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स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक

अमित राव पवार
देवास (मध्य प्रदेश)
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इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर के पन्नों पर अंकित दिन नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना में सदैव जीवित रहने वाली प्रेरणाएँ बन जाती हैं। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, ६ जून १६७४ का दिन भारतीय इतिहास की ऐसी ही एक अमर तिथि है, जब रायगढ़ की पवित्र धरती पर श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ। यह घटना किसी राजा के सिंहासनारोहण का मात्र राजकीय आयोजन नहीं थी, बल्कि भारतीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वाधीन शासन की उद्घोषणा थी। उस दिन एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक हुआ था।

सत्रहवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक अस्थिरता, विदेशी प्रभुत्व और सामाजिक निराशा के दौर से गुजर रहा था। सत्ता का केंद्र जनता से दूर था और शासन का उद्देश्य लोककल्याण के बजाय साम्राज्य विस्तार बन चुका था। ऐसे समय में एक युवा ने यह स्वप्न देखने का साहस किया कि इस भूमि का शासन इसी भूमि के लोगों के हाथों में होना चाहिए। यह स्वप्न था- “हिन्दवी स्वराज्य” का और उस स्वप्न के महान शिल्पकार थे श्री मंत छत्रपति शिवाजी महाराज। शिवाजी महाराज ने अपने जीवन की यात्रा किसी विशाल साम्राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि संघर्षशील राष्ट्रनायक के रूप में प्रारंभ की थी। सीमित संसाधन, विपरीत परिस्थितियाँ और शक्तिशाली शत्रुओं के बीच उन्होंने जिस धैर्य, साहस और दूरदर्शिता का परिचय दिया, वह विश्व इतिहास में अद्वितीय है। उनके लिए सत्ता व्यक्तिगत वैभव का साधन नहीं, बल्कि जनकल्याण और राष्ट्ररक्षा का माध्यम थी। यही कारण है कि उनके प्रत्येक अभियान के पीछे विस्तारवाद नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और सुरक्षा का उद्देश्य दिखाई देता है। लगभग तीन दशकों तक चले संघर्ष, संगठन और राष्ट्रनिर्माण के पश्चात जब स्वराज्य एक सुदृढ़ शक्ति के रूप में स्थापित हो गया, तब राज्याभिषेक की आवश्यकता अनुभव की गई। यह केवल धार्मिक या परंपरागत प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक घोषणा थी कि यह राज्य किसी साम्राज्य की जागीर नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और सार्वभौम सत्ता है। रायगढ़ का दुर्ग उस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना, जब भारतीय आत्मविश्वास ने पुनःअपना मस्तक ऊँचा किया। राज्याभिषेक समारोह की भव्यता जितनी आकर्षक थी, उससे कहीं अधिक उसका वैचारिक महत्व था। “सदियों बाद किसी भारतीय शासक ने पूर्ण वैदिक परंपरा के अनुसार स्वयं को स्वतंत्र सम्राट घोषित किया था। “यह घटना उस मानसिक गुलामी के विरुद्ध भी थी, जिसने समाज को यह विश्वास दिला दिया था कि विदेशी शासन ही उसकी नियति है। श्री शिवाजी महाराज ने अपने राज्याभिषेक के माध्यम से यह संदेश दिया कि स्वराज्य केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की अवस्था है।

रायगढ़ में आयोजित यह समारोह भारतीय संस्कृति की जीवंतता और सामाजिक सहभागिता का अनुपम उदाहरण था। देश के विभिन्न क्षेत्रों से
विद्वान, संत, धर्माचार्य, योद्धा और आम जनता के साथ जनप्रतिनिधि इसमें सम्मिलित हुए। यह आयोजन किसी एक क्षेत्र या समुदाय का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र की आकांक्षाओं का उत्सव बन गया। राज्याभिषेक के उपरांत दान,दक्षिणा और लोकहित के कार्यों पर जो बल दिया गया,वह शिवाजी महाराज की जनोन्मुखी शासन दृष्टि को स्पष्ट करता है। आज जब हम श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक दिवस को स्मरण करते हैं, तो हमें केवल उसके ऐतिहासिक वैभव को नहीं देखना चाहिए, बल्कि उसके मूल संदेश को समझना चाहिए। श्री शिवाजी महाराज का जीवन बताता है कि राष्ट्र का निर्माण केवल तलवार की शक्ति से नहीं, बल्कि चरित्र, संगठन, न्याय और जनविश्वास से होता है। उन्होंने अपने शासन में धर्म को आस्था का विषय बनाया, शासन का उपकरण नहीं। उन्होंने महिलाओं के सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, किसानों को संरक्षण दिया, प्रशासन को जवाबदेह बनाया और सुरक्षा को राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी माना। वर्तमान समय में जब नेतृत्व के मूल्य,
प्रशासनिक नैतिकता और राष्ट्रीय दायित्व पर निरंतर चर्चा होती है, तब शिवाजी महाराज का व्यक्तित्व एक आदर्श उदाहरण बनकर सामने आता है।

यह राज्याभिषेक हमें याद दिलाता है कि सत्ता का वास्तविक अर्थ सेवा है, अधिकार का वास्तविक उद्देश्य संरक्षण है और नेतृत्व का वास्तविक स्वरूप त्याग एवं उत्तरदायित्व है। “यह भी विचारणीय है कि राज्याभिषेक केवल अतीत की गौरवगाथा बनकर न रह जाए। “यदि हम वास्तव में इस दिवस का सम्मान करना चाहते हैं, तो हमें शिवाजी महाराज के आदर्शों को अपने जीवन और समाज में उतारना होगा। स्वराज्य का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और आत्मअनुशासन भी है। जिस राष्ट्र के नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होते हैं, वही राष्ट्र सशक्त और समृद्ध बनता है। श्री छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जिसने पराधीनता के अंधकार में आत्मविश्वास का दीप प्रज्वलित किया। यह घटना हमें स्मरण कराती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि नेतृत्व में दूरदृष्टि, समाज में एकता और लक्ष्य के प्रति अटूट निष्ठा हो, तो इतिहास की दिशा बदली जा सकती है।आज, राज्याभिषेक दिवस पर हम केवल एक महान राजा को स्मरण नहीं करते, बल्कि उस विचार को नमन करते हैं जिसने भारत को स्वराज्य का मंत्र दिया। रायगढ़ की वह ऐतिहासिक गूँज आज भी हमें पुकारती है कि राष्ट्र निर्माण का कार्य कभी समाप्त नहीं होता। प्रत्येक पीढ़ी को अपने समय में स्वराज्य के मूल्यों की रक्षा करनी होती है।

वास्तव में, ६ जून १६७४ का राज्याभिषेक केवल शिवाजी महाराज के मस्तक पर मुकुट धारण करने का क्षण नहीं था, वह भारत के स्वाभिमान,
आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का महोत्सव था। यही कारण है कि “तीन शताब्दियों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह दिवस भारतीय जनमानस में प्रेरणा, गौरव और राष्ट्रभक्ति का अमिट प्रतीक बना हुआ है।”

परिचय :-  अमित राव पवार
निवासी : देवास (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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