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कविता

विश्वगुरु भगवान श्रीकृष्ण
आंचलिक बोली, कविता

विश्वगुरु भगवान श्रीकृष्ण

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) ओदे आवत हे कन्हैया, बजावत बंसी। झूम-झूम के नाचत हें, जम्मों यदुवंशी।। पहिरे हे मोर मुकुट अउ बैजयंती माला। संग म हवंय सुबल, बलराम, मधु ग्वाला।। गोकुल के बन म, चरावत हे गाय-गरुवा। कदम्ब रुख बइठे हे, मुरलीधर दुलरुवा।। कान्हा के रूप ल देखके, राधा मोहागे हे। मया के जादू म, तोला खोजत आगे हे।। गोपी मन घलो रंग गेहें, पिरीत के रंग म। रासलीला के बेड़ा म, थिरकत हें संग म।। ब्रज म माखन अउ मिसरी के हवय भंडार। चोरी करे बर आवत हे, जग के पालनहार।। जमुना नदिया के तीर, खेलत हे मन-मगन। नाग नथैया के पाँव छुए, कालिया के फन।। बरसे जब करिया बादर, घपटे जब अंधियार। गोबरधन परबत उठाके, करे तँय ह उजियार।। कुरुक्षेत्र म गियान देके, देखाए रुप बिराट। विश्वगुरु तोला कहिथें, जय हो! दीनानाथ।। तँय तो अंतरयामी अस...
चारपाई की अदालत में
कविता

चारपाई की अदालत में

डॉ. अवधेश कुमार "अवध" भानगढ़, गुवाहाटी, (असम) ******************** सुना है कि कर्मों का हिसाब-किताब रखते हैं चित्रगुप्त ईश्वर परिणाम घोषित करते हैं और यमराज लागू न जाने ये कितना सच है, कितना झूठ! किंतु एक ठोस सच हम सब देखे हैं देख रहे हैं और आगे भी देखेंगे हमारी साढ़े तीन हाथ की देह घर के बाहरी कोने में पौने चार हाथ की चारपाई पर हो जाती है निढाल जब करवट बदलने में बेहाल जब लाचार असहाय और बदहाल जब तब...... तब उस देह के कर्मों का हिसाब चित्रगुप्त नहीं, ईश्वर नहीं यमराज भी नहीं संतानें लगाती हैं साथी सहमते हैं, भाई झल्लाते हैं मक्खियां भिनभिनाती हैं बिस्तर पर हुई लीपा पोती वारिस चींख चींखकर बताते हैं परिजन धड़ल्ले से परिणाम सुनाते हैं "बूढ़ा रात-दिन खांस खांसकर जीना मुश्किल कर दिया है न जाने कब जाएगा हम चैन से कब जी सकेंगे......" चारपाई पर ...
अंतिम मित्र
कविता

अंतिम मित्र

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** आखिरी दोस्त आखिरी उम्मीद हो तुम। जीवन के अंतिम अध्याय की अंतिम कड़ी हो तुम। मोह का पाश नहीं स्नेह का अंतिम चरण हो तुम। मेरे अंतिम जीवन की अंतिम स्पष्ट किरण हो तुम। मेरे अधूरे जीवन की अंतिम मुस्कुराहट हो तुम। सब कुछ खो जाने के बाद भी मेरे अंतिम जीवन का मधुर एहसास हो तुम। थक सा गया था मैं युगों के इंतजार के बाद मेरे अंतिम जीवन के अंतिम समय का मोक्ष का आधार हो तुम। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐...
अब और क्या चाहती है तू?
कविता

अब और क्या चाहती है तू?

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** अब बता भी दे जरा, और क्या चाहती है तू मुझसे, तंग आ चुका हूं तुझसे, विवाहोपरांत मेरी पत्नी, क्लोज नहीं हो पायी उतनी, उतना दखलंदाजी कर रही है मेरे मन मंदर में, किनारे पाने के लिए मार रहा हूं हाथ पांव डूबता जा रहा हूं तुझ जैसे समंदर में, क्या जादूगरनी है तू, क्या मेरे पल-पल की विवरणी है तू, रील्स की आभासी दुनिया में, कैसा यह जाल बिछाया है, बैठे हैं सब एक ही छत के नीचे, पर हर शख्स यहां पर पराया है, बच्चे की किलकारी छूटी, रिश्तों की वो गर्माहट टूटी, तेरी नीली रोशनी के चक्कर में, अपनों की हर शिकायत रूठी, तूने फुसफुसाकर कानों में, अपनों की आवाज को छीन लिया, नोटिफिकेशन के इस दलदल ने, मेरा चैन, मेरा हर दिन लिया, अब बस भी कर ऐ काली स्क्रीन, मुझे मेरी दुनिया वापस दे, जहाँ स्क्रीन नहीं, बस चेहरे ह...
ठहराव
कविता

ठहराव

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** एक पड़ाव सा आ गया एक ठहराव सा आगया। खोजती नजरों में भटकाव सा आ गया जिन्दगी की राह में बहाव सा आ गया। आ गया कोई मन द्वार के अन्दर दिल के कोने को कोई भा गया छू गया कोई चंचल मन को धानी आंचल जो लहराया। दृगों के दर्पण में मन प्राण को देखकर आ गया कोई, छा गया कोई अरे, वो तो नीर भरा बादल हैं जो मेरे आंगन में बरस गया। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्...
शिव बसे हैं मेरे दिल में
कविता

शिव बसे हैं मेरे दिल में

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** शिव बसे हैं मेरे दिल में किस्मत जगी। शिव करे हैं सुमंगल किस्मत जगी।। चेतना, कामना, भावना पल्लवित। जिन्दगी को नया मोड़ किस्मत जगी।। शिव की नगरी, बनी मेरी कुटिया अभी। बनके मंदिर सुसज्जित बहुत है सजी।। शिव बसे हैं मेरे दिल में किस्मत जगी। शिव बने हैं मेरे नाथ किस्मत जगी।। अब नहीं पीर, मातम, निराशा बची। जिन्दगी को नवल एक भाषा मिली।। माह सावन का है शिवजी करते दया। इक नये राग से अब तो सरगम सजी।। गीत, गजलों, भजन की हैं स्वरलहरियाँ। मांगलिक-शुभ की गुंजित सुखद ध्वनियाँ।। शिव बसे हैं मेरे दिल में किस्मत जगी। शिव बने हैं परमधाम, किस्मत जगी।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति ...
रक्षा बंधन
कविता

रक्षा बंधन

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** धागे का बंधन पक्का है, भाई उसमें बंध जाता है। जब बहना की साड़ी खिंचती, साड़ी में वो समा जाता है। धागे का ... बहने सावन भर भोले को, जल अर्पित कर शक्ति पाती। भाई कर पर बांध के राखी, बहने उसका भाग्य जगाती। भाई इस पवित्र बंधन पर, समय पड़े तो लुट जाता है। धागे का ... जो सक्षम हैं बहनों को वे, ये पुनीत अवसर देते हैं। मोदी, योगी इस पुनीत दिन, बहनों का आशीष लेते हैं। सैनिक भी राखी बंधवाकर, रक्षा हेतु खड़ा रहता है। धागे का ... इस पवित्र त्यौहार को हिंदू, पूरी निष्ठा से हैं मनाते। बनते हैं पकवान अनेकों, बहिन और भाई मिलकर खाते। बहन ने राखी बांधी जिसको, वो रक्षक बनकर रहता है। धागे का... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचि...
गोहरावत हे हसदेव
आंचलिक बोली, कविता

गोहरावत हे हसदेव

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) चिचियावत डोलत हांसत हे, मन ल देख वो थरथर कांपत हे, कइसे बचावंव तन, डारा अउ पाना ल, छिटका कुरिया म लावंव कइसे दाना ल, बता बघवा बेटा अब कइसे गुंर्राबे रे, हाथी बेटा कोन पत्ता ल तैं खाबे रे, हुंआ हुंआ कइसे अब कहिबे कोलिहा, झोल डारत हे मोला परदेशी झोलहा, मोर कोरा म आही कइसे मिट्ठा पानी, धन फेंका जाही मोर कर्मठ कहानी, कोन लकरी छवाही कुंदरा के छानी, का किस्सा सुनाही अब नाना अउ नानी, बुटूर-बुटूर घर के मुखिया देखत हे, खीसा भर डारे अउ आंखी सेंकत हे, सुध हवा पानी अब कहां ले लाबे, मोर हिरदे के पीरा कहां गोहराबे, इंखर आंखी के पीरा ल कइसे कसबे, अब तो पर गे तोला सूरी अउ फांसी, कहां जावय बता ए भई, गोहरावत हे हसदेव, हसदेव... कइसे बचाहीं अपन जंगल ल, कइसे बचाहीं अपन पानी, कइसे बचाहीं चिरई-चुरग...
पुष्प वाटिका
कविता

पुष्प वाटिका

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** अंखियों से अखियां जब है मिले फूलों की ओट में जानकी के। तिरछी नैनो से जब है मिले राम के नैना जानकी से। फूल बगिया में प्रकृति बिखर गई जब राम जानकी मिलन हुआ। देखते ही नैना चार हुए जब राम सिया का मिलन हुआ। मन ही मन पति रूप स्वीकार किया गौरा से पति वर मांग लिया। श्री राम प्रभु की सुंदर छवि को सीता ने मन में बसाय लिया। सीता ने जब वर मांग लीया, मूर्ति मुस्काई वर है दिया। सुंदर सुशील मनमोहक है, हे राम सिया की जोड़ी है, एक आदर्श दंपति का मिलन हुआ, सीता ने पाया राम को है किरण कर वंदन प्रभु चरणों में तुलसी के राम अमर है सदा। जय हो जय हो सीताराम के स्वर, जब गुंज उठा मिथिला मे है। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉ...
अभी बाकी है
कविता

अभी बाकी है

डॉ. राम रतन श्रीवास बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ******************** ┈┉═❀❀═┉┈ अभी आँखों में कुछ सपने, अभी अरमान बाकी है। अभी इस जिंदगी में कुछ, नया अभियान बाकी है।। अगर इंसान हैं हम तो, किसी के काम आ जाएँ.... अभी मंज़िल नहीं आई, अभी गगन के पार बाकी है।। अभी माँ की दुआओं में, वहीं दूध की शक्ति बाकी है। अभी पिता के आशीष में, वही वज्र सा बल बाकी है।। अभी बहन की हँसी और, बच्चों में खुशियां खिलानी है... अभी रिश्तों की साँसों में, बहुत-सा प्यार बाकी है।। अभी बच्चे किताबों में, नया संसार पढ़ते हैं। अभी सपनों के पंखों से, नई ऊँचाइयाँ चढ़ते हैं।। उन्हें कैसी धरा देंगे, यही प्रश्न आज अपना है?... अभी आने वाली पीढ़ी का, हम पर भार बाकी है।। अभी रूठे हुए अपनों को, हमें फिर पास लाना है। अभी टूटे हुए रिश्तों का, भरोसा फिर से जगाना है।। न दौलत साथ जाएगी, न ये ऊँची हव...
जड़ें
कविता

जड़ें

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ज़मींदोज जड़ों के जंजाल को जीवित रखने के लिए, वृक्षों की विभिन्न शाखाएं अवनि, अम्बर से समझोता करने को अडिग हैं। तुंग श्रृंग शिखर वृक्ष का सन्देश सुनाता अम्बर को कहता अवनि आश्वस्त हैं तप्त रवि जब किरणें फैलाता। पसरे वृक्ष छाया करतें अवनि पर गोलाई, चोडाई, चतुर्भुज, लंम्बाई गणित बैठाती है शाखाएं। झुमकर ठण्डी पवन तपती दुपहरी में पर्णो का स्वर संगीत सुनाती आडी, तिरछी शाखाएं वृक्षों की आलिंगन करती अवनि का। मानो वृक्ष शाखाएं कह रही हों हे अवनि हम तुझे सम्भाल लेंगी हां, क्योंकि नीचे की जड़ों का तुम ही आधार हो हैं वृक्षों के कई आकार छोटे, लम्बे, गोलाकार देते सदैव अम्बर को अवनि का अस्तित्वाकार। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी...
अनुभूतियां
कविता

अनुभूतियां

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** आज इंसान की अनुभूतियां विकृत हो रही हैं, स्मृतियाँ क्षत- विक्षत हो गई हैं ! धर्म-कर्म-कर्तव्य बिसर रहा है "थोड़ा ठीक हो जाय" ये प्रयास नहीं करते, क्योंकि हमारी कल्पनायें भी चोटिल हो चुकी हैं, "समय के साथ सब ठीक हो जाएगा," ये कहकर समय पर ही टाल देते हैं। वर्तमान- भविष्य के साथ बस आधा आधा जी रहे हैं ! इंसान मानव होने की पहचान खोने लगा है, निजी अभिज्ञान को सांचे में ढालकर, सामुदायिक पहचान का जामा पहना रहा है ! दिन-रात, रिक्तता और द्वंद्व के झूले में संतुलन बनाए रखने में बीत रहा है ! किसी दिन स्वयं का अतिक्रमण कर इंसान अस्तित्वहीन हो जाएगा, इस तिलस्मी दुनिया से कूच कर जाएगा , फिर भी कुछ आभास नहीं कर पायेगा!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश क...
नंगे को डर कैसा
कविता

नंगे को डर कैसा

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** प्रश्न उठा डर नहीं लगता उत्तर मिला कैसा डर... किससे डर... ये दुनिया है ही नंगों की नंगे को नंगे से डर कैसा..... ये तो हमाम है यहाँ सब नंगे हैं बस.. अंतर इतना सा कि कोई है छोटा नंगा तो कोई बड़ा नंगा कोई मात्र हेराफेरी से चलता है तो कोई सौदा कर लेता आत्मा का जैसा भी हो नंगा तो बस नंगा है नंगे को नंगे से डर कैसा..... क्यों सोचते हैं नंगे के पास आत्मा होगी जिसे अहसास हो जिसमें संवेदन हो... दर्द हो.. नंगा कब सचेत होता है कि जमीर जागता रहे नंगा कब अचेत होता है कि प्रतिहिंसा दफन हो कौन पड़े चेतन-अवचेतन के पंगे में नंगे तो सिर्फ नंगे होते हैं फिर नंगे को डर कैसा..... नंगे को तो मतलब है मात्र अपने मतलब से अपनी आकांक्षा से अपनी महत्वाकांक्षा से अगर कुछ होता और तो क्यों कहलाता नंगा...
अगर कभी हार मानने का मन करे
कविता

अगर कभी हार मानने का मन करे

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* एक बीज के बारे में सोचो जो धरती में बहुत गहरा दबा है अंधेरे से घिरा हुआ बिना जाने बस इंतज़ार कर रहा है। वो बढ़ने से पहले टूटता है देखने से पहले ऊपर की ओर बढ़ता है खालीपन को चीरते हुए आगे बढ़ता है उस पर भरोसा करके जिसे वो देख नहीं सकता। अंधेरा अंत नहीं है टूटना असफलता नहीं है इंतज़ार करना बेकार नहीं है कुछ नया आकार ले रहा है। अगर कभी हार मानने का मन करे तो अपने अंदर छिपे उस बीज के बारे में सोचो शायद अभी तुम्हें वो दिखाई न दे लेकिन हो सकता है तुम बनते जा रहे हो। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मान...
जंग जारी है
कविता

जंग जारी है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जंग जारी है... अंग्रेजों के चले जाने से ही खत्म नहीं हो जाती आजादी की लड़ाई, अभी भी भरे पड़े हैं इस देश के भीतर बहुत से अंग्रेज़परस्त लोग, व्यक्तिगत लालसा पाले लोग। लाखों हैं जिन्हें नहीं पता बमुश्किल मिली आजादी की कीमत, बुनियाद हिलाने बैठे हैं दीमक पर दीमक। हमें नहीं शिकायत वतन के शूरवीरों से, पर कैसे भूल जाएँ कि हो रहा है देश घायल भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, आतंकवाद और पाखंड जैसे तीरों से। शकुनि जैसे लोग चल रहे रह-रहकर चाल पर चाल, आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश हो रहा निढाल। बेरोजगारी बढ़ रही जैसे सुरसा का मुख, कौन सुने नौजवानों के दुख? स्वतंत्रता की जंग अभी भी जारी है, बाहर आ ही जाने है खबर किसकी देशद्रोहियों से गहरी यारी है। परिचय :-  र...
अधूरा सफर
कविता

अधूरा सफर

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** अधूरे सफर की अधूरी कहानी लिख रहा हूं मोहब्बत तो कभी मिली नहीं ग़म की दास्तान लिख रहा हूं। जीवन सफर में मिलते रहे जाने पहचाने चेहरे मगर हमराही कोई मिलकर भी मिला नहीं। सोचा था हमराही को हमसफर बनाकर सुनाऊंगा अपनी हर गम-ऐ-दास्तां सारी। मगर वक्त के तराजू पर हमराही हमसफर के मुकाम पर कभी पहुंचा ही नहीं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हे...
राखी और मायका
कविता

राखी और मायका

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** राखी आती है हर साल, पर हर साल मायके जाना कहाँ हो पाता है... कभी बच्चों की पढ़ाई, कभी घर की जिम्मेदारियाँ, कभी समय की कमी, तो कभी हालात रोक लेते हैं। भैया की कलाई तक राखी पहुँच जाती है, पर बेटी का मन आज भी मायके की देहरी पर बैठा रहता है। सब कहते हैं - "अब तो ससुराल ही तुम्हारा घर है" पर कोई ये नहीं समझता कि बेटियाँ मायका छोड़ती हैं, मायके से जुड़ी यादें नहीं... राखी के दिन सबसे ज़्यादा याद आता है वो आँगन, जहाँ भाई के साथ बचपन खेला था। परिचय :- इंदौर (मध्य प्रदेश) की निवासी अपने शब्दों की निर्झर बरखा करने वाली शशि चन्दन एक ग्रहणी का दायित्व निभाते हुए अपने अनछुए अनसुलझे एहसासों को अपनी लेखनी के माध्यम से स्याह रंग कोरे कागज़ पर उतारतीं हैं, जो उन्हें खुशियों के आसमानी रंग देते हैं। घोषणा पत्...
प्रकृति ईश्वर रुप
कविता

प्रकृति ईश्वर रुप

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** नीला अम्बर, सागर तल, मन करता है उड़ान। दिलों में ये ख़ुशियाँ लाये, ओठों पर मुस्कान । नीला अम्बर… प्रकृति का रुप अद्भुत, विविध इसकी पहचान। बिन मांगे करती है सबके जीवन का कल्याण। धरती उगले हीरे मोती ओर कई रत्नों की खान। भरणपोषण का भार उठा कर करती अन्न दान। नीला अम्बर… पेड़ पौधों देते हैं सब के जीवन को वायु प्राण। हरियाली में छुपा हुआ है औषधी का विज्ञान। छांव में बैठो वृक्षों के तो दूर हो जाती थकान। जल की वर्षा में भी सहायक इसका योगदान। नीला अम्बर… नदियाँ हमको सिखा रही है सदा रहे गतिमान। समाहित कर लेतीं सब कुछ सागर के समान। जल बिन जीवन होता न संभव जैसे रहे न मीन। जल जीवन के मूल तत्व में इसका प्रमुख स्थान। नीला अम्बर… सूरज करता सारे जन जीवन को उष्मा प्रदान। पकता अन्न न पाते भोजन रहता भूखा किस...
हम बागी बलिया वाले
कविता

हम बागी बलिया वाले

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** हम बागी बलिया वाले हम बागी बैरिया वाले हम गंगा के किनारे वाले हम घाघरा के किनारे वाले हम हिम्मत वाले हम कीमत वाले हमारे नस नस बहता स्वाभिमान है हम बागी बलिया वाले देते बलिदान हैं डर का कहीं नहीं नामोनिशान है स्वर्ग से ऊंचा हमारा स्वाभिमान है। परिचय :- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' निवासी : गुदरी सिंह के टोला, पांडे पुर, बैरिया, बलिया (उत्तरप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हम...
मृत्यु
कविता

मृत्यु

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** क्यों तुमसे सब डरते हैं क्यों रोते हैं तुम आने पर तुमसे हैं जो सुखद शान्ति देता नहीं कोई जीवन भर। तुम असीम शांति दात्री अवसादों से दो मुक्ति तुम सम्बल हो जीवन जीने का तुमसे सीख धैर्य की। तुम पावन शान्त स्थिर जल सी तुम अट्टहास जीवन का जीवन की ज्वलंत मुर्ति तुम निरंन्तर चलायमान न रुकने वाली न मुड़ने वाली पगडंडी। तुम क्या हो, कुछ तो कहो कही तो दिखो क्यों है, तुम्हारी अदृश्य अनुभुति भय विषाद के साथ होता है आगमन तुम्हारा कुछ क्षण, दहलीज़ पर रुकतीं कब कैसे पता नहीं। कहीं नदी, पहाड़, झरनें, पगडंडी पर पतंग सी फड़फड़ाती आती या कहुं गिद्ध सी घात लगाती और, क्षण में विभत्स दृष्य दिखा स्वयं चुपचाप निकल जाती। क्यों करता नहीं कोई तूम्हारी अगवानी क्यों नहीं बान्थता तुम्हारे नाम का सेहरा तुम्हे, हां तुम्हें बु...
तिरंगे की महिमा
कविता

तिरंगे की महिमा

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** भारत की पहचान तिरंगा, त्याग और बलिदान तिरंगा, समृद्धि और प्रकृति है तिरंगा, हिंदुस्तानियों का मान और सम्मान तिरंगा। इस तिरंगे के खातिर कितने युद्ध किये सैना ने गुलामी की जंजीरों से मुक्त तिरंगा, बलिदानियों का मान तिरंगा शहीदों का सम्मान तिरंगा आन बान और शान तिरंगा गर्व और स्वाभिमान तिरंगा जान और जहान तिरंगा शक्ति और साहस से तिरंगा, कुछ कर गुजरने की प्रेरणा है तिरंगा। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहि...
ओढ़ ली खामोशी मैंने
कविता

ओढ़ ली खामोशी मैंने

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** ओढ़ ली खामोशी मैंने, किसी हथियार के रूप में नहीं, बस अपने बचाव के लिए, महसूस हो रहे दुराव के लिए, करता रहा अब तक निर्देशित सबको, नास्तिक मन द्वारा मान चुके, अपने परिवार रूपी रब को, पर अब निर्देशन किसी को सुहाता नहीं है, मेरी मौजूदगी भी किसी को सुहाता नहीं है, चकित हूँ अचानक से आए मेहमान के लिए, जिसने एकांत का यह कमरा सजा दिया, और मेरी ही महफ़िल में मुझे पराया बना दिया, वक्त बदला तो रिश्तों के मायने बदल गए, जो कभी साए थे, वो धूप बनके ढल गए, मेरी हर सलाह अब इक दीवार सी लगती है, अपनों के बीच भी यह जिंदगी बीमार सी लगती है, शब्द थक चुके हैं अब मिन्नतें करते-करते, थक गया हूँ मैं भी अंदर ही अंदर मरते-मरते, इसलिए अब मैंने चुप रहने का हुनर सीख लिया, शिकायतों के पन्नों को भीतर ही भ...
सब्र
कविता

सब्र

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** निसंदेह सब्र के साथ सब कुछ सम्भल जाता है, किन्तु इस लंबे सफर में काफी कुछ छूट जाता है! मौन हो जाती हूँ निशब्द नहीं, आवाज भी आती है पर वाणी सुनाई नहीं देती भावनायें उबलती हैं किन्तु बहने नहीं देती शब्द भी आते हैं किन्तु लय नहीं। व्याख्या बन चुकी हूँ उस पुस्तक की जिसके पहले पन्ने पर प्रेम की परिभाषा लिखी है, अंतिम पन्ना आघात का, मध्यभाग में है जज़्बातों से खिलवाड़। भय नहीं की हार जाऊँगी, बस अब हार जीत की आस नहीं, आइना हूँ टूटती नहीं, सब्र से भरी हूँ टूट के बिखरने का डर है, किन्तु जीना छोड़ती नहीं, क्योंकि रचयिता ने रचा है जीवों का जीवन संवारने के लिए जीवन संग्राम में निमित्त बन इतिहास बनने के लिए!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी ...
मौसम की शरारत
कविता

मौसम की शरारत

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** मौसम ने की शरारत और बहारों ने पैगाम लिख दिया नभ से दूर चाँद आज देखो स्याह जुल्फों ने छिपा लिया पवन पालने झूले अरमान तारों को हँसना सिखा दिया बहना अल्हड़पन में झरनों को झरते नयनों ने सिखा दिया घंघरू खनक गजरे महक बहकना सुरों को सिखा दिया सतरंगी सपनों ने मन के हया में हिना का रंग मिला दिया खंजनी अखियों का जालिम वार हुश्न को कातिल बना दिया अधरों की छुअन से सरगम ने भँवरों को गाना सिखा दिया यौवन भार से झुकी देह ने शर्माना फूलों को सिखा दिया मिलना दिलों का चुपके-चुपके राज को राज रहना सिखा दिया पीहू पीहू करे प्रेम में मनवा प्रीत का उन्माद बढा दिया जमुना तट पर रास रचे फक्कड़ राधा माधव को मिला दिया दिन चढे चाहे रात ढले पल पल प्यार में बस गुजार दिया बिखरा रंग प्यार का ऐसा नफरत करना ...
पवित्र होती नदियां
कविता

पवित्र होती नदियां

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** नदियों में छोटी बड़ी नदियाँ पवित्र कहलाती ये नदियाँ आस्थाभक्ति की आत्मानदियाँ तृप्तकराती मानव को, नदियाँ।। नदियों में पवित्र, गंगा महानदी शिव की जटा से, बही गंगा नदी करते स्नान ध्यान, करते आचमन श्रद्धालु करते पूजा, मिलता शगुन।। मित्र श्रद्धालु भक्त बन्धु सह परिवार डुबकी लगाने को, सब रहते तैयार बहती गंगा की, जहाँ तेज जलधार आत्मसन्तुष्टि करातीगंगा, बून्द धार।। हर हर गंगे से गूँजता, गंगा का धाम गंगा नदी बही जहाँ, वही पुण्य धाम उमड़ता है बेसुमार, भक्तों का रैला भक्तिभावना में उमड़ता, गंगा मेला।। पिंडदान से,साही करते गंगा स्नान परम्परा में गंगा की पूजा होता ध्यान सगुन शान्ति में मिलती गंगा के धाम गंगा आरती गंगा स्तुति करते प्रणाम।। गंगा नदी बनी एक विकास का धाम गंगा एक पुण्य पवित्र मिलन स्थान भक्त पर्...