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हिरणी के इस चंचल मन को
गीत

हिरणी के इस चंचल मन को

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** हिरणी के इस चंचल मन को हवा वसंती महकाती। खिलता हरसिंगार चमन में, हम गाते गीत प्रभाती।। सौरभ सरिता उर में बहती, खिलती आशा की कलियाँ। पिया कहे सिंगार सलौना, चाहत में डूबी अँखियाँ।। यादें लेतीं हैं अँगड़ाईं, मुस्कानें सब मदमाती। प्रणय वल्लरी झूम रही है, अंग-अंग यौवन छाया। सजा कुंतलों पर गजरा है, देख मदन भी बौराया।। प्रेम तूलिका लिखती पाती, भेद खोलकर हर्षाती। प्रीति हमारी यह मधुमासी, प्रिय मधुर मुलाकातें हैं।। संबंधों के गठबंधन में, भ्रमरों की बारातें हैं।। मधुरस छलके तृषित अधर से, धड़कन -धड़कन इतराती। प्रियतम तेरी बनी मेनका, आशाएँ आलिंगन की। मन राधा बन बैठा व्याकुल, राह तके अनुमोदन की।। लगती आग मिलन की ऐसी, प्रेम क्षितिज में इठलाती। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवास...
लिख तो सकता हूं
कविता

लिख तो सकता हूं

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जानता हूँ तुम्हें गिला है कि मैं तुम्हारे बारे में क्यों नहीं लिखता, तुम्हारा चाहने वाला क्यों नहीं दिखता। हाँ, लिख तो सकता हूँ तुम्हारे रूप, श्रृंगार और सौंदर्य पर, भय, लोभ, लालच, मोह, दया और ऐश्वर्य पर, मगर अब थक चुका हूँ इन विषयों को दोहराने से। मोह अब भी पूरी तरह छूटा नहीं, पर कुछ नया सीखने की चाह जागी है। इन सबके अलावा भी लिखने को बहुत कुछ है। कब तक लिखता रहूँ वही चमत्कार, पाखंड और झूठ? अब दिखते हैं मुझे असली मुद्दे अशिक्षा, गरीबी, भूख और शोषण। लिखना है कौन कर रहा है इनका पोषण, क्यों अब भी जिंदा हैं हजारों साल पुराने, बेकार नियम, जिनके नीचे दबकर आज भी सिसक रहे हैं लाखों लोग। क्यों नहीं कर पा रहा आम नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग? हक़, अधिकार और कर्तव्...
जाति श्रम का विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है
आलेख

जाति श्रम का विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है

आरुषि कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** ऐसा कोई एक निश्चित वर्ष नहीं है जब जातिगत भेदभाव "शुरू" हुआ हो। यह बहुत लंबे समय के दौरान धीरे-धीरे विकसित हुआ। यह १५००–१००० ईसा पूर्व का समय था। इसकी जड़ें अक्सर ऋग्वेद के समय (लगभग १५००–१००० ईसा पूर्व) से जोड़ी जाती हैं। 'पुरुष सूक्त' नामक एक भजन में चार वर्णों (सामाजिक श्रेणियों) का वर्णन किया गया है। हालाँकि, इस चरण में, यह व्यवस्था उतनी कठोर या जन्म-आधारित नहीं थी, जैसी कि बाद के जातिगत भेदभाव में देखने को मिली। लेकिन धीरे-धीरे, ५०० ईसा पूर्व और ३०० ईसा पूर्व के बीच, 'मनुस्मृति' जैसे ग्रंथों ने सामाजिक पदानुक्रम को औपचारिक रूप देना शुरू कर दिया। इस दौरान, जाति व्यवस्था उत्तरोत्तर वंशानुगत और प्रतिबंधात्मक होती गई। शुद्धता, अपवित्रता और सामाजिक अलगाव की धारणाएँ और अधिक प्रबल हो गईं। यहाँ इसके कुछ सबसे क्रूर पहलू दिए गए ...
आशा भोंसले जी को विनम्र श्रद्धांजलि
दोहा

आशा भोंसले जी को विनम्र श्रद्धांजलि

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** प्रखर सुरमयी गायिका, सचमुच दिव्य महान। आशा ताई का करें, दिशा-दिशा गुणगान।। आशा जी के सुर सजें, तो गूँजे ब्रम्हांड। महिमा में लिखते चलो, चाहें जितने कांड।। आशा जी संगीत थीं, सरस्वती का रूप। आठ दशक देती रहीं, सुखद सुरों की धूप।। आशा जी का यह गमन, हम सब हुए उदास। साज़ सिसकते आज तो, टूट गई है आस।। आशा जी जीवित सदा, जब तक है संगीत। हर साधक की चेतना, बनी रहेंगी मीत।। धूमिल हो सकता नहीं, आशा जी का नाम। वे तो थीं संगीत की, सच में पावन धाम।। गाते-गाते ही गईं, लिया न कभी विराम। आशा जी की वंदना, होगी सुबहोशाम।। आशा जी आवेग थीं, लिए हुए उल्लास। अब होगा बैकुंठ में, उनका पावन वास।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), ए...
बिसुआ
चौपाई, छंद

बिसुआ

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** आज पर्व है सत्तूयानी। इसे पवित तिथि कहते ज्ञानी।। आज जगे जो रवि से आगे। किस्मत तुरंत उसकी जागे।। नमन करो पहले धरनी का। लेना असीस पितु-जननी का।। नित्य क्रिया से निवृत्त होकर। करो स्नान सारे तन धोकर।। तब जपना प्रभु को हे प्राणी। मंत्र पढ़ो निकले मृदु वाणी।। दान-पुण्य करना सब भाई। जीवन की ये असली कमाई।। फिर सत्तू का भोग लगाना। बिसुआ का ये पर्व मनाना।। घी-शक्कर संग दूध सानो। आम टिकोला को शुभ मानो।। बिसुआ जो भी लोग मनाता। पाप-पुंज जो हो कट जाता।। ग्रह गोचर उसके मिट जाते। आज मनुज जो सत्तू खाते।। लगन आज से उत्तम जानो। शादी का शुभ मुहूर्त मानो।। लगी गूँजने अब शहनाई। अशुभ मास की हुई विदाई।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिव...
अंतःकरण
कविता

अंतःकरण

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मनुष्य का संघर्ष बाहरी मुश्किलों से नहीं स्वयं से होता है, इंसान का मन कई परतो में विभाजित है, इनमे न्याय, स्वार्थ, अन्याय के विचारों में द्वंद सदैव चलता है। मान- सम्मान और पहचान की आकांक्षा मनुष्य को विचारों के जाल में उलझा देती है। मनुष्य की विशेष प्रवृत्ति, स्वयं को सही साबित करने हेतु तर्क-वितर्क करता है स्वयं को नैतिक समझता है! शक्ति और नियन्त्रण के प्रति आकर्षित हो अपने विचार मनवाना चाहता है! दूसरों को प्रभावित कर स्वयं की स्थित दृढ़ करना चाहता है! मनुष्य की यही मनोदशा संबंधो को कमजोर करती है, आपसी संवाद में दूरिया पैदा करती हैं, संवाद एवं सहयोग के स्थान पर प्रतिस्पर्धा जन्म लेती है !! शुद्ध परिवर्तन स्वयं के भीतर से ही जन्म लेता है मनुष्य जब अपनी कमजोरियों को ...
आधुनिकता
कविता

आधुनिकता

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** तन सजा है मन प्यासा है भूखी रही सदा आत्मा तन की लिप्सा पूरी हो अभिप्सा नारी की शोख अदा बिक रही आह बिक रही धड़कने बिकती हैं शैया सलवटें बिक रहे स्वप्न बिकने को आतुर अस्मिता बिक रही मन की चाहतें जिधर उठे नजरें बाजार सजा है बिकने को परोसी गई आह से वाह तलक बिक जाती हैं मानवता सुलग रही मंजिल की चाह भूल गये मन अपनी राह.... कैसे लगे मोल पसीने की बूँदों का कैसे हो पहचान इन्सानी रक्तबीजों का सड़ रहा जो नाली में कैसा है धर्म इसका भाषा रह गई तौल-मोल की पैसा स्थापित हुआ इन्सानी धर्म सपने कैद राजमहलों में हँस मजबूर गाना चुनने व्यवसायीकरण होरहा लिप्सा का कव्वे आरहे बिकने हँस के मोल.. इस खतरनाक परिवेश आश्चर्य कहाँ और किसे बाजार में उतरे नारी बिकने को उपभोक्ता बन पुरुष बने भोक्ता निष्ठुर...
पनघट
कविता

पनघट

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** गाँवों में नींद मीठी होती ये बात तो हवाएं भी कुछ कहती है बौराये आमों तले कोयल की कूक भी मीठी होती नयनों से कैसे कहे। पत्तों से झाँकती सूरज की किरणें तपीश को ठंडा कर देती खेत से पुकारती आवाजें सुबह की बयार को मीठा कर देती नयनों से कैसे कहे। गोरी के पनघट पे जाने से पायल कानों में मिठास घोल देती बैलो की घंटियाँ मीठी बातें कहती पनघट इन्ही मिठासो से इठलाता है ये बात नयनों से कैसे कहे। परिचय : संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता : श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि : २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा : आय टी आय निवासी : मनावर, धार (मध्य प्रदेश) व्यवसाय : ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन : देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार पत्रों में निरंतर पत्र और रचनाओं का प्रकाशन, प्रकाशित काव्य कृति "दरवाजे पर दस...
अंजनीसुत कुलदेव हमारे
भजन

अंजनीसुत कुलदेव हमारे

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** कुलदेव हमारे अंजनीसुत, संकट हरने वाले, भक्ति-दीप से सजे थाल में प्रेम-सुमन हम ढाले। घी-गुड़, चूरमा, लड्डू लेकर भावों का श्रृंगार, अर्पित करते चरणों में हम, मिटे सकल संताप अपार। भोग नहीं बस अन्न मात्र, यह श्रद्धा का उजियारा, हर कण में बसता विश्वास, हर कण में है सहारा। रुई-सी कोमल भावना से सजी हुई हर थाली, जैसे मन की सरल प्रार्थना पहुँचे उनकी ड्योढ़ी प्यारी। बजरंगबली के चरणों में जब अर्पित हो अन्न, तब मिट जाते दुःख सभी, हो जाता जीवन धन्य। सिंदूर सजा, चोला दमके, गूंजे जय-जयकार, भोग के संग झूम उठे मन, हो जाए मंगलाचार। कुलदेव की कृपा से ही तो घर में सुख का वास, उनकी छाया में कटता है जीवन का हर त्रास। एक लड्डू में छिपा हुआ आशीषों का सागर, जो ग्रहण करे श्रद्धा से, हो जाए भव से पार। हे पवनसुत, स्वीकार करो यह प्र...
पता बताना भूल गए
ग़ज़ल

पता बताना भूल गए

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** पता अपना बताना भूल गए। हमें रस्ता दिखाना भूल गए। किसी के साथ थोड़ी दूर जाकर, हमारे साथ आना भूल गए। हमारे सामने होकर गए पर, नज़र हमसे मिलाना भूल गए। जताए तो बहुत रिश्ते पुराने, मगर उनको निभाना भूल गए। कठिन हैं राह सारी इश्क़ वाली, कई इन पर ठिकाना भूल गए। भिगोया तन भरी बरसात लेकिन लगी दिल की बुझाना भूल गए। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास : अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति : शिक्षक प्रकाशन : देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान : साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय...
सड़कछाप सड़क का दर्शनशास्त्र
व्यंग्य

सड़कछाप सड़क का दर्शनशास्त्र

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सड़क का भी एक दर्शन होता है खासकर उस सड़क का, जो खुद सड़कछाप हो। वह सड़क जो कहीं टिककर नहीं रहती, हर मोहल्ले, हर मोड़, हर चुनावी वादे में आवारगी करती मिल जाती है। आजकल ऐसी सड़कें खूब चलन में हैं- चलन में इसलिए कि चलने लायक कम और दिखने लायक ज़्यादा होती हैं। सड़क साम्यवाद का जीवंत, धूल-धूसरित उदाहरण है। यहाँ गधे और घोड़े एक ही ताल में चलते हैं कभी-कभी तो पहचान ही गड़बड़ा जाती है कि कौन सा किस श्रेणी में है। पशु, पक्षी, मानव सबको सड़क समान भाव से अपनाती है। सड़क सबकी माँ है। अब अगर माँ की गोद में बैठकर कोई पूछे कि गधे-घोड़े का फर्क क्यों नहीं दिख रहा, तो इसमें माँ का क्या दोष! सड़क तो बस बनी है आओ, चलो, दौड़ो, गिरो, रौंदो जो लिखा लाए हो, वही होगा। आप सड़क पर हैं या सड़क पर लाए गए हैं यह नि...
विभीषिका युद्ध की
कविता

विभीषिका युद्ध की

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** युद्ध होते आयें हैं इतिहास गवाह है होते आयें हैं युगों-युगों से युद्ध इतिहास का प्रत्येक पन्ना भरा है रक्त रंजित करते धरा को युद्धों से विध्वंस का द्योतक है युद्ध माना... कि... विध्वंस स्वयं में सृजक होता है मगर....भंयकर पीड़ा अपने में समेटे होता है युद्ध.... लाशें बिखरती है चहुँ और धरा पर इन सामरिक युद्धों में न जाने उजड़ते हैं कितने घर-परिवार खंडित होते हैं अनगिन रिश्ते युद्धों में रामायण... महाभारत... और न जाने कितनी परिचायक घटनायें युद्धों की.... मगर एक युद्ध और होता है कहलाता है मानसिक युद्ध यहाँ शत्रु नहीं होते बाहरी पर दुश्मन इंसान के होते हैं भीतरी स्वयं के विकार झूझती है आत्मा स्व-निर्मित वैचारिक जाल में माध्यम बनते हैं काम, क्रोध, लिप्सा, अहम् न तलवार, न गोली प...
करुणामयी माँ
दोहा

करुणामयी माँ

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** वसुधा-सी करुणामयी, माँ दृढ़ ज्यों आकाश। माँ शुभ का करती सृजन, करे अमंगल नाश।। माँ में सारी सृष्टि है, माँ लगती ब्रम्हांड। माँ को पढ़ लो पूर्ण हों, रामायण के कांड।। माँ रोटी, माँ दूध है, माँ लोरी, माँ गोद। माँ सुख का आधार है, माँ से ही आमोद ।। माँ सुर, लय, आलाप है, अधरों पर मुस्कान। माँ सम्बल, उत्साह है, है हर शय की शान।। माँ सचमुच में देव है, लगती है वह ईश। माँ के चरणों में झुकें, भगवानों के शीश।। माँ अवतारों में प्रथम, करती है कल्याण। माँ से ही उत्थान है, बल पाते हैं प्राण।। माँ है तो उजियार है, माँ है तो है हर्ष। माँ है तो हर जीत है, नहीं कठिन संघर्ष।। माँ जीजा, पुतली वही, नाम यशोदा जान। कौशल्या बन राम से, जनती पुत्र महान।। माँ है तो संपन्नता, संतति नित धनवान। माँ से ही तो स्वर्ग है, मा...
रवायत
कविता

रवायत

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हमें यूं तुमको देखने की आदत है। न है मोहब्बत फिर भी बहुत कुछ कहने की आदत है। कभी सोचा ही नहीं तुमको पाने का बस यूं ही तुमसे दिल लगाने की आदत है। लोग सोचते हैं जिस्म को छूने की हमें यूं ही तुम्हारी रूह को गले लगाने की आदत है। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.co...
करूँ अनंत साधना
स्तुति

करूँ अनंत साधना

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** करूँ अनंत साधना, पवित्र संग भावना। करूँ सदैव प्रार्थना, बिना सहेज कामना। तुम्हीं धरा तुम्हीं हवा, विशाल आसमान हो। तुम्हीं यहाँ तुम्हीं वहाँ, समस्त तू जहान हो।। सदैव ग्रन्थ वाचते, सुवेद मंत्र धारते। सुशांत चित्त को रखूँ , सुधर्म को सकारते। सुकर्म नित्य ही करूँ, बचा रखा चरित्र है। न दानवी विचार है, हिया सदा पवित्र है।। कुपंथ छोड़ मैं चला, विशुद्ध ही सुकर्म है। विचार शुद्ध श्रेष्ठ है, असत्यता न धर्म है। करूँ सदा उपासना, करूँ असाध्य साधना। जपूँ दयालु राम को, पवित्र संग भावना।। प्रतीति ईश में रखूँ, प्रभुत्व स्वाभिमान में। भजूँ सदा अनंत को, रखूँ सदैव ध्यान में। अदृश्य शक्ति है यहाँ, रखे सदा प्रभाव को। करे कृपा कृपालु ही, हरे सभी अभाव को।। कृपा असीम ईश की, यदाकदा मुझे मिले। गरीब भाग्य जो...
जाल और सवाल
कविता

जाल और सवाल

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** उनकी एक चूक किसी के लिए पहाड़ बन जाती है, और निर्दोष भी अपना ही चेहरा छुपाता है। क्यों नहीं समझते कुछ लोग दूसरे की विवशता का भार, क्यों उसकी आवश्यकता को बना देते हैं दूरी की दीवार। वो तो विश्वास के धागों से आपके खेल में बंधा है, यह आप सबकी जिम्मेदारी है कि उसे न कहना पड़े- “मेरा प्रश्न अब तक अनसुलझा है।” यदि कोई आपके कारवां का सिपाही है, तो उसकी थकान भी आपकी गवाही है, आपकी दुनियादारी उसने भी निभाई है, फिर क्यों उसकी पीड़ा पर चुप्पी छाई है? अब तो सबकी कलम में एक ही स्याही बहती है, पर शब्दों के जाल में उलझी हुई सच्चाई ही सबसे कम कहती है। आपके दिखाए ख्वाबों के तंतु में वो स्वयं को लपेट चुका है, अपने ही हाथों से फंसने का जाल बिछा चुका है। तो बताओ जब अपनी ही बनाई इस दुखद दशा में ...
बस्ती का सच
कविता

बस्ती का सच

संगीता शुक्ला 'स्वरा' शहडोल (मध्यप्रदेश) ******************** यहाँ चेहरा नहीं, एक नकाब है, साज़िशों का ही अब हिसाब है। मुस्कुराना भी यहाँ एक आज़ाब है, नेक-दिली अब महज़ एक ख़्वाब है। पीठ का ज़ख़्म बहुत बेहिसाब है, दोस्त के हाथ में ही तेज़ाब है। हाथ मिलाना यहाँ अब खराब है, बगल में छिपा एक खंजर-ए-नायाब है। झूठी दुआओं का अपना शबाब है, हर शख़्स यहाँ बस एक सैलाब है। तू चुप रहकर देख 'स्वरा', यह जवाब है, दुनिया का सच अब खुली किताब है। परिचय :  संगीता शुक्ला 'स्वरा' निवास : शहडोल (मध्यप्रदेश) संप्रति : साहित्यकार, मंचीय कवयित्री पुस्तक एकल संग्रह : स्वरा प्रवाहिनी चयनीत साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश द्वारा, द्वितीय : मुक्तक संग्रह "स्वाति की बूंद", तृतीय संग्रह प्रकाशन पर- आचमन 'स्वरा' की, 23 सांझ संग्रह।। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिका...
किताबों के साथ
कविता

किताबों के साथ

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** क्या आप जानते है चिंता को, और पहचानते हो तनाव को। जीवन में अनुभव किये होंगे, पीड़ा, बेबसी और मजबूरी को। डर, घबराहट और परेशानियां, जगाये रखती होगी देर रात को। कल की चिंता, व्याकुलता, भय, आंखों से दूर रखती है निंद को। सफल नहीं हुआ तो क्या होगा, कब दूर करूंगा बेरोजगारी को। लाखों कठिनाइयां है रास्तें में कैसे संभाल पाऊंगा जिंदगी को। पुस्तकालय में दत्तचित्त होकर, हराते है कितने ही विचारों को। युवा किताबों के साथ पढ़ते है, घर के विखंडित हालातों को। उन्हें याद है पिता के सिर चढ़ा, कर्ज और साहूकार का तकाजा। ज्ञात है ब्याज की चक्रवृद्धि दर, क्योंकि दुनिया में दौलत से ही, परिभाषित है रंक और राजा। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में, हताशा से गहराई तक टूट जाते है। आखिरी सीढ़ी तक पहुंचकर, बिना मंजिल के फ...
हमारी संस्कृति
आलेख

हमारी संस्कृति

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** बचपन से अब तक यह हमारी संस्कृति है सुनता आ रहा हूँ किन्तु हमारी संस्कृति क्या है यह आज तक समझ नहीं पाया हूँ। हमारी संस्कृति कोई कला, विज्ञान, वस्तु अथवा क़ानून है जिसके अनुसार हमें चलना चाहिए। संस्कृति के विषय में कोई ग्रन्थ या नियमावली हो तो उसका मुझे ज्ञान नहीं। संस्कृति के विषय मे विभिन्न धर्मों के मठाधीश, स्वयंभू संस्कृति बचाओ रक्षक व हमारे देश के कर्णधार नेताओं के द्वारा समय समय पर चलाए गए आंदोलन और हमारे देश के शुभचिंतक समाचार माध्यमों से पक्ष विपक्ष में कराई जाने वाली बहस के माध्यम से ही संस्कृति बारे में जानकारी प्राप्त होती है ।मैने एक परिचित बुजुर्ग व्यक्ति जो आध्यात्मिक विषय में अधिक रूचि रखते हैं ,उनसे जिज्ञासा वश पूछा संस्कृति क्या है? यदि कोई जानकारी हो तो बताएँ। उनके मतानुसार जो हमारे ऋषि मुनियों व पूर्वजों ने अतीत ...
ईरान–इजराइल, अमेरिका युद्ध पर
कविता

ईरान–इजराइल, अमेरिका युद्ध पर

महेश बड़सरे राजपूत इंद्र इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** वो आवाजें! मलबे के नीचे, दबे हुए लोगों की, क्या नहीं पहुंच पाती हैं, ओ आकाओं तुम्हारे कानों तक? पर क्या? ये अहसास नहीं तुम्हें, कई माँ–बाप और विधवाऐं, भाई–बहनें और उनके टूटे सपने, टूटी इमारतें कोस रहे हैं आसमानों तक। सिसकियों से, चीखों–चीत्कारों से, लेना देना नहीं मासूम पुकारों से, शिकारियों की जिद ने ही पहुंचाया है हजारों जिंदगियों को कब्रस्तानों तक। तुम्हारा घमंड! छेड़ गया युद्ध प्रचंड, विश्वास हुआ खण्ड–खण्ड, प्रतिशोध की ज्वाला अखण्ड, पहुंची निर्दोषों के आशियानों तक। तुम्हारा लोभ! ले ही आया विक्षोभ, है चारों तरफ शोक ही शोक, सूना घर, सूनी गलियाँ, सूने रास्ते, सुने ताफ़िला घर और मस्जिदों तक। ओ! हुक्मरानों! दिल की आंखें खोलो, दिल की गहराइयों से शुभ शुभ बोलो, और जो तड़पते–...
डॉक्टर हड़ताल पर हैं
व्यंग्य

डॉक्टर हड़ताल पर हैं

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज का दिन मेरी ज़िंदगी के सबसे मनहूस दिनों में बाकायदा दर्ज किए जाने लायक है। अब आप व्यंग्यप्रिय पाठक यह मत पूछ बैठिए कि क्या आज शादी की सालगिरह है। जनाब, मनहूसियत के लोकतंत्र में और भी कई अवसर होते हैं। आज डॉक्टरों की हड़ताल है। जी हाँ, धरती के भगवानों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में सारे भगवान बाकायदा हड़ताल पर हैं। अब आप सोचेंगे, इसमें मनहूस होने जैसा क्या है? हड़ताल का मतलब न ओपीडी की खटर-पटर, न इमरजेंसी की धमा-चौकड़ी ना ह मरीज़ों के रिश्तेदारों की। यानी एक दिन की खुली साँस। पर भाई साहब, इस बार डॉक्टर यूनियन ने हड़ताल को हड़ताल नहीं, नजरबंदी बना दिया है। फरमान हुआ है कि कोई शहर नहीं छोड़ेगा, कोई आउटिंग पर नहीं जाएगा। बस घर में बंद रहो और सामूहिक रूप से एक बार कलेक्ट्रेट जाकर ज्ञा...
स्पर्श (घनाक्षरी)
कविता, धनाक्षरी

स्पर्श (घनाक्षरी)

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** नजर तो नजर है, खबर असर खूब, सोचिए तो फर्श भी, स्पर्श से विलय धरे। फेर होवे नजर का, तो नूर की नजर से, नजर दशा दर्श को, स्पर्श मन से करे। शब्द क्षुब्ध क्रुद्ध कभी, तो नेम धेम क्षेम के, सार क्षार निहार से, बुद्ध का स्पर्श करे। नाप का प्रताप भाव, माप दंड अति गूढ़, भाव मिले पुष्प खिले, भाव ही स्पर्श भरे। शब्द मर्म भाव धर्म, शब्द गुने बने लब्ध, कमजोर ज्ञान गर, स्पर्श बिन वो गिरे। निज मम्मा ममत्व में, पिता भाव घनत्व का, शब्द अर्थ स्पर्श सत्य, श्री राम कृष्ण हरे। शिव कृत्य नृत्य नाद, आदि ध्वनि डम डम, शब्द संसार गूंज से, ऊर्जा शांति छाई है। शब्द स्पर्श अर्थ व्यर्थ, खेल सदा डग मग, मेरी बात तेरी बात, स्पर्श मात खाई है। गाय निहित दक्षता, रख दूध में शुद्धता, नकली वस्तु त्याग से, गाय स्पर्श जान लो। धन कमाऊ स्पर्श तो,...
क्यों परेशान रहता है मन
कविता

क्यों परेशान रहता है मन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** अक्सर परेशान होता है मन जबकि, अपने दर्द को जुड़ाव में बदल सकता है पत्थर पर सहानुभूति को निखार सकता है फिर भी परेशान रहता है मन!! सब कहते हैं, अंधेरे दिनों में मोमबत्तियां जलाना सीखो, यादों की चिंगारी को रूह से हटाना सीखो, अवसाद में रहना जिंदगी के सही मायने नहीं होते . ये समझता है, फिर भी परेशान. रहता है मन!! अवसाद से भरा जीवन भीतर खालीपन भार देता है, हृदय का खोखलापन, धड़कनों की लय को धीमा कर देता है, आशा और निराशा जीवन के दो पहलू हैं, खुशी एक निर्णय है, जो स्वयं से हमे लेना होता है , सब कुछ जानता है, फिर भी क्यों परेशान होता है मन!! जिंदगी के तूफान आत्मा को तोड़ देते हैं, बदलते समय की बरसाती किसी चमत्कार से कम नहीं लगती, मन के उमड़ते ज्वालामुखी को शांत कर देती है, स्वयं...
खामोश यादें
कविता

खामोश यादें

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं गूंजता रहूंगा तेरे शहर में तेरी यादों के संग। मैं अकेला ही सही पर फ़िरता रहूंगा हर जगह तेरी खामोशी को ले अपने संग। लोग पूछेगे मुझें जब क्या दर्द है तुम्हें? मगर मैं फिर भी चुपचाप फिरता रहूंगा सीने में दफन की तेरी खामोश यादों को ले संग। मैं लिखता रहूंगा हर जगह इश्क़ लोग पूछेंगे मुझे कौन है हमराही तेरा? तो मैं चुपचाप हंसता रहूंगा, तेरी मुस्कुराहट को याद कर। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट...
भाग्यविधाता
कविता

भाग्यविधाता

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** पांच वर्ष में मतदान होता लोकतंत्र को मजबूत करता मजबूत करने का महापर्व मतदाता को इसपर खूब गर्व ।।१।। भारी उत्सकुता से आता मतदान की कतार लगाता मतदान केंद्र में मतदाता मतदान कर लौट जाता ।।२।। मतदान कर नहीं बताता निर्णय अकेले दे जाता मतदानकेंद्र में सीधे आता मत का अधिकार बताता ।।३।। मतदान केंन्द्र सज जाता चुनाव अधिकारी डटजाता मतदान की नींव बनाता बारी बारी से सबको बुलाता ।।४।। बारिकी में चुनावअधिकारी हिसाब में रखता होशियारी चुनाव परिणाम की करता कागज कलम से तैयारी ।।५।। एक एक मत का हिसाब देते अधिकारीबखूब जबाव निष्पक्षता बरतते लाजबाव मत हो न जाये खराब ।।६।। मतदाता का मतदान कितना होता कीमती असरदार बन जाता कितना होता महान मतदाता ही निर्णायक मुख्यभूमिका निभाता ।।७।। खुलता है जब मतपेटी भाग्...