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विश्वास के रंग
कविता

विश्वास के रंग

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** जीवन क्या है..? जीवन का दूसरा नाम है विश्वास जब टूटता है विश्वास टूट जाता है स्वयं इन्सान और तोड़ता है विश्वास मन का शक मन का भ्रम मनगढंत गलतफहमियां शक जब सुलगाता है मन उठता है शक का धुंआ सोच लिपटी रहती है इस धुंए में पनपती है कुंठा जो पनपाती है अविश्वास.... जब पनपने लगे अविश्वास मन सोचता है हर गलत को सही और सही को गलत तब... बदलने लगती है सोच बदली सोच करती है मन भ्रमित भ्रमित मन बदलता चलने की दिशा और... बदल जाती है परिस्थितियां.... बदलते ही परिस्थितियां छाने लगते हैं बादल संकट के और... इन्हीं मेघों की बरसात कर देता है जीना दूभर कुतर्क पर उतर आते हैं मन और मष्तिष्क उलट जाते हैं कर्म जो उलट देते हैं परिणाम.... जीने के लिए जीतना होता है विश्वास कहीं किसी ने जीता है तर...
शाखा से टुटे पत्ते सी
कविता

शाखा से टुटे पत्ते सी

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** न जाने कब मन समन्दर की गहराई कम हो और हम कही खो जाए लहरो मे सोचने जुबा खोलने होता नही ओस बून्दो का आभास ओस तो पिधलती है, लुटती है केवल पत्तो के लिए। क्या तुम पिधलकर जम जाओगी ओस सी या ओस सी लुटकर अपनी सुन्दरता बिखेरोगी सिर्फ मैरे लिए क्यो की मै क्योंकि मै शाख से टुटे पत्तो के समान घरा पर गिरी सी परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंद...
रंगत से अधिक संगत को संभालिए
कविता

रंगत से अधिक संगत को संभालिए

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** रंगत तो पल में बदल जाए, संगत जीवन गढ़ जाती है, अच्छे लोगों की छाया में, किस्मत भी मुस्काती है। रंगत चेहरे की धूप-छाँव, समय के संग ढल जाती है, संगत सच्ची मिल जाए तो, राह नई बन जाती हैl रंगत बाहरी चमक-दमक, मन को कहाँ सजाती है, संगत सच्ची हो अगर, आत्मा भी महक जाती है। रंगत झूठी दिखावा है, जो क्षण भर में मिट जाती है, संगत सच्ची दीपक बन, हर अंधेरा हर जाती है। रंगत से मत धोखा खाना, यह तो आँख भरमाती है, संगत की पहचान करो, यही राह दिखलाती है। रंगत से रिश्ते ना जोड़ो, ये अक्सर टूट जाते हैं, संगत सच्ची निभ जाए तो, जीवन फूल खिलाते हैं। रंगत चाहे जैसी हो, दिल को क्या समझाती है, संगत अच्छी हो तो जीवन, खुशियों से भर जाती है। रंगत के पीछे भागे जो, अक्सर पछताते हैं, संगत सही चुनने वाले, मंजिल तक जात...
पहली पाती प्रेम की
कविता

पहली पाती प्रेम की

माधवी तारे लंदन ******************** सुनते-सुनते गजल जगजीत की याद आई पहली पाती प्रेम की गुणों के बखान भर से कृष्ण को रुक्मिणी ने लिख भेजी बात मन की काल बदला हाल भी प्यार की न अब बात भी देखने की खूबसूरती बात कहां अब प्यार की इसे छोड़ उसे पकड़ फिर भी स्नेह की नहीं खबर इस शिप से उस शिप में जाती रहती आज की जेन ज़ी प्रेम के सुनहरे रंगों में हम जी रहे हैं पतझड़ को हम प्रेम की पाती फिर भी मन में पहली धक-धक, पहली याद गहरे कहीं अब अपने साथ आज की बात हलांकि कुछ और ही प्यार व्यार सब व्यापार प्यार बचा सिर्फ शब्द भावनाएं खो गई कहीं परिचय :-  माधवी तारे वर्तमान निवास : लंदन मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) अध्यक्ष : अंतर्राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच (लन्दन शाखा) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक क...
एक माँ की कसक
लघुकथा

एक माँ की कसक

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** रोहित शर्मा, एक सम्मानित व्यवसायी, ने अपनी तेइस वर्षीय बेटी आन्या का रिश्ता एक ऐसे संपन्न संयुक्त परिवार में तय कर दिया था, जो अपने फलते-फूलते व्यापार साम्राज्य के लिए मशहूर था। उनके लिए यह किसी सपने जैसा रिश्ता था- सुरक्षा, प्रतिष्ठा और मान-सम्मान, सब एक ही प्रस्ताव में समाए हुए। कॉलेज से नई-नई निकली आन्या बेहद उत्साहित थी। भव्य समारोह, महंगे तोहफ़े और बड़े परिवार में कदम रखने का ख्याल उसके लिए किसी रोमांच से कम नहीं था। उसने मासूमियत से कहा- “माँ, वहाँ तो मेरे पास हमेशा कज़िन्स रहेंगे! मुझे कभी अकेलापन नहीं लगेगा। उनका इतना बड़ा बंगला है मां… ढेर सारे नौकरानी-नौकर हैं तो काम की भी दिक्कत नहीं होगी।” उसकी आँखों में मासूम चमक थी। पर माँ, मीरा अनुभवी थी, उसके चेहरे की मुस्कान गायब थी। उसने उस परिवार के बारे में बड़े किस्से सुने थे- जह...
आज के दौर में
कविता

आज के दौर में

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** आज भरोसा उन पे करो जो दुश्मन है, जान का खतरा उनसे है जो जीवन है, दुश्मन तो सदा सावधान ही रखता है, जहर पिलाएगा वही जो संघ चखता है, पता नहीं चलता कब वो किसे पैसे खिला दे, मीठापन वो इतना करे के जहर बना दे, कुटिलता तो छुप जाती है अब मुस्कानों पे, न करो भरोसा अपनों पर कब राज बता दे, अकेले जी लेने का हुनर पैदा कर लो, दया, मोह और भावों का भी सौदा कर लो, टांग खींचेंगे जितने ज्यादा अपने रहेंगे, घर का कुत्ता भौंक भौंक तुझे कुत्ता कहेंगे, भूल के न भाई पर कभी एतबार भी करना, खुद से ज्यादा कभी किसी को प्यार न करना, राज, पाठ और धन के लिए क्या क्या होता है, आंख मूंद भरोसा करने वाला सब कुछ खोता है, चढ़के फांसी पर न अपना तुम प्राण निकालो, हो मरने की जल्दी तो रिश्तेदार बुला लो, आज के दौर में कहां ...
राम जन्म के आनंद में
गीत

राम जन्म के आनंद में

महेश बड़सरे राजपूत इंद्र इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आया है आया है राम जन्म उत्सव २... दिखलाया है दिखलाया है सनातनी वैभव 2... राम जन्म के आनंद में, रंग-रंग के फूल खिले। छोटा-बड़ा नही है कोई, एक दूजे से गले मिले।। उत्साह और उल्लास भरा, भाव सभी में छाया है.... आया है आया है राम जन्म उत्सव २ ... बाल वृद्ध और बहनें करते, रामचरित का पारायन। गली मोहल्ले गूंजे जयकारे, राम नाम का हो गुंजन।। प्यारा नाम रामचन्द्र का, सकल विश्व को भाया है..... आया है आया है राम जन्म उत्सव २ ... जब थे राघव प्रकट हुए, अवध बन गया साकेत धाम। देवी देवता आ प्रगटे थे, अदृश्य रूप में करने प्रणाम।। देख हरी को शिशु रूप में, बैकुंठ लोक मुसकाया है..... आया है आया है राम जन्म उत्सव २ ... भोगवाद की चकाचौंध में, मत फंसना ओ मतवालों। रखना है आदर्श राम का, ओ संस्कृति के रखवालो...
संकल्पों की फुलवारी
गीत

संकल्पों की फुलवारी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** कुलवंती दयमंती है वह घर की लक्ष्मी हर नारी। तीनों लोकों में यश उसका सारा जग है बलिहारी।। उर विशाल माँ दुर्गा जैसा, जगजननी कहलाती है। जन्मे गर्भ से देवता हैं, धरती स्वर्ग बनाती है।। साहस करुणा की हे देवी, अभिनंदन है अवतारी। आशा है विश्वास वही है, दिव्य शक्ति है कल्याणी। जगत् को संजीवनी देती, मधुरस पूरित है वाणी।। सब रूपों में पूजित नारी, देखो सब पर है भारी। अपना धर्म निभाती हँसकर, पीर जगत् की हरती है। कर्म करे श्रद्धा से अपना, धरा उर्वरा करती है।। चहुँदिशि जय-जयकार उसी की, संकल्पों की फुलवारी। कीर्तिमान नित नूतन रचती, ध्वजा प्रगति की फहराती। करती है उत्थान देश का, अंतरिक्ष तक वह जाती।। त्यागी लक्ष्मी स्वाभिमानिनी, दुर्गावती कहाँ हारी। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" न...
डायरी के पन्ने
कविता

डायरी के पन्ने

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** तुम उसे चुनना खुद के लिए जो तुम्हें पसंद हो मैं हर बार तुम्हें ही चुनूंगी। कभी जो मेरी याद आये, मेरी डायरी के पन्नों को पलट लेना जो बात जुबां कभी कह ना सकीं वो उन पन्ने में दिखाई देंगे।। कुछ शब्दों मे अधूरे सपने सजे होंगे, कुछ पन्नों में पाप-पुण्य का लेखा-जोखा होगा, उन्हीं पन्नों में कुछ शब्द, तुम्हें देखकर मुस्कुरायेंगे! सब कुछ बटोर पाऊँ इन कांपते हाथों में अब दम नहीं है, तुम कहोगे तो बीते पलों की दास्तान तुम्हें सुना दूंगी! जिंदगी किसे मिली है यहां सदा के लिए एक दिन हम सबकी सांसे थम जानी है! अगर कभी मूंद ली आंखे हमने वक्त के पहले, तो कुछ अधूरे कुछ पूरे के पन्नों को समझेगा कौन।। परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५...
नदी का समर्पण
कविता

नदी का समर्पण

अनिता राजेश गुप्ता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मैं बहती नदिया सी चंचल, तुम सागर से गंभीर प्रिये, मैं इठलाती कल-कल छल-छल करती, उमड़-घुमड़ कर आती तुम्हारे पास, मेरा लक्ष्य है सागर से मिलन, लेकिन नहीं भूली हूं मैं, पथ के ग्रामों और शहरों को, खेतों और खलिहानों को, इन सबको अपने जल से सींचती, जन-जन की मैं प्यास बुझाती, पहुंचती हूं अपने लक्ष्य तक, जहां सागर से मिलकर मुझे, एकाकार होना है, जहां न "मैं" हूं न "तुम" हो, बल्कि अब "मैं" व "तुम" दोनों मिलकर "हम" हैं। परिचय :- अनिता राजेश गुप्ता निवासी - इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक...
दिव्य शक्ति तांडव
स्तुति

दिव्य शक्ति तांडव

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** सत सृष्टि तांडव रचयिता, सत्यं स्वरूपं, शिव शक्तिं, कल्याणं कारणं, दिव्यं, शक्ति तांडव नमो नमः। नाट्यराजं, महाशक्ति, पार्वती कल्याणी, शुभंकारी, महाकाली, शक्ति तांडव नमो नमः॥१॥ ज्ञानं स्वरूपा, शक्ति रूपा, प्रेमं, शांति, अमृतं, अज्ञानं, विनाशं, दिव्यं, शक्ति तांडव नमो नमः। नृत्यं स्वरूपा, नृत्यं रूपा, नृत्यं, नृत्यं, नृत्यं, अज्ञानं, विनाशं, दिव्यं, शक्ति तांडव नमो नमः॥२॥ दिव्यं स्वरूपा, दिव्यं रूपा, दिव्यं, दिव्यं, दिव्यं, अज्ञानं, विनाशं, दिव्यं, शक्ति तांडव नमो नमः। शक्ति तांडव, शक्ति तांडव, शक्ति तांडव, शक्ति तांडव, अज्ञानं, विनाशं, दिव्यं, शक्ति तांडव नमो नमः॥३॥ ॐ नमः शिवायै च शिवायै च नमो नमः। परिचय :- बाल कृष्ण मिश्रा निवासी : रोहिणी, (दिल्ली) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सु...
रामजन्म भयो अवध में
गीत

रामजन्म भयो अवध में

आशा जाकड़ 'आस' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** चैत्र मास शुक्ल पक्ष शुभ नवमी आई, मध्यान बारह बजे शुभ समाचार लाई। अवनि से अंबर तक खूब ‌पुष्प है बरसाई। रामजन्म भयो अवध में खुशियांँ छाई।। रानी कौशल्या गोदी में ललनवा सुलाएं राजा दशरथ सिरहाने खड़े मंद मुस्काए कैकेई और सुमित्रा उनको दे रहे बधाई। राम जन्म भयो अवध में खुशियांँ छांई।। सखियांँ आवें, ताली बजा मंगलाचार गावें ढोलक बजाकर, हर्षित बधाई गीत गावें। नृप दशरथ बाँट रहे थाल भर-भर मिठाई। राम जन्म भयो अवध में खुशियांँ छाई।। समाचार सुन वशिष्ठ जी राजमहल आए राम की जन्म-कुंडली सबको सुनवाएं। हर्षित राजा वशिष्ठजी के चरणन पुजाई। राम जन्म भयो अवध में खुशियांँ छाई।। अयोध्या में सर्वत्र ढोल-ताशे बज रहे, घर-घर ढोलक, झांझ-मजीरे बज रहे। राजमहल द्वारे बज रही तुरई-शहनाई। राम जन्म भयो अवध खुशियांँ छाई।। बंदनवार सज रहे, मं...
लिखूंगा तुम्हारे लिए
कविता

लिखूंगा तुम्हारे लिए

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सोच रखा है लिखूंगा तुम्हारे लिए चंद महत्वपूर्ण पंक्तियां, मगर उबर लेने दो मुझे मेरी कुछ परेशान करती उलझनों से, अभी तामील कर रहा हूं आदेश अपने आप को मानने वाले विज्ञ जनों से, मेरा भी तो ये सपना है कि तुमसे बात करूं खुलकर, दुनियादारी के बीच रह क्या करना है अच्छी तरह समझा दूं मिलकर, होता है महसूस कि तू आकर्षित है मुझसे, पर मिलकर ही बताऊंगा कि मुझे क्या उम्मीद है तुमसे, उम्मीद हां वहीं उम्मीद जो लगाया था हमारे महापुरुषों ने हमसे, हमारे इस समाज से, जो उबर नहीं पा रहे घर, परिवार, हंसी और अपने आप से, जैसे मैं दूर जा चुका था उस राह से, गिरता जा रहा था खुद की निगाह से, अपनों को परेशानियों में देखना मुझे बिल्कुल भी गंवारा नहीं है, इस मिशन की राह में चलने के सिवा और कोई चारा नहीं है। ...
एक मुट्ठी आसमाँ
कविता

एक मुट्ठी आसमाँ

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** करो जागरण अंतर्मन का, मन संकल्प सजाओ। करना है जो कर ही डालो, रोग दूर कर जाओ।। बंधु ज़रा निज मन की बात मानकर तो देखो। एक मुट्ठी आसमाँ ज़रा हासिल कर तो देखो।। साहस का भाव निभाकर, संयम ह्दय जगाओ। करना है जो, कर ही डालो, मंज़िल को पा जाओ।। ख़ुद की कमियों को ज़रा ईमानदारी से लेखो। ज़रा, एक मुट्ठी आसमाँ हासिल कर तो देखो।। जीवटता से तो मार्ग स्वास्थ्य का मिल जाता है। सब कुछ होना, इक दिन हम में बल लाता है।। करना है जो, कर ही डालो, मंज़िल को पा जाओ।। ज़रा, एक मुट्ठी आसमाँ हासिल कर तो देखो।। रीति-नीति के पथ पर चल, मंगल को तो पाओ। अंधकार को परे हटाओ, हथेली पर नूर उगाओ।। इंसानी जज़्बातों को संग ले जीवन को लेखो। ज़रा, एक मुट्ठी आसमाँ हासिल कर तो देखो।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी...
सिलेंडर भैया
कविता

सिलेंडर भैया

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** सिलेंडर भैया आजकल बड़ी किल्लत मचाए, रसोई में जैसे सन्नाटा सा छाए। चूल्हे की हंसी अब कहीं खो सी गई, बिना तुम्हारे रसोई भी रो सी गई। भूखे से बर्तन खामोश पड़े हैं, जैसे सब सपने कहीं दूर खड़े हैं। आटे की लोई भी इंतजार में है, तवा भी जैसे किसी पुकार में है। रसोई की रानी अब उदास बैठी है, आंच बिना हर खुशबू रूठी है। चाय की चुस्की भी अधूरी लगती, सुबह की रौनक भी फीकी सी लगती। तुम बिन हर स्वाद अधूरा लगता, हर पकवान अब बेसूरा लगता। जल्दी आओ, रसोई में रंग भर दो, हर चेहरे पर फिर से उमंग भर दो। सिलेंडर भैया, अब देर न लगाओ, रसोई की खुशियों को फिर से लौटाओl परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश...
“कवि, कविता और वो …”- कवि शब्दशेखर ‘उन्मुक्त’
व्यंग्य

“कवि, कविता और वो …”- कवि शब्दशेखर ‘उन्मुक्त’

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** कवि के लिए कविता जैसे चौथ का चाँद, और कवि जैसे चकोर- एकटक निहारता हुआ अपनी कविता को... कविता ही उसकी ओढ़नी, बिछावन, सब कुछ। कवि महोदय की रातें और पत्नी की नींद के बीच छिड़ जाती है छंदों की जंग। बस दिख जाए कविता- विचारों के उमड़ते-घुमड़ते बादलों के बीच कहीं एक झलक मिल जाए, एक पूँछ सी ही नजर आ जाए, फिर तो खींच के निकाल लेंगे बाहर! कवि बेचारा, कविता का मारा- मारा-मारा फिरता है जंगल में। कविता जैसे बाघिन- दिखेगी तभी ‘साइटिंग’ होगी। ‘दिखेगी तनिक गम्म तो खाओ! कवि अपनी लेखनी की बंदूक ताने बस फिरता है दिखे कहीं, तो करे शिकार। पूरी कविता नहीं तो पूँछ ही मिल जाए, उसी को ले जाकर दिखा देंगे! कविता की पूँछ पकड़ना भी बहुत ही "कवियोचित", काम है, मित्र। इधर कवि से अग्निसमक्ष सात फेरे लेकर आयी वो ..यानी...
ज्ञान आलोक
कविता

ज्ञान आलोक

अमिता मराठे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ज्ञान आलोक में रखना कदम दिव्य कर्म करते रहना सहज। कर्तव्य पथ सदा रहे निर्मल संस्कार व्यवहार रहे सरल। कर्म कल्याणकारी अनुकूल अल्हादित ह्रदय रहे कोमल। ज्ञान आलोक में रखना कदम दिव्य कर्म करते रहना सहज उदित सूर्य नित्य देता प्रकाश सृष्टि को संतृप्त करना है काम। संस्कार में बसे व्यवहार साफ रवि की निःस्वार्थ अनवरत चाल। ज्ञान आलोक में रखना कदम दिव्य कर्म करते रहना सहज। कर्तव्य पथ पर चलते रहना ज्ञान गुणों का दान करना। मर्यादा व आज्ञाओं में रहना संतुष्ट मानव जीवन कहना। ज्ञान आलोक में रखना कदम दिव्य कर्म करते रहना सहज। दृढ़ता से निश्चय बुध्दि बने मनन चिंतन से पुष्प खिले। कर्म से प्रथम स्व उत्कर्ष करें स्व उत्कर्ष से नवनिर्माण करें। ज्ञान आलोक में रखना कदम दिव्य कर्म करते रहना सहज। परिचय :- अमि...
आज क्यों
गीत

आज क्यों

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** बात पर, आज क्यों, बंधु देखो अड़े। दुश्मनी, है बढ़ी, प्राण लेने खड़े।। है चकित, यह धरा, शांत आकाश है। रो रहे, खग सभी, हो रहा नाश है।। वीर जो, थे बहुत, पार्थ साथी थके। मित्र के, सारथी, क्रुद्ध होके रुके।। स्वार्थ में, क्रूर हो, वीर योद्धा लड़े। नित्य बम, फेंकते, दुष्ट शैतान हैं। ताकतें, चीख कर, ले रहीं जान हैं।। लक्ष्य है जीत का, बंध सब टूटते। उर चुभे, शूल हैं, बंधु हैं छूटते।। आज तो, शर्म से, वीर सारे गड़े। है नियति, यह निठुर, पार्थ भी जानते। भाग्य में, जो लिखा, वो हुआ मानते।। धर्म ही, कर्म है, युद्ध पर काल है। कौरवों, पाँडवों, का बुरा हाल है।। मर रहे, युद्ध में, आज छोटे बड़े। शक्ति पर, गर्व है, युद्ध थोपा नया। नाश है, त्रास दें, मूढ़ भूले दया।। रोक दो, युद्ध को, श्याम आधार हो। हो विजय...
क्या मिलता है मुफ्त में
कविता

क्या मिलता है मुफ्त में

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** ये हवा ये पानी, ये धूप ये जंगल पहाड़, नहीं कह सकते इसे मुफ्त का, हर जीव हर इंसान को ये प्रकृति की देन है, इनके अनुसार रहो ताउम्र सुख चैन है, बिना पानी सींचे कलियां भी नहीं खिलती, मांगो तो भी फ्री में गालियां भी नहीं मिलती, शतरंज के प्यादे, और नेताओं के वादे, बिना लाभ के नहीं होते, महीने भर का जगा, फिर साल पांच रहते सोते, ये चावल चना दे रहे मुफ्त का कहते, मगर हमारे करों के हिस्से इसमें छुपे रहते, शिक्षक बिना पैसे नहीं पढ़ाता, बिना पैसे आंतरिक व्यवस्था नहीं चल पाता, बिना वेतन मजदूर मजदूरी को नहीं जाता, बिना वेतन न्यायाधीश न्याय नहीं दे पाता, हर कर्म के पीछे स्वार्थ छुपा होता है, मजलूमों में भूख, गरीबी, दर्द छुपा होता है, सिर्फ बद्दुआ निःस्वार्थ लोग करते हैं प्रयुक्त, एक यही तो है ज...
आदत
कविता

आदत

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मुझ तुम संग रहने की आदत है। मुझ तुमसे बाते करने की आदत है। मुझ तुम संग सब कहने की आदत है। मुझ तुम संग जीने की आदत है। मुझ तुम संग हर लम्हा बीताने की आदत है। मुझ तुम संग मस्ती में खोने की आदत है। मुझ तुम संग मुस्कुराने की आदत है। मुझ तुम संग हर खामोसी कहने की आदत है। मुझ तुम संग हर गम भुलाने की आदत है। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्र...
ट्रंप पुराण
दोहा

ट्रंप पुराण

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** जो दशकों बनता रहा, सकल विश्व सिरमौर। शौर्य शस्त्रागार का, ठहरेगा किस ठौर।।। दुनिया के लघु देश फिर, जकड़न से आजाद। कम ज्यादा सामान का, खुशी कभी अवसाद।। विकास के सोपान की, जकड़ रखे कुछ देश। एटम बॉम्ब निर्माण से, बदल लिया परिवेश।। टैरिफ खौफ बढ़ा गया, छीना जग का चैन। उधर मुनाफा ही बढ़ा, तकते सारे नैन।। हमला भी ईरान पे, सतत चले जब बात। अकड़ ठसन में ट्रंप था, उल्टी पड़ गई लात।। काला सफेद झूठ सब, ट्रंप सोच के तर्क। केंद्र ही व्यापार है, साफ झलकता फर्क।। जब तक डॉन गिरी चली, खूब लिया आनंद। सहनशक्ति अब अन्य की, गले पड़ा है फंद।। जीवन डॉन उमर सदा, कुछ कड़ियों का तोड़। आस पास के देश भी, कभी नहीं रणछोड़।। धरा तुला कमजोर को, खूब दिखाई आंख। अस्त्र शस्त्र गिरवा दिए, दाबे उनको कांख।। भारत देश गिरफ्त में, आए कब...
इस चंचल मन को
गीत

इस चंचल मन को

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** हिरणी के इस चंचल मन को हवा वसंती महकाती। खिलता हरसिंगार चमन में, हम गाते गीत प्रभाती।। सौरभ सरिता उर में बहती, खिलती आशा की कलियाँ। पिया कहे सिंगार सलौना, चाहत में डूबी अँखियाँ।। यादें लेतीं हैं अँगड़ाईं, मुस्कानें सब मदमाती। प्रणय वल्लरी झूम रही है, अंग-अंग यौवन छाया। सजा कुंतलों पर गजरा है, देख मदन भी बौराया।। प्रेम तूलिका लिखती पाती, भेद खोलकर हर्षाती। प्रीति हमारी यह मधुमासी, प्रिय मधुर मुलाकातें हैं।। संबंधों के गठबंधन में, भ्रमरों की बारातें हैं।। मधुरस छलके तृषित अधर से, धड़कन -धड़कन इतराती। प्रियतम तेरी बनी मेनका, आशाएँ आलिंगन की। मन राधा बन बैठा व्याकुल, राह तके अनुमोदन की।। लगती आग मिलन की ऐसी, प्रेम क्षितिज में इठलाती। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवास...
परीक्षा
कविता

परीक्षा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** तन गई प्रत्यंचा, खींचा गया डोर, दागे जा रहे अक्षर-तीर चहुं ओर, लड़ रहे नन्हे योद्धा अदम्य साहस के साथ, अनजान अभी भी नैतिक-अनैतिक के व्यूह-पथ, अक्षरों के ये शर चीरते मन-मस्तिष्क की दीवार, फिर भी सजग हैं बच्चे, करने प्रत्युत्तर प्रहार, एकाग्रता का कवच ओढ़े, संकल्पों की ढाल लिए, क्षणिक विचलन भी यहाँ अंधकार के द्वार दिए, जीतना यह रण अनिवार्य, त्यागने होंगे संशय-संघार, हर बहाना, हर बाधा को रखना होगा दूर अपार, दुश्मन के वही पुराने दाँव, पर अब सुसज्जित है नई पीढ़ी, ज्ञान-शस्त्रों से सुसज्जित, लिख रही अपनी तकदीर नई, यह जंग लौटे हर वर्ष, प्रश्नों के जंजाल लिए, उत्तर बन कर काटना है हर संशय के जाल लिए, महायुद्ध अब भी जारी है, विजय-किला दृष्टि में साकार, पताका फहराने को साध रहे है...
खिड़की पर ठहरी धूप
कविता

खिड़की पर ठहरी धूप

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** नित ही, खिड़की पर ठहरी धूप बात करती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। खिड़की पर ठहरी धूप मुहब्बत को समेटे है। खिड़की पर ठहरी धूप भावनाओं को लपेटे है।। खिड़की पर ठहरी धूप हर पीर को हरती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। खिड़की पर ठहरी धूप अहसासों का दर्पण है। खिड़की पर ठहरी धूप में प्रीति का समर्पण है।। खिड़की पर ठहरी धूप विश्वासों को धरती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। खिड़की पर ठहरी धूप में तो प्रखर मुस्कान है। खिड़की पर ठहरी धूप में तो प्रबल अरमान है।। खिड़की पर ठहरी धूप अंतस में इस भरती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इ...
राम जन्मे कौशल्या के
भजन

राम जन्मे कौशल्या के

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** राम जन्मे कौशल्या के कैकई के भरत लाल सुमित्रा ने जाए लखन शत्रुघ्न जन्मे देखो अयोध्या धाम। राजा दशरथ प्रसन्न है दान करें धन धन्य, हीरा-मोती-माणक-पन्ना लूटा रहे दे थाल। नगरवासी थाल सजाये करें आरती दीप जलाएं, मन हरषे कौशल्या, केकई सुमित्रा ने भी देखो दो- दो लाल है जाये, दशरथ आंगन बटे बधाई सखिया देखो मंगल गान है गाये लाला के जनम की देखो बधाई गाये देखो बधाई गाये। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्र...