करूँ अनंत साधना
नरेंद्र सिंह
मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार)
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करूँ अनंत साधना, पवित्र संग भावना।
करूँ सदैव प्रार्थना, बिना सहेज कामना।
तुम्हीं धरा तुम्हीं हवा, विशाल आसमान हो।
तुम्हीं यहाँ तुम्हीं वहाँ, समस्त तू जहान हो।।
सदैव ग्रन्थ वाचते, सुवेद मंत्र धारते।
सुशांत चित्त को रखूँ , सुधर्म को सकारते।
सुकर्म नित्य ही करूँ, बचा रखा चरित्र है।
न दानवी विचार है, हिया सदा पवित्र है।।
कुपंथ छोड़ मैं चला, विशुद्ध ही सुकर्म है।
विचार शुद्ध श्रेष्ठ है, असत्यता न धर्म है।
करूँ सदा उपासना, करूँ असाध्य साधना।
जपूँ दयालु राम को, पवित्र संग भावना।।
प्रतीति ईश में रखूँ, प्रभुत्व स्वाभिमान में।
भजूँ सदा अनंत को, रखूँ सदैव ध्यान में।
अदृश्य शक्ति है यहाँ, रखे सदा प्रभाव को।
करे कृपा कृपालु ही, हरे सभी अभाव को।।
कृपा असीम ईश की, यदाकदा मुझे मिले।
गरीब भाग्य जो...















