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कविता

लिख तो सकता हूं
कविता

लिख तो सकता हूं

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जानता हूँ तुम्हें गिला है कि मैं तुम्हारे बारे में क्यों नहीं लिखता, तुम्हारा चाहने वाला क्यों नहीं दिखता। हाँ, लिख तो सकता हूँ तुम्हारे रूप, श्रृंगार और सौंदर्य पर, भय, लोभ, लालच, मोह, दया और ऐश्वर्य पर, मगर अब थक चुका हूँ इन विषयों को दोहराने से। मोह अब भी पूरी तरह छूटा नहीं, पर कुछ नया सीखने की चाह जागी है। इन सबके अलावा भी लिखने को बहुत कुछ है। कब तक लिखता रहूँ वही चमत्कार, पाखंड और झूठ? अब दिखते हैं मुझे असली मुद्दे अशिक्षा, गरीबी, भूख और शोषण। लिखना है कौन कर रहा है इनका पोषण, क्यों अब भी जिंदा हैं हजारों साल पुराने, बेकार नियम, जिनके नीचे दबकर आज भी सिसक रहे हैं लाखों लोग। क्यों नहीं कर पा रहा आम नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग? हक़, अधिकार और कर्तव्...
अंतःकरण
कविता

अंतःकरण

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मनुष्य का संघर्ष बाहरी मुश्किलों से नहीं स्वयं से होता है, इंसान का मन कई परतो में विभाजित है, इनमे न्याय, स्वार्थ, अन्याय के विचारों में द्वंद सदैव चलता है। मान- सम्मान और पहचान की आकांक्षा मनुष्य को विचारों के जाल में उलझा देती है। मनुष्य की विशेष प्रवृत्ति, स्वयं को सही साबित करने हेतु तर्क-वितर्क करता है स्वयं को नैतिक समझता है! शक्ति और नियन्त्रण के प्रति आकर्षित हो अपने विचार मनवाना चाहता है! दूसरों को प्रभावित कर स्वयं की स्थित दृढ़ करना चाहता है! मनुष्य की यही मनोदशा संबंधो को कमजोर करती है, आपसी संवाद में दूरिया पैदा करती हैं, संवाद एवं सहयोग के स्थान पर प्रतिस्पर्धा जन्म लेती है !! शुद्ध परिवर्तन स्वयं के भीतर से ही जन्म लेता है मनुष्य जब अपनी कमजोरियों को ...
आधुनिकता
कविता

आधुनिकता

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** तन सजा है मन प्यासा है भूखी रही सदा आत्मा तन की लिप्सा पूरी हो अभिप्सा नारी की शोख अदा बिक रही आह बिक रही धड़कने बिकती हैं शैया सलवटें बिक रहे स्वप्न बिकने को आतुर अस्मिता बिक रही मन की चाहतें जिधर उठे नजरें बाजार सजा है बिकने को परोसी गई आह से वाह तलक बिक जाती हैं मानवता सुलग रही मंजिल की चाह भूल गये मन अपनी राह.... कैसे लगे मोल पसीने की बूँदों का कैसे हो पहचान इन्सानी रक्तबीजों का सड़ रहा जो नाली में कैसा है धर्म इसका भाषा रह गई तौल-मोल की पैसा स्थापित हुआ इन्सानी धर्म सपने कैद राजमहलों में हँस मजबूर गाना चुनने व्यवसायीकरण होरहा लिप्सा का कव्वे आरहे बिकने हँस के मोल.. इस खतरनाक परिवेश आश्चर्य कहाँ और किसे बाजार में उतरे नारी बिकने को उपभोक्ता बन पुरुष बने भोक्ता निष्ठुर...
पनघट
कविता

पनघट

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** गाँवों में नींद मीठी होती ये बात तो हवाएं भी कुछ कहती है बौराये आमों तले कोयल की कूक भी मीठी होती नयनों से कैसे कहे। पत्तों से झाँकती सूरज की किरणें तपीश को ठंडा कर देती खेत से पुकारती आवाजें सुबह की बयार को मीठा कर देती नयनों से कैसे कहे। गोरी के पनघट पे जाने से पायल कानों में मिठास घोल देती बैलो की घंटियाँ मीठी बातें कहती पनघट इन्ही मिठासो से इठलाता है ये बात नयनों से कैसे कहे। परिचय : संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता : श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि : २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा : आय टी आय निवासी : मनावर, धार (मध्य प्रदेश) व्यवसाय : ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन : देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार पत्रों में निरंतर पत्र और रचनाओं का प्रकाशन, प्रकाशित काव्य कृति "दरवाजे पर दस...
विभीषिका युद्ध की
कविता

विभीषिका युद्ध की

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** युद्ध होते आयें हैं इतिहास गवाह है होते आयें हैं युगों-युगों से युद्ध इतिहास का प्रत्येक पन्ना भरा है रक्त रंजित करते धरा को युद्धों से विध्वंस का द्योतक है युद्ध माना... कि... विध्वंस स्वयं में सृजक होता है मगर....भंयकर पीड़ा अपने में समेटे होता है युद्ध.... लाशें बिखरती है चहुँ और धरा पर इन सामरिक युद्धों में न जाने उजड़ते हैं कितने घर-परिवार खंडित होते हैं अनगिन रिश्ते युद्धों में रामायण... महाभारत... और न जाने कितनी परिचायक घटनायें युद्धों की.... मगर एक युद्ध और होता है कहलाता है मानसिक युद्ध यहाँ शत्रु नहीं होते बाहरी पर दुश्मन इंसान के होते हैं भीतरी स्वयं के विकार झूझती है आत्मा स्व-निर्मित वैचारिक जाल में माध्यम बनते हैं काम, क्रोध, लिप्सा, अहम् न तलवार, न गोली प...
रवायत
कविता

रवायत

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हमें यूं तुमको देखने की आदत है। न है मोहब्बत फिर भी बहुत कुछ कहने की आदत है। कभी सोचा ही नहीं तुमको पाने का बस यूं ही तुमसे दिल लगाने की आदत है। लोग सोचते हैं जिस्म को छूने की हमें यूं ही तुम्हारी रूह को गले लगाने की आदत है। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.co...
जाल और सवाल
कविता

जाल और सवाल

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** उनकी एक चूक किसी के लिए पहाड़ बन जाती है, और निर्दोष भी अपना ही चेहरा छुपाता है। क्यों नहीं समझते कुछ लोग दूसरे की विवशता का भार, क्यों उसकी आवश्यकता को बना देते हैं दूरी की दीवार। वो तो विश्वास के धागों से आपके खेल में बंधा है, यह आप सबकी जिम्मेदारी है कि उसे न कहना पड़े- “मेरा प्रश्न अब तक अनसुलझा है।” यदि कोई आपके कारवां का सिपाही है, तो उसकी थकान भी आपकी गवाही है, आपकी दुनियादारी उसने भी निभाई है, फिर क्यों उसकी पीड़ा पर चुप्पी छाई है? अब तो सबकी कलम में एक ही स्याही बहती है, पर शब्दों के जाल में उलझी हुई सच्चाई ही सबसे कम कहती है। आपके दिखाए ख्वाबों के तंतु में वो स्वयं को लपेट चुका है, अपने ही हाथों से फंसने का जाल बिछा चुका है। तो बताओ जब अपनी ही बनाई इस दुखद दशा में ...
बस्ती का सच
कविता

बस्ती का सच

संगीता शुक्ला 'स्वरा' शहडोल (मध्यप्रदेश) ******************** यहाँ चेहरा नहीं, एक नकाब है, साज़िशों का ही अब हिसाब है। मुस्कुराना भी यहाँ एक आज़ाब है, नेक-दिली अब महज़ एक ख़्वाब है। पीठ का ज़ख़्म बहुत बेहिसाब है, दोस्त के हाथ में ही तेज़ाब है। हाथ मिलाना यहाँ अब खराब है, बगल में छिपा एक खंजर-ए-नायाब है। झूठी दुआओं का अपना शबाब है, हर शख़्स यहाँ बस एक सैलाब है। तू चुप रहकर देख 'स्वरा', यह जवाब है, दुनिया का सच अब खुली किताब है। परिचय :  संगीता शुक्ला 'स्वरा' निवास : शहडोल (मध्यप्रदेश) संप्रति : साहित्यकार, मंचीय कवयित्री पुस्तक एकल संग्रह : स्वरा प्रवाहिनी चयनीत साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश द्वारा, द्वितीय : मुक्तक संग्रह "स्वाति की बूंद", तृतीय संग्रह प्रकाशन पर- आचमन 'स्वरा' की, 23 सांझ संग्रह।। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिका...
किताबों के साथ
कविता

किताबों के साथ

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** क्या आप जानते है चिंता को, और पहचानते हो तनाव को। जीवन में अनुभव किये होंगे, पीड़ा, बेबसी और मजबूरी को। डर, घबराहट और परेशानियां, जगाये रखती होगी देर रात को। कल की चिंता, व्याकुलता, भय, आंखों से दूर रखती है निंद को। सफल नहीं हुआ तो क्या होगा, कब दूर करूंगा बेरोजगारी को। लाखों कठिनाइयां है रास्तें में कैसे संभाल पाऊंगा जिंदगी को। पुस्तकालय में दत्तचित्त होकर, हराते है कितने ही विचारों को। युवा किताबों के साथ पढ़ते है, घर के विखंडित हालातों को। उन्हें याद है पिता के सिर चढ़ा, कर्ज और साहूकार का तकाजा। ज्ञात है ब्याज की चक्रवृद्धि दर, क्योंकि दुनिया में दौलत से ही, परिभाषित है रंक और राजा। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में, हताशा से गहराई तक टूट जाते है। आखिरी सीढ़ी तक पहुंचकर, बिना मंजिल के फ...
ईरान–इजराइल, अमेरिका युद्ध पर
कविता

ईरान–इजराइल, अमेरिका युद्ध पर

महेश बड़सरे राजपूत इंद्र इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** वो आवाजें! मलबे के नीचे, दबे हुए लोगों की, क्या नहीं पहुंच पाती हैं, ओ आकाओं तुम्हारे कानों तक? पर क्या? ये अहसास नहीं तुम्हें, कई माँ–बाप और विधवाऐं, भाई–बहनें और उनके टूटे सपने, टूटी इमारतें कोस रहे हैं आसमानों तक। सिसकियों से, चीखों–चीत्कारों से, लेना देना नहीं मासूम पुकारों से, शिकारियों की जिद ने ही पहुंचाया है हजारों जिंदगियों को कब्रस्तानों तक। तुम्हारा घमंड! छेड़ गया युद्ध प्रचंड, विश्वास हुआ खण्ड–खण्ड, प्रतिशोध की ज्वाला अखण्ड, पहुंची निर्दोषों के आशियानों तक। तुम्हारा लोभ! ले ही आया विक्षोभ, है चारों तरफ शोक ही शोक, सूना घर, सूनी गलियाँ, सूने रास्ते, सुने ताफ़िला घर और मस्जिदों तक। ओ! हुक्मरानों! दिल की आंखें खोलो, दिल की गहराइयों से शुभ शुभ बोलो, और जो तड़पते–...
स्पर्श (घनाक्षरी)
कविता, धनाक्षरी

स्पर्श (घनाक्षरी)

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** नजर तो नजर है, खबर असर खूब, सोचिए तो फर्श भी, स्पर्श से विलय धरे। फेर होवे नजर का, तो नूर की नजर से, नजर दशा दर्श को, स्पर्श मन से करे। शब्द क्षुब्ध क्रुद्ध कभी, तो नेम धेम क्षेम के, सार क्षार निहार से, बुद्ध का स्पर्श करे। नाप का प्रताप भाव, माप दंड अति गूढ़, भाव मिले पुष्प खिले, भाव ही स्पर्श भरे। शब्द मर्म भाव धर्म, शब्द गुने बने लब्ध, कमजोर ज्ञान गर, स्पर्श बिन वो गिरे। निज मम्मा ममत्व में, पिता भाव घनत्व का, शब्द अर्थ स्पर्श सत्य, श्री राम कृष्ण हरे। शिव कृत्य नृत्य नाद, आदि ध्वनि डम डम, शब्द संसार गूंज से, ऊर्जा शांति छाई है। शब्द स्पर्श अर्थ व्यर्थ, खेल सदा डग मग, मेरी बात तेरी बात, स्पर्श मात खाई है। गाय निहित दक्षता, रख दूध में शुद्धता, नकली वस्तु त्याग से, गाय स्पर्श जान लो। धन कमाऊ स्पर्श तो,...
क्यों परेशान रहता है मन
कविता

क्यों परेशान रहता है मन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** अक्सर परेशान होता है मन जबकि, अपने दर्द को जुड़ाव में बदल सकता है पत्थर पर सहानुभूति को निखार सकता है फिर भी परेशान रहता है मन!! सब कहते हैं, अंधेरे दिनों में मोमबत्तियां जलाना सीखो, यादों की चिंगारी को रूह से हटाना सीखो, अवसाद में रहना जिंदगी के सही मायने नहीं होते . ये समझता है, फिर भी परेशान. रहता है मन!! अवसाद से भरा जीवन भीतर खालीपन भार देता है, हृदय का खोखलापन, धड़कनों की लय को धीमा कर देता है, आशा और निराशा जीवन के दो पहलू हैं, खुशी एक निर्णय है, जो स्वयं से हमे लेना होता है , सब कुछ जानता है, फिर भी क्यों परेशान होता है मन!! जिंदगी के तूफान आत्मा को तोड़ देते हैं, बदलते समय की बरसाती किसी चमत्कार से कम नहीं लगती, मन के उमड़ते ज्वालामुखी को शांत कर देती है, स्वयं...
खामोश यादें
कविता

खामोश यादें

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं गूंजता रहूंगा तेरे शहर में तेरी यादों के संग। मैं अकेला ही सही पर फ़िरता रहूंगा हर जगह तेरी खामोशी को ले अपने संग। लोग पूछेगे मुझें जब क्या दर्द है तुम्हें? मगर मैं फिर भी चुपचाप फिरता रहूंगा सीने में दफन की तेरी खामोश यादों को ले संग। मैं लिखता रहूंगा हर जगह इश्क़ लोग पूछेंगे मुझे कौन है हमराही तेरा? तो मैं चुपचाप हंसता रहूंगा, तेरी मुस्कुराहट को याद कर। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट...
भाग्यविधाता
कविता

भाग्यविधाता

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** पांच वर्ष में मतदान होता लोकतंत्र को मजबूत करता मजबूत करने का महापर्व मतदाता को इसपर खूब गर्व ।।१।। भारी उत्सकुता से आता मतदान की कतार लगाता मतदान केंद्र में मतदाता मतदान कर लौट जाता ।।२।। मतदान कर नहीं बताता निर्णय अकेले दे जाता मतदानकेंद्र में सीधे आता मत का अधिकार बताता ।।३।। मतदान केंन्द्र सज जाता चुनाव अधिकारी डटजाता मतदान की नींव बनाता बारी बारी से सबको बुलाता ।।४।। बारिकी में चुनावअधिकारी हिसाब में रखता होशियारी चुनाव परिणाम की करता कागज कलम से तैयारी ।।५।। एक एक मत का हिसाब देते अधिकारीबखूब जबाव निष्पक्षता बरतते लाजबाव मत हो न जाये खराब ।।६।। मतदाता का मतदान कितना होता कीमती असरदार बन जाता कितना होता महान मतदाता ही निर्णायक मुख्यभूमिका निभाता ।।७।। खुलता है जब मतपेटी भाग्...
विश्वास के रंग
कविता

विश्वास के रंग

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** जीवन क्या है..? जीवन का दूसरा नाम है विश्वास जब टूटता है विश्वास टूट जाता है स्वयं इन्सान और तोड़ता है विश्वास मन का शक मन का भ्रम मनगढंत गलतफहमियां शक जब सुलगाता है मन उठता है शक का धुंआ सोच लिपटी रहती है इस धुंए में पनपती है कुंठा जो पनपाती है अविश्वास.... जब पनपने लगे अविश्वास मन सोचता है हर गलत को सही और सही को गलत तब... बदलने लगती है सोच बदली सोच करती है मन भ्रमित भ्रमित मन बदलता चलने की दिशा और... बदल जाती है परिस्थितियां.... बदलते ही परिस्थितियां छाने लगते हैं बादल संकट के और... इन्हीं मेघों की बरसात कर देता है जीना दूभर कुतर्क पर उतर आते हैं मन और मष्तिष्क उलट जाते हैं कर्म जो उलट देते हैं परिणाम.... जीने के लिए जीतना होता है विश्वास कहीं किसी ने जीता है तर...
शाखा से टुटे पत्ते सी
कविता

शाखा से टुटे पत्ते सी

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** न जाने कब मन समन्दर की गहराई कम हो और हम कही खो जाए लहरो मे सोचने जुबा खोलने होता नही ओस बून्दो का आभास ओस तो पिधलती है, लुटती है केवल पत्तो के लिए। क्या तुम पिधलकर जम जाओगी ओस सी या ओस सी लुटकर अपनी सुन्दरता बिखेरोगी सिर्फ मैरे लिए क्यो की मै क्योंकि मै शाख से टुटे पत्तो के समान घरा पर गिरी सी परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंद...
रंगत से अधिक संगत को संभालिए
कविता

रंगत से अधिक संगत को संभालिए

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** रंगत तो पल में बदल जाए, संगत जीवन गढ़ जाती है, अच्छे लोगों की छाया में, किस्मत भी मुस्काती है। रंगत चेहरे की धूप-छाँव, समय के संग ढल जाती है, संगत सच्ची मिल जाए तो, राह नई बन जाती हैl रंगत बाहरी चमक-दमक, मन को कहाँ सजाती है, संगत सच्ची हो अगर, आत्मा भी महक जाती है। रंगत झूठी दिखावा है, जो क्षण भर में मिट जाती है, संगत सच्ची दीपक बन, हर अंधेरा हर जाती है। रंगत से मत धोखा खाना, यह तो आँख भरमाती है, संगत की पहचान करो, यही राह दिखलाती है। रंगत से रिश्ते ना जोड़ो, ये अक्सर टूट जाते हैं, संगत सच्ची निभ जाए तो, जीवन फूल खिलाते हैं। रंगत चाहे जैसी हो, दिल को क्या समझाती है, संगत अच्छी हो तो जीवन, खुशियों से भर जाती है। रंगत के पीछे भागे जो, अक्सर पछताते हैं, संगत सही चुनने वाले, मंजिल तक जात...
पहली पाती प्रेम की
कविता

पहली पाती प्रेम की

माधवी तारे लंदन ******************** सुनते-सुनते गजल जगजीत की याद आई पहली पाती प्रेम की गुणों के बखान भर से कृष्ण को रुक्मिणी ने लिख भेजी बात मन की काल बदला हाल भी प्यार की न अब बात भी देखने की खूबसूरती बात कहां अब प्यार की इसे छोड़ उसे पकड़ फिर भी स्नेह की नहीं खबर इस शिप से उस शिप में जाती रहती आज की जेन ज़ी प्रेम के सुनहरे रंगों में हम जी रहे हैं पतझड़ को हम प्रेम की पाती फिर भी मन में पहली धक-धक, पहली याद गहरे कहीं अब अपने साथ आज की बात हलांकि कुछ और ही प्यार व्यार सब व्यापार प्यार बचा सिर्फ शब्द भावनाएं खो गई कहीं परिचय :-  माधवी तारे वर्तमान निवास : लंदन मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) अध्यक्ष : अंतर्राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच (लन्दन शाखा) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक क...
आज के दौर में
कविता

आज के दौर में

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** आज भरोसा उन पे करो जो दुश्मन है, जान का खतरा उनसे है जो जीवन है, दुश्मन तो सदा सावधान ही रखता है, जहर पिलाएगा वही जो संघ चखता है, पता नहीं चलता कब वो किसे पैसे खिला दे, मीठापन वो इतना करे के जहर बना दे, कुटिलता तो छुप जाती है अब मुस्कानों पे, न करो भरोसा अपनों पर कब राज बता दे, अकेले जी लेने का हुनर पैदा कर लो, दया, मोह और भावों का भी सौदा कर लो, टांग खींचेंगे जितने ज्यादा अपने रहेंगे, घर का कुत्ता भौंक भौंक तुझे कुत्ता कहेंगे, भूल के न भाई पर कभी एतबार भी करना, खुद से ज्यादा कभी किसी को प्यार न करना, राज, पाठ और धन के लिए क्या क्या होता है, आंख मूंद भरोसा करने वाला सब कुछ खोता है, चढ़के फांसी पर न अपना तुम प्राण निकालो, हो मरने की जल्दी तो रिश्तेदार बुला लो, आज के दौर में कहां ...
डायरी के पन्ने
कविता

डायरी के पन्ने

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** तुम उसे चुनना खुद के लिए जो तुम्हें पसंद हो मैं हर बार तुम्हें ही चुनूंगी। कभी जो मेरी याद आये, मेरी डायरी के पन्नों को पलट लेना जो बात जुबां कभी कह ना सकीं वो उन पन्ने में दिखाई देंगे।। कुछ शब्दों मे अधूरे सपने सजे होंगे, कुछ पन्नों में पाप-पुण्य का लेखा-जोखा होगा, उन्हीं पन्नों में कुछ शब्द, तुम्हें देखकर मुस्कुरायेंगे! सब कुछ बटोर पाऊँ इन कांपते हाथों में अब दम नहीं है, तुम कहोगे तो बीते पलों की दास्तान तुम्हें सुना दूंगी! जिंदगी किसे मिली है यहां सदा के लिए एक दिन हम सबकी सांसे थम जानी है! अगर कभी मूंद ली आंखे हमने वक्त के पहले, तो कुछ अधूरे कुछ पूरे के पन्नों को समझेगा कौन।। परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५...
नदी का समर्पण
कविता

नदी का समर्पण

अनिता राजेश गुप्ता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मैं बहती नदिया सी चंचल, तुम सागर से गंभीर प्रिये, मैं इठलाती कल-कल छल-छल करती, उमड़-घुमड़ कर आती तुम्हारे पास, मेरा लक्ष्य है सागर से मिलन, लेकिन नहीं भूली हूं मैं, पथ के ग्रामों और शहरों को, खेतों और खलिहानों को, इन सबको अपने जल से सींचती, जन-जन की मैं प्यास बुझाती, पहुंचती हूं अपने लक्ष्य तक, जहां सागर से मिलकर मुझे, एकाकार होना है, जहां न "मैं" हूं न "तुम" हो, बल्कि अब "मैं" व "तुम" दोनों मिलकर "हम" हैं। परिचय :- अनिता राजेश गुप्ता निवासी - इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक...
लिखूंगा तुम्हारे लिए
कविता

लिखूंगा तुम्हारे लिए

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सोच रखा है लिखूंगा तुम्हारे लिए चंद महत्वपूर्ण पंक्तियां, मगर उबर लेने दो मुझे मेरी कुछ परेशान करती उलझनों से, अभी तामील कर रहा हूं आदेश अपने आप को मानने वाले विज्ञ जनों से, मेरा भी तो ये सपना है कि तुमसे बात करूं खुलकर, दुनियादारी के बीच रह क्या करना है अच्छी तरह समझा दूं मिलकर, होता है महसूस कि तू आकर्षित है मुझसे, पर मिलकर ही बताऊंगा कि मुझे क्या उम्मीद है तुमसे, उम्मीद हां वहीं उम्मीद जो लगाया था हमारे महापुरुषों ने हमसे, हमारे इस समाज से, जो उबर नहीं पा रहे घर, परिवार, हंसी और अपने आप से, जैसे मैं दूर जा चुका था उस राह से, गिरता जा रहा था खुद की निगाह से, अपनों को परेशानियों में देखना मुझे बिल्कुल भी गंवारा नहीं है, इस मिशन की राह में चलने के सिवा और कोई चारा नहीं है। ...
एक मुट्ठी आसमाँ
कविता

एक मुट्ठी आसमाँ

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** करो जागरण अंतर्मन का, मन संकल्प सजाओ। करना है जो कर ही डालो, रोग दूर कर जाओ।। बंधु ज़रा निज मन की बात मानकर तो देखो। एक मुट्ठी आसमाँ ज़रा हासिल कर तो देखो।। साहस का भाव निभाकर, संयम ह्दय जगाओ। करना है जो, कर ही डालो, मंज़िल को पा जाओ।। ख़ुद की कमियों को ज़रा ईमानदारी से लेखो। ज़रा, एक मुट्ठी आसमाँ हासिल कर तो देखो।। जीवटता से तो मार्ग स्वास्थ्य का मिल जाता है। सब कुछ होना, इक दिन हम में बल लाता है।। करना है जो, कर ही डालो, मंज़िल को पा जाओ।। ज़रा, एक मुट्ठी आसमाँ हासिल कर तो देखो।। रीति-नीति के पथ पर चल, मंगल को तो पाओ। अंधकार को परे हटाओ, हथेली पर नूर उगाओ।। इंसानी जज़्बातों को संग ले जीवन को लेखो। ज़रा, एक मुट्ठी आसमाँ हासिल कर तो देखो।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी...
सिलेंडर भैया
कविता

सिलेंडर भैया

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** सिलेंडर भैया आजकल बड़ी किल्लत मचाए, रसोई में जैसे सन्नाटा सा छाए। चूल्हे की हंसी अब कहीं खो सी गई, बिना तुम्हारे रसोई भी रो सी गई। भूखे से बर्तन खामोश पड़े हैं, जैसे सब सपने कहीं दूर खड़े हैं। आटे की लोई भी इंतजार में है, तवा भी जैसे किसी पुकार में है। रसोई की रानी अब उदास बैठी है, आंच बिना हर खुशबू रूठी है। चाय की चुस्की भी अधूरी लगती, सुबह की रौनक भी फीकी सी लगती। तुम बिन हर स्वाद अधूरा लगता, हर पकवान अब बेसूरा लगता। जल्दी आओ, रसोई में रंग भर दो, हर चेहरे पर फिर से उमंग भर दो। सिलेंडर भैया, अब देर न लगाओ, रसोई की खुशियों को फिर से लौटाओl परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश...
ज्ञान आलोक
कविता

ज्ञान आलोक

अमिता मराठे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ज्ञान आलोक में रखना कदम दिव्य कर्म करते रहना सहज। कर्तव्य पथ सदा रहे निर्मल संस्कार व्यवहार रहे सरल। कर्म कल्याणकारी अनुकूल अल्हादित ह्रदय रहे कोमल। ज्ञान आलोक में रखना कदम दिव्य कर्म करते रहना सहज उदित सूर्य नित्य देता प्रकाश सृष्टि को संतृप्त करना है काम। संस्कार में बसे व्यवहार साफ रवि की निःस्वार्थ अनवरत चाल। ज्ञान आलोक में रखना कदम दिव्य कर्म करते रहना सहज। कर्तव्य पथ पर चलते रहना ज्ञान गुणों का दान करना। मर्यादा व आज्ञाओं में रहना संतुष्ट मानव जीवन कहना। ज्ञान आलोक में रखना कदम दिव्य कर्म करते रहना सहज। दृढ़ता से निश्चय बुध्दि बने मनन चिंतन से पुष्प खिले। कर्म से प्रथम स्व उत्कर्ष करें स्व उत्कर्ष से नवनिर्माण करें। ज्ञान आलोक में रखना कदम दिव्य कर्म करते रहना सहज। परिचय :- अमि...