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यह जगत है स्वार्थ का

आशा शर्मा
धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश)
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यह जगत है स्वार्थ का,
बना बनाया खेल।
क्यों इसमें उलझा हुआ,
सरपट चल रही रेल।।

रिश्ते नाते अर्थ के,
धन बिन सब बेकार।
बेटा मांगे गाड़ी बंगला,
मांगे भाई अधिकार।।

पत्नी ने धीरे से कहा,
सुनो मेरे भरतार।
बेटे की भर दो तुम जेबें,
दे दो भाई को घर बार।।

चलो चलें हरि भजन को,
वही करेंगे भव से पार।
जो खेला हमने रचा,
वो है झूठा संसार।।

मिलता है, प्रभु शरण में,
निश्छल प्रेम अपार।
सत्य यही है कलियुग का,
यहां चल कपट, व्यापार।।

खेल रचाया था हमने,
अब टूट गया भ्रम जाल।
उलटे पैरों भाग लो,
यही समय की है मांग।।

प्रभु शरण हो जाओगे,
है निश्चित कल्याण।।

परिचय : आशा शर्मा
निवासी : धरमपुरी सांवेर रोड इंदौर (मध्य प्रदेश)
सम्प्रति : शिक्षिका हायर सैकैंडरी स्कूल
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।


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