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नेताजी कर्मदास की कैंची लीला

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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नेताजी कर्मदास बड़े कर्मयोगी हैं। कर्म और कर्मफल, दोनों में उनका अटूट विश्वास है। बस फर्क इतना है कि उनके कर्म का केंद्र न राष्ट्र है, न जनकल्याण, वे तो एक ही महान कर्म के लिए अवतरित हुए हैं, वो कर्म है ‘फीता काटना।‘ दिन में दो-चार फीते न कटें तो उनकी उंगलियाँ ऐसे फड़कती हैं जैसे बिना दाना देखे कबूतर बेचैन हो उठे। जेल हो या जिम, अस्पताल हो या शोरूम,बस मंच सजा हो, फीता तना हो और कैमरे तैयार हों, नेताजी अपने कर्म-प्रदर्शन के लिए तत्पर खड़े मिलेंगे। उनके अनुसार फीता काटना पतंग के पेंच लड़ाने से भी अधिक कौशलपूर्ण कार्य है। वे न सुई से, न तलवार से, सिर्फ कैंची से, एक दिन राजनीति की चाँदी काटने का सपना संजोए बैठे हैं। एक बार किसी कार्यक्रम में उन्हें भोंथरी कैंची थमा दी गई। फीता झटके से न कटा तो नेताजी को ‘हलाल’ शैली अपनानी पड़ी। बस फिर क्या था,धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं और नेताजी पर जमकर थू-थू हुई। लेकिन नेताजी ऐसे पके खिलाड़ी हैं कि थू-थू को भी जीभ से चाटकर साफ कर देते हैं। उसी दिन से उन्होंने अपनी निजी, धारदार कैंची जेब में रखना शुरू कर दिया। अब हालत यह है कि सपनों में भी वे फीते काटते रहते हैं। नेताइन कई बार रात में उनके हाथ हवा में चलते देख समझ जाती हैं कि आज फिर कोई उद्घाटन हो रहा है,एक बार तो उनकी साड़ी को ही ‘फीता’ समझकर काट डाला!
शहर में कोई ऐसा पुल, सड़क या इमारत नहीं बची जिसका उद्घाटन इनके कर-कमलों से न हुआ हो। बल्कि एक पुल तो हर बरसात में ढहकर जैसे इन्हें निमंत्रण देता है, “आइए, फिर से मेरा उद्धार कीजिए!” पीडब्ल्यूडी और ठेकेदार भी इस परंपरा को निभाने में पूरी निष्ठा दिखाते हैं। यह हुनर यूँ ही नहीं आता। नेताजी के राजनीतिक गुरु चरणदास जी, जो फीता-कटिंग में मानो पीएचडी कर चुके थे, उन्होंने इन्हें विधिवत प्रशिक्षण दिया था। उन्होंने सिखाया, कैमरे का एंगल क्या हो, कैंची और हाथ का संतुलन कैसे रखा जाए, और सबसे महत्वपूर्ण, दूसरे की कैंची पर भरोसा क्यों नहीं करना चाहिए। साथ ही यह भी हिदायत दी, भीड़ में किसी और को हाथ लगाने का मौका मत दो, वरना श्रेय की बंदरबांट हो जाएगी। हाथ
को पेट के सामने इस तरह साधकर रखना है कि दूसरों को कैंची दिखे ही नहीं, और कैमरा पहले से सेट रहना चाहिए। अब तो हालत यह है कि जैसे ही फीता दिखता है, नेताजी बिजली की गति से अपनी कैंची निकालते हैं और “झट” से काम तमाम। हालाँकि उन्होंने अन्य सामाजिक कार्यों में भी हाथ आजमाया था, जैसे फल वितरण। पर एक बार अस्पताल में केले बाँटने गए तो संस्था के ही पदाधिकारियों की “साथी हाथ बढ़ाना” की भावना इतनी प्रबल हुई कि नेताजी के हाथ के साथ दस और हाथ जुड़ गए, पूरी मानव श्रृंखला बन गई। अखबार में एक्सक्लूसिव फोटो का सपना चकनाचूर हो गया।
पहले नेताजी शांति के कबूतर भी उड़ाते थे, दंगे हों तो ठीक, न हों तो करवाकर कबूतर छोड़ते थे। लेकिन कबूतरों ने भी बगावत कर दी, उड़ने के बजाय सिर पर बैठकर बीट करने लगे। तब से नेताजी का शांति से मोहभंग हो गया। हाँ, उन्हें एक और काम भाने लगा,अनावरण। जैसे ही कोई शिलापट्टिका ओढ़नी ओढ़े दिखती, नेताजी उसमें दुल्हन का आभास कर ‘घूंघट उठाने’ को तत्पर हो जाते। लेकिन पिछले कुछ समय से उनके अपने कारनामों का अनावरण ईडी और सीबीआई करने लगे हैं,इससे वे बेहद दुखी हैं। कहते हैं, “अब तो बेपर्दा करने का काम भी हमारे हाथ से निकल गया।” ले-देकर एक काम बचा है ,कैंची चलाने का। लेकिन तभी उनकी जिंदगी में प्रवेश हुआ बाबा धर्मदास का, मानो कुंडली में शनि बैठ गया हो। बाबा कोई साधारण संत नहीं, उनकी पहुँच ऊपर तक है, ईश्वर तक हो या न हो, अधिकारियों और नेताओं तक तो सीधी लाइन है। लाखों अनुयायी, वीआईपी भक्त और भव्य जीवनशैली, कार, बंगला, सुरक्षा,सब कुछ गुरु-दक्षिणा में प्राप्त।
बाबा का प्रभाव ऐसा कि अब उद्घाटन कार्यक्रमों में नेताजी की जगह बाबा को बुलाया जाने लगा। पेट्रोल पंप से लेकर सरकारी भवन तक,हर जगह बाबा की कैंची चलने लगी। कर्मदास जी के लिए यह असहनीय था, उनका एकमात्र अधिकार भी छिन गया। अब हालात यह हैं कि नेताजी सिर्फ अपने पार्टी कार्यालय के उद्घाटन तक सीमित रह गए हैं, वो भी पाँच साल में एक बार। वहाँ भी बड़े नेताओं के सामने उनका रोल बस “साथी हाथ बढ़ाना” तक सिमट गया है। नेताजी दिनभर अपनी जेब में रखी कैंची को टटोलते रहते हैं,धार कब की कुंद हो चुकी है। एक दिन घरवालों ने पूछा, “इतने परेशान क्यों रहते हो? बाबा धर्मदास के पास चलें?” यह सुनकर नेताजी को पहली बार लगा,अगर कहीं चुल्लू भर पानी मिल जाए… तो शायद उसमें डूब जाना ही बेहतर होगा।

परिचय :-  डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन)  किताबगंज   प्रकाशन,  गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित 
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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