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भावनात्मक और आध्यात्मिक पवित्र माह- सावन
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भावनात्मक और आध्यात्मिक पवित्र माह- सावन

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** जब तपती धरती वर्षा की पहली बूंदों से शीतल होती है, जब सूखे वृक्षों पर फिर से हरियाली लौट आती है और जब वातावरण में मिट्टी की सोंधी सुगंध जीवन के पुनर्जन्म का एहसास कराती है, तभी भारतीय संस्कृति का सबसे भावनात्मक और आध्यात्मिक पवित्र माह-सावन आरंभ होता है। यह केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि मनुष्य, प्रकृति और परमात्मा के बीच संतुलन स्थापित करने का काल है। भारतीय परंपरा ने सावन को मात्र धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं माना, बल्कि आत्मशुद्धि, सामाजिक अनुशासन, स्वास्थ्य-संरक्षण और पर्यावरण चेतना का जीवंत पर्व बनाया है। यही कारण है कि सहस्राब्दियों बाद भी सावन की प्रासंगिकता अक्षुण्ण बनी हुई है। आज जब मनुष्य अभूतपूर्व भौतिक प्रगति के बावजूद मानसिक तनाव, सामाजिक विखंडन और पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है, तब सावन का ...
नारे नहीं, राष्ट्र चाहिए : नीट विवाद और व्यवस्था परिवर्तन का समय।
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नारे नहीं, राष्ट्र चाहिए : नीट विवाद और व्यवस्था परिवर्तन का समय।

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** किसी भी राष्ट्र का भविष्य संसदों में जितना तय होता है, उससे कहीं अधिक उन परीक्षा-कक्षों में निर्धारित होता है, जहाँ करोड़ों युवा अपने श्रम, संयम और स्वप्नों के साथ बैठते हैं। वहाँ केवल प्रश्नपत्र नहीं खुलते, वहाँ भविष्य के चिकित्सक, वैज्ञानिक, शिक्षक और राष्ट्रनिर्माता आकार लेते हैं। इसलिए जब किसी राष्ट्रीय परीक्षा की पवित्रता पर प्रश्न उठता है, तब आहत केवल एक परीक्षा नहीं होती, घायल राष्ट्र का विश्वास होता है। भारत की संस्कृति ने ज्ञान को कभी व्यापार नहीं माना। हमारे यहाँ विद्या को "सरस्वती" कहा गया, क्योंकि वह केवल जीविका का साधन नहीं, जीवन का संस्कार है। नालंदा और तक्षशिला की परंपरा से लेकर आधुनिक भारत की प्रतियोगी परीक्षाओं तक एक सूत्र निरंतर दिखाई देता है प्रतिभा का सम्मान। यदि यह सूत्र टूटता है, तो केवल व्य...
कठपुतली
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कठपुतली

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कठपुतली एक कला है। काठ का अर्थ है लकड़ी, और पुतली अर्थात गुड़िया। पहले मनोरंजन केलिए कलाकार काठ की गुड़िया ऐसी बनाते कि उनके हाथ पैर सब हिला सकते थे और उनमें डोरियां बांधकर तमाशा दिखाकर लोगों का मनोरंजन किया करते थे। कोई भी कहानी हो इन गुड़ियों के माध्यम से समझा दिया करते थे। जब सिनेमा का दौर आया तो यह कला छुप गयी। अब तो शोपीस की तरह घरों में इन्हें सजाया जाता है। बनाई तो आज भी जाती है, पर नचाई नहीं जाती है। कुछ निजी जीवन भी ऐसा ही है। पहले नारी शक्ति थी। मुगलों की संस्कृति का अनुसरण कर भारत में नारी को घर में बंद कर दिया गया। शिक्षा का अधिकार छीन लिया। पुरुष प्रधान समाज का निर्माण हुआ, नारी उसकी इच्छानुसार चलने वाली कठपुतली बन कर रह गई। आज जब उसे शिक्षा और सुरक्षा के मायने समझने लगे तो वह सारे बंधन तोड़ निरंकुश हो...
एक ज्योति जो आज भी भारत का पथ आलोकित कर रही है।
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एक ज्योति जो आज भी भारत का पथ आलोकित कर रही है।

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** कुछ तिथियाँ केवल इतिहास का हिस्सा नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना को झकझोरने वाली स्मृतियाँ बन जाती हैं। ४ जुलाई ऐसी ही एक तिथि है। वर्ष १९०२ के इसी दिन बेलूर मठ में एक युवा संन्यासी ने ध्यानावस्था में अपनी अंतिम सांस ली और महासमाधि को प्राप्त हुए। उनकी आयु मात्र उनतालीस वर्ष थी, किंतु उस अल्प जीवन में उन्होंने जो वैचारिक ज्योति प्रज्वलित की,वह आज भी भारत के पथ को आलोकित कर रही है। इसलिए स्वामी विवेकानंद जी की पुण्यतिथि केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिवस है। यह स्वयं से पूछने का दिन है कि क्या हम उस भारत के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं,जिसका स्वप्न स्वामी जी ने देखा था। महापुरुषों का जाना शून्य अवश्य छोड़ता है, किंतु यदि उनके विचार जीवित रहें तो वह शून्य निराशा नहीं बनता, प्रेरणा बन जाता...
हमारे त्योहारों का वैज्ञानिक महत्व
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हमारे त्योहारों का वैज्ञानिक महत्व

अनिता राजेश गुप्ता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** भारत विविधताओं का देश है, जहां हर क्षेत्र, हर समुदाय और हर ऋतु के साथ अलग-अलग त्यौहार जुड़े हुए हैं। ये त्यौहार केवल आनंद और उत्सव का माध्यम ही नहीं है बल्कि उनके पीछे गहरे वैज्ञानिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण भी जुड़े हुए हैं। प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनियों ने अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर ऐसे नियम और परंपराएं बनाई जो मानव जीवन को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक थी। त्यौहार उसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सबसे पहले अगर हम त्यौहारों के समय पर ध्यान दें तो पाएंगे कि अधिकांश महत्वपूर्ण त्यौहार ऋतु परिवर्तन के समय मनाये जाते हैं; जैसे मकर संक्रांति सर्दियों के अंत और बसंत के आगमन का संकेत देती है। इसी दिन से सूर्य भगवान उत्तरायण होते हैं। इस त्यौहार में तिल-गुड़ खाने की परंपरा है जो कि शरीर को गर्म रखते हैं और ऊर्जा ...
छाया वृक्ष की जड़ों से बंधी होती है
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छाया वृक्ष की जड़ों से बंधी होती है

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हमारी परंपराएं हमारी जड़ हैं, और हमारे बुजुर्ग वो पेड़ हैं, जिनकी छत्रछाया में हमारे घर परिवार का सम्मान सुरक्षित है। आज इतनी उच्छृंखलता श्री पीढ़ी में देखने को मिलती है, उसका मूल कारण है कि, आज बुजुर्गों को बेकार सामान समझकर रातों उन्हें वृद्ध आश्रम भेज दिया जाता है, अथवा घर में कोई भी उनकी सलाह लेना आवश्यक नहीं समझता है बस एक गैरजरूरी सामान समझकर उनका अपमान किया जाता है। वे दुखी होकर चुपचाप बैठे रहते हैं और समझौता कर लेते हैं। नतीजा हमारे सामने है। माता पिता आधुनिकता की दौड़ में बच्चों को मंहगी शिक्षा तो दिलवा रहे हैं, परंतु मर्यादित जीवन जीने की और संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा जो केवल जो जी चुके है, जीवन को उन्हें ही पता है। वह शिक्षा नहीं देता रहे हैं। बच्चे भटक रहे हैं। मनमानी न होने पर जीवन तक समाप्त करने को ...
स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक
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स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर के पन्नों पर अंकित दिन नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना में सदैव जीवित रहने वाली प्रेरणाएँ बन जाती हैं। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, ६ जून १६७४ का दिन भारतीय इतिहास की ऐसी ही एक अमर तिथि है, जब रायगढ़ की पवित्र धरती पर श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ। यह घटना किसी राजा के सिंहासनारोहण का मात्र राजकीय आयोजन नहीं थी, बल्कि भारतीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वाधीन शासन की उद्घोषणा थी। उस दिन एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक हुआ था। सत्रहवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक अस्थिरता, विदेशी प्रभुत्व और सामाजिक निराशा के दौर से गुजर रहा था। सत्ता का केंद्र जनता से दूर था और शासन का उद्देश्य लोककल्याण के बजाय साम्राज्य विस्तार बन चुका था। ऐसे सम...
माता कैकेई – चरित्र वर्णन
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माता कैकेई – चरित्र वर्णन

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** सूक्ष्म परिचय- माता कैकेई कैकय देश की राजकुमारी थी। वे शास्त्र और शस्त्र विद्या में निपुण थीं। उन्हें राजनीति का भी सम्यक ज्ञान था। इसीलिए वे देवासुर संग्राम में राजा दशरथ की सारथी बनकर उनके साथ रहीं। जब महाराज दशरथ घायल हो गए, तो कुशल राजनीतिज्ञ की भांति उन्हें सुरक्षित बचाकर ले आई थी। एक युद्ध में रावण ने जब उनके रुप और सौंदर्य पर कटाक्ष किया तो, उन्होंने कहा कि इक्ष्वाकु वंश में जन्मा बालक ही तुझे मृत्यु की गोद में सुलाएगा। मेरा यह वचन है। तेरे समूल वंश को मिटा देगा और इस अपमान का जवाब तुझे अवश्य देगा। समय बीतता गया जब भगवान राम का अवतार हुआ कैकयी की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। वे जानती थी कि यह नारायण हैं। माता कौशल्या से भी अधिक प्रेम वे राम से करती थी। जब रामजी के राज तिलक की घोषणा हुई तो वे माता कैकेई स...
भारत के आत्मगौरव और स्वामी विवेकानंद की ऐतिहासिक यात्रा
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भारत के आत्मगौरव और स्वामी विवेकानंद की ऐतिहासिक यात्रा

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत के इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना में अमिट स्मृति बन जाती हैं। ३१ मई १८९३ ऐसी ही एक तिथि है। यह वह दिन था जब भारतभूमि का एक युवा संन्यासी, साधारण गेरुआ वेशभूषा में, सीमित संसाधनों के साथ, परंतु असीम आत्मविश्वास और अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति को अपने भीतर समेटे हुए, भारतभूमि से विश्व मंच की ओर प्रस्थान कर रहा था। वह कोई राजा नहीं था, न किसी साम्राज्य का दूत और न ही किसी राजनीतिक शक्ति का प्रतिनिधि। वह भारत की आत्मा का वाहक था। वह थे "स्वामी विवेकानंद।" उस समय भारत अंग्रेज़ी दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। चारों ओर निराशा, हीनभावना और सांस्कृतिक असुरक्षा का वातावरण था। पश्चिमी सभ्यता की चमक के सामने भारतीय समाज अपनी ही परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लगाने लगा था। भारत की...
अब्राहम अकॉर्ड्स: बदलती वैश्विक राजनीति का दर्पण
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अब्राहम अकॉर्ड्स: बदलती वैश्विक राजनीति का दर्पण

किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया (महाराष्ट्र) ******************** ट्रम्प बनाम मौजतबा खामनेई और बदलती मिडिल ईस्ट जियोपॉलिटिक्स -पश्चिम एशिया में नई ध्रुवीय राजनीति का उदय? अब्राहम अकॉर्ड्स केवल एक शांति समझौता नहीं, बल्कि २१वीं सदी की नई जियोपॉलिटिकल व्यवस्था का प्रतीक बन चुका है। अब्राहम अकॉर्ड्स में संभावतः तेल, व्यापार मार्ग, सैन्य प्रभाव हथियारों का बाजार, चीन-रूस की बढ़ती मौजूदगी और वैश्विक शक्ति संतुलन की लड़ाई भी छिपी हुई है- वैश्विक स्तरपर पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां कूटनीति, धर्म, सुरक्षा, ऊर्जा और वैश्विक शक्ति संतुलन एक-दूसरे से टकराते हुए नजर आ रहे हैं। इसी बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के केंद्र में है अब्राहम अकॉर्ड्स एक ऐसा समझौता जिसे अमेरिका ने इजरायल और अरब देशों के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी खत्म करने के लिए तैयार करा...
नमो भारत : भारत की आधुनिक और तेज़ रफ्तार परिवहन क्रांति
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नमो भारत : भारत की आधुनिक और तेज़ रफ्तार परिवहन क्रांति

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** भारत तेज़ी से आधुनिक परिवहन व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। इसी दिशा में दिल्ली-मेरठ रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) के अंतर्गत चल रही “नमो भारत” रैपिड रेल ने नया इतिहास रच दिया है। यह केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि भविष्य की स्मार्ट, सुरक्षित और तेज़ यातायात व्यवस्था का प्रतीक बन चुकी है। इसकी गति और आधुनिक सुविधाओं ने पारंपरिक मेट्रो प्रणालियों के कई रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिए हैं। “नमो भारत” भारत की पहली क्षेत्रीय त्वरित परिवहन प्रणाली (RRTS) है, जिसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम (NCRTC) द्वारा विकसित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य दिल्ली, गाज़ियाबाद और मेरठ जैसे शहरों के बीच तेज़, आरामदायक और समयबद्ध यात्रा उपलब्ध कराना है। मेरठ से दिल्ली की मेरी हाल की यात्रा इस बार कुछ अलग और यादगार रही। वर्षों से सड़क के लंबे जाम, धूल, धक्का-म...
हल्दीघाटी- अमर स्वाभिमान
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हल्दीघाटी- अमर स्वाभिमान

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** १८ जून भारतीय इतिहास की वह अमर तिथि है,जो केवल एक युद्ध का स्मरण नहीं कराती बल्कि त्याग, स्वाभिमान, साहस और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण की गाथा सुनाती है। यह वह दिन है जब मेवाड़ की धरती पर एक ऐसा संघर्ष हुआ, जिसने इतिहास के पन्नों में वीरता की अमिट छाप छोड़ दी। वर्ष १५७६ में "हल्दी घाटी" के रूप में लड़ा गया यह युद्ध केवल तलवारों की टकराहट नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता और अधीनता, स्वाभिमान और सत्ता के बीच का निर्णायक संघर्ष था। 'राजस्थान की अरावली पर्वतमालाओं के बीच स्थित हल्दीघाटी' आज भी उस ऐतिहासिक दिन की मौन साक्षी है। इसकी पीली मिट्टी मानो आज भी उन वीरों के रक्त से रंजित गौरवपूर्ण स्मृतियों को अपने भीतर संजोए हुए है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का मूल्य समझा...
तालमेल
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तालमेल

माधवी तारे लंदन ******************** सब देवी देवताओं के आग्रह और नम्र निवेदन पर ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण करने की जिम्मेदारी अपने पर ली। परंतु भागवत कह कर जैसे श्री व्यास मुनि को कार्य की सार्थकता नहीं लग रही थी। मन में लगता रहा कि इसमें कुछ कमी रह गई है। बाद में जब सुकदेव मुनि ने नैमिषारण्य में परीक्षित राजा जो भागवत कथा सुनाना शुरू किया तब उन्हें अपने कृतित्व की सार्थकता लगने लगी। ऐसी ही स्थिति ब्रह्मा की सृष्टि निर्माण करने के बाद हुई होगी, जब तक सरस्वती की वीणा की झंकार प्रकृति में नहीं गूंजी और पक्षियों का कलरव और नदी की कलकल उन्हें नहीं सुनाई दी, तब तक ब्रह्माजी को आनंद की प्राप्ति नहीं हुई। झरनों से बहते, कलकल करती नदियों के संगीत से पूरी प्रकृति रममाण हुई। मनुष्य और प्रकृति के तालमेल की शुरुआत हुई। अनेक वर्ष यह तालमेल बढ़िया चल रहा था लेकिन लालच ने जब मनुष्य की बुद्धि को छुआ तो ...
भोजशाला : केवल एक स्मारक नहीं, भारत की आत्मा का स्वर
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भोजशाला : केवल एक स्मारक नहीं, भारत की आत्मा का स्वर

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत केवल भूगोल का एक टुकड़ा नहीं है, यह हजारों वर्षों की संस्कृति, ज्ञान, साधना और अध्यात्म की जीवित चेतना है। इस चेतना को यदि कहीं मूर्त रूप में देखा जा सकता है, तो वह हमारी प्राचीन शिक्षण परंपराओं, मंदिरों और सांस्कृतिक धरोहरों में दिखाई देती है। मध्यप्रदेश की पावन धरती पर स्थित धार की भोजशाला भी ऐसी ही एक अमूल्य धरोहर है, जो केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, माँ सरस्वती की आराधना और राजा भोज के सांस्कृतिक वैभव की जीवंत गाथा है। मालवा की ऐतिहासिक नगरी धार सदियों से विद्या, कला और संस्कृति का केंद्र रही है। परमार वंश के महान प्रतापी राजा भोज ने इस भूमि को केवल शासन का केंद्र नहीं बनाया, बल्कि इसे ज्ञान की राजधानी के रूप में स्थापित किया। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि जिस प्रकार तक्षशिला औ...
श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज- वह ज्वाला जिसे यातनाएँ भी बुझा न सकीं
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श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज- वह ज्वाला जिसे यातनाएँ भी बुझा न सकीं

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारतीय इतिहास का गगन अनेक वीरों की गाथाओं से आलोकित है, किंतु कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि राष्ट्र की आत्मा में सदैव जीवित रहते हैं। श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज ऐसे ही एक अमर व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन साहस, स्वाभिमान, विद्वता और बलिदान का अद्वितीय संगम था। दुर्भाग्य से इतिहास के अनेक पन्नों में उनके व्यक्तित्व को उतनी व्यापकता नहीं मिली, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। उनके जीवन को केवल युद्धों और बलिदान तक सीमित कर दिया गया, जबकि सत्य यह है कि संभाजी महाराज केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना के प्रखर प्रहरी थे। आज जब समाज वैचारिक भ्रम, सांस्कृतिक विस्मृति और इतिहास की अधूरी व्याख्याओं से जूझ रहा है, तब संभाजी महाराज का जीवन हमें यह स्मरण कराता है कि राष्ट्र केवल तलवारों से नहीं...
लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन
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लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** सूचना के विस्फोट के इस दौर में पत्रकारिता पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। स्मार्टफोन की स्क्रीन पर उभरती एक खबर कुछ ही पलों में जनमत तैयार कर देती है, सरकारों पर दबाव बना देती है और समाज की दिशा तक तय कर देती है। लेकिन इस तेज़, तात्कालिक और प्रतिस्पर्धा पत्रकारिता के बीच एक मूल प्रश्न बार-बार उभरता है, क्या हम अपने मूल उद्देश्य से भटक रहे हैं? यदि भारतीय परंपरा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो संचार और संवाद की अवधारणा कोई नई नहीं है। हमारे पुराणों में देवऋषि नारद जी का चरित्र इस बात का प्रमाण है कि सूचना का आदान-प्रदान केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व था। नारदजी केवल संदेशवाहक नहीं थे, वे संवाद के वाहक थे। उनका हर हस्तक्षेप किसी न किसी रूप मेंलोककल्याण से जुड़ा होता ...
हिमाचल प्रदेश और केरल की संस्कृति, भूगोल और परंपराओं की तुलनात्मकता
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हिमाचल प्रदेश और केरल की संस्कृति, भूगोल और परंपराओं की तुलनात्मकता

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हिमाचल प्रदेश और केरल भारत के दो विविध राज्यों हैं, जहाँ पहाड़ी ठंडक और उष्णकटिबंधीय समुद्र तट अपनी-अपनी संस्कृति, भूगोल और परंपराओं को समृद्ध करते हैं। ये राज्य प्रकृति, त्योहारों और लोक जीवन से भरे हैं। हिमाचल प्रदेश (उत्तर भारत) और केरल (दक्षिण भारत) की संस्कृति और भूगोल एकदम भिन्न हैं। हिमाचल ठंडी घाटियों, ऊनी वस्त्रों, सेब के बागानों और लोक नृत्यों (नाटी) के लिए जाना जाता है, जबकि केरल गर्म तटीय जलवायु, सूती परिधानों, नारियल/मसालों और शास्त्रीय कलाओं (कथकली) का केंद्र है। दोनों राज्य उच्च साक्षरता और पर्यटन के लिए प्रसिद्ध हैं। हिमाचल प्रदेश और केरल की भौगोलिक स्थिति :- हिमाचल प्रदेश हिमालय की गोद में बसा पहाड़ी राज्य है, जिसका क्षेत्रफल लगभग ५५,६७३ वर्ग किलोमीटर है। यह उत्तर में जम्मू-कश्मीर, पूर्व में तिब्ब...
भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश
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भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत की सांस्कृतिक चेतना विविधताओं से परिपूर्ण है, जहाँ प्रत्येक क्षेत्र अपनी विशिष्ट पहचान और आध्यात्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र इसी परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है। यह भूमि केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध रही है। इसी क्षेत्र (जानापाव) से जुड़ी भगवान परशुराम की परंपरा इसे एक विशिष्ट गौरव प्रदान करती है। भगवान परशुराम का व्यक्तित्व भारतीय चिंतन में शक्ति, तप, ज्ञान और न्याय का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। उनका जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के यहाँ हुआ। वे भृगु वंश के थे और विशेष बात यह है कि वे एकमात्र ऐसे अवतार हैं, जिन्होंने ऋषि कुल में जन्म लेकर भी क्षत्रिय धर्...
जाति श्रम का विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है
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जाति श्रम का विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है

आरुषि कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** ऐसा कोई एक निश्चित वर्ष नहीं है जब जातिगत भेदभाव "शुरू" हुआ हो। यह बहुत लंबे समय के दौरान धीरे-धीरे विकसित हुआ। यह १५००–१००० ईसा पूर्व का समय था। इसकी जड़ें अक्सर ऋग्वेद के समय (लगभग १५००–१००० ईसा पूर्व) से जोड़ी जाती हैं। 'पुरुष सूक्त' नामक एक भजन में चार वर्णों (सामाजिक श्रेणियों) का वर्णन किया गया है। हालाँकि, इस चरण में, यह व्यवस्था उतनी कठोर या जन्म-आधारित नहीं थी, जैसी कि बाद के जातिगत भेदभाव में देखने को मिली। लेकिन धीरे-धीरे, ५०० ईसा पूर्व और ३०० ईसा पूर्व के बीच, 'मनुस्मृति' जैसे ग्रंथों ने सामाजिक पदानुक्रम को औपचारिक रूप देना शुरू कर दिया। इस दौरान, जाति व्यवस्था उत्तरोत्तर वंशानुगत और प्रतिबंधात्मक होती गई। शुद्धता, अपवित्रता और सामाजिक अलगाव की धारणाएँ और अधिक प्रबल हो गईं। यहाँ इसके कुछ सबसे क्रूर पहलू दिए गए ...
हमारी संस्कृति
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हमारी संस्कृति

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** बचपन से अब तक यह हमारी संस्कृति है सुनता आ रहा हूँ किन्तु हमारी संस्कृति क्या है यह आज तक समझ नहीं पाया हूँ। हमारी संस्कृति कोई कला, विज्ञान, वस्तु अथवा क़ानून है जिसके अनुसार हमें चलना चाहिए। संस्कृति के विषय में कोई ग्रन्थ या नियमावली हो तो उसका मुझे ज्ञान नहीं। संस्कृति के विषय मे विभिन्न धर्मों के मठाधीश, स्वयंभू संस्कृति बचाओ रक्षक व हमारे देश के कर्णधार नेताओं के द्वारा समय समय पर चलाए गए आंदोलन और हमारे देश के शुभचिंतक समाचार माध्यमों से पक्ष विपक्ष में कराई जाने वाली बहस के माध्यम से ही संस्कृति बारे में जानकारी प्राप्त होती है ।मैने एक परिचित बुजुर्ग व्यक्ति जो आध्यात्मिक विषय में अधिक रूचि रखते हैं ,उनसे जिज्ञासा वश पूछा संस्कृति क्या है? यदि कोई जानकारी हो तो बताएँ। उनके मतानुसार जो हमारे ऋषि मुनियों व पूर्वजों ने अतीत ...
जब-जब बिखरता समाज, तब-तब याद आते हैं श्रीराम
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जब-जब बिखरता समाज, तब-तब याद आते हैं श्रीराम

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** क्या आज का समाज उस आदर्श की ओर अग्रसर है, जिसे हम ‘रामराज्य’ के नाम से जानते हैं, या हम उससे लगातार दूर होते जा रहे हैं? यह प्रश्न केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती भी है। श्री राम नवमी का पावन पर्व हमें इसी आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है। त्रेतायुग में श्रीराम का अवतरण केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि मानवता को दिशा देने वाला एक युगांतरकारी क्षण था। आज, जब समाज अनेक प्रकार के नैतिक और सामाजिक संकटों से जूझ रहा है, तब श्रीराम के आदर्श पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में जन्मे श्रीराम ने अयोध्या में राजा दशरथ और माता कौशल्या के यहाँ जन्म लेकर यह सिद्ध किया कि महानता वंश या वैभव से नहीं, बल्कि चरित्र और आचरण से निर्धारित होती है। उनके ज...
नवरात्रि का संदेश: मातृशक्ति, राष्ट्रभाव और भारतीय संस्कृति की अमर चेतना
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नवरात्रि का संदेश: मातृशक्ति, राष्ट्रभाव और भारतीय संस्कृति की अमर चेतना

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** जब विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताएँ समय के प्रवाह में विलीन हो गईं, तब भी भारत की संस्कृति आज उतनी ही जीवंत, जाग्रत और प्रेरणादायी बनी हुई है। इसका कारण केवल इसका प्राचीन इतिहास या विशाल भूभाग नहीं, बल्कि वह गहरी सांस्कृतिक चेतना है, जिसकी जड़ें मातृत्व, शक्ति और आध्यात्मिक मूल्यों में निहित हैं। भारतीय जीवन-दृष्टि में शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं, बल्कि संरक्षण, करुणा, सृजन और संतुलन की वह शक्ति है जो समाज को दिशा देती है। यही कारण है कि भारत में शक्ति की उपासना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दर्शन है- और इसी दर्शन का विराट उत्सव है नवरात्रि। भारतीय संस्कृति का मूल स्वर यदि किसी एक भाव में व्यक्त किया जाए तो वह है- मातृत्व और शक्ति का सम्मान। यहाँ मातृभूमि को केवल भूमि नहीं माना गया,बल्कि ...
होली-परंपरा, प्रतीक और वर्तमान की वैचारिक चुनौती
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होली-परंपरा, प्रतीक और वर्तमान की वैचारिक चुनौती

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** होली भारतीय सांस्कृतिक जीवन का केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की परीक्षा भी है। रंगों की उन्मुक्तता, सामूहिक उल्लास और लोक परंपराओं की जीवंतता के बीच यह पर्व हर वर्ष हमें यह प्रश्न पूछने के लिए विवश करता है कि क्या हम अपने मूल मूल्यों के प्रति उतने ही प्रतिबद्ध हैं, जितने अपने उत्सवों के प्रति? बदलते सामाजिक परिदृश्य, तीव्र होती वैचारिक प्रतिस्पर्धा और डिजिटल माध्यमों की प्रभावशाली उपस्थिति के बीच होली का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है। पौराणिक कथा में हिरण्यकशिपु का अहंकार, प्रह्लाद की दृढ़ आस्था, होलिका का छल और अंततः भगवान नरसिंह का न्याय- ये घटनाएँ केवल धार्मिक आख्यान नहीं है, ये सत्ता और सत्य के शाश्वत संघर्ष का रूपक हैं। हिरण्यकशिपु उस मानसिकता का प्रतीक है, जो शक्ति के मद में असहमत...
सत्रहवां संस्कार
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सत्रहवां संस्कार

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  सोलह संस्कारों का वर्णन हमारे वेदों में वर्णित है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के जीवन में सोलह संस्कार किए जाते हैं। आप सोच रहे होंगे, ये सत्रहवां संस्कार कहाँ से आ गया, जिसको आज तक आपने सुना या देखा नहीं। "आवश्यकता अविष्कार की जननी है।" जो भी परम्पराएं समाज में स्थापित होती है, वो वक़्त और समाज की जरूरत के हिसाब से तय होती है। वर्तमान में छात्र डॉक्टरी की पढ़ाई करते हैं। उसके लिए उन्हें मनुष्य के मृत शरीर अर्थात देह की आवश्यकता होती है, जिसके बिना वे मानव शरीर की बारीकियों का अध्ययन नहीं कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त शोध यानी रिसर्च के लिए भी मानव देह की आवश्यकता पड़ती है। वर्तमान में देश के मेडिकल कालेजों में जितनी देहों की आवश्यकता है, उस अनु‌पात में मिल नहीं पा रही है। मृत्यु के बाद हम अपने धर्म के अनुसार देह को...
वाककला जीवन की प्रगति के मोड़ में भरती मुस्कान
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वाककला जीवन की प्रगति के मोड़ में भरती मुस्कान

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** इंसान कलाओं के भंडार में पारंगत है। वह उपयोग कहां कब किस तरीके से कला को दर्शाता है उसका निखार लाता है यह व्यक्ति का व्यक्तिगत विषय है। इसमें व्यक्ति का व्यक्तित्व साफ झलकता है । कला का रूप प्रत्यक्ष होता है। व्यक्ति अपनी प्रतिभा का परिचय देने में सक्षम संबल होता है। अपने अंदर छुपी कला कब कहां किस रूप में उभारता है यह अपनेआप में पेचीदा प्रश्न है। यह जरूर है कि अवसर सुअवसर में श्रोता ही कला का निर्णयकारी सहित मूल्यांकन करता है। यकीनन मानिए तालियां की गड़गड़ाहट में वाक कला प्रमाणित करती है कि वक्ता के भावनात्मक विचार श्रोताओं के ह्र्दयमन में स्पर्श कर गए है। व्यक्ति की प्रतिभा औऱ उसकी कला जब प्रकट होती है तो वह निश्चित चर्चित होती है। यह बयां करती है कि वाक कला में पारंगत है। इंसान वाक कला कौशलता में बोलकर खरा उतरता है। वाक कला ...