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यादों का घर

देवेन्द्र देव “मिर्जापुरी”
बुलंदशहर (उ.प्र.)
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शाम ढल चुकी थी। आकाश में धूप का अंतिम रंग जैसे धीरे-धीरे सिमटकर अँधेरे में खो रहा था। घर के आँगन में खड़ा पुराना नीम का पेड़ अब भी वैसे ही खड़ा था, पर उसके नीचे बैठने वाला आज कोई नहीं था।
अजय बरामदे में रखी उसी कुर्सी पर बैठा था, जहाँ कभी उसके पिता जी अख़बार पढ़ते हुए उसे जीवन की बहुत-सी छोटी-छोटी सीखें दिया करते थे। आज कुर्सी खाली थी, पर उस पर जैसे अब भी किसी के होने का अहसास बाकी था। हवा का एक झोंका आया और पास रखे अख़बार के पन्ने अपने आप फड़फड़ा उठे। अजय ने चौंककर देखा।
“पिताजी…?” उसके होंठों से अनायास निकल पड़ा।
कुछ क्षण के लिए उसे लगा जैसे वही परिचित आवाज सुनाई देगी-
“अरे, ऐसे चौंकते क्यों हो? बैठो, कुछ बातें करते हैं…”
पर वहाँ सिर्फ खामोशी थी।
पिता जी को गए हुए कई महीने बीत चुके थे, लेकिन हर शाम वही लगती थी कि जैसे समय यहीं कहीं ठहर गया हो। अजय ने आँखें बंद कीं और यादों के दरवाजे अपने आप खुलने लगे, पिता जी का सख्त चेहरा…पर उस सख्ती के पीछे छिपा अथाह स्नेह…उनका हर बात पर समझाना कि “जिंदगी आसान नहीं होती बेटा, पर हार माननी भी नहीं चाहिए…”
वह अक्सर सोचता था कि पिता जी इतने कठोर क्यों हैं?
पर आज समझ आ रहा था कि वह कठोरता नहीं, जिम्मेदारी थी… वह डाँट नहीं, चिंता थी…
अचानक उसे लगा जैसे आँगन के दरवाजे पर कोई खड़ा है। वह जल्दी से उठा और बाहर गया। दरवाजा खोलते ही वही सुनसान गली सामने थी।
अजय कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा, जैसे किसी के लौट आने की उम्मीद अब भी बाकी हो।
“आप भी न, पिताजी… ऐसे ही बिना बताए चले गए…” उसकी आवाज भर्रा गई।
उसे याद आया, वह आखिरी दिन… पिता जी अस्पताल के बिस्तर पर थे। कमजोर आवाज में उन्होंने उसका हाथ पकड़ा था,,
“मजबूत रहना…बेटे,, घर अब तुम्हें सँभालना है…”
उस वक्त अजय ने सिर हिलाकर हाँ तो कह दी थी, पर वह नहीं जानता था कि यह ‘मजबूती’ कितनी भारी होगी। आज वही शब्द उसके कानों में गूँज रहे थे। अजय वापस आकर बरामदे में पड़ी उसी कुर्सी के पास बैठ गया। उसने धीरे से उस कुर्सी को छुआ,जैसे पिता जी का हाथ पकड़ रहा हो।
आँखों से आँसू बह निकले।
“आपके बिना सब अधूरा लगता है, पिताजी…”
तभी अचानक एक हल्की-सी आवाज आई- जैसे कोई धीरे से कह रहा हो-
“मैं यहीं हूँ…”
अजय ने इधर-उधर देखा- कोई नहीं था। पर उस आवाज में एक अजीब-सा भरोसा था… एक अपनापन… उसे एहसास हुआ-
पिता जी कहीं गए नहीं हैं।
वह हर उस फैसले में हैं जो वह लेता है…
हर उस हिम्मत में हैं जो वह जुटाता है…
हर उस जिम्मेदारी में हैं जिसे वह निभाने की कोशिश करता है…
पिता जी का अस्तित्व अब शरीर में नहीं, बल्कि उसके भीतर भावों में बस गया था। अजय ने आँसू पोंछे और आसमान की ओर देखा। तारों की हल्की रोशनी में उसे जैसे पिता जी का चेहरा दिखाई दिया,,, गंभीर, लेकिन संतोष से भरा।
वह धीरे से मुस्कुराया। अब दर्द तो था, लेकिन उसके साथ एक ताकत भी थी। वह उठकर अंदर चला गया। आज पहली बार उसे लगा कि पिता जी ने उसे अकेला नहीं छोड़ा, बल्कि उसे खुद के पैरों पर खड़ा कर दिया है। दरवाजा बंद करते हुए उसने मन ही मन कहा,,,
“आप हमेशा मेरे साथ रहेंगे… हर उस रास्ते पर जहाँ मैं चलूँगा…”
और फिर वही अहसास उसके दिल में उतर गया कि पिता जी अब दूर नहीं हैं…
वह बस एक रूप बदलकर रह गए हैं…
मन ही मन रमेश ने कहा ?
“आप कहीं नहीं गए, पिताजी…
आप यहीं हैं… इस घर में… मेरे साथ…”
और सच में…
कुछ लोग चले जाते हैं, लेकिन कभी जाते नहीं…
वे बस बस जाते हैं,,,,
हमारे दिल में,
हमारी सोच में,
और हमारे अपने इस छोटे-से संसार में,,,
हमारे “यादों के घर” में…
केवल यादों के घर में,,,,
और हर उस साहस में, जो अब अजय के भीतर जिंदा है।

परिचय :-   देवेन्द्र देव “मिर्जापुरी”
निवासी : शास्त्री नगर बुलंदशहर (उ.प्र)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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