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लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन
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लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** सूचना के विस्फोट के इस दौर में पत्रकारिता पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। स्मार्टफोन की स्क्रीन पर उभरती एक खबर कुछ ही पलों में जनमत तैयार कर देती है, सरकारों पर दबाव बना देती है और समाज की दिशा तक तय कर देती है। लेकिन इस तेज़, तात्कालिक और प्रतिस्पर्धा पत्रकारिता के बीच एक मूल प्रश्न बार-बार उभरता है, क्या हम अपने मूल उद्देश्य से भटक रहे हैं? यदि भारतीय परंपरा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो संचार और संवाद की अवधारणा कोई नई नहीं है। हमारे पुराणों में देवऋषि नारद जी का चरित्र इस बात का प्रमाण है कि सूचना का आदान-प्रदान केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व था। नारदजी केवल संदेशवाहक नहीं थे, वे संवाद के वाहक थे। उनका हर हस्तक्षेप किसी न किसी रूप मेंलोककल्याण से जुड़ा होता ...
हिमाचल प्रदेश और केरल की संस्कृति, भूगोल और परंपराओं की तुलनात्मकता
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हिमाचल प्रदेश और केरल की संस्कृति, भूगोल और परंपराओं की तुलनात्मकता

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हिमाचल प्रदेश और केरल भारत के दो विविध राज्यों हैं, जहाँ पहाड़ी ठंडक और उष्णकटिबंधीय समुद्र तट अपनी-अपनी संस्कृति, भूगोल और परंपराओं को समृद्ध करते हैं। ये राज्य प्रकृति, त्योहारों और लोक जीवन से भरे हैं। हिमाचल प्रदेश (उत्तर भारत) और केरल (दक्षिण भारत) की संस्कृति और भूगोल एकदम भिन्न हैं। हिमाचल ठंडी घाटियों, ऊनी वस्त्रों, सेब के बागानों और लोक नृत्यों (नाटी) के लिए जाना जाता है, जबकि केरल गर्म तटीय जलवायु, सूती परिधानों, नारियल/मसालों और शास्त्रीय कलाओं (कथकली) का केंद्र है। दोनों राज्य उच्च साक्षरता और पर्यटन के लिए प्रसिद्ध हैं। हिमाचल प्रदेश और केरल की भौगोलिक स्थिति :- हिमाचल प्रदेश हिमालय की गोद में बसा पहाड़ी राज्य है, जिसका क्षेत्रफल लगभग ५५,६७३ वर्ग किलोमीटर है। यह उत्तर में जम्मू-कश्मीर, पूर्व में तिब्ब...
भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश
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भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत की सांस्कृतिक चेतना विविधताओं से परिपूर्ण है, जहाँ प्रत्येक क्षेत्र अपनी विशिष्ट पहचान और आध्यात्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र इसी परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है। यह भूमि केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध रही है। इसी क्षेत्र (जानापाव) से जुड़ी भगवान परशुराम की परंपरा इसे एक विशिष्ट गौरव प्रदान करती है। भगवान परशुराम का व्यक्तित्व भारतीय चिंतन में शक्ति, तप, ज्ञान और न्याय का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। उनका जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के यहाँ हुआ। वे भृगु वंश के थे और विशेष बात यह है कि वे एकमात्र ऐसे अवतार हैं, जिन्होंने ऋषि कुल में जन्म लेकर भी क्षत्रिय धर्...
जाति श्रम का विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है
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जाति श्रम का विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है

आरुषि कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** ऐसा कोई एक निश्चित वर्ष नहीं है जब जातिगत भेदभाव "शुरू" हुआ हो। यह बहुत लंबे समय के दौरान धीरे-धीरे विकसित हुआ। यह १५००–१००० ईसा पूर्व का समय था। इसकी जड़ें अक्सर ऋग्वेद के समय (लगभग १५००–१००० ईसा पूर्व) से जोड़ी जाती हैं। 'पुरुष सूक्त' नामक एक भजन में चार वर्णों (सामाजिक श्रेणियों) का वर्णन किया गया है। हालाँकि, इस चरण में, यह व्यवस्था उतनी कठोर या जन्म-आधारित नहीं थी, जैसी कि बाद के जातिगत भेदभाव में देखने को मिली। लेकिन धीरे-धीरे, ५०० ईसा पूर्व और ३०० ईसा पूर्व के बीच, 'मनुस्मृति' जैसे ग्रंथों ने सामाजिक पदानुक्रम को औपचारिक रूप देना शुरू कर दिया। इस दौरान, जाति व्यवस्था उत्तरोत्तर वंशानुगत और प्रतिबंधात्मक होती गई। शुद्धता, अपवित्रता और सामाजिक अलगाव की धारणाएँ और अधिक प्रबल हो गईं। यहाँ इसके कुछ सबसे क्रूर पहलू दिए गए ...
हमारी संस्कृति
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हमारी संस्कृति

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** बचपन से अब तक यह हमारी संस्कृति है सुनता आ रहा हूँ किन्तु हमारी संस्कृति क्या है यह आज तक समझ नहीं पाया हूँ। हमारी संस्कृति कोई कला, विज्ञान, वस्तु अथवा क़ानून है जिसके अनुसार हमें चलना चाहिए। संस्कृति के विषय में कोई ग्रन्थ या नियमावली हो तो उसका मुझे ज्ञान नहीं। संस्कृति के विषय मे विभिन्न धर्मों के मठाधीश, स्वयंभू संस्कृति बचाओ रक्षक व हमारे देश के कर्णधार नेताओं के द्वारा समय समय पर चलाए गए आंदोलन और हमारे देश के शुभचिंतक समाचार माध्यमों से पक्ष विपक्ष में कराई जाने वाली बहस के माध्यम से ही संस्कृति बारे में जानकारी प्राप्त होती है ।मैने एक परिचित बुजुर्ग व्यक्ति जो आध्यात्मिक विषय में अधिक रूचि रखते हैं ,उनसे जिज्ञासा वश पूछा संस्कृति क्या है? यदि कोई जानकारी हो तो बताएँ। उनके मतानुसार जो हमारे ऋषि मुनियों व पूर्वजों ने अतीत ...
जब-जब बिखरता समाज, तब-तब याद आते हैं श्रीराम
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जब-जब बिखरता समाज, तब-तब याद आते हैं श्रीराम

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** क्या आज का समाज उस आदर्श की ओर अग्रसर है, जिसे हम ‘रामराज्य’ के नाम से जानते हैं, या हम उससे लगातार दूर होते जा रहे हैं? यह प्रश्न केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती भी है। श्री राम नवमी का पावन पर्व हमें इसी आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है। त्रेतायुग में श्रीराम का अवतरण केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि मानवता को दिशा देने वाला एक युगांतरकारी क्षण था। आज, जब समाज अनेक प्रकार के नैतिक और सामाजिक संकटों से जूझ रहा है, तब श्रीराम के आदर्श पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में जन्मे श्रीराम ने अयोध्या में राजा दशरथ और माता कौशल्या के यहाँ जन्म लेकर यह सिद्ध किया कि महानता वंश या वैभव से नहीं, बल्कि चरित्र और आचरण से निर्धारित होती है। उनके ज...
नवरात्रि का संदेश: मातृशक्ति, राष्ट्रभाव और भारतीय संस्कृति की अमर चेतना
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नवरात्रि का संदेश: मातृशक्ति, राष्ट्रभाव और भारतीय संस्कृति की अमर चेतना

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** जब विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताएँ समय के प्रवाह में विलीन हो गईं, तब भी भारत की संस्कृति आज उतनी ही जीवंत, जाग्रत और प्रेरणादायी बनी हुई है। इसका कारण केवल इसका प्राचीन इतिहास या विशाल भूभाग नहीं, बल्कि वह गहरी सांस्कृतिक चेतना है, जिसकी जड़ें मातृत्व, शक्ति और आध्यात्मिक मूल्यों में निहित हैं। भारतीय जीवन-दृष्टि में शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं, बल्कि संरक्षण, करुणा, सृजन और संतुलन की वह शक्ति है जो समाज को दिशा देती है। यही कारण है कि भारत में शक्ति की उपासना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दर्शन है- और इसी दर्शन का विराट उत्सव है नवरात्रि। भारतीय संस्कृति का मूल स्वर यदि किसी एक भाव में व्यक्त किया जाए तो वह है- मातृत्व और शक्ति का सम्मान। यहाँ मातृभूमि को केवल भूमि नहीं माना गया,बल्कि ...
होली-परंपरा, प्रतीक और वर्तमान की वैचारिक चुनौती
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होली-परंपरा, प्रतीक और वर्तमान की वैचारिक चुनौती

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** होली भारतीय सांस्कृतिक जीवन का केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की परीक्षा भी है। रंगों की उन्मुक्तता, सामूहिक उल्लास और लोक परंपराओं की जीवंतता के बीच यह पर्व हर वर्ष हमें यह प्रश्न पूछने के लिए विवश करता है कि क्या हम अपने मूल मूल्यों के प्रति उतने ही प्रतिबद्ध हैं, जितने अपने उत्सवों के प्रति? बदलते सामाजिक परिदृश्य, तीव्र होती वैचारिक प्रतिस्पर्धा और डिजिटल माध्यमों की प्रभावशाली उपस्थिति के बीच होली का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है। पौराणिक कथा में हिरण्यकशिपु का अहंकार, प्रह्लाद की दृढ़ आस्था, होलिका का छल और अंततः भगवान नरसिंह का न्याय- ये घटनाएँ केवल धार्मिक आख्यान नहीं है, ये सत्ता और सत्य के शाश्वत संघर्ष का रूपक हैं। हिरण्यकशिपु उस मानसिकता का प्रतीक है, जो शक्ति के मद में असहमत...
सत्रहवां संस्कार
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सत्रहवां संस्कार

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  सोलह संस्कारों का वर्णन हमारे वेदों में वर्णित है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के जीवन में सोलह संस्कार किए जाते हैं। आप सोच रहे होंगे, ये सत्रहवां संस्कार कहाँ से आ गया, जिसको आज तक आपने सुना या देखा नहीं। "आवश्यकता अविष्कार की जननी है।" जो भी परम्पराएं समाज में स्थापित होती है, वो वक़्त और समाज की जरूरत के हिसाब से तय होती है। वर्तमान में छात्र डॉक्टरी की पढ़ाई करते हैं। उसके लिए उन्हें मनुष्य के मृत शरीर अर्थात देह की आवश्यकता होती है, जिसके बिना वे मानव शरीर की बारीकियों का अध्ययन नहीं कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त शोध यानी रिसर्च के लिए भी मानव देह की आवश्यकता पड़ती है। वर्तमान में देश के मेडिकल कालेजों में जितनी देहों की आवश्यकता है, उस अनु‌पात में मिल नहीं पा रही है। मृत्यु के बाद हम अपने धर्म के अनुसार देह को...
वाककला जीवन की प्रगति के मोड़ में भरती मुस्कान
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वाककला जीवन की प्रगति के मोड़ में भरती मुस्कान

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** इंसान कलाओं के भंडार में पारंगत है। वह उपयोग कहां कब किस तरीके से कला को दर्शाता है उसका निखार लाता है यह व्यक्ति का व्यक्तिगत विषय है। इसमें व्यक्ति का व्यक्तित्व साफ झलकता है । कला का रूप प्रत्यक्ष होता है। व्यक्ति अपनी प्रतिभा का परिचय देने में सक्षम संबल होता है। अपने अंदर छुपी कला कब कहां किस रूप में उभारता है यह अपनेआप में पेचीदा प्रश्न है। यह जरूर है कि अवसर सुअवसर में श्रोता ही कला का निर्णयकारी सहित मूल्यांकन करता है। यकीनन मानिए तालियां की गड़गड़ाहट में वाक कला प्रमाणित करती है कि वक्ता के भावनात्मक विचार श्रोताओं के ह्र्दयमन में स्पर्श कर गए है। व्यक्ति की प्रतिभा औऱ उसकी कला जब प्रकट होती है तो वह निश्चित चर्चित होती है। यह बयां करती है कि वाक कला में पारंगत है। इंसान वाक कला कौशलता में बोलकर खरा उतरता है। वाक कला ...
नई दृष्टि
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नई दृष्टि

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** जनरेशन जेड (जेन जी) वह पीढ़ी है जिसका जन्म लगभग १९९७ और २०१२ के बीच हुआ है। यह पीढ़ी डिजिटल नेटिव्स कहलाती है क्योंकि वे इंटरनेट और स्मार्टफोन के साथ बड़े हुए हैं और तकनीक के साथ सहज हैं। वे विविधता, सामाजिक न्याय और वर्क लाइफ बैलेंस को महत्व देते हैं। आज जेन जी शब्द हर चर्चा का केंद्र है - विज्ञापन से लेकर शिक्षा नीति तक, हर जगह इसका जिक्र होता है। प्रौद्योगिकी-प्रेमी: जेन ज़ेड के लोग स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन शॉपिंग जैसी तकनीक के साथ पूरी तरह से सहज हैं। हाल ही में यूट्यूब में एक नई रिपोर्ट पेश की है कि भारत में ६८ फ़ीसदी जेन जी वीडियो से सीखे हुए हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज का इस्तेमाल कर रहे हैं। यूट्यूब आप जेन जी के लिए सिर्फ वीडियो देखने का प्लेटफार्म नहीं बल्कि डिजिटल संस्कृति सीखने और सोशल कनेक्शन का केंद्र बन चुका है। ...
भारतीय सेना दिवस
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भारतीय सेना दिवस

प्रिया कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** भारतीय सेना के शौर्य, बलिदान और समर्पण को सम्मान देने के लिए हर साल १५ जनवरी को भारतीय सेना दिवस मनाया जाता है। १९४९ में इसी दिन, फील्ड मार्शल के. एम. करिअप्पा भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ बने, जो भारत के सैन्य इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण था। भारतीय सेना देश की सीमाओं की रक्षा करने और देश के अंदर शांति और सुरक्षा बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारतीय सेना के जवान अत्यधिक ठंड, गर्मी, रेगिस्तान, पहाड़ों और घने जंगलों जैसी कठिन परिस्थितियों में दिन-रात काम करते हैं। वे देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। भारतीय सेना दिवस पूरे भारत में बड़े गर्व और सम्मान के साथ मनाया जाता है। मुख्य परेड नई दिल्ली में होती है, जहाँ सैनिक अपना अनुशासन, शक्ति और आधुनिक सैन्य उपकरण द...
सतरंगी दुनिया – १५
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सतरंगी दुनिया – १५

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** जितना अगूंठा हमारा फोन पर चलता है, अगर उतना माला पर चले तो हमें भगवान अवश्य मिलेंगे। 'भला करने से भला होता है' इस कहावत से तो मेरा विश्वास ही उठ गया है, क्योंकि मैं अपनी प्रेमिका को डेयरी मिल्क, फाईव स्टार और फिर किट-कैट देता था। उसी प्रेमिका से मेरी शादी हो गयी। अब वो मुझे टिफिन में टिंडे, लौकी और करेले दे रही है। लोग अपने मोबाईल पर डी.पी. लगाते हैं। डी.पी.- मतलब दिखावटी फोटो। एक लड़की कह रही थी मैं बचपन में बहुत ताकतवर थी। मैंने पूछा- तुम्हें कैसे पता ? उसने कहा- मेरी मम्मी कहती है जब मैं रोती थी तो पूरा घर सिर पर उठा लेती थी। हमें भगवान और डॉक्टर को कभी नाराज नहीं करना चाहिए, क्योंकि जब भगवान नाराज होता है तो डॉक्टर के पास भेजता है और जब डॉक्टर नाराज होता है, तो वो भगवान के पास भेज देता है। जब कोई बटोरने की जगह ब...
गणतंत्र दिवस
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गणतंत्र दिवस

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** २६ जनवरी १९५० को हमारे देश को संविधान मिला, जिसने हर भारतीय को समान अधिकार, समान अवसर और समान सम्मान दिया। आजादी हमें १९४७ में मिली, लेकिन उसे सही दिशा देने का काम हमारे संविधान ने किया। डॉ. भीमराव आंबेडकर और उनके साथियों ने ऐसा संविधान बनाया, जो हमें सिर्फ अधिकार नहीं, कर्तव्य भी सिखाता है यह ऐतिहासिक क्षणों में गिना जाने वाला समय था। इसके बाद से हर वर्ष इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है तथा इस दिन देशभर में राष्ट्रीय अवकाश रहता है। भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है, जिसमें देश के हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का अधिकार दिया गया है। इस दिन १९५० में हमारा संविधान लागू हुआ था। तब से भारत एक गणतंत्र देश बन गया। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने कितने त्...
स्वतंत्रता
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स्वतंत्रता

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** ओशो कहते हैं- जीवन जीने के केवल दो ढंग हैं: एक मालिक बनकर और दूसरा गुलाम बनकर। गुलामी में जिया गया जीवन, जीवन नहीं- केवल समय काटना है। यदि जीना है, तो मालिक बनकर जियो, अन्यथा मर जाना ही बेहतर है। यह कथन कठोर अवश्य लगता है, पर इसमें जीवन का गहरा सत्य छिपा है। मालिक बनने का अर्थ किसी पर शासन करना नहीं है। यह बाहरी सत्ता की नहीं, भीतर की सत्ता की बात है। असली गुलामी बाहर नहीं, हमारे अपने मन में है- आदतों की गुलामी, भय की गुलामी, तुलना की गुलामी, अपेक्षाओं और समाज की राय की गुलामी। मालिक बनने की यात्रा भी मन से ही शुरू होती है। सवाल यह नहीं कि हमें कहाँ पहुँचना है; असली सवाल यह है कि हम कहाँ से शुरू कर रहे हैं- भय से या बोध से। मन के आनंद का स्वाद ही मंज़िल का पता देता है। जिस क्षण व्यक्ति किसी कार्य को करते हुए सहज आनंद अनुभव करता है, उस...
स्वामी विवेकानन्द की जयंती
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स्वामी विवेकानन्द की जयंती

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयंती, अर्थात १२ जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् १९८४ ई. को 'अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष' घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की कि सन १९८४ से १२ जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयंती (जयन्ती) का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए। राष्ट्रीय युवा दिवस का महत्व और उद्देश्य :- राष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का महत्व और उद्देश्य आज के युवाओं को भविष्य में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना और उन्हें अपने देश के प्रति कर्तव्यनिष्ठ और जागरूक बनाना है। राष्ट्रीय युवा दिवस युवाओं को समर्पित एक विशेष दिन है। इस दिन का उद्देश्य युवाओं में समझ, प्रशंसा और ज़िम्मेदारी को बढ़...
सेतु का काम करती हिन्दी
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सेतु का काम करती हिन्दी

डाॅ. कृष्णा जोशी इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** आज हम बड़े ही रोचक विषय पर बात करेंगे जी हाँ हिन्दी न केवल भाषा वरन भारतीय संस्कृति और एकता का प्रतीक हैं। हम सभी जानते है हिन्दी के जनक और जननी कौन है? जी भारतेन्दु हरिशचंद्र जी का नाम तो सुना ही होगा वो न केवल हिन्दी के जनक कहलाते बल्कि दुनिया में आधुनिक साहित्य के जनक कहलाते हैं। वहीं जननी संस्कृत जी पर हिन्दी आज भी सबसे सरल, प्रिय, विकसित भाषा है जिसे राज भाषा का दर्जा प्राप्त है, वैश्विक स्तर पर हिन्दी ने अपनी पहचान यूँ ही नहीं बनाई, आज ना केवल भारत में अन्य देश में भी हिन्दी भाषा प्रचलित है। यह तो हम हिन्दी के विकास और पहचान कैसे बनाई उसको जाने पर हिन्दी का योगदान देश के विकास में और देश को समृद्ध बनाने में अहम भूमिका निभाता रहा, हिन्दी संघ की भाषा है जो हमें जोड़े रखती हैं। यह वो मज़बूत कड़ी है जो हमें जड़ों से जोड...
विजय दिवस
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विजय दिवस

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हर साल १६ दिसंबर को मनाया जाने वाला विजय दिवस, भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन है। यह १९७१ के भारत-पाक युद्ध में भारतीय सशस्त्र बलों की पाकिस्तान पर विजय का प्रतीक है। यह एक ऐतिहासिक संघर्ष था जिसने न केवल भारत की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया, बल्कि मानवीय मूल्यों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता की भी पुष्टि की। यह दिन हमारे उन सैनिकों के बलिदान और वीरता का स्मरण करता है जिन्होंने आधुनिक इतिहास की सबसे निर्णायक विजयों में से एक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस युद्ध में ३० लाख से अधिक लोगों की जान गई और १०० लाख बांग्लादेशी निर्वासित हो गए।26 मार्च को बांग्लादेश अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है, और इसी दिन से इस युद्ध की भयावहता शुरू हुई थी। लगभग नौ महीने बाद, १६ दिसंबर को, अंततः सब कुछ समाप्त हो गया। पूर्वी और पश्चिमी पाकि...
मानवाधिकार दिवस: स्वतंत्रता समानता और न्याय का संदेश
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मानवाधिकार दिवस: स्वतंत्रता समानता और न्याय का संदेश

 दिव्याना कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ********************  मानवाधिकार दिवस प्रत्येक वर्ष १० दिसंबर को विश्व भर में मनाया जाता है यह दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा १९४८ में अपनाई गई सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा पत्र की याद दिलाता है, जो सभी मनुष्यों को जन्मजात अधिकार प्रदान करता है ,जिसमें ३० अनुच्छेदों के माध्यम से जीवन, गरिमा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित की गई है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद न्याय की शुरुआत: द्वितीय विश्व युद्ध की भयावहताओं, जैसे होलोकॉस्ट और नरसंहार, ने वैश्विक स्तर पर न्याय की नई व्यवस्था की मांग को जन्म दिया। मित्र राष्ट्रों-अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और सोवियत संघ ने १९४५ में नूर्नबर्ग में अंतरराष्ट्रीय सैन्य न्यायाधिकरण (IMT) की स्थापना की, जो युद्ध अपराधियों को व्यक्तिगत रूप से दंडित करने का पहला मॉडल बना। इन मुकदमों ने १९४८ में संयुक्त राष्ट्र...
छत्तीसगढ़ के पहिली बलिदानी : वीर नारायण सिंह बिंझवार
आंचलिक बोली, आलेख

छत्तीसगढ़ के पहिली बलिदानी : वीर नारायण सिंह बिंझवार

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** जब हम गरीब मनखे ला इंसाफ अउ अधिकार दिलाय के बात करथन त सबले पहिली हमर मन म एकेच नाव आथे। वो नाव हरे वीर नारायण सिंह बिंझवार के जेन हर गरीब मनखे के जान बचाय बर अपन जान के बलिदान कर दिस। जमीदार होय के बाद भी साहूकार मन ले गरीब मनखे के भूख मिटाय बर आंदोलन करिस। १८५७ के स्वतंत्रता समर म छत्तीसगढ़ के पहिली बलिदानी आय। वीर नारायण सिंह के जनम छत्तीसगढ के सोनखान गांव म बछर १७९५ म जमीदार परिवार म होइस। पिता के नाव रामसाय रिहिस। कहे जाथे कि पुरखा के सियान मन कर ३०० गांव के जमींदारी रिहिस। वीर नारायण सिंह बिंझवार जनजाति के रिहिस। पिता के परलोक सिधारे के बाद ३५ बछर म अपन पिता के जगह म बइठ के जमींदार बन गे। पर दुख ल अपन दुख जान के गांव के गरीब मनखे मन बर अब्बड़ दया धरम करय। बछर १८५६ म बिकट आकाल परिस। लोगन मन कर खाय प...
अखंड भारत के निर्माता : सरदार वल्लभभाई पटेल
आलेख

अखंड भारत के निर्माता : सरदार वल्लभभाई पटेल

रूपेश कुमार चैनपुर (बिहार) ******************** भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अनेक ऐसे वीर पुरुष हुए जिन्होंने अपने जीवन को राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित कर दिया। महात्मा गॉंधी ने जहाँ अहिंसा और सत्य का मार्ग दिखाया, वहीं पंडित नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण कि परिकल्पना की। परन्तु इन सबके बीच एक ऐसे पुरुष का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है जिसने भारतीय रियासतों को एक सूत्र में पिरोकर भारत की अखंडता को स्थायी रूप प्रदान किया। वे थे सरदार वल्लभभाई पटेल, जिन्हें ससम्मान “लौह पुरुष” और “अखंड भारत के निर्माता” कहा जाता है। सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म ३१ अक्टूबर १८७५ को गुजरात के नडियाद नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता झवेरभाई एक साधारण कृषक थे और माता लाडबाई धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी। बचपन से ही वल्लभभाई में आत्मसम्मान, परिश्रम और दृढ़ संकल्प की भावना थी। उन्होंने...
हिन्दी दिवस
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हिन्दी दिवस

मोहर सिंह मीना "सलावद" मोतीगढ़, बीकानेर (राजस्थान) ******************** हिन्दी दिवस प्रति वर्ष १४ सितम्बर को पूरे देश में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। १४ सितम्बर १९४९ को ही संविधान सभा ने निर्णय लिया था कि हिन्दी केन्द्र सरकार की आधिकारिक भाषा होगी क्योंकि भारत के अधिकतर क्षेत्रों में हिन्दी भाषा बोली जाती थी। इसलिए हिन्दी को राजभाषा बनाने का निर्णय लिया गया और इसी निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को प्रत्येक क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए वर्ष १९५३ से पूरे भारत देश में १४ सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित करवाने के लिए काका कालेलकर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्द दास आदि साहित्यकारों को साथ लेकर राजेन्द्र सिंह ने अथक प्रयास किए। हिन्दी भाषा और इसमें निहित भारत की सांस्कृत...
समाधान जरूरी है
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समाधान जरूरी है

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** आज सूर्योदय होने से पहले ही घर के आंगन में प्रातः काल की ताज़ा हवा का आनंद लेने के लिये मैं अपने दैनिक कार्य से एक दम फ्रि हो गया और जैसे ही घर से निकले के लिए कदम बढ़ाया तो आंगन मे देखा गमले में फूल खिल उठा था और उससे थोड़ी ही दूर में ऊपर से रस्सी से बंधा हुआ आज का अखबार दिखाई दिया मैं थोड़ा सा चिंता मे डुब गया। क्योंकि पेपर वाला रोज़ की तरह विलंब न करके समय से पहले ही अखबार पहुंचा दिया था। फिर क्या अखबार हाथ में आते ही मै खुद को पढ़ने से भला रोक पाता? तभी देखा कि गहरे काले काले मोटे अक्षरों से हेड लाइन को देख मैं तो शून्य सा हो गया लिखा यूं था कि- 'अविचारी वाहन चालक' हेड लाइन पढ़ते ही मैं आग बबूला हो गया। मन को थोड़ा शांत किया और मैंने सोचा कि आज सही समय आ गया है जवाब देने का, अक्सर सोसल मीडिया में चंद टी.आर.पी.पाने के चक...
स्वयं ही स्वयं को पहचानिये
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स्वयं ही स्वयं को पहचानिये

माधवी तारे लंदन ******************** बचपन से एक मराठी गीत रेडियो पर सुनना अच्छा लगता था। सुधीर फडके जी के स्वरों में वह गीत बहुत मधुर लगता। उसका अर्थ कुछ ऐसा था कि मानव जन्म में ही मनुष्य से देवत्व प्राप्त करने किया जा सकता है यही तुलसी रामायण का एक मुख्य तत्व है। यह लेख भी कुछ ऐसे ही विचारों से भरपूर है। हम अक्सर देखते हैं कि मनुष्य को स्वर्ण की बहुत चाह होती है। और इसी से आंका जाता है कि व्यक्ति कितना संपन्न है। इस शरीर के सौंदर्य में स्वर्ण और चांदी चार चांद लगाते हैं। लेकिन हम ये अक्सर भूल जाते हैं कि इस ईश्वर प्रदत्त शरीर की कीमत सोने चांदी से कहीं अधिक है और बहुत मूल्यवान है। लेकिन मनुष्य चौर्यमयी सोने का अधिक जतन करता है और शरीर रूपी सोने को बिलकुल भूल जाता है। हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि अनेक योनियों में भटकने के बाद हमें मनुष्य जन्म की प्राप्ति हुई है। सोने की लंका के गुणग...
सतरंगी दुनियां
आलेख

सतरंगी दुनियां

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** क्या कड़वे पौधे से मीठे फल आ सकता है? जी हां धैर्य एक कड़वा पौधा है पर फल हमेशा मीठे ही आते है। अपना बैंक बैलेंस देखकर खुश मत होइए जनाब, ऊपर वाला हिसाब तो आपके कर्मों का करेगा। चार लोग क्या कहेंगे? अक्सर कोई भी काम करने से पहिले हम सोचते है। चार लोग आपकी आपकी तेरहवीं पर कहेंगे "पूड़ी गरम लाना।" इसलिए उन चार लोगों में अपना अमूल्य समय बर्बाद न करें अपने कार्य में व्यस्त रहें। समय सबसे बलवान है। आप कुछ भी योजना बना ले पर होता वही है जो समय चाहता है। एक महिला सरकारी कार्यालय पहुंची और विधवा पेंशन का फार्म भरने लगी क्लर्क ने पूछा आपके पति को मरे कितना समय हुआ है? महिला ने बताया वो अभी बीमार है। फिर आप विधवा पेंशन का फार्म क्यों भर रही है? अरे भाई सरकारी काम में बहुत समय लगता है। जब तक मेरी पेंशन पास हो जायेगी तब तक शाय...