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सच्चा भारत
कविता

सच्चा भारत

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** दलित, पिछड़े और सवर्ण हम सबको पास बुलाते हैं, हैं सभी नागरिक इस देश के, सबको गले लगाते हैं, इंसानियत ही धर्म है अपना, पीड़ा महसूसना मर्म है अपना, ईद, दीवाली और क्रिसमस मिलकर हम मनाते हैं, कर देते हैं सबको ताकीद, हक़ और अधिकार से सब हों वाकिफ़, छल-कपट कर लोगों को हरिजन नहीं बनाते हैं, तोड़ कुरीति की जंजीरें, हम नया दौर अब लाएंगे, जात-पात के ठेकेदारों को आईना रोज दिखलाएंगे, संविधान की शपथ उठाकर, हर आंचल को खुशहाल करें, मजहब से ऊपर उठकर हम, इंसान गले से लगाएंगे, नफरत की जो आंधी उठी, उसे मोहब्बत से मोड़ेंगे, टूटे हुए जो दिल हैं उनको, भाईचारे से जोड़ेंगे, अनेकता में एकता ही, इस पावन धरा की शक्ति है, तिरंगे की इस शान की खातिर, खुद का सर्वस्व निचोड़ेंगे। परिचय :-  राजेन्द्र ल...
स्पर्श एक अद्भुत शक्ति
कविता

स्पर्श एक अद्भुत शक्ति

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** स्पर्श में है एक अदृश्य और एक अजीब शक्ति यह मन के बाहरी व भीतरी सतह की महाशक्ति।। स्पर्श की अनुभूति ओतप्रोत स्वतः अनुभव होती, यह तापमान, शीतलता की भाषा, स्पर्श से कहती।। शरीर में क्रिया खुद पे खुद स्पर्श से अहसास कराती, मौसम के अनुकूल मन शरीर में स्पर्श से स्वयं कराती।। कहींकंपन का, कहीं धड़कन का, कही हिलनेडुलने की, कहीं आनंद का कहीं उदासीनता मन को स्पर्श है करती।। वातावरण का रुख कितना, स्वच्छ है या दुगन्धमय वातावरण के जरिये यह मुक्त कंठ में मौन कहती।। स्पर्श में अद्भुतशक्ति सारी, होती खुशबू स्पर्श में प्यारी स्पर्श की क्या करे बराबरी, स्पर्श बताता हल्का या भारी।। खट्टा मीठा खारा जीभ में स्पर्श से खुलासा होता सारा ज्ञान अज्ञान की गुणकारी बातें, स्पर्श करती मन मे सारी।। कभी किसी के कड़वे बोल कड़वी बा...
पितरों के स्मरण से अपनी जड़ों तक लौटने का पर्व श्राद्ध पक्ष
आलेख

पितरों के स्मरण से अपनी जड़ों तक लौटने का पर्व श्राद्ध पक्ष

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचने की कोशिश की है कि हम कौन हैं? हमारा नाम, हमारा परिचय और हमारी व्यक्तिगत पहचान निश्चित ही हमारी अपनी है, लेकिन हमारे अस्तित्व की जड़ें कहीं बहुत पीछे तक जाती हैं। हमारे भीतर हमारे माता-पिता का अंश है, उनके भीतर हमारे दादा-दादी का, और उनके पीछे अनगिनत पीढ़ियों का वह इतिहास है, जिसने हमारे वर्तमान को आकार दिया। हमारे शरीर में रक्त के साथ उनकी विरासत प्रवाहित होती है, हमारे संस्कारों में उनकी छाप होती है और हमारे जीवन में उनके संघर्षों की अनुगूंज सुनाई देती है। लेकिन आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मनुष्य दुनिया को जानने के लिए बेचैन है, अपने भविष्य को लेकर चिंतित है, पर अपनी जड़ों को जानने के लिए उसके पास समय नहीं। मोबाइल में हजारों तस्वीरें हैं, दुनिया की हर जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध...
कमाल हो जाएगा (घनाक्षरी)
धनाक्षरी

कमाल हो जाएगा (घनाक्षरी)

डॉ. विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** यदि याद पाठ शाला, पाला किए बुजुर्ग से, अवसर चूको नहीं, वक्त चला जाएगा। जवाब हर बात या, भूल की अवहेलना, तर्क अज्ञान वश तो, विद्वता ना पाएगा। घर परिवार देश, समाज क्रम घटित, जानी अनजानी कभी, रोक कैसे पाएगा। समझकर संवाद को, सभा समूह विवाद, मुंह अपना खोलिये, वाह ही करायेगा। युग जो बदल गया, मौन भाषा भूल गया, बोले बिना चैन गया, आदत बनाएगा। नजर तो घुमाइये, शहर से गांव तक, मुख्य शीर्ष बैठकें तो, सुनना सिखाएगा। विवाद के महारथी, बिना सुने बन गए, झूठ ज्ञान गढ़ गए, तो जीत क्या पाएगा। वक्ता पहचान यही, तथ्य बोध कला सही, प्रभाव सामने सही, नाम ही कमाएगा। पड़ोस परिवार में, बोलकर भाषा कटु, खड़े स्वाभिमान लिए, टपक ही जायेगा। छपना है अच्छा बुरा, छपास बना आसरा, बिखरा जो यही रोग, राह क्या दिखाएगा। चूकना नहीं...
विश्वधर्म
आलेख

विश्वधर्म

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा फतेहाबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) ******************** अहिंसा, शांति, प्रेम, शिक्षा और साहित्य के अमर साधक, मानवता के अमर पुजारी महात्मा गांधी जी ने विश्व शांति के लिए जीवन भर कार्य किया। पृथ्वी पर भिन्न-भिन्न धर्म, भाषा- बोली, रंग- रूप हैं, परंतु हैं सभी ईश्वर की कृति। महात्मा गांधी जी ने सभी धर्मों का सम्मान किया। उनका मत था सर्वत्र समता और एकता संसार में स्थापित हो। संसार का सार प्रेम है, जो अहिंसा से जन्मता है। हिंसा से जिसका चित दुःखी हो वह मानव है और यही है दुनिया का असली धर्म है। आज समग्र विश्व आतंकवाद, उग्रवाद, संघर्ष की दहशत में जी रहा है। इसका मुख्य कारण प्रतिशोध, घृणा, धर्मवाद, बदले की भावना है। अन्याय तथा शोषण अपने चरम पर है। आग के बदले आग व आंख के बदले आंख इस मानवी सोच ने मानवता को संकट व अशांति में डाल दिया है। इस समस्या का हल अहिंसा, क्षमा, प्रे...
शिक्षा
कविता

शिक्षा

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** नव भारत में कदम बढ़ाओ। शिक्षा को बच्चों अपनाओ।। लटका कर कंधे पर बस्ता। विद्यालय नित ही तुम जाओ।। भाग्य विधाता शिक्षक अपना। अपने शिक्षक के गुण गाओ।। कंधे पे है जिम्मेदारी। हथकण्डे तुम मत अपनाओ।। स्वाभिमान होता है प्यारा। सबके उर में जगह बनाओ।। बन जाओ ज्ञानी विज्ञानी नैतिकता का दीप जलाओ।। महत्व श्रम का बच्चों जानो। सच के पथ पर चलते जाओ।। आदर करो बड़ों का बच्चों। चरणों में सिर सदा झुकाओ।। परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सतर्क...
श्री पार्वती शक्ति तांडव स्तुति
स्तुति

श्री पार्वती शक्ति तांडव स्तुति

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** जयति महाशक्ति स्वरूपा, शिव-हृदय-विहारिणी, प्रलय-काल-नृत्यातुरा, दनुज-वंश-विदारिणी। डमरू-ध्वनि-संग थिरकती, चरण-चाप-कंपित-धरा, त्रिलोकी-वंदिता माता, आदि-शक्ति करुणामयी, जगदुद्धरा। रण-चंडी रूप धरे, नयन-अग्नि झलकावती, मुंडमाल कंठ सोहे, खड्ग-हस्त चमकावती। तांडव-लय-बद्ध पग, घुँघरू रुनझुन बाजत, भक्त-रक्षण-हेतु माँ, विकराल रूप साजत। सौम्य रूप गौरी तुम, तुम्हीं महाकाली विकट, शरण आए भक्त के, संकट हरतीं तुम तुरंत। सृष्टि-स्थिति-विनाश की, तुम्हीं आद्या मूल हो, नमन तुमको जगदंबे, तुम ही सिद्धि-अनुकूल हो। हुंकार उग्र प्रचंड माते! शत्रु-दल थर-थर काँपता, तेज ओजस्वी देख तेरा, काल भी पग नापता। अरि-कंठ-विदारण खड्ग चमके, असुर-मस्तक डोलते, जो बढ़े सुत की ओर कुदृष्टि, प्राण उसके बोलते। परम पावन सौम्य गौरी! अंच...
पितर पाख
आंचलिक बोली, कविता

पितर पाख

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) मरे पुरखा मन के बिकट आव-भगत होवत हे, जियत-जागत मनखे के कोनो नइ हे पुछारी। सरग के पहुना मन बर बरा अउ चीला बनत हे, घर के दाई-ददा मन बर नइ हे भात अउ पानी।। गोबर म लिपागे कुरिया के ओरिया अउ परछी, चाँउर पिसान के चउँक पुरागे सुग्घर सजे सिंगार। रंग-रंग के फूल-फलेता, पाना दसे हे ओरी-ओर, हूमहई म हूम ममहागे, कउँवा ह बने हे परुवार।। मुरदा मन के मान-गुन होथे, चढ़थे फूल के हार, कलप-कलप के जम्मो रोथें, सुरता के बाँधे गठरी। पितर मन के बंदगी करे ले तोला मिलही पितर, तँय भगवान ल सुमर, लमाके भक्ति के सुतरी।। जीते-जियत म सेवा कर, झन कर मरे के अगोरा, ओही मन भुइयाँ के देवता, मत भेज बुढ़वा घर। सियान मन के आरती उतार, चरन धो-धो के पी ले, घर ह बैकुंठ बनही, उँखर जीव जुड़ाही हर बछर।। परिचय : अशोक कुमार यादव निवासी : म...
मैं इस दौर के लिए नहीं बनी
कविता

मैं इस दौर के लिए नहीं बनी

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शायद मैं इस युग के लिए नहीं बनी या ये समय मेरा नहीं जहाँ लोग रिश्ते भूल जाते हैं मैं दिल से लगा लेती हूँ!! यहाँ खुद को साबित करने की होड़ मची है सही-गलत को तज कर स्वयं को ही धोखा दे लेते हैं मैं अकेले चलती रही अपने पर यकीन कर के कि शायद समय मेरा होगा कभी! लोग बातों को अनसुना कर "बाद मे बात करते हैं" कहकर भूल जाते हैं मैं उस "बाद" का इंतजार करती हूँ! सबके सपनों में इंद्रधनुषी रंग भरती रही जीवन भर मेरे सपने बेरंग ही रहे नहीं समझ पाई जीवन मे कभी! इस छोटे से जीवन मे अगले पल का अधिकार नहीं भविष्य के सपनों के लिए लोग रिश्तों को दांव पर लगा देते हैं कहते हैं हमसे, इतना कौन सोचता है शायद सच कहते हैं, पर मेरा दिल हर एहसास को ज्यादा ही महसूस करता है क्यूंकि मैं इस युग के लिए नहीं बनी!! ...
गणपति उत्सव
दोहा

गणपति उत्सव

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** गणपति उत्सव सुख लिए,बाँट रहा आनंद। मंगलकारी काज हर, अशुभ राह हर बंद।। गणपति जी की साधना, करते हैं जो नित्य। उनका जीवन हर समय, दमके ज्यों आदित्य।। सुख मिलते हर भक्त को, और सदा वरदान, प्रथमपूज्य की कृपा से, जीवन में लालित्य।। गणनायक आये जगत, ले उत्सव को संग। अमन-चैन के खिल गए, जग में चोखे रंग।। अंतर्मन में चेतना, दमक रहा उजियार। गणपति जी का आगमन, भाग रहा अँधियार।। रिद्धि-सिद्धि के संग में, रहें गजाननराज। मात-पिता के मान की, नित चोखी आवाज़।। गणपति पूजन हो रहा, मंगलकारी भाव। प्रथमपूज्य हे देव तुम, देना सच का ताव।। सदा बनाते ईश तुम, सबके बिगड़े काज। चमत्कार फिर से करो, सिद्धिविनायक आज।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मे...
माँ की महिमा
स्तुति

माँ की महिमा

शिवराज आनंद सोनपुर, सूरजपुर (छत्तीसगढ़) ******************** माँ! हम आए तेरी शरण में, नित छुएँ चरण, मम निवेदन स्वीकार करो! है यही भाव-भजन, मन लगी लगन, मम-जीवन निर्माण करो! हम सब बाल-पौधे माँ! तू माँ- माली साथ है। तू जननी! हम लाल, सब तेरे हाथ हैं॥ जग सृजनी! दे तू जैसी आकृति, सब तेरा उपहार है। हम सब कच्ची मिट्टी, तू सबका कुंभकार है॥ तू भू की रानी, तू अम्बर की न्यारी माँ। तुझमें बसी दुनिया सारी, तुझसे तर दुनिया सारी। हे स्नेहमयी माँ! तेरी गोद में हम हैं सोए, तुझ संग मिलकर हम हैं रोए। तेरे आँचल में हमने खेला! तेरे आँचल में हमने खाया! तूने हमें कहा-आँखों का तारा! हमने तुझे कहा-ध्रुव का तारा!! राम-कृष्ण, भीष्म- युधिष्ठिर तूने बनाया॥ सच है कि कर्ण-अर्जुन, बुद्ध-महावीर तूने ही बनाया। तेरी महिमा अपार माँ! तेरी महिमा अपार। हे नित्य माता! तूने ही...
पहले पाने का जुनून-सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी
व्यंग्य

पहले पाने का जुनून-सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आईफ़ोन १८ लॉन्च हो चुका है। अब प्रतीक्षा है कि भारत में उसे सबसे पहले किसने खरीदा। पिछली बार आईफ़ोन १७ के आगमन पर अंकुश गोयल जी ने रातभर स्टोर के बाहर डेरा डालकर यह गौरव अर्जित किया था। देश को उन पर एवरेस्ट विजय जैसा गर्व हुआ होगा। आखिर फोन खरीदना साधारण काम हो सकता है, लेकिन सबसे पहले खरीदना देश की शान में उसकी सहभागिता। पश्चिम को यह बेचैनी आईफ़ोन ने सिखाई होगी; हम भारतीय इसे जन्मजात लेकर आते हैं। हमें सबसे पहले पहुँचना, पाना, बताना, बाँटना और लूटना भी है। “सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी” गीत की पंक्ति नहीं, जीवन- पद्धति और जन्मसिद्ध अ-धिक्कार है। सड़क पर हमारी प्रतिभा दिखाई देती है। एम्बुलेंस सायरन बजाती निकले तो बाइकवीर इसे रास्ता देने का संकेत नहीं, दौड़ की चुनौती समझता है। वह घायल से ...
आंसू की एक बूंद-सी
कविता

आंसू की एक बूंद-सी

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* आंसू की एक बूंद-सी होती है बेटियां स्पर्श खुरदुरा हो, तो रोती है बेटियां रोशन करेगा बेटा, तो बस एक ही कूल को दो-दो कुलों की लाज ढोती है बेटियां कोई नहीं है एक दूजे से कम दोस्तों हीरा अगर है बेटा, तो मोती है बेटियां कांटों की राह ये खुद ही चलती रहेंगी औरों के लिए फूल बोती है बेटियां विधि का विधान है यही यही है दुनिया की रस्म मुट्ठी भर नीर-सी होती है बेटियां परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मानित घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स ...
है विश्व हमारा परिवार
कविता

है विश्व हमारा परिवार

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** हैं हम हिम्मती हिंदुस्तान वाले हैं हम गीता,वेद,पुराण वाले जो हम ठानते है जो हम मानते हैं वह कर डालते हैं तीन समंदर रख कर साथ में तिरंगा रख कर हाथ में चलते हैं हम ऐसे ही नहीं उबलते हैं हम ऐसे ही नहीं उछलते हैं हम है हृदय हमारा विशाल है हिंद हमारा विशाल देख अन्याय आता रक्त में उबाल है सारा संसार हमारा परिवार हैं हमारे उच्च संस्कार होते हैं हमारे हिंद में ईश्वर के अवतार करते हैं हम सब पर उपकार मानता है हमें सारा संसार है हमें सच्चाई से सदा प्यार बदल देंगे हम सारा संसार करके सत्कर्म बार बार। परिचय :-  सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' निवासी : गुदरी सिंह के टोला, पांडे पुर, बैरिया, बलिया, (उत्तरप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी ...
सच्चा शिक्षक
कविता

सच्चा शिक्षक

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मेरी जाति जानने के इच्छुक मेरे नन्हे विद्यार्थियों, अब मैं तुम्हें रोज नई बातें सिखाऊंगा, जाति-पांति जरूरी या मजबूरी नहीं बताऊंगा। लील चुकी है इस प्रश्न में छुपी भावनाएं कई अबोध और मासूम जिंदगियां, इसने समाज को केवल गरल ही दिया, विभाजन की दीवारों को अब मैं ढहाऊंगा। न मैं अगड़ा हूँ, न मैं पिछड़ा हूँ, न मैं किसी ऊंचे-नीचे भेद में बिखरा हूँ, मेरी कलम, मेरा ज्ञान ही मेरी पहचान है, तुम्हारे भविष्य को सँवारना ही मेरा ईमान है। तुम्हें किताबों के अक्षरों से आगे सोचना सिखाऊंगा, भेदभाव की इस संकीर्ण सोच से तुम्हें बचाऊंगा, मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है इस जहाँ में, तुम्हारे कोमल मनों में यही अलख जगाऊंगा। छोड़कर पीछे जात-पात के हर झूठे बंधन को, ज्ञान के प्रकाश से महकाऊंगा तुम्हारे जीवन को, कल...
सत्ता के सौदागर
कविता

सत्ता के सौदागर

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** सत्ता के सौदागर सदैव लाशों के ढेर लगाते हैं ईमान धर्म पिछले दरवाजे से कब के बाहर जाते हैं तिनके की आहट से भी सहम-सहम ये जाते हैं हिलती दिखे कुर्सी इनकी तो झट षड्यंत्र रचाते हैं साम,दाम,दंड भेद से खिचड़ी ऐसी पकाते हैं देख पैंतरे इनके विरोधी इनसे मात खाते हैं उजले वस्त्रों से चमक दमक करतब काले कर जाते हैं सत्ता के सौदागर सदैव लाशों के ढेर लगाते हैं सत्ता वो तोता है जिसमें इनके प्राण है अटके तोते की रक्षा में होते हैं इनके सारे लटके-झटके महत्वाकांक्षा में जो बाधा बने वे सदैव ही है खटके जब लगा दाव बिना चुके चेलों ने है गुरुओं को पटके जिसने पढा पाठ पटकन का वे ही सत्ता पाते हैं सत्ता के सौदागर सदैव लाशों के ढेर लगाते हैं अपना उल्लू सीधा कर ये वादे रोज भुलाते हैं एक बार जो जीत गया ...
श्री पार्वती शक्ति तांडव स्तुति
स्तुति

श्री पार्वती शक्ति तांडव स्तुति

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** जगज्जननी आदि शक्ति, आदि रूप धारिणी, महाकाली महालक्ष्मी, महासरस्वती रूपिणी। शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा कल्याणी, कूष्माण्डा स्कन्दमाता, कात्यायनी सुखदानी॥१॥ कालरात्रि महागौरी, सिद्धिदात्री वरप्रदा, नवदुर्गा नवशक्ति, सर्व सिद्धी दायिका। दक्षकन्या सती साध्वी, शिवप्रिया मनमोहिनी, पार्वती हिमवान पुत्री, सर्व मंगल कारिणी॥२॥ सिंह वाहिनी त्रिनेत्र धारी, महिषासुर मर्दिनी, धूम्रलोचन वधकारी, चण्ड-मुण्ड विनाशिनी। रक्तबीज संहारी माता, रौद्र रूप धारिणी, रणचण्डी महाकाली, काल सर्प गामिनी॥३॥ डमरू बाजे शंख बाजे, बाजे मृदंग झांझरी, तांडव नाचे आदि शक्ति, झुमे सकल सृष्टि री। पाद प्रहार कम्प धरणी, गगन गूंजे गर्जना, भयभीत देव दानव, करे विनीत प्रार्थना॥४॥ जय भवानी जय कल्याणी, जय जगदम्बा कालिका, बाल कृष...
गणपति महिमा
कविता

गणपति महिमा

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** गौरी नंद गणेश तुम्हारी महिमा सब से न्यारी है। पूरण कीजिए काज सभीके ये विनती हमारी है। गौरी नंद … महा गणपति रुप तुम्हारा श्रृष्टि तुम मे समाई है। हरे सभीके संकट तुमने जिस पर विपदा आई है। गौरी नंद … युद्ध रचाकर शिव से तुमने माँ का मान बढ़ाया है। कृपा हुई शिव की तुमपर गजमुख तुमने पाया है। गौरी नंद … एक दन्त दयावंत तुम्हारी मूषक बनी सवारी है। विघ्न हंता संकट मोचन छवि अति मनोहारी है। गौरी नंद … प्रथम पूज्य का पाकर वर गणनायक कहलाते हो। धन्य होता जीवन उसका जिसपर कृपा बरसाते हो। गौरी नंद … ज्ञान बुद्धि के तुम सरोवर तुमसा नहीं कोई दूजा है। हम तो है अज्ञानी मानव विधि न जाने क्या पूजा है। गौरी नंद … दर्शन की अभिलाषा लेकर द्वार तुम्हारे हम आये है। गंध पुष्प स्वीकार करो प्रभु श्रद्धा शीश झुकाये है। गौरी नंद … ...
कभी छोटी थी मैं
कविता

कभी छोटी थी मैं

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** जब छोटी सी हुआ करती थी मैं बहुत ज्यादा बाते किया करती थी पूरा घर सर पर उठाए रहती थी थोड़ा बड़ी हुई, सबने कहा थोड़ा कम बोला करो नासमझ थी समझ नहीं पाती थी कि, पहले तो मेरे बोलते रहने से सभी खुश हुआ करते थे अभी कह्ते है, कम बोला करो थोड़ा और बड़ी हुई, घर बदला लोग बदले बोलना अपने आप कम हो गया फिर भी डांट मिली मैं और भी चुप हो गई ना बोलने को लोगों ने बेवकूफ और मंद बुद्धि की उपमा मिली कभी कुछ बोलना चाहा तो जवाब मिला तुम जानती ही क्या हो तुम चुप रहो, बच्चे आए, बड़े हुए मैंने फिर बोलना शुरू किया किन्तु फिर से चुप करा दिया गया तुम चुप रहो, बुढ़ी हो गई हो कुछ याद नहीं रहता तुमको अब तुम आराम करो ! चुप रहते रहते आत्मा में कहीं सब कुछ दबा दबा सा रह गया है अब तो जाने का वक्त आ रहा है कुछ बोलूँ इसक...
पता है …
कविता

पता है …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* मन में कई बार कितना गुबार भरा होता है शब्दों का मगर होंठ ऐसे जमे होते हैं मानो सिल गए हों। आंखे इतनी बोझिल होती हैं आंसुओं के बोझ से कि सब धुंधला धुंधला सा नज़र आने लगता है लेकिन फिर भी एक बूंद भी मजाल क्या जो आंखों से कतरा बनकर बह जाए। कितनी कठोरता होती है उस तकलीफ में जिसे बस मौन रहकर सह लिया जाता है जिसमें मन को चीखें बस मन के अंदर ही किसी कोने में दबकर रह जाती हैं। जीवन में पीड़ाओं का होना आम बात है किंतु कुछ पीड़ाएं गहरे घाव के साथ हृदय को असहाय बना देती हैं कहते हैं कि व्यक्त करने से पीड़ा का बोझ कम हो जाता है मगर कुछ पीड़ाएं है जो बार बार दोहराने से हृदय को छलनी करती हैं आत्मा पर एक नया बोझ बन जाती हैं। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : ...
मोदी जी के जन्मदिवस पर
कविता

मोदी जी के जन्मदिवस पर

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** जिस मां ने ये लाल जना है, उन चरणों में नमन हमारा। ऐसा पालन किया पूत का, उसने सबकुछ राष्ट्र पे वारा। जिस मां ने... घर छोड़ा, परिवार भी छोड़ा, एक झोला ले निकल पड़ा वो। मानव सेवा ध्येय था उसका, उस पर ही बस अडिग रहा वो। ईश्वर रीझ गया सेवा से, प्रतिपल उसको दिया सहारा। जिस मां ने... आज *लाल* का जन्मदिवस है, सब मिल प्रभु से अरज लगाए। उसके सब संकल्प सफल हों, सभी विरोधी मुंह की खाएं। सबका साथ विकास सभी का, उसका है बस एक ही नारा। जिस मां ने... भारत विश्व गुरु बन जाए, ये बस *मोदी* कर सकता है। जो निष्काम भाव सेवक हो, उसके आगे जग झुकता है। *हीरा* मां तेरा सपूत है, नभमंडल में ध्रुव सा तारा। जिस मां ने... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मे...
डिजिटल इंडिया का डिजिटल टोल नाका
व्यंग्य

डिजिटल इंडिया का डिजिटल टोल नाका

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** डिजिटल इंडिया का डिजिटल टोल नाका या यूं कहिए कि आन लाइन पेमेंट कटौती में सरकार की डकैती। याद है २०१६-१७ वाला वो दौर? मोहल्ले के पान ठेले पर भी एक लड़का आकर स्टिकर चिपका जाता था - "PhonePe/Paytm/BHIM से पेमेंट करें"। चाय की टपरी, ऑटो वाला, सब्जी वाला, सबकी दुकान पर QR कोड ऐसे चमक रहा था जैसे भारत रत्न मिल गया हो। नारा था- कैशलेस बनो, देश बदलेगा। फ्री है, जीरो MDR है, कोई चार्ज नहीं। और हम बन भी गए। जेब में १० रुपये का सिक्का रखना भी हमने पिछड़ापन समझ लिया। अब कहानी का इंटरवल खत्म हुआ है, और सेकंड हाफ शुरू हो रहा है। सरकार और उसके थिंक-टैंक अब नया ज्ञान दे रहे हैं- UPI फ्री कैसे हो सकता है? सर्वर का खर्चा है, मेंटेनेंस है, NPCI को भी तो कमाना है। अरे? NPCI? वो संस्था जो खुद सालाना १००० करोड़ से ज्यादा के मुनाफे में बैठी ...
थोथे सारे वादे निकले
गीत

थोथे सारे वादे निकले

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** थोथे सारे वादे निकले, सच्चाई के लाले। आँखों बँधी लोभ की पट्टी, होते नित घोटाले।। उबड़-खाबड़ सड़क कोसती, व्यस्त सभी चौराहे। करें डामरीकरण प्रदर्शन, नाटक जब जी चाहे।। मन में क्षोभ हज़ारों लेकिन, ख़ुद ही दुश्मन पाले। टौल-टैक्स भारी ले-लेकर भरते रोज़ ख़ज़ाने। सड़क सुधरती कागज़ पर ही, काम सभी मनमाने।। सच्चाई पर मौन भीष्म बन, काम करें सब काले। दुर्घटनाएँ होतीं प्रतिदिन, रोतीं हैं माताएँ। थोड़े दिन आन्दोलन होते, चक्रव्यूह रचनाएँ।। अंधी नगरी चौपट राजा, बुनता रहता जाले। औरँगज़ेबी आदेशों से, दिल पर चले कुल्हाड़ी। गहरी चोट कुशासन देता, उलट-पुलट हर गाड़ी।। बस नीलामी आदर्शों की करते टोपी वाले। परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. ...
हिंदी से मेरी बातचीत
कविता

हिंदी से मेरी बातचीत

चित्रलेखा व्यास कानोड़, उदयपुर (राजस्थान) ******************** मैंने पूछा- “हिंदी! कहो, क्या तुम्हें कभी राष्ट्रभाषा कहा जाएगा?” वह मुस्कुराई- “नहीं, अभी तो मेरे हिस्से में बस प्रतीक्षा का वनवास है।” मैंने फिर पूछा- “फिर तुम्हारा भविष्य क्या है, कहाँ तक जाएगी तुम?” बोली- “जहाँ तक अपनी मिट्टी की गंध को संजोए मनुष्य जाएगा, मैं भी वहीं रहूँगी।” संस्कृत की गोद से निकली, प्राकृत की गलियों में पली, अपभ्रंश की देहरी लाँघकर, जन-जन की वाणी बनी, कबीर की साखी और तुलसी के मानस में ढलकर। पर सत्ता के गलियारों में पराई चमक ने जब अपना सिंहासन सजाया, तब अपने ही घर में मुझे कभी-कभी मौन, उपेक्षित और विस्मृत पाया। मैंने पूछा- “हिंदी, तुम बीच राह में कहाँ गुम हो गई थीं?” वह बोली- “गुम नहीं हुई थी, तुम्हारी ज़ुबानों पर चुपचाप जीवित थी।” “तुमने मुझे बाज़ार में छोड़ा...
चुनावी मौसम
कविता

चुनावी मौसम

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** चुनाव आया, मौसम बदला, नेता जी का चेहरा चमका। कल तक जनता याद न थी, आज हर घर में रिश्ता पक्का। हाथ जोड़कर नेता बोले “आप ही मेरे माई-बाप!” पाँच साल तक फोन न उठाया, अब रोज़ पूछें—“कैसे हैं आप?” घोषणाओं की ऐसी बारिश, बादल भी शरमा जाएँ, हर गली में पुल बन जाएँगे, बस नदियाँ खोजी जाएँ। बेरोज़गार को नौकरी देंगे, किसान की किस्मत बदलेंगे, महँगाई को दूर भगाकर सपनों में भी दाम घटेंगे। भाषण में बिजली चौबीस घंटे, सड़कें होंगी चकाचक, नेता जी के भाषण सुनकर जनता बोले“वाह! क्या पटकथा!” पोस्टर में मुस्कान बड़ी है, वादों का आकार निराला, वोट पड़ते ही जनता ढूँढे “अरे, नेता जी कहाँ गए भला?” फिर पाँच बरस बाद अचानक फिर से दर्शन हो जाते हैं, जो कल तक थे “जनसेवक”, आज फिर “सेवक” हो जाते हैं। ...