
प्रीतम कुमार साहू ‘गुरुजी’
लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़)
********************
(छत्तीसगढ़ी बोली)
चिरई चुरगुन के चिंव-चिंव बोली अउ फुँदक-फुँदक के रेंगना हर घाते सुग्घर लागथे। प्राकृतिक सौंदर्य हर चिरई चुरगुन ले हवय। चिरई चुरगुन बिना जंगल झाड़ी अउ महल अटारी ह सुन्ना लागथे।
फेर गरमी दिन म नदियाँ नरवा, तरिया, डबरी सबो ह सुखा जाथे त चिरई चुरगुन मन बूँद-बूँद पानी बर तरसत रहि जाथे। कतकोंन चिरई मन तो दाना-पानी बिना अपन परान ल तियाग देथे। ऐसना समय म चिरई चुरगुन के जीव ल बचाय बर उदिम कर सकथन अपन घर के छत छानी मा, बारी बखरी मा अउ जेन मेर रुख राई हे तेन मेर सकोरा म दाना पानी राख के चिरई चुरगुन के पियास ल बुझा स सकथन। जेकर ले लहकत घाम म उड़त परकी परेवना अउ जम्मों चिरई चुरगुन मन अपन पियास ला बुझा सके। आज कल तो सहर तो बहुत दूरिहा के बात आय गांव म घलोक आघु कस चिरई चुरगुन देखे बर नइ मिलय। दिनों दिन चिरई चुरगुन मन कम होवत जात हे। जेन हर पर्यावरण संतुलन बर बने बात नो आय। विलुपत चिरई चुरगुन ल हमला बचाय ल परही सँगवारी हो।
ए दुनिया म जतेक महत्तम मनखे मन के हे ओतकेच महत्तम चिरई चुरगुन मन के घलोक हवय। प्राकृतिक समपदा के भोग करें के अधिकार सिरिफ मनखेमन बस ल नइ हे, सबो जीव मन ला उपभोग करें के अधिकार हवय। प्राकृतिक संतुलन ल बनाय रखे बर सबो जी के अब्बर महत्तम हे। फेर कतकोन मनखेमन ह अपन आप ला सुजानीक समझ के दुसर जीव उपर अतिचार करत रहिथे। जंगल के आधा जीव जंतु मन हर तो मार के खवई म सिरागे। अउ आधा जेन हर बाचे हावय वहू मन के जीव ल खतरा बने रहिथे।
ए दुनिया म सिरफ मनखे हर ऐसन जीव आए जेन हर सबो जीव के जान ल बचा सकत हे। फेर मनखे हर सुवारथ म अनधरा हो के दूसर जीव मन उपर अतिचार करत सिकार करे म लगे रहिथे। दिनों दिन चिरई चुरगुन मन कम होत जात हे। जेन ल बचाय के जिम्मेवारी मनखे मन के हवय। मनखेमन हर त अपन खाय पिये के अउ जिनगी जिए बर नाना परकार के नवा नवा उदीम कर डारे हावय। फेर एसना नवा नवा उदिम का कोनो चिरई चुरगुन बर कोनो करय हावय? बिरले मनखे मन करत हवय।
एकरे सेती सँगवारी हो चिरई चुरगुन के पियास बुझाय बर अउ विलोपत होवत चिरई चुरगुन ल बचाय बर अपन अपन घर के छत छानी म, बारी बखरी म, अउ जेन मेर रुख राई हे तेन मेर सकोरा म दाना पानी राखव। जेकर ले चिरई चुरगुन मन अपन भूख पियास ला मिटा के अपन जिनगी ल बचा सकय।
घाम पियास मा घुमत लहक,
मँय हर आहूँ तुहर दुवारी।
घर के छत म दाना-पानी,
राखे रहिबे तँय हर सँगवारी।
दाना पानी मँय हर खाहूँ
खुख पियास ल अपन मिटाहूँ।
थोकिन दाना थोकिन पानी,
चोंच म भर के मँय ले जाहूँ।
रद्दा देखत सुरता क रही,
चारा धर के आवत होही।
चोंच म चोंच मिला के सुग्घर
दाना पानी खवा के आहूँ।।
परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक)
निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)।
घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें …🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 60360 पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच का सदस्य बनने हेतु हमारे चलभाष क्रमांक 98273 60360 पर अपना नाम और कृपया मुझे जोड़ें लिखकर हमें भेजें…🙏🏻
