Saturday, June 27राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

देवलोक का अमृतकाल बनाम मृत्युलोक में मानवता का पतनकाल

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
********************

देवराज इंद्र की सभा सजी थी। देवलोक में “अमृतकाल महोत्सव” चल रहा था। अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं, अमरबेल के पुष्प बरस रहे थे और सोमरस की स्टॉल पर ऐसी भीड़ थी जैसी मृत्युलोक में तंदूरी रोटी की दुकान पर लगती है। तभी सभा में देवर्षि नारद का आगमन हुआ। इंद्र ने मुस्कुराकर कहा, “अहोभाग्य! आजकल तो आपका अधिक समय मृत्युलोक में ही बीतता है। कहीं किसी गठबंधन सरकार में मंत्री पद मिल गया क्या?”
नारद ने कटाक्ष अनसुना कर पूछा, “देवराज, बताइए, देवता, दानव और मानव में श्रेष्ठ कौन है?” इंद्र चौंके, “अब आप भी हमारी श्रेष्ठता पर प्रश्न उठाने लगे? कहीं मृत्युलोक की विपक्षी शक्तियों ने आपको प्रभावित तो नहीं कर दिया?”
नारद मुस्कराए, “नहीं इंद्र, पर सत्य यही है कि आज सबसे शक्तिशाली मानव है। उसने अपना अलग संसार बना लिया है। उसे अब न देवताओं की आवश्यकता है, न दानवों की। वह अवसर के अनुसार स्वयं देवता भी बन जाता है और दानव भी। इतनी शीघ्रता से रूप बदलने की कला तो हमने भी नहीं सीखी।”
वे आगे बोले, “कभी हम आकाशवाणी कर मानव को देव-प्रकोप का भय दिखाते थे। प्रकृति और जीवन की वस्तुओं को देवस्वरूप घोषित कर अनुशासन बनाए रखते थे। वह स्वयं ही भाषणों, प्रवचनों और घोषणाओं के माध्यम से दूसरे मनुष्यों को नियंत्रित कर रहा है। कुछ शब्दों के सहारे वह समाज में वैमनस्य फैला सकता है, भाई को भाई से लड़वा सकता है और धार्मिक उन्माद का तूफ़ान खड़ा कर सकता है।” सभा में सन्नाटा छा गया।
नारद बोले, “जब तक मानव में मानवता थी, वह सीमित इच्छाओं वाला प्राणी था। वह पीड़ा समझता था। करुणा रखता था और दूसरों के हित की सोचता था। यही गुण उसे देवताओं के निकट ले जाते थे। लेकिन उसे देवताओं से भी ऊपर उठना था। उसने उपाय खोज लिया,मानवता को ही त्याग दिया।”
“मानवता के जाते ही उसने पशुत्व धारण कर लिया। अब वह नारी की अस्मिता पर आक्रमण कर सकता है, धर्म और राजनीति के नाम पर हिंसा फैला सकता है, स्वार्थ के लिए किसी का भी गला काट सकता है ।” नारद ने एक घूँट जल पिया और फिर बोले, “ब्रह्मा जी से सृष्टि-निर्माण में एक भूल हो गई। उन्होंने मानवता का कोई दृश्य स्वरूप नहीं बनाया। इसलिए मानवता-विहीन मनुष्य भी बाहर से वैसा ही दिखता है जैसा मानवता
से परिपूर्ण व्यक्ति। इसी का लाभ उठाकर लोग अपने कुकर्मों को सम्मान का वस्त्र पहनाते रहते हैं।”
“अब मनुष्य आपदा में भी अवसर ढूँढ़ता है। कोरोना काल में इसका विराट रूप दिखाई दिया। दुर्घटना, बाढ़, भूकंप या करंट से किसी की मृत्यु हो रही हो, तो सहायता के लिए हाथ कम और मोबाइल कैमरे अधिक उठते हैं।

पहले ‘राम नाम की लूट’ थी, अब ‘लाइक और कमेंट की लूट’ है। लोग संवेदनाओं से अधिक सोशल मीडिया की कमाई में रुचि रखते हैं।”
“पत्रकार भी ‘मानवता हुई शर्मसार’ शीर्षक की तलाश में रहते हैं । दर्शक इस त्रासदी का लाइव प्रसारण देखते हैं और धीरे-धीरे उसे सामान्य मानने लगते हैं।”
नारद की वाणी और तीखी हो गई। “अब रिश्ते बोझ हैं, संवेदनाएँ बाधा हैं और स्वार्थ ही धर्म है। सड़क पर तड़पते घायल में किसी को करुणा नहीं दिखती। बेटा माँ की अर्थी उठाने से पहले संपत्ति के कागज़ सुरक्षित कर लेना चाहता है। लोग दूसरों की चिताओं की गर्मी में अपने हितों की रोटियाँ सेंक रहे हैं।”
फिर उन्होंने इंद्र की ओर देखते हुए कहा, “देवराज, आप अपने देवत्व पर गर्व करते हैं, पर कभी मृत्युलोक जाकर देखिए। मानव ने कैसी अद्भुत प्रगति की है! उसने देवताओं की शक्तियाँ तो प्राप्त कर लीं, पर मानवता खो दी। वहाँ आज ऐसा अमृतकाल चल रहा है जिसमें मानवता चंद सिक्कों, थोड़ी प्रसिद्धि और क्षणिक लाभ के लिए प्रतिदिन नीलाम हो रही है। उसके सामने आपका यह अमृत महोत्सव भी फीका पड़ जाता है।”
इंद्र का चेहरा गंभीर हो गया। उन्हें लगा कि यदि यही गति रही तो एक दिन मानव सचमुच देवताओं की कुर्सी पर दावा ठोक देगा।
उन्होंने तुरंत घोषणा की, “नृत्य-गान बंद किया जाए। सभी देवता ब्रह्माजी के पास चलें। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि मानव कितना शक्तिशाली हो गया है, बल्कि यह है कि उसके भीतर मानवता का सॉफ़्टवेयर दोबारा कैसे इंस्टॉल किया जाए।”

परिचय :-  डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन)  किताबगंज   प्रकाशन,  गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित 
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें …🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 60360 पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच का सदस्य बनने हेतु हमारे चलभाष क्रमांक 98273 60360 पर अपना नाम और कृपया मुझे जोड़ें लिखकर हमें भेजें…🙏🏻

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *