
अमित राव पवार
देवास (मध्य प्रदेश)
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भारत केवल भूगोल का एक टुकड़ा नहीं है, यह हजारों वर्षों की संस्कृति, ज्ञान, साधना और अध्यात्म की जीवित चेतना है। इस चेतना को यदि कहीं मूर्त रूप में देखा जा सकता है, तो वह हमारी प्राचीन शिक्षण परंपराओं, मंदिरों और सांस्कृतिक धरोहरों में दिखाई देती है। मध्यप्रदेश की पावन धरती पर स्थित धार की भोजशाला भी ऐसी ही एक अमूल्य धरोहर है, जो केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, माँ सरस्वती की आराधना और राजा भोज के सांस्कृतिक वैभव की जीवंत गाथा है।
मालवा की ऐतिहासिक नगरी धार सदियों से विद्या, कला और संस्कृति का केंद्र रही है। परमार वंश के महान प्रतापी राजा भोज ने इस भूमि को केवल शासन का केंद्र नहीं बनाया, बल्कि इसे ज्ञान की राजधानी के रूप में स्थापित किया। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि जिस प्रकार तक्षशिला और नालंदा विश्व में शिक्षा के महान केंद्र माने जाते थे, उसी प्रकार भोजशाला भी संस्कृत अध्ययन, वेद-शास्त्र, संगीत, कला और दर्शन का अद्भुत केंद्र थी। देश-विदेश से विद्यार्थी यहाँ ज्ञान प्राप्त करने आते थे। यह स्थान केवल अध्ययन का केंद्र नहीं था, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा का स्पंदन था। जनश्रुतियों और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार राजा भोज माँ सरस्वती के अनन्य उपासक थे। कहा जाता है कि उनकी तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर माँ वाग्देवी ने उन्हें इसी पावन स्थल पर साक्षात दर्शन दिए। उसी स्मृति में इस स्थान को वाग्देवी मंदिर और आगे चलकर भोजशाला के नाम से जाना गया। आज भी वहाँ मौजूद शिलालेख, संस्कृत के श्लोक, नक्काशीदार स्तंभ, देवी-देवताओं की आकृतियाँ और स्थापत्य कला उस गौरवशाली अतीत की मौन गवाही देते हैं। कल्पना कीजिए उस कालखंड की, जब भोजशाला के प्रांगण में वेदों का उच्चारण गूंजता होगा, यज्ञ की पवित्र अग्नि प्रज्ज्वलित होती होगी, विद्वानों के शास्त्रार्थ होते होंगे और माँ सरस्वती की आराधना से पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठता होगा। वह केवल एक भवन नहीं था, बल्कि ज्ञान और संस्कृति का जीवंत तीर्थ था।
लेकिन इतिहास केवल वैभव की कहानी नहीं कहता, वह संघर्ष और पीड़ा के अध्याय भी अपने भीतर समेटे रहता है। मध्यकालीन आक्रमणों के दौरान इस धरोहर को भी क्षति पहुँची। अनेक ऐतिहासिक विवरणों में उल्लेख मिलता है कि इस स्थल के मूल स्वरूप को बदलने के प्रयास हुए। समय बीतता गया, सत्ता बदलती गई, लेकिन भोजशाला की पहचान और उससे जुड़ी आस्था कभी समाप्त नहीं हुई। यही कारण है कि आज भी करोड़ों लोगों के मन में भोजशाला केवल एक पुरातात्विक संरचना नहीं, बल्कि श्रद्धा और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक बनी हुई है। वर्तमान समय में भोजशाला इतिहास, आस्था और न्यायिक विमर्श का केंद्र बनी हुई थी, किन्तु १५ मई २०२६ शुक्रवार को मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने अपना निर्णय सुनाते हुए इस स्थान को मंदिर घोषित किया। न्यायालय ने फैसला सुनाया, भोजशाला परिसर के अंदर हिंदुओ के पूजा करने के अधिकार को प्रतिबंधित लड़ने वाला २००३ का एएसआई आदेश और मुस्लिम समुदाय द्वारा प्रार्थना की अनुमति देने वाला आदेश दोनों रदद् किये जाते है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया की संरचना का धार्मिक स्वरूप एक मंदिर का है।
एक पक्ष इसे माँ वाग्देवी का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम समाज इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है। यह विषय संवेदनशील अवश्य है, किंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सत्य की खोज संवैधानिक मर्यादा, ऐतिहासिक तथ्यों और सामाजिक सौहार्द के साथ हुई। परिसर में मौजूद मूर्तियाँ, संस्कृत शिलालेख, हिंदू स्थापत्य शैली और पुरातात्विक संकेत इस स्थल के ऐतिहासिक स्वरूप को हम सब न्यायालय के इस फैसले का स्वागत करते है। किन्तु भोजशाला का वास्तविक महत्व किसी विवाद से कहीं अधिक बड़ा है। यह उस भारत की पहचान है जिसने विश्व को ज्ञान, दर्शन, संस्कृति और सहिष्णुता का मार्ग दिखाया। यह स्मरण कराती है कि भारत की आत्मा उसकी सभ्यता में बसती है, और सभ्यता तभी जीवित रहती है जब समाज अपनी विरासत को सम्मान देता है।आज आवश्यकता इस बात की है कि भोजशाला को राजनीति और विवादों की दृष्टि से नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक के रूप में देखा जाए। इतिहास को मिटाकर भविष्य का निर्माण नहीं किया जा सकता। आने वाली पीढ़ियों को यह जानने का अधिकार है कि उनकी सभ्यता कितनी समृद्ध, कितनी वैभवशाली और कितनी ज्ञानमयी रही है। भोजशाला केवल धार की धरोहर नहीं है, यह सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक स्मृति है। इसके पत्थरों में इतिहास बोलता है, इसके स्तंभों में संस्कृति साँस लेती है और इसके मौन में आज भी माँ सरस्वती की वीणा की ध्वनि सुनाई देती है। प्रश्न केवल एक भवन का नहीं, बल्कि उस आत्मा का है जिसने भारत को “विश्वगुरु” बनाया था।
निवासी : देवास (मध्य प्रदेश)
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