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Tag: अमित राव पवार

भावनात्मक और आध्यात्मिक पवित्र माह- सावन
आलेख

भावनात्मक और आध्यात्मिक पवित्र माह- सावन

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** जब तपती धरती वर्षा की पहली बूंदों से शीतल होती है, जब सूखे वृक्षों पर फिर से हरियाली लौट आती है और जब वातावरण में मिट्टी की सोंधी सुगंध जीवन के पुनर्जन्म का एहसास कराती है, तभी भारतीय संस्कृति का सबसे भावनात्मक और आध्यात्मिक पवित्र माह-सावन आरंभ होता है। यह केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि मनुष्य, प्रकृति और परमात्मा के बीच संतुलन स्थापित करने का काल है। भारतीय परंपरा ने सावन को मात्र धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं माना, बल्कि आत्मशुद्धि, सामाजिक अनुशासन, स्वास्थ्य-संरक्षण और पर्यावरण चेतना का जीवंत पर्व बनाया है। यही कारण है कि सहस्राब्दियों बाद भी सावन की प्रासंगिकता अक्षुण्ण बनी हुई है। आज जब मनुष्य अभूतपूर्व भौतिक प्रगति के बावजूद मानसिक तनाव, सामाजिक विखंडन और पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है, तब सावन का ...
नारे नहीं, राष्ट्र चाहिए : नीट विवाद और व्यवस्था परिवर्तन का समय।
आलेख

नारे नहीं, राष्ट्र चाहिए : नीट विवाद और व्यवस्था परिवर्तन का समय।

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** किसी भी राष्ट्र का भविष्य संसदों में जितना तय होता है, उससे कहीं अधिक उन परीक्षा-कक्षों में निर्धारित होता है, जहाँ करोड़ों युवा अपने श्रम, संयम और स्वप्नों के साथ बैठते हैं। वहाँ केवल प्रश्नपत्र नहीं खुलते, वहाँ भविष्य के चिकित्सक, वैज्ञानिक, शिक्षक और राष्ट्रनिर्माता आकार लेते हैं। इसलिए जब किसी राष्ट्रीय परीक्षा की पवित्रता पर प्रश्न उठता है, तब आहत केवल एक परीक्षा नहीं होती, घायल राष्ट्र का विश्वास होता है। भारत की संस्कृति ने ज्ञान को कभी व्यापार नहीं माना। हमारे यहाँ विद्या को "सरस्वती" कहा गया, क्योंकि वह केवल जीविका का साधन नहीं, जीवन का संस्कार है। नालंदा और तक्षशिला की परंपरा से लेकर आधुनिक भारत की प्रतियोगी परीक्षाओं तक एक सूत्र निरंतर दिखाई देता है प्रतिभा का सम्मान। यदि यह सूत्र टूटता है, तो केवल व्य...
आस्था की विजय: जब पंढरपुर में एक बालक के रक्षक बने स्वयं विट्ठल
संस्मरण

आस्था की विजय: जब पंढरपुर में एक बालक के रक्षक बने स्वयं विट्ठल

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** एक सत्य घटना पर आधारित संस्मरण एक पारिवारिक संस्मरण, जो बताता है कि श्रद्धा का सबसे बड़ा प्रमाण अनुभव होता है, भारत की सांस्कृतिक परंपरा में कुछ पर्व केवल तिथियाँ नहीं होते, वे लोकजीवन की आत्मा बन जाते हैं। आषाढ़ी एकादशी ऐसा ही एक महापर्व है, जो महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। इस दिन "पंढरपुर" स्थित भगवान श्रीविट्ठल-रुक्मिणी मंदिर में दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं। चंद्रभागा नदी में स्नान, हरिनाम, संकीर्तन, वारकरी परंपरा की पदयात्राएँ और"जय जय राम कृष्ण हरी" का अखंड घोष इस तीर्थ को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है। सदियों से यह विश्वास जीवित है कि पांडुरंग विट्ठल अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनते हैं। ऐसी ही आस्था से जुड़ा एक सत्य संस्मरण मध्य प्रदेश के देवास स...
एक ज्योति जो आज भी भारत का पथ आलोकित कर रही है।
आलेख

एक ज्योति जो आज भी भारत का पथ आलोकित कर रही है।

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** कुछ तिथियाँ केवल इतिहास का हिस्सा नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना को झकझोरने वाली स्मृतियाँ बन जाती हैं। ४ जुलाई ऐसी ही एक तिथि है। वर्ष १९०२ के इसी दिन बेलूर मठ में एक युवा संन्यासी ने ध्यानावस्था में अपनी अंतिम सांस ली और महासमाधि को प्राप्त हुए। उनकी आयु मात्र उनतालीस वर्ष थी, किंतु उस अल्प जीवन में उन्होंने जो वैचारिक ज्योति प्रज्वलित की,वह आज भी भारत के पथ को आलोकित कर रही है। इसलिए स्वामी विवेकानंद जी की पुण्यतिथि केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिवस है। यह स्वयं से पूछने का दिन है कि क्या हम उस भारत के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं,जिसका स्वप्न स्वामी जी ने देखा था। महापुरुषों का जाना शून्य अवश्य छोड़ता है, किंतु यदि उनके विचार जीवित रहें तो वह शून्य निराशा नहीं बनता, प्रेरणा बन जाता...
स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक
आलेख

स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर के पन्नों पर अंकित दिन नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना में सदैव जीवित रहने वाली प्रेरणाएँ बन जाती हैं। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, ६ जून १६७४ का दिन भारतीय इतिहास की ऐसी ही एक अमर तिथि है, जब रायगढ़ की पवित्र धरती पर श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ। यह घटना किसी राजा के सिंहासनारोहण का मात्र राजकीय आयोजन नहीं थी, बल्कि भारतीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वाधीन शासन की उद्घोषणा थी। उस दिन एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक हुआ था। सत्रहवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक अस्थिरता, विदेशी प्रभुत्व और सामाजिक निराशा के दौर से गुजर रहा था। सत्ता का केंद्र जनता से दूर था और शासन का उद्देश्य लोककल्याण के बजाय साम्राज्य विस्तार बन चुका था। ऐसे सम...
भारत के आत्मगौरव और स्वामी विवेकानंद की ऐतिहासिक यात्रा
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भारत के आत्मगौरव और स्वामी विवेकानंद की ऐतिहासिक यात्रा

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत के इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना में अमिट स्मृति बन जाती हैं। ३१ मई १८९३ ऐसी ही एक तिथि है। यह वह दिन था जब भारतभूमि का एक युवा संन्यासी, साधारण गेरुआ वेशभूषा में, सीमित संसाधनों के साथ, परंतु असीम आत्मविश्वास और अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति को अपने भीतर समेटे हुए, भारतभूमि से विश्व मंच की ओर प्रस्थान कर रहा था। वह कोई राजा नहीं था, न किसी साम्राज्य का दूत और न ही किसी राजनीतिक शक्ति का प्रतिनिधि। वह भारत की आत्मा का वाहक था। वह थे "स्वामी विवेकानंद।" उस समय भारत अंग्रेज़ी दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। चारों ओर निराशा, हीनभावना और सांस्कृतिक असुरक्षा का वातावरण था। पश्चिमी सभ्यता की चमक के सामने भारतीय समाज अपनी ही परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लगाने लगा था। भारत की...
हल्दीघाटी- अमर स्वाभिमान
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हल्दीघाटी- अमर स्वाभिमान

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** १८ जून भारतीय इतिहास की वह अमर तिथि है,जो केवल एक युद्ध का स्मरण नहीं कराती बल्कि त्याग, स्वाभिमान, साहस और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण की गाथा सुनाती है। यह वह दिन है जब मेवाड़ की धरती पर एक ऐसा संघर्ष हुआ, जिसने इतिहास के पन्नों में वीरता की अमिट छाप छोड़ दी। वर्ष १५७६ में "हल्दी घाटी" के रूप में लड़ा गया यह युद्ध केवल तलवारों की टकराहट नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता और अधीनता, स्वाभिमान और सत्ता के बीच का निर्णायक संघर्ष था। 'राजस्थान की अरावली पर्वतमालाओं के बीच स्थित हल्दीघाटी' आज भी उस ऐतिहासिक दिन की मौन साक्षी है। इसकी पीली मिट्टी मानो आज भी उन वीरों के रक्त से रंजित गौरवपूर्ण स्मृतियों को अपने भीतर संजोए हुए है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का मूल्य समझा...
भोजशाला : केवल एक स्मारक नहीं, भारत की आत्मा का स्वर
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भोजशाला : केवल एक स्मारक नहीं, भारत की आत्मा का स्वर

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत केवल भूगोल का एक टुकड़ा नहीं है, यह हजारों वर्षों की संस्कृति, ज्ञान, साधना और अध्यात्म की जीवित चेतना है। इस चेतना को यदि कहीं मूर्त रूप में देखा जा सकता है, तो वह हमारी प्राचीन शिक्षण परंपराओं, मंदिरों और सांस्कृतिक धरोहरों में दिखाई देती है। मध्यप्रदेश की पावन धरती पर स्थित धार की भोजशाला भी ऐसी ही एक अमूल्य धरोहर है, जो केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, माँ सरस्वती की आराधना और राजा भोज के सांस्कृतिक वैभव की जीवंत गाथा है। मालवा की ऐतिहासिक नगरी धार सदियों से विद्या, कला और संस्कृति का केंद्र रही है। परमार वंश के महान प्रतापी राजा भोज ने इस भूमि को केवल शासन का केंद्र नहीं बनाया, बल्कि इसे ज्ञान की राजधानी के रूप में स्थापित किया। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि जिस प्रकार तक्षशिला औ...
श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज- वह ज्वाला जिसे यातनाएँ भी बुझा न सकीं
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श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज- वह ज्वाला जिसे यातनाएँ भी बुझा न सकीं

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारतीय इतिहास का गगन अनेक वीरों की गाथाओं से आलोकित है, किंतु कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि राष्ट्र की आत्मा में सदैव जीवित रहते हैं। श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज ऐसे ही एक अमर व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन साहस, स्वाभिमान, विद्वता और बलिदान का अद्वितीय संगम था। दुर्भाग्य से इतिहास के अनेक पन्नों में उनके व्यक्तित्व को उतनी व्यापकता नहीं मिली, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। उनके जीवन को केवल युद्धों और बलिदान तक सीमित कर दिया गया, जबकि सत्य यह है कि संभाजी महाराज केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना के प्रखर प्रहरी थे। आज जब समाज वैचारिक भ्रम, सांस्कृतिक विस्मृति और इतिहास की अधूरी व्याख्याओं से जूझ रहा है, तब संभाजी महाराज का जीवन हमें यह स्मरण कराता है कि राष्ट्र केवल तलवारों से नहीं...
लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन
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लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** सूचना के विस्फोट के इस दौर में पत्रकारिता पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। स्मार्टफोन की स्क्रीन पर उभरती एक खबर कुछ ही पलों में जनमत तैयार कर देती है, सरकारों पर दबाव बना देती है और समाज की दिशा तक तय कर देती है। लेकिन इस तेज़, तात्कालिक और प्रतिस्पर्धा पत्रकारिता के बीच एक मूल प्रश्न बार-बार उभरता है, क्या हम अपने मूल उद्देश्य से भटक रहे हैं? यदि भारतीय परंपरा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो संचार और संवाद की अवधारणा कोई नई नहीं है। हमारे पुराणों में देवऋषि नारद जी का चरित्र इस बात का प्रमाण है कि सूचना का आदान-प्रदान केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व था। नारदजी केवल संदेशवाहक नहीं थे, वे संवाद के वाहक थे। उनका हर हस्तक्षेप किसी न किसी रूप मेंलोककल्याण से जुड़ा होता ...
भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश
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भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत की सांस्कृतिक चेतना विविधताओं से परिपूर्ण है, जहाँ प्रत्येक क्षेत्र अपनी विशिष्ट पहचान और आध्यात्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र इसी परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है। यह भूमि केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध रही है। इसी क्षेत्र (जानापाव) से जुड़ी भगवान परशुराम की परंपरा इसे एक विशिष्ट गौरव प्रदान करती है। भगवान परशुराम का व्यक्तित्व भारतीय चिंतन में शक्ति, तप, ज्ञान और न्याय का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। उनका जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के यहाँ हुआ। वे भृगु वंश के थे और विशेष बात यह है कि वे एकमात्र ऐसे अवतार हैं, जिन्होंने ऋषि कुल में जन्म लेकर भी क्षत्रिय धर्...
जब-जब बिखरता समाज, तब-तब याद आते हैं श्रीराम
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जब-जब बिखरता समाज, तब-तब याद आते हैं श्रीराम

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** क्या आज का समाज उस आदर्श की ओर अग्रसर है, जिसे हम ‘रामराज्य’ के नाम से जानते हैं, या हम उससे लगातार दूर होते जा रहे हैं? यह प्रश्न केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती भी है। श्री राम नवमी का पावन पर्व हमें इसी आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है। त्रेतायुग में श्रीराम का अवतरण केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि मानवता को दिशा देने वाला एक युगांतरकारी क्षण था। आज, जब समाज अनेक प्रकार के नैतिक और सामाजिक संकटों से जूझ रहा है, तब श्रीराम के आदर्श पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में जन्मे श्रीराम ने अयोध्या में राजा दशरथ और माता कौशल्या के यहाँ जन्म लेकर यह सिद्ध किया कि महानता वंश या वैभव से नहीं, बल्कि चरित्र और आचरण से निर्धारित होती है। उनके ज...
नवरात्रि का संदेश: मातृशक्ति, राष्ट्रभाव और भारतीय संस्कृति की अमर चेतना
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नवरात्रि का संदेश: मातृशक्ति, राष्ट्रभाव और भारतीय संस्कृति की अमर चेतना

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** जब विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताएँ समय के प्रवाह में विलीन हो गईं, तब भी भारत की संस्कृति आज उतनी ही जीवंत, जाग्रत और प्रेरणादायी बनी हुई है। इसका कारण केवल इसका प्राचीन इतिहास या विशाल भूभाग नहीं, बल्कि वह गहरी सांस्कृतिक चेतना है, जिसकी जड़ें मातृत्व, शक्ति और आध्यात्मिक मूल्यों में निहित हैं। भारतीय जीवन-दृष्टि में शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं, बल्कि संरक्षण, करुणा, सृजन और संतुलन की वह शक्ति है जो समाज को दिशा देती है। यही कारण है कि भारत में शक्ति की उपासना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दर्शन है- और इसी दर्शन का विराट उत्सव है नवरात्रि। भारतीय संस्कृति का मूल स्वर यदि किसी एक भाव में व्यक्त किया जाए तो वह है- मातृत्व और शक्ति का सम्मान। यहाँ मातृभूमि को केवल भूमि नहीं माना गया,बल्कि ...
होली-परंपरा, प्रतीक और वर्तमान की वैचारिक चुनौती
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होली-परंपरा, प्रतीक और वर्तमान की वैचारिक चुनौती

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** होली भारतीय सांस्कृतिक जीवन का केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की परीक्षा भी है। रंगों की उन्मुक्तता, सामूहिक उल्लास और लोक परंपराओं की जीवंतता के बीच यह पर्व हर वर्ष हमें यह प्रश्न पूछने के लिए विवश करता है कि क्या हम अपने मूल मूल्यों के प्रति उतने ही प्रतिबद्ध हैं, जितने अपने उत्सवों के प्रति? बदलते सामाजिक परिदृश्य, तीव्र होती वैचारिक प्रतिस्पर्धा और डिजिटल माध्यमों की प्रभावशाली उपस्थिति के बीच होली का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है। पौराणिक कथा में हिरण्यकशिपु का अहंकार, प्रह्लाद की दृढ़ आस्था, होलिका का छल और अंततः भगवान नरसिंह का न्याय- ये घटनाएँ केवल धार्मिक आख्यान नहीं है, ये सत्ता और सत्य के शाश्वत संघर्ष का रूपक हैं। हिरण्यकशिपु उस मानसिकता का प्रतीक है, जो शक्ति के मद में असहमत...