हिरणी के इस चंचल मन को
मीना भट्ट "सिद्धार्थ"
जबलपुर (मध्य प्रदेश)
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हिरणी के इस चंचल मन को
हवा वसंती महकाती।
खिलता हरसिंगार चमन में,
हम गाते गीत प्रभाती।।
सौरभ सरिता उर में बहती,
खिलती आशा की कलियाँ।
पिया कहे सिंगार सलौना,
चाहत में डूबी अँखियाँ।।
यादें लेतीं हैं अँगड़ाईं,
मुस्कानें सब मदमाती।
प्रणय वल्लरी झूम रही है,
अंग-अंग यौवन छाया।
सजा कुंतलों पर गजरा है,
देख मदन भी बौराया।।
प्रेम तूलिका लिखती पाती,
भेद खोलकर हर्षाती।
प्रीति हमारी यह मधुमासी,
प्रिय मधुर मुलाकातें हैं।।
संबंधों के गठबंधन में,
भ्रमरों की बारातें हैं।।
मधुरस छलके तृषित अधर से,
धड़कन -धड़कन इतराती।
प्रियतम तेरी बनी मेनका,
आशाएँ आलिंगन की।
मन राधा बन बैठा व्याकुल,
राह तके अनुमोदन की।।
लगती आग मिलन की ऐसी,
प्रेम क्षितिज में इठलाती।
परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ"
निवास...


















