद रखिए, जहां से छल शुरू होता है, वहां से महाभारत शुरू होता है। *जो चीज मन की शांति को छीन ले-उसे छोड़ देना ही समझदारी है; चाहे वह आदत हो, सोच हो या कोई रिश्ता।* एक बार थानेदार, कलेक्टर और मास्टर बैठे हुए थे। तब थानेदार ने शेखी बघारते हुए कहा-मेरा बहुत रौब है, जब जी चाहे, किसी को भी पीट सकता हूँ। इसका समर्थन करते कलेक्टर ने कहा- मैं भी जिले का राजा हूँ, मैं जो चाहे कर सकता हूँ। आखिरी में मास्टर ने कहा- मेरा तो काई रौब नहीं है, सारा दिन छात्रों को चाँटे मारता हूँ, आगे उनकी किस्मत-कलेक्टर बनें या थानेदार। शादीशुदा व्यक्ति की गर्लफ्रेन्ड उसके घर आई। उसको देखकर बीबी चिल्लाई और बोलने लगी- एक म्यान में २ तलवार नहीं र...
आहा ग्राम्य जीवन! सुनो, सुनो मेरे विकास की कहानी…
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आहा ग्राम्य जीवन! सुनो, सुनो मेरे विकास की कहानी…

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** हे पथिक, ज़रा ठहर। हाँ, तू शहर से आया है, मुझे पता है क्यों आया है। “आहा ग्राम्य जीवन” की पीएचडी करने निकला होगा। आ, मेरी छाँव में बैठ जा। जुगाड़ की सवारी ने तेरी रीढ़ की हड्डी को लोकतंत्र की तरह ढीला कर दिया होगा। मैं इस गाँव का बरगद हूँ,पुराना, अनुभवी और वक्त के थपेड़ों से घायल होकर बेकार घोषित हो चुका हूँ। पहले मेरे नीचे प्रेम कहानियाँ पनपती थीं, अब योजनायें और घोषणाओं के पोस्टर चिपकते हैं। प्रेम के नाम मिट गए, विकास के वादे चिपक गए, दोनों का हश्र लगभग एक जैसा ही है। तू पूछेगा, गाँव कितना बदला? तो सुन, गाँव बदला नहीं, बदलने की घोषणाएँ बार-बार हुई हैं। यहाँ “विकास” कम, “बदला” ज़्यादा चलता है। लोग बच्चे इसलिए पैदा करते हैं कि कोई तो पुरखों की दुश्मनी का ईएमआई चुकाए। परिवार, मोहल्ला, पू...
सतरंगी दुनिया – ३४
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सतरंगी दुनिया – ३४

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  यदि इंसान शिक्षा से पहले संस्कार, व्यापार से पहले व्यवहार, भगवान से पहले माता-पिता को पहचान ले हो तो ज़िंदगी में कभी कोई कठिनाई आ ही नहीं सकती। हैसियत का परिचय हमें तब देना चाहिए, जब बात आत्म सम्मान की हो। अन्यथा सादगी ही सबसे बड़ा परिचय है। *सुख में शांति है, यह हमारा भ्रम है। शांति में सुख है, यह वास्तविकता है।* हम लोग उस जमाने की पैदाइश हैं, जब रोते हुए को चुप कराने के लिए दोबारा पीटा जाता था। कभी-कभी कुछ लोग ज़िंदगी में सबक बनकर आते हैं। आँखों में ऐसी धूल झोंक जाते हैं, कि पहले से ज्यादा साफ नजर आने लगता है। भले ही आप अलग रहिए, मगर अपने माता-पिता और भाइयों से जुड़े रहिए, क्योंकि मुसीबत में यही अपने आपके आसपास नजर आएँगे, बाकी की दुनिया हाल पूछने भी नहीं आएगी। समय, सेहत, दोस्त और और व्यापार ऐसे कीमती निवेश हैं, जो...
चार लोग कुछ नहीं कहेंगे तो क्या होगा
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चार लोग कुछ नहीं कहेंगे तो क्या होगा

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** चार लोगों की चिंता इस दुनियादारी में सभी को है। सभी एक-दूसरे को बस यही नसीहत देने में लगे रहते हैं, "देखो, ऐसा मत करो। अगर ऐसा किया तो चार लोग क्या कहेंगे, पता है? चार लोग देख लेंगे तो... अरे, चार लोगों का तो ख्याल करो!" लेकिन सोशल मीडिया ही एक ऐसी जगह है, जहाँ इसके उलट, इन चार लोगों का इंतजार किया जाता है। सोशल मीडिया में वही चार लोग अचानक देवता बन जाते हैं। हसरत भरी निगाह से बस चार लोग आ जाएँ मेरी पोस्ट पर... कुछ कह जाएँ, और कुछ नहीं तो कम से कम लाइक का बटन ही दबा जाएँ। वरना पोस्ट की आत्मा अधर में लटक जायेगी मित्र । पोस्ट डालते ही मन की स्थिति किसी मछुआरे जैसी हो जाती है। काँटा पानी में फेंका और आँखें लहरों पर टिकीं हुई, कब कोई कमेंट रूपी मछली फँसे। मोबाइल स्क्रीन उस तालाब का पानी है,...
सतरंगी दुनिया- ३३
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सतरंगी दुनिया- ३३

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  *हमारे समाज को सब पता है कि कौन किसके साथ घूम रहा है, किसकी बहू, बेटी कहाँ जा रही है, और किसके बेटे का कहाँ लफड़ा है ? लेकिन किसके घर आज खाना नहीं बना, ये समाज को नहीं पता और न ही जानना चाहते हैं।* शेर को पकड़ने के ३ तरीके हैं। (१) न्यूटन का तरीका- शेर को अपने पास आने दो जैसे ही हमारे पास आ जाए, उसे पकड़ लो। (२) आइंस्टाइन का तरीका-शेर का तब तक पीछा करो, जब तक कि वह थक न जाए, जैसे ही वह थक जाए, उसे पकड़ लो और अंतिम तरीका पुलिस का-खरगोश को पकड़ो और उसे तब तक पीटते रहो; जब तक कि वह स्वीकार न कर ले कि वही शेर है। कलियुग चल रहा है गलत को गलत ही रहने दो। अगर गलत को गलत साबित करने जाओगे तो खुद ही गलत साबित कर दिए जाओगे। सुबह पत्नी चाय-नाश्ता पूछने आई तो मैंने कहा-बना दो। फिर रुक कर पूछने लगी- ये मोदी जी १ दिन में तीन देश कैस...
मानसून का सरकारी आवंटन
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मानसून का सरकारी आवंटन

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “सोचिए, अगर ऊपरवाले ने मानसून का ज़िम्मा नीचेवाले सरकारी तंत्र को सौंप दिया होता तो...?” सरकारी तंत्र! बाप रे बाप... यह व्यवस्था नहीं, कोई चमत्कारी प्रयोगशाला लगती। बारिश की बूँदें नहीं, नोटशीटें टपक रही होतीं-एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर तक! मानसून सीधे कैसे आ जाता? पहले फ़ाइलों की मार्किंग होती, फिर रीमार्किंग। अतिरिक्त टिप्पणियाँ लगतीं, और फ़ाइलों की ड़दौड़ शुरू हो जाती- तहसील से पटवारी, पटवारी से एस.डी.एम., एस.डी.एम. से कलेक्टर और कलेक्टर से लेकर चायवाले तक सभी से सुझाव लिए जाते। जनमत सर्वेक्षण कराए जाते।फिर नेता लोग यह तय करते कि किस क्षेत्र में उन्हें कितने वोट मिले हैं- उसी अनुपात में वहाँ मानसून आवंटित होता। टेंडर भरे जाते, सिफ़ारिशी पत्र लगाए जाते, उन पर वजन डाला जाता। फिर जाकर म...
सतरंगी दुनिया- ३२
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सतरंगी दुनिया- ३२

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *गिरगिट ने आत्महत्या कर ली और सुसाईड नोट में लिखा-इंसान से ज्यादा मैं रंग नहीं बदल सकता।* हमें हमेशा अपने लिए अच्छा सोचना चाहिए, क्योंकि गलत सोचने के लिए तो दुनिया बैठी है। *कभी भी अफवाहों पर ध्यान मत दीजिए, क्योंकि अफवाह जलने वाले पकाते हैं, इसे मूर्ख परोसते हैं और बेवकूफ उसे खाते हैं।* 'सब्र का फल मीठा होता है', इसी कहावत के चक्कर में मेरे २ सब्र के फलों की शादी हो गई और कल एक और की सगाई होने वाली है। *जमाने का सच देखिए- "अफवाहें बिना पैर के दौड़ती है और सच लंगड़ाकर चलता है।* अगर आपको उपवास करने का शौक है तो विचारों का करें, अगर भूखे रहने से भगवान खुश होते तो गरीब सबसे सुखी होते। *आजकल रोटी गैस पर बनती है, इसलिए खाने के बाद पेट में गैस बनती है।* आजकल रिश्तेदार भी बदल गए हैं, बचपन में जब वो हमारे घर आते थे तो पैसे द...
मरने की फुर्सत नहीं
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मरने की फुर्सत नहीं

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** डेस्कटॉप पर वे सारे काम खुले पड़े थे, जिनकी उम्मीद सामान्यतः किसी डॉक्टर से नहीं की जाती- सोशल मीडिया, लेखन, फोटोशॉप, कैनवा और न जाने कितनी रचनात्मक टैबें। तभी श्रीमतीजी का चिर-परिचित ताना कानों में पड़ा- “कंप्यूटर पर आँखें गड़ाए रहते हो, कभी हॉस्पिटल पर भी ध्यान दे लिया करो!” रोज़ ऐसे वाक्य चाय के साथ निगल जाता हूँ, लेकिन उस दिन चाय पहले ही समाप्त हो चुकी थी, इसलिए ताना गले में अटक गया। मैंने निश्चय किया कि आज दुनिया को दिखाऊँगा कि मैं भी एक गंभीर और व्यस्त डॉक्टर हूँ। बाथरूम में चिड़िया-स्नान किया, गीला तौलिया बिस्तर पर छोड़ा, अधोवस्त्र फर्श पर और अलमारी से एक जोड़ी कपड़े निकालते हुए चार जोड़ियाँ नीचे गिरा दीं। डॉक्टर होने में भले कमी रह गई हो, पतिपन के संस्कारों का प्रदर्शन पूरे मनो...
सतरंगी दुनिया- ३१
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सतरंगी दुनिया- ३१

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  एक कंजूस महिला ने अपनी वसीयत तैयार की, लिखा-मैं पुर्नजन्म में विश्वास करती हूँ, इसलिए यह वसीयत अपने नाम कर रही हूँ, ताकि मेरे द्वारा छोड़ी हुई सम्पत्ति अगले जन्म में मुझे ही मिले। बूंद-सा जीवन है इंसान का ? लेकिन अहंकार सागर से भी बड़ा है। *ये ज़िंदगी तब तक हल्की है, जब तक सारे बोझ माँ-बाप ने उठाए होते हैं।* केवल खून के रिश्ते ही महत्वपूर्ण नहीं होते। मुसीबत में हाथ थाम लेने से बड़ा कोई रिश्ता नहीं। सच बोलना तो दूर की बात, आजकल लोग सच सुनना भी पसंद नहीं करते हैं। नियंत्रण जरूरी है यदि आमदनी कम हो तो खर्चों पर और जानकारी कम हो तो शब्दों पर। *बहुत पढ़ाई कर ली, पर मैं भी कुछ सवाल हल नहीं कर पाया। यदि आपके पास इनके जवाब हों तो अवश्य बताइए-यदि भाड़ में जाना हो तो किससे जाय पैदल, आटो या रेलगाड़ी से ? यदि किसी के पाप का घड़ा भर...
बेईमानों की ईमानदारी
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बेईमानों की ईमानदारी

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** साधो, इस संसार में ईमानदारों की कोई कमी नहीं है। बस उन्हें पहचानने की दृष्टि चाहिए। लोग व्यर्थ कहते हैं कि ईमानदारी खत्म हो गई। सच तो यह है कि वह पहले से कहीं अधिक व्यवस्थित, प्रशिक्षित और प्रोफेशनल हो चुकी है। फर्क बस इतना है कि उसने अपना पता बदल लिया है। अब वह मंदिरों, दफ्तरों और उपदेशों में नहीं, सीधे बेईमानों की गोद में बैठती है। बेईमान आदमी अपने धंधे के प्रति अद्भुत निष्ठावान होता है। जो करेगा, खुलकर करेगा। उसे अपने चरित्र को लेकर कोई भ्रम नहीं होता। वह जानता है कि वह क्या है, क्यों है और किस दर पर उपलब्ध है। ऊपर वाले का भी पूरा ध्यान रखता है,एक परमात्मा और दूसरे वे, जो फाइलों के ऊपर बैठे हैं। चढ़ावे समय पर चढ़ते हैं, हिस्से नियम से पहुँचते हैं और साझेदारी इतनी पारदर्शी होती है कि क...
सतरंगी दुनिया-३०
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया-३०

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  इस दुनिया में सिर्फ धोखा एवं धक्का ही मुफ्त में मिलता है, बाकी हर चीज की कीमत चुकानी पड़‌ती है। *देखिए हमारे देश की हालत- कचरा उठाने वाला अनपढ़‌ है और कचरा फेंकने वाले पढ़े-लिखे।* हर कोशिश में शायद सफलता नहीं मिल पाती है, लेकिन प्रत्येक सफलता का कारण कोशिश ही होती है। आपका लहज़ा बता देता है कि जुबान बोल रही है या पैसा। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि १०० में आने वाली पुलिस ११२ में आ रही है। कर्म वो चिठ्ठी है, जो कभी भी गलत पते पर नहीं पहुंचती है, जिसने भेजी है, उसी के पास लौटती है। *सुन लेने से कितने ही सवाल सुलझ जाते हैं और सुना देने से हम फिर वहीं उलझ जाते हैं।* अगर आप सोचते हैं, कि सब दु:ख दूर होने के बाद मन प्रसन्न होगा तो ये आपका वहम है...। मन प्रसन्न रखें, सब दु:ख स्वयं दूर हो जाएंगे। उन रिश्तों को टूटने दें, जिनकी वजह ...
खुदा ही खुदा है
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खुदा ही खुदा है

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** खुदा की तलाश किसे नहीं? जिसे भी हो, वह हमारे शहर,गड्डापुर, आ जाए। यहाँ तलाश शर्तिया पूरी होगी। गारंटी वैसी ही, जैसी दाद-खाज, खुजली, भगंदर, नपुंसकता और खोया प्यार लौटाने वाले विज्ञापन देते हैं। गड्डापुर में खुदा मंदिर-मस्जिद में कम, गली-सड़क पर अधिक मिलता है। फर्क इतना है कि यहाँ खुदा दिखता नहीं, पैर पड़ते ही महसूस होता है। कहीं सीवर लाइन का खुदा, कहीं अमृत जलधारा का खुदा, कहीं बिजली विभाग का खुदा, तो कहीं नगर परिषद का सर्वधर्म समभाव वाला खुदा। पूरा शहर खुदामय है। विकास और खुदाई का चोली-दामन का साथ है। जहाँ विकास आएगा, वहाँ पहले धरती का सीना खुलेगा। पुल बनेंगे, सड़कें बनेंगी, टावर खड़े होंगे, स्टेशन अमृतमय होगा, तो खुदाई अनिवार्य है। रेलवे का ‘अमृत स्टेशन’ प्रोजेक्ट आया तो हमारे स्टेशन ...
सतरंगी दुनिया – २९
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया – २९

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  वास्कोडिगामा अगर शादी-शुदा होता तो को कभी भी भारत की खोज नहीं कर पाता, क्योंकि कहां जा रहे हो ? कहाँ से आ रहे हो ? किसके साथ जा रहे हो ? कब वापस आओगे ? मुझे भी साथ ले चलो। मेरे लिए वहाँ से क्या लाओगे ? ये सब सवाल पूछने वाली पत्नी उसके पास नहीं थी। कभी साथ बैठोगे तो अपने दर्द बताएंगे, यूँ फोन से पूछोगे तो खैरियत ही बताएंगे। अब दुनिया भरोसे लायक नहीं रही, क्योंकि लोग अब कसम खाकर भी झूठ बोलते हैं। *उम्र से पहले ही बड़े हो जाते हैं वो बेटे, जिन्हें बाप से दौलत नहीं, बल्कि जिम्मेदारियाँ मिलती हैं।* आजकल नींद भी बदल गई है, अब सपने नहीं आते। अब तो थकान सुलाती है, और जिम्मेदारियाँ उठाती है। मैं वो समझदार हूँ, जिसे पता है कि मुझे किसने, कब और कितना बेवकू‌फ बनाया था। *भारत में सिर्फ १ प्रतिशत लड़कियाँ क्रिकेट, टैनिस, हॉकी और ...
दास्तान-ए-सांड
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दास्तान-ए-सांड

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** मेरा जन्मदिन अभी दूर है, लेकिन हमारे यहाँ जन्मदिन की तैयारियाँ किसी चुनाव से कम नहीं होतीं-घोषणापत्र पहले, कार्यक्रम बाद में। इस बार तय हुआ है कि गायों को चारा और गुड़ खिलाकर जन्मदिन मनाया जाएगा। शहर में इन दिनों गौ-प्रेम फैशन में है। हर मोहल्ले में गौ-आश्रम उग आए हैं-कुछ श्रद्धा से, कुछ फोटो से और कुछ फेसबुक प्रेमियों के सेवा सेल्फी प्रेम से। जब से हमारे योग-गुरु बाबा ने सौंदर्य प्रसाधन से लेकर दवा-दारू तक में गाय का तड़का लगाया है, गाय पाँच सितारा शो-रूम की वस्तु बन चुकी है। देसी गाय अब श्रद्धा की नहीं, औकात की चीज़ हो गई है। गाय से हमारा रिश्ता नया नहीं है। बचपन से पाठ्यक्रम में थी-“गाय हमारी माता है।” निबंध में, उपलों में, होली की बालुडियों में, और सुबह के मक्खन में गाय बराबर मौजूद ...
सतरंगी दुनिया- २८
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सतरंगी दुनिया- २८

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  पत्नी ने घर में ज्यादा खाना बनाया तो पति ने पूछा कि घर में खाने वाले हम ३ लोग हैं, फिर तुमने ढेर सारा खाना किसके लिए बनाया है। पत्नी ने प्यारा-सा उत्तर दिया,- मुझे बचे हुए भोजन से विविध व्यंजन बनाने की विधि सीखनी है। आजकल की नौकरानी का हाल देखिए, मालकिन ने नई नौकरानी को समझाते हुए कहा, देख मैं ज्यादा बोलना पसंद नहीं करती। अगर में अंगुली का इशारा करूं तो समझ लेना कि में बुला रही हूँ। नौकरानी बोली,- मैडम मैं भी ज्यादा बोलना पसंद नहीं करती। अगर मैं सर हिला दूं तो आप समझ लेना कि मैं नहीं आ सकती। *एक ६० साल की उम्र वाले व्यक्ति की टी शर्ट पर एक शानदार वाक्य लिखा था- मेरी उम्र ६० साल नहीं है, मैं तो केवल १६ साल का हूँ ४४ साल के अनुभव के साथ। इसे कहते हैं नजरिया।* परमात्मा कभी किसी का भाग्य नहीं लिखता है, बल्कि जीवन के ...
देवलोक का अमृतकाल बनाम मृत्युलोक में मानवता का पतनकाल
व्यंग्य

देवलोक का अमृतकाल बनाम मृत्युलोक में मानवता का पतनकाल

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** देवराज इंद्र की सभा सजी थी। देवलोक में "अमृतकाल महोत्सव" चल रहा था। अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं, अमरबेल के पुष्प बरस रहे थे और सोमरस की स्टॉल पर ऐसी भीड़ थी जैसी मृत्युलोक में तंदूरी रोटी की दुकान पर लगती है। तभी सभा में देवर्षि नारद का आगमन हुआ। इंद्र ने मुस्कुराकर कहा, “अहोभाग्य! आजकल तो आपका अधिक समय मृत्युलोक में ही बीतता है। कहीं किसी गठबंधन सरकार में मंत्री पद मिल गया क्या?” नारद ने कटाक्ष अनसुना कर पूछा, “देवराज, बताइए, देवता, दानव और मानव में श्रेष्ठ कौन है?” इंद्र चौंके, “अब आप भी हमारी श्रेष्ठता पर प्रश्न उठाने लगे? कहीं मृत्युलोक की विपक्षी शक्तियों ने आपको प्रभावित तो नहीं कर दिया?” नारद मुस्कराए, “नहीं इंद्र, पर सत्य यही है कि आज सबसे शक्तिशाली मानव है। उसने अपना अलग संसार ब...
सतरंगी दुनिया -२६
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया -२६

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *अजीब बात है, कि वो इंजीनियर नहीं है फिर भी तारीफ के पुल बाँध लेता है।* हँसना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है, पर दूसरों पर हँसना हमारे लिए हानिकारक है। उम्र बढ़ने के साथ हमें यह नहीं सोचता चाहिए कि हम ओल्ड हो गए हैं, बल्कि ऐसा सोचना चाहिए, कि हम तपकर गोल्ड हो गए हैं। उमर कहती है कि अभी थोड़ी भक्ति कर ले, पर दिल कहाँ है, मानता वो तो कहता है कुछ मस्ती कर ले। *यदि आप उम्र को हराना चाहते हैं, तो आप अपने शौक जिन्दा रखिए।* यदि आप खुश रहना चाहते हैं तो इस बात पर ध्यान मत दीजिए कि कौन क्या कर रहा है, कब कर रहा है और क्यों कर रहा है ? अब मुझे उम्र समझाती है कि अब जिंदगी की शाम हो गयी है, परतुं दिल कहता है कि महफिल तो शाम को ही शुरू होती है। बुढ़ापे में भी जवानी का जोश रखिए। माना हमारा तन कछुआ होता है, मगर जनाब हमारा मन तो खरगो...
चिंता शिविर
व्यंग्य

चिंता शिविर

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज तड़के ही पड़ोसी शर्मा जी आ धमके। हाथ में मेरा वही अख़बार था, जिसे वे रोज़ की तरह “पढ़ने के लिए उधार” ले गए थे और पढ़कर अब “ज्ञान बाँटने” लौटाए थे। अख़बार के भीतर से एक पम्पलेट भी झाँक रहा था, मानो वह स्वयं शर्मिंदा हो कि अख़बार के साथ ग़लती से लौट आया है। हमारे शर्मा जी पड़ोसी धर्म का पूरा निर्वाह करते हैं, अख़बार मेरा, पढ़ते वे; चाय मेरी, पीते वे; और अखवार की ख़बरें ऐसी सुनाते हैं जैसे स्वयं रिपोर्टर हों। आज चाय की पहली चुस्की के साथ उन्होंने पम्पलेट मेरी ओर बढ़ाया, “आप तो वैसे भी अख़बार नहीं पढ़ते, कम से कम पम्पलेट ही देख लिया करो। शहर में बड़ा ज़रूरी कार्यक्रम होने जा रहा है।” मैंने सहज अनुमान लगाया, “कोई नया शो-रूम, चमत्कारी वैद्य, असफल प्रेम को सफल करने का कोर्स, या फिर किसी ...