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लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन

अमित राव पवार
देवास (मध्य प्रदेश)
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सूचना के विस्फोट के इस दौर में पत्रकारिता पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। स्मार्टफोन की स्क्रीन पर उभरती एक खबर कुछ ही पलों में जनमत तैयार कर देती है, सरकारों पर दबाव बना देती है और समाज की दिशा तक तय कर देती है। लेकिन इस तेज़, तात्कालिक और प्रतिस्पर्धा पत्रकारिता के बीच एक मूल प्रश्न बार-बार उभरता है, क्या हम अपने मूल उद्देश्य से भटक रहे हैं? यदि भारतीय परंपरा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो संचार और संवाद की अवधारणा कोई नई नहीं है। हमारे पुराणों में देवऋषि नारद जी का चरित्र इस बात का प्रमाण है कि सूचना का आदान-प्रदान केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व था। नारदजी केवल संदेशवाहक नहीं थे, वे संवाद के वाहक थे। उनका हर हस्तक्षेप किसी न किसी रूप मेंलोककल्याण से जुड़ा होता था। वे तीनों लोकों देव, दानव और मनुष्य के बीच संतुलन स्थापित करने वाले एक सजग संप्रेषक थे। पौराणिक मान्यताओं और भारतीय परंपरा के अनुसार, देवर्षि नारद को ब्रह्मांड का प्रथम पत्रकार (First Journalist) माना जाता है। आज की पत्रकारिता, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, उसी उत्तरदायित्व को आधुनिक संदर्भ में निभाने का दावा करती है। इसका मूल कार्य है जनता को सूचना देना, उसे जागरूक बनाना और सत्ताधारी तंत्र को जवाबदेह बनाए रखना। लेकिन जब हम वर्तमान परिदृश्य का विश्लेषण करते हैं, तो पाते हैं कि पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा अब सूचना से अधिक “प्रभाव” पर केंद्रित हो गया है।

टीआरपी की होड़, डिजिटल क्लिक्स की प्रतिस्पर्धा व राजनीतिक-आर्थिक दबावों ने पत्रकारिता के स्वरूप को बदल दिया है। “ब्रेकिंग न्यूज़” की जल्दबाजी में तथ्यों की पुष्टि पीछे छूट जाती है, और कई बार आधी-अधूरी या पक्षपाती सूचनाएँ समाज के सामने परोस दी जाती हैं। यह प्रवृत्ति न केवल पत्रकारिता की विश्वसनीयता को कमजोर करती है, बल्कि समाज में भ्रम और विभाजन भी पैदा करती है। ऐसे समय में देवऋषि नारदजी का आदर्श एक प्रासंगिक संदर्भ प्रस्तुत करता है। नारदजी संवाद करते थे, केवल सूचना नहीं देते थे। वे तथ्यों को समझते विश्लेषण करते और फिर उन्हें इस प्रकार प्रस्तुत करते कि उससे समाधान और संतुलन की दिशा बन सके। उनका उद्देश्य कभी सनसनी फैलाना नहीं था, बल्कि सत्य को सार्थक रूप में सामने लाना था। आधुनिक पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि गति और सत्य के बीच संतुलन बनाए रखना। तकनीक ने हमें तेजी दी है, लेकिन क्या हमने उस तेजी के साथ जिम्मेदारी को भी उतनी ही मजबूती से अपनाया है? सोशल मीडिया के दौर में हर व्यक्ति संभावित “सूत्र” बन चुका है,लेकिन हर सूचना विश्वसनीय नहीं होती। ऐसे में पत्रकार की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है वह केवल खबर देने वाला नही, बल्कि सत्य का संरक्षक है। पत्रकारिता के तीन पारंपरिक स्तंभ सूचना, शिक्षा और मनोरंजन आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। लेकिन इन तीनों के बीच संतुलन बिगड़ता दिखाई देता है। मनोरंजन के नाम पर सनसनीखेज प्रस्तुति और सूचना के नाम पर पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग, समाज के विवेक को प्रभावित कर रही है। इसके विपरीत, नारदजी का संवाद हमेशा उद्देश्यपूर्ण और संतुलित होता था, जिसमें लोकहित सर्वोपरि रहता था।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारत में पत्रकारिता की शुरुआत जनसेवा के उद्देश्य से हुई थी। “उदंत मार्तंड” जैसे प्रारंभिक समाचार पत्र सीमित संसाधनों के बावजूद सत्य और समाज के प्रति प्रतिबद्ध थे। आज संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद यदि पत्रकारिता अपने मूल्यों से समझौता करती है, तो यह चिंता का विषय है। हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि आज भी कई पत्रकार और मीडिया संस्थान निष्पक्षता और ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं। वे दबावों के बावजूद सच को सामने लाने का साहस रखते हैं और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है, और उनकी आवाज़ अक्सर शोर में दब जाती है। वर्तमान समय में “फेक न्यूज़”, “पेड न्यूज़”और “प्रोपेगेंडा जर्नलिज्म” जैसी चुनौतियाँ पत्रकारिता की साख को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में आवश्यकता केवल तकनीकी सुधार की नहीं, बल्कि नैतिक पुनर्जागरण की है।

पत्रकारिता को फिर से उस मूल भावना की ओर लौटना होगा, जहाँ सत्य,निष्पक्षता और जनहित सर्वोच्च हों। देवऋषि नारद जी का चरित्र हमें यही सिखाता है कि सूचना का अर्थ केवल खबर देना नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा देना है। पत्रकारिता तब ही सार्थक है जब वह सत्ता से सवाल पूछे, समाज की पीड़ा को स्वर दे और बिना किसी भय या पक्षपात के सत्य को सामने लाए। अंततः यह कहना उचित होगा कि आधुनिक पत्रकारिता एक चौराहे पर खड़ी है। एक रास्ता उसे अधिक प्रभावशाली, लेकिन कम विश्वसनीय बना सकता है, जबकि दूसरा रास्ता उसे कठिन, लेकिन सम्मानजनक और भरोसेमंद बनाए रखेगा। चुनाव पत्रकारिता को ही करना है। यदि वह देवऋषि नारद जी के आदर्शों निष्पक्षता, निर्भीकता और लोककल्याण को अपनाती है, तो वह न केवल अपनी साख बचा पाएगी, बल्कि समाज को भी एक सशक्त और सकारात्मक दिशा दे सकेगी।

परिचय :-  अमित राव पवार
निवासी : देवास (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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