Monday, October 19राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

कविता

ईश्वर की ही खोज है : किन्नर
कविता

ईश्वर की ही खोज है : किन्नर

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** स्त्री और पुरुष अल्हड़ता और पौरुष उभय पक्ष का अपभ्रंश सांसारिक नियमों से प्रताड़ित पक्ष है : ये किन्नर आवेग में आक्रोश करुणा में क्रोध मातृत्व और पितृत्व से मर्माहत संतानोत्पत्ति से असक्षम शिशु प्रेम को लालायित निसंतान इंसान होते हैं किन्नर उत्पीड़न आहत नारी मन सा हतोत्साहित असहाय पुरुष सा दिशाहीन, परिणाम रहित उन्मादित मन सा इश्रुहीन बिलखते दीन मन सा तन भी भूखा, भूखे मन सा भीषण भावों के उतार चढाव में शीत युद्ध मर्यादा से लड़ता नज़र नज़र से तिरोहित अपनी लक्ष्मण रेखा में सिमटे रहते ये किन्नर स्पंदन रहित संवेदना का मारा विधी की कृपाहीन कृपा का मारा ममता से दूर माँ का नयनतारा कब वीर्यवान पिता ने स्वीकारा किस्मत कोसता का रब का मारा ईश्वर की ही खोज है ये बेचारा स्वयं मन को समझाता स...
कारवाई
कविता

कारवाई

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कदम दर कदम बढती गई सोचा मन्जिल पास ही होगी पर, यह मेरा भृम था । दूर, बहुत दूर कुछ आकृति दिखाई दी मेरे कदम आगे बढने के बजाय पिछे जाने लगे शायद उन्हे, किसी आधार की प्रतिक्षा थी। कुछ पदचिन्ह दिखाई दिए देखा दूर तक, कोई नही था। अकेले सफर कठिन होता है मित्रो कारवा, के साथ चलकर जिन्दगी बदल सकते है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौ...
माँ ब्रह्मचारिणी
कविता

माँ ब्रह्मचारिणी

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** नवदुर्गा का द्वितीय स्वरूप तप, त्याग और साधना की दिव्य प्रतिमूर्ति, माँ ब्रह्मचारिणी का रूप महान, अडिग निष्ठा, असीम धैर्य से प्रकाशित, माँ देतीं भक्ति का अनुपम ज्ञान। श्वेत वस्त्र में शोभित माता, मुखमंडल पर तेज अपार, हाथों में जपमाला और कमंडल, भक्तों पर करतीं कृपा अपार। कठिन तपस्या, दृढ़ संकल्प से, जग को राह दिखाती हैं, सत्य, संयम और निष्ठा की ज्योति, अंतर्मन में जगाती हैं। जिनके चरणों में शीश नवाकर, मिट जाते मन के संताप, माँ की महिमा का स्मरण कर, जीवन में भरते पुण्य प्रताप। हे माँ! देना ऐसी शक्ति, हर संकट में धैर्य बनाएँ, आपकी कृपा से श्रद्धा के दीप, जीवन-पथ पर जगमगाएँ। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्...
ओ भारत के वीर जवानों
कविता

ओ भारत के वीर जवानों

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** ओ भारत के वीर जवानों ये देश तुम्हारे साथ है अब विश्व तुम्हारे साथ है ओ भारत के वीर जवानों ये देश तुम्हारे हाथ है तुमपर हमको नाज है तुम भारत की लाज हो तुम भारत की लाज हो।। तुमसे उन्नत खड़ा है हिमगिरि प्रेरित हैं गंगा की लहरी तुम भारत की तस्वीर मनोहर भारत के‌ हो वीर धरोहर तुम भारत के रक्षक प्रहरी तुम भारत के रक्षक प्रहरी।। तुम्ही बने हो देश की धड़कन तुम भारत के मान के रक्षक देश के हो सम्मान के रक्षक सशक्त भारत की आत्मा संस्कृति के तुम संरक्षक संस्कृति के तुम संरक्षक।। तुम्ही प्रताप की तलवार तुम्ही शिवा की हो ललकार रानी लक्ष्मी की संतान तात्या टोपे का अभिमान आदर्श तुम्हारा मर्यादा गीता के तुम ज्ञान हो भारत के वीर जवान हो भारत के वीर जवान हो।। नोट- मैंने स्वयं पूर्व प्रधानमंत्री श्री रा...
खो रहे हैं
कविता

खो रहे हैं

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** हम एक ऐसी दुनिया मे खो गए हैं जहां मृत्यू से कोई भय नहीं है। बचपन मे खोए जवानी में खोए ऐसे खोए की मनुष्य बनना भूल गए। एक दिन यूँ ही खोए हुए हम ने एक सूखी काली पड़ी टहनी को तोड़ा उसकी पानी के प्यास की फुसफुसाहट को होठों से लगाया लगा बारिश कहीं खो गई इन फूल-पौधों को सिसकता छोड़कर। यूँ ही एकदिन हमने सजने संवरने के समान को छुआ, जीवों की उधडती चमड़ी की पीड़ा भरी चीख को महसूस किया, इस सजावट में कितने जानवरों के शरीर कट कर बलिदान हुए होंगे, इन्सानियत भी खो गई पशु-पक्षियों पर अत्याचार करते-करते। एक दिन मंदिर में ईश्वर की मूर्ति को निहारते खो गए, उनकी आंखों की नमी को महसूस किया खुद की आंखों के गीलेपन से, मानो मूर्ति बोल रही हो, तुम मेरे ही बनाए मनुष्य हो, जिसने प्रेम खो दिया, ...
आदमी का चेहरा
कविता

आदमी का चेहरा

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** आदमी का चेहरा आदमी के कई चेहरे होते हैं। एक चेहरा जो वह दुनिया को दिखाता है, एक जो अपने लोगों के सामने रखता है, और एक जिसे वह खुद से भी छिपाकर रखता है। वह मुस्कुराता है जब भीतर कुछ टूट रहा होता है, वह हाल पूछता है जब उसे सामने वाले से कुछ काम होता है। कभी-कभी उसकी चुप्पी उसके शब्दों से ज्यादा सच बोलती है। आदमी को पहचानना उसके चेहरे से आसान नहीं, उसके व्यवहार को समय के साथ देखना पड़ता है। क्योंकि चेहरा एक पल में बदल सकता है, लेकिन आदतें बहुत कुछ बता देती हैं। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी क...
दान के दानव
कविता

दान के दानव

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** कच्ची उम्र की लाडो जब डोली में बैठी थी, बाबुल की आँखों में आँसू की लकीरें ऐंठी थीं। बोझ नहीं थी बेटी, फिर भी तोल दिया बाज़ार में, दहेज तुला पर रिश्ते का सौदा झूठे व्यवहार में।। माँ ने चूड़ी बेची, बापू के खेत गिरवी रखे गए, भाई की पढ़ाई छूटी, बहन के सपने बेचे गए। लक्ष्मी कहकर जो लाए, लक्ष्मी ही चाहे व्यापार में, बाराती नहीं, सौदागर ठहरे दहलीज़ और द्वार में।। वो जो कल तक गुड़िया से खेला करती आँगन में, आज ससुराल में जला करती दहेज के दामन में। ताने सुनती, गालियाँ सहती पल पल छुपी हुई आंचल में , कम लाई है सुनकर, बंधी रही रिश्तों की सांकल में।। स्टोव फट जाते रोज यहां चीखों की आवाज में, चीखें ही दब जाती है परिवार की झूठी लाज में। धाराएं लिखी बहुत हैं कानूनों की किताब में, चिताएं ही घर में जल जाती, न...
पैसा
कविता

पैसा

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** पैसा चाहिए, चाहिए पैसा, जीने को भी चाहिए पैसा। रोटी माँगे, माँगे रोटी, रोटी के संग माँगे पैसा। घर बनवाए, बनवाए घर, घर सजाने को चाहिए पैसा। सपने देखे, देखे सपने, सपनों को भी चाहिए पैसा। रिश्ते अपने, अपने रिश्ते, रिश्तों को कब चाहिए पैसा? बहुत ज़रूरी है पैसा मगर, हर चीज़ से ज़्यादा नहीं पैसा। परिचय :- इंदौर (मध्य प्रदेश) की निवासी अपने शब्दों की निर्झर बरखा करने वाली शशि चन्दन एक ग्रहणी का दायित्व निभाते हुए अपने अनछुए अनसुलझे एहसासों को अपनी लेखनी के माध्यम से स्याह रंग कोरे कागज़ पर उतारतीं हैं, जो उन्हें खुशियों के आसमानी रंग देते हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को खोलकर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख...
जय मां शारदे
कविता

जय मां शारदे

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** जय मां शारदे! जय मां शारदे! करता मैं आपका आह्वान होइए मेरे कलम पर विराजमान हैं हम मां! तेरी संतान मां! अपने चरणों में दे दो स्थान करता मैं तेरा अर्चन मां! ला दो परिवर्तन मां! दमका दो मेरा जीवन मां! ले लो मेरा रक्तकण मां! झंकृत कर दो मेरे हृदय के तार मां! ज्ञान का कर दो मेरे हृदय में संचार मां! करो स्वीकार मेरा बलिदान मां! तरस रहा तेरे कृपा हेतु हिंदुस्तान मां! भर दो ज्ञान सागर से अपने प्यार के सागर से मेरी रिक्त गगरी मेरी रिक्त नगरी मां! काट दो अज्ञानता के बंधन सारे मां! दे दो दर्शन, खड़ा मैं तेरे द्वारे। परिचय :-  सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' निवासी : गुदरी सिंह के टोला, पांडे पुर, बैरिया, बलिया, (उत्तरप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर...
अभी उड़ान बाकी है
कविता

अभी उड़ान बाकी है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जितना रोकना था रोक चुके, जितना टोकना था टोक चुके, अभी बनाना पहचान बाकी है, बिटिया की लंबी उड़ान बाकी है। देवी, देवता, आस्था, संस्कार, थामे हुए थी आपकी संसार, मान्यता, धागा, डोरी, पाखंड, करते रहे हो उन्हें खंड-खंड, कितनी उड़ेगी देखना एक दिन पाने को पूरा आसमान बाकी है। झाड़ू-पोछा, बर्तन, चूल्हा-चौका, हर स्तर पर टोका न दे मौका, देहरी से किंचित क्या निकला कदम, कुत्ते चुप रहे हर बार तूने भौका, टूटेगी जिस दिन तेरा उच्चता भाव, गिरेगा भरभराकर तमतमाता ताव, दुनिया के हर ग्रंथों का होगा चीरफाड़ होना स्त्री का पूरा आख्यान बाकी है। जब तक न दोगे पूर्ण रूप से तवज्जो उनके नजरिये से संपूर्ण समाधान बाकी है। जितना रोकना था रोक चुके, जितना टोकना था टोक चुके, अभी बनाना पहचान बाकी है, बिटिया की लंबी उड़ान बाकी है। ...
स्वदेश प्यार
कविता

स्वदेश प्यार

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** कहां है स्वदेश प्यार? कहां है मानव प्यार? कहां हैं अमर क्रांतिकारी? कहां है मानव सेवा की क्यारी? कहां की धरती जग में न्यारी? कहां की धरती जग में प्यारी? कहां हैं पावन सीता सी नारी? कहां है धर्म ज्ञान की पिटारी? कहां है वीरों की फुलवारी? कहां वेद की ऋचाएं नित गूंजती हैं? कहां दुनिया पेड़ पौधों को पूजती है? कहां गो पालन एक बड़ा व्रत है? कहां हो रहा विकास अनवरत है? कहां हैं शिवा, प्रताप और छत्रसाल? किसका हृदय है समंदर सा विशाल? किसके हृदय में आता विश्व प्रेम का उछाल? कहां हैं हमारे धर्म पाल? कहां है उन्नत भाल? कहां है बल अपरंपार? कहां गूंजता सदा मंत्रोच्चार? कहां गूंजता शक्ति का जय-जयकार? कहां अटल संकल्प संबल है? कहां वेद, पुराण का बल है? कहां गूंजते गीता के अमर स...
राखी का त्यौहार
कविता

राखी का त्यौहार

गगन खरे क्षितिज कोदरिया मंहू (मध्य प्रदेश) ******************** राखी खुशियाँ और भाई बहन का मिठास भरा त्योहार होता है, प्रेम प्यार की मिसाल होता है। पवित्र रिश्ता भारत की पहचान है। जीवन रेखा बहन गगन दो परिवारों की। परिचय :- गगन खरे क्षितिज निवासी : कोदरिया मंहू इन्दौर मध्य प्रदेश उम्र : ६६वर्ष शिक्षा : हायर सेकंडरी मध्य प्रदेश आर्ट से सम्प्रति : नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण भोपाल मध्यप्रदेश सेवानिवृत्त २०१४ साहित्य में कदम : २०१४ से भारतीय साहित्य परिषद मंहू, मध्य प्रदेश लेखक संघ मंहू इकाई, महफ़िल ए साहित्य कोदरिया मंहू, आर्चना साहित्य संस्थान मंहू, राष्ट्रीय संखी साहित्य परिवार, छत्तीसगढ़ सखी साहित्य परिवार, म. प्र. संखी साहित्य परिवार, राष्ट्रिय हिंदी रक्षक मंच आदि समूह से समय पर जुड़े है। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेर...
बेटी
कविता

बेटी

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** एक माँ का दिल ही बता सकता है की बेटी के जन्म की खुशी और बेटी दिवस का महत्व क्या है। बेटी उनके लिये- एक विश्वास है एक संबल है एक साहस है, बेटी हर पल का एहसास है बेटी माँ बाप की परछाई है, बेटी पिता का आत्मविश्वास है मनोबल है, बेटी चिन्ता को चिन्तन मे परिवर्तन का नाम है, बेटी कठिन डगर मे एक पथ है पथिक है बेटी-बेटी ही है, बेटी दिखावा नही दृढ़ संकल्प है, बेटी माँ बाप के लिये समर्पित ईश्वर का एक उपहार है। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय ...
आग जब फैलती है
कविता

आग जब फैलती है

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आग जब फैलती है तो सब कुछ स्वाहा कर ही देती है। यदि समय पर बुझाया ना गया तो फिर कुछ ‌नहीं बचता है। मैं जिस आग को फैलते देख रही हूं, उसकी बात करती हूं। लव-जिहाद, समाज में है। संस्कृति को मिटाने का जिहाद। परिवार नियोजन नाम का जिहाद। नशीली वस्तुओं का जिहाद हर शहर, हर गांव में, शराब की बढ़ती दुकानों का जिहाद। शारीरिक शोषण का जिहाद। धर्म स्थलों को भ्रष्ट करने का जिहाद। धर्म परिवर्तन करवाने का जिहाद। शिक्षा प्रणाली में समाया हुआ गलत इतिहास का जिहाद। धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाते जाने का जिहाद। रोजगार और अर्थ प्रणाली का जिहाद। और भी कई धीमे-धीमे जहर वाले जिहाद चल रहे हैं। हमारी नाक के नीचे, हम चारों ओर से जिहाद की आग से घिरते जा रहे हैं। यह हादसे भी उसी का, एक रुप हैं। ईश्वर का कोप‌ ...
अनजान मन्जिल
कविता

अनजान मन्जिल

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जिन्दगी ढलान सी ढलती जा रही है लुढकती जा रही है धीरे-धीरे अंन्जानी मन्जिल की ओर ऐसी मन्जिल की ओर जिसका न मुझे पता है न जलती जिन्दगी को। बस चलती है, कुछ देश कुछ अनदेखा कर कहीं मन मसोसकर कही प्यासी, उदास, उद्विग्न, निराश जिन्दगी चल रही है सिर्फ ढलान के लिए हां, सिर्फ ढलान के लिए... परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा ...
सच्चा भारत
कविता

सच्चा भारत

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** दलित, पिछड़े और सवर्ण हम सबको पास बुलाते हैं, हैं सभी नागरिक इस देश के, सबको गले लगाते हैं, इंसानियत ही धर्म है अपना, पीड़ा महसूसना मर्म है अपना, ईद, दीवाली और क्रिसमस मिलकर हम मनाते हैं, कर देते हैं सबको ताकीद, हक़ और अधिकार से सब हों वाकिफ़, छल-कपट कर लोगों को हरिजन नहीं बनाते हैं, तोड़ कुरीति की जंजीरें, हम नया दौर अब लाएंगे, जात-पात के ठेकेदारों को आईना रोज दिखलाएंगे, संविधान की शपथ उठाकर, हर आंचल को खुशहाल करें, मजहब से ऊपर उठकर हम, इंसान गले से लगाएंगे, नफरत की जो आंधी उठी, उसे मोहब्बत से मोड़ेंगे, टूटे हुए जो दिल हैं उनको, भाईचारे से जोड़ेंगे, अनेकता में एकता ही, इस पावन धरा की शक्ति है, तिरंगे की इस शान की खातिर, खुद का सर्वस्व निचोड़ेंगे। परिचय :-  राजेन्द्र ल...
स्पर्श एक अद्भुत शक्ति
कविता

स्पर्श एक अद्भुत शक्ति

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** स्पर्श में है एक अदृश्य और एक अजीब शक्ति यह मन के बाहरी व भीतरी सतह की महाशक्ति।। स्पर्श की अनुभूति ओतप्रोत स्वतः अनुभव होती, यह तापमान, शीतलता की भाषा, स्पर्श से कहती।। शरीर में क्रिया खुद पे खुद स्पर्श से अहसास कराती, मौसम के अनुकूल मन शरीर में स्पर्श से स्वयं कराती।। कहींकंपन का, कहीं धड़कन का, कही हिलनेडुलने की, कहीं आनंद का कहीं उदासीनता मन को स्पर्श है करती।। वातावरण का रुख कितना, स्वच्छ है या दुगन्धमय वातावरण के जरिये यह मुक्त कंठ में मौन कहती।। स्पर्श में अद्भुतशक्ति सारी, होती खुशबू स्पर्श में प्यारी स्पर्श की क्या करे बराबरी, स्पर्श बताता हल्का या भारी।। खट्टा मीठा खारा जीभ में स्पर्श से खुलासा होता सारा ज्ञान अज्ञान की गुणकारी बातें, स्पर्श करती मन मे सारी।। कभी किसी के कड़वे बोल कड़वी बा...
शिक्षा
कविता

शिक्षा

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** नव भारत में कदम बढ़ाओ। शिक्षा को बच्चों अपनाओ।। लटका कर कंधे पर बस्ता। विद्यालय नित ही तुम जाओ।। भाग्य विधाता शिक्षक अपना। अपने शिक्षक के गुण गाओ।। कंधे पे है जिम्मेदारी। हथकण्डे तुम मत अपनाओ।। स्वाभिमान होता है प्यारा। सबके उर में जगह बनाओ।। बन जाओ ज्ञानी विज्ञानी नैतिकता का दीप जलाओ।। महत्व श्रम का बच्चों जानो। सच के पथ पर चलते जाओ।। आदर करो बड़ों का बच्चों। चरणों में सिर सदा झुकाओ।। परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सतर्क...
पितर पाख
आंचलिक बोली, कविता

पितर पाख

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) मरे पुरखा मन के बिकट आव-भगत होवत हे, जियत-जागत मनखे के कोनो नइ हे पुछारी। सरग के पहुना मन बर बरा अउ चीला बनत हे, घर के दाई-ददा मन बर नइ हे भात अउ पानी।। गोबर म लिपागे कुरिया के ओरिया अउ परछी, चाँउर पिसान के चउँक पुरागे सुग्घर सजे सिंगार। रंग-रंग के फूल-फलेता, पाना दसे हे ओरी-ओर, हूमहई म हूम ममहागे, कउँवा ह बने हे परुवार।। मुरदा मन के मान-गुन होथे, चढ़थे फूल के हार, कलप-कलप के जम्मो रोथें, सुरता के बाँधे गठरी। पितर मन के बंदगी करे ले तोला मिलही पितर, तँय भगवान ल सुमर, लमाके भक्ति के सुतरी।। जीते-जियत म सेवा कर, झन कर मरे के अगोरा, ओही मन भुइयाँ के देवता, मत भेज बुढ़वा घर। सियान मन के आरती उतार, चरन धो-धो के पी ले, घर ह बैकुंठ बनही, उँखर जीव जुड़ाही हर बछर।। परिचय : अशोक कुमार यादव निवासी : म...
मैं इस दौर के लिए नहीं बनी
कविता

मैं इस दौर के लिए नहीं बनी

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शायद मैं इस युग के लिए नहीं बनी या ये समय मेरा नहीं जहाँ लोग रिश्ते भूल जाते हैं मैं दिल से लगा लेती हूँ!! यहाँ खुद को साबित करने की होड़ मची है सही-गलत को तज कर स्वयं को ही धोखा दे लेते हैं मैं अकेले चलती रही अपने पर यकीन कर के कि शायद समय मेरा होगा कभी! लोग बातों को अनसुना कर "बाद मे बात करते हैं" कहकर भूल जाते हैं मैं उस "बाद" का इंतजार करती हूँ! सबके सपनों में इंद्रधनुषी रंग भरती रही जीवन भर मेरे सपने बेरंग ही रहे नहीं समझ पाई जीवन मे कभी! इस छोटे से जीवन मे अगले पल का अधिकार नहीं भविष्य के सपनों के लिए लोग रिश्तों को दांव पर लगा देते हैं कहते हैं हमसे, इतना कौन सोचता है शायद सच कहते हैं, पर मेरा दिल हर एहसास को ज्यादा ही महसूस करता है क्यूंकि मैं इस युग के लिए नहीं बनी!! ...
आंसू की एक बूंद-सी
कविता

आंसू की एक बूंद-सी

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* आंसू की एक बूंद-सी होती है बेटियां स्पर्श खुरदुरा हो, तो रोती है बेटियां रोशन करेगा बेटा, तो बस एक ही कूल को दो-दो कुलों की लाज ढोती है बेटियां कोई नहीं है एक दूजे से कम दोस्तों हीरा अगर है बेटा, तो मोती है बेटियां कांटों की राह ये खुद ही चलती रहेंगी औरों के लिए फूल बोती है बेटियां विधि का विधान है यही यही है दुनिया की रस्म मुट्ठी भर नीर-सी होती है बेटियां परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मानित घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स ...
है विश्व हमारा परिवार
कविता

है विश्व हमारा परिवार

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** हैं हम हिम्मती हिंदुस्तान वाले हैं हम गीता,वेद,पुराण वाले जो हम ठानते है जो हम मानते हैं वह कर डालते हैं तीन समंदर रख कर साथ में तिरंगा रख कर हाथ में चलते हैं हम ऐसे ही नहीं उबलते हैं हम ऐसे ही नहीं उछलते हैं हम है हृदय हमारा विशाल है हिंद हमारा विशाल देख अन्याय आता रक्त में उबाल है सारा संसार हमारा परिवार हैं हमारे उच्च संस्कार होते हैं हमारे हिंद में ईश्वर के अवतार करते हैं हम सब पर उपकार मानता है हमें सारा संसार है हमें सच्चाई से सदा प्यार बदल देंगे हम सारा संसार करके सत्कर्म बार बार। परिचय :-  सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' निवासी : गुदरी सिंह के टोला, पांडे पुर, बैरिया, बलिया, (उत्तरप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी ...
सच्चा शिक्षक
कविता

सच्चा शिक्षक

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मेरी जाति जानने के इच्छुक मेरे नन्हे विद्यार्थियों, अब मैं तुम्हें रोज नई बातें सिखाऊंगा, जाति-पांति जरूरी या मजबूरी नहीं बताऊंगा। लील चुकी है इस प्रश्न में छुपी भावनाएं कई अबोध और मासूम जिंदगियां, इसने समाज को केवल गरल ही दिया, विभाजन की दीवारों को अब मैं ढहाऊंगा। न मैं अगड़ा हूँ, न मैं पिछड़ा हूँ, न मैं किसी ऊंचे-नीचे भेद में बिखरा हूँ, मेरी कलम, मेरा ज्ञान ही मेरी पहचान है, तुम्हारे भविष्य को सँवारना ही मेरा ईमान है। तुम्हें किताबों के अक्षरों से आगे सोचना सिखाऊंगा, भेदभाव की इस संकीर्ण सोच से तुम्हें बचाऊंगा, मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है इस जहाँ में, तुम्हारे कोमल मनों में यही अलख जगाऊंगा। छोड़कर पीछे जात-पात के हर झूठे बंधन को, ज्ञान के प्रकाश से महकाऊंगा तुम्हारे जीवन को, कल...
सत्ता के सौदागर
कविता

सत्ता के सौदागर

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** सत्ता के सौदागर सदैव लाशों के ढेर लगाते हैं ईमान धर्म पिछले दरवाजे से कब के बाहर जाते हैं तिनके की आहट से भी सहम-सहम ये जाते हैं हिलती दिखे कुर्सी इनकी तो झट षड्यंत्र रचाते हैं साम,दाम,दंड भेद से खिचड़ी ऐसी पकाते हैं देख पैंतरे इनके विरोधी इनसे मात खाते हैं उजले वस्त्रों से चमक दमक करतब काले कर जाते हैं सत्ता के सौदागर सदैव लाशों के ढेर लगाते हैं सत्ता वो तोता है जिसमें इनके प्राण है अटके तोते की रक्षा में होते हैं इनके सारे लटके-झटके महत्वाकांक्षा में जो बाधा बने वे सदैव ही है खटके जब लगा दाव बिना चुके चेलों ने है गुरुओं को पटके जिसने पढा पाठ पटकन का वे ही सत्ता पाते हैं सत्ता के सौदागर सदैव लाशों के ढेर लगाते हैं अपना उल्लू सीधा कर ये वादे रोज भुलाते हैं एक बार जो जीत गया ...
गणपति महिमा
कविता

गणपति महिमा

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** गौरी नंद गणेश तुम्हारी महिमा सब से न्यारी है। पूरण कीजिए काज सभीके ये विनती हमारी है। गौरी नंद … महा गणपति रुप तुम्हारा श्रृष्टि तुम मे समाई है। हरे सभीके संकट तुमने जिस पर विपदा आई है। गौरी नंद … युद्ध रचाकर शिव से तुमने माँ का मान बढ़ाया है। कृपा हुई शिव की तुमपर गजमुख तुमने पाया है। गौरी नंद … एक दन्त दयावंत तुम्हारी मूषक बनी सवारी है। विघ्न हंता संकट मोचन छवि अति मनोहारी है। गौरी नंद … प्रथम पूज्य का पाकर वर गणनायक कहलाते हो। धन्य होता जीवन उसका जिसपर कृपा बरसाते हो। गौरी नंद … ज्ञान बुद्धि के तुम सरोवर तुमसा नहीं कोई दूजा है। हम तो है अज्ञानी मानव विधि न जाने क्या पूजा है। गौरी नंद … दर्शन की अभिलाषा लेकर द्वार तुम्हारे हम आये है। गंध पुष्प स्वीकार करो प्रभु श्रद्धा शीश झुकाये है। गौरी नंद … ...