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स्वतंत्रता

नील मणि
मवाना रोड (मेरठ)
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ओशो कहते हैं- जीवन जीने के केवल दो ढंग हैं: एक मालिक बनकर और दूसरा गुलाम बनकर। गुलामी में जिया गया जीवन, जीवन नहीं- केवल समय काटना है। यदि जीना है, तो मालिक बनकर जियो, अन्यथा मर जाना ही बेहतर है। यह कथन कठोर अवश्य लगता है, पर इसमें जीवन का गहरा सत्य छिपा है। मालिक बनने का अर्थ किसी पर शासन करना नहीं है। यह बाहरी सत्ता की नहीं, भीतर की सत्ता की बात है। असली गुलामी बाहर नहीं, हमारे अपने मन में है- आदतों की गुलामी, भय की गुलामी, तुलना की गुलामी, अपेक्षाओं और समाज की राय की गुलामी।
मालिक बनने की यात्रा भी मन से ही शुरू होती है। सवाल यह नहीं कि हमें कहाँ पहुँचना है; असली सवाल यह है कि हम कहाँ से शुरू कर रहे हैं- भय से या बोध से। मन के आनंद का स्वाद ही मंज़िल का पता देता है। जिस क्षण व्यक्ति किसी कार्य को करते हुए सहज आनंद अनुभव करता है, उसी क्षण वह सही दिशा में होता है। उदाहरण के लिए- कोई व्यक्ति सुबह टहलने जाता है। वह व्यक्ति टहलने इसलिए जाता है क्योंकि डॉक्टर ने कहा है, समाज कहता है, डर है कि बीमार न पड़ जाए- तो वह गुलाम है। दूसरा व्यक्ति इसलिए जाता है क्योंकि उसे चलना अच्छा लगता है, हवा से बातें करना अच्छा लगता है- तो वह मालिक है। दोनों की क्रिया समान है, पर जीवन को जीने की गुणवत्ता अलग है।
जिस जीवन में बुद्धि, विचार, अनुशासन और व्यवस्था है- वही परम स्वतंत्र जीवन है। अक्सर लोग अनुशासन को बंधन समझ लेते हैं, जबकि सच्चाई इसके उलट है। जैसे नदी- जब तक उसके किनारे हैं, तब तक वह बहती है, खेतों को सींचती है, जीवन देती है। किनारे टूट जाएँ तो वही नदी बाढ़ बनकर विनाश करती है। अनुशासन नदी के किनारों की तरह है- वह जीवन को दिशा देता है, रोकता नहीं। जीवन के ऊपर कोई नियम नहीं है, कोई मर्यादा नहीं है- जीवन अमर्याद है। वहाँ न कुछ शुभ है, न अशुभ। वह व्यक्ति मालिक है जिसे जीवन में सब स्वीकार है- अंधेरा भी, उजाला भी; जैसे दिन के बिना रात नहीं और रात के बिना दिन नहीं। वह सुख दुख को एक समान स्वीकारता है।

साधारणतया मनुष्य का मन विरोधाभास स्वीकार नहीं कर पाता। वह या तो उजाले को पकड़ता है या अंधेरे से लड़ता है। वह समझ नहीं पाता कि सुख-दुख तराजू के दो पलड़े हैं जिसे वह समझ नहीं पाता, उसे जीवन में उतार भी नहीं पाता। जैसे-जैसे हमारी समझ बढ़ती है, वैसे-वैसे हम आगे बढ़ते जाते हैं। स्वतंत्रता कोई मंज़िल नहीं, बल्कि एक बढ़ती हुई अनुभूति है। आज जो स्वतंत्रता है, कल उससे भी गहरी हो सकती है। अतः सही ढंग से जीना मतलब- जीवन से लड़ना नहीं- उसे समझना; भागना नहीं- स्वीकारना और सबसे बढ़कर- अपने मन का मालिक बनना। क्योंकि जिस दिन मन हमारा हो गया, उसी दिन जीवन स्वयं हमारे पक्ष में खड़ा हो जाता है।

परिचय :- नील मणि
निवासी : राधा गार्डन, मवाना रोड, (मेरठ)
घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।

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