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अगर कभी हार मानने का मन करे
कविता

अगर कभी हार मानने का मन करे

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* एक बीज के बारे में सोचो जो धरती में बहुत गहरा दबा है अंधेरे से घिरा हुआ बिना जाने बस इंतज़ार कर रहा है। वो बढ़ने से पहले टूटता है देखने से पहले ऊपर की ओर बढ़ता है खालीपन को चीरते हुए आगे बढ़ता है उस पर भरोसा करके जिसे वो देख नहीं सकता। अंधेरा अंत नहीं है टूटना असफलता नहीं है इंतज़ार करना बेकार नहीं है कुछ नया आकार ले रहा है। अगर कभी हार मानने का मन करे तो अपने अंदर छिपे उस बीज के बारे में सोचो शायद अभी तुम्हें वो दिखाई न दे लेकिन हो सकता है तुम बनते जा रहे हो। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मान...
जंग जारी है
कविता

जंग जारी है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जंग जारी है... अंग्रेजों के चले जाने से ही खत्म नहीं हो जाती आजादी की लड़ाई, अभी भी भरे पड़े हैं इस देश के भीतर बहुत से अंग्रेज़परस्त लोग, व्यक्तिगत लालसा पाले लोग। लाखों हैं जिन्हें नहीं पता बमुश्किल मिली आजादी की कीमत, बुनियाद हिलाने बैठे हैं दीमक पर दीमक। हमें नहीं शिकायत वतन के शूरवीरों से, पर कैसे भूल जाएँ कि हो रहा है देश घायल भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, आतंकवाद और पाखंड जैसे तीरों से। शकुनि जैसे लोग चल रहे रह-रहकर चाल पर चाल, आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश हो रहा निढाल। बेरोजगारी बढ़ रही जैसे सुरसा का मुख, कौन सुने नौजवानों के दुख? स्वतंत्रता की जंग अभी भी जारी है, बाहर आ ही जाने है खबर किसकी देशद्रोहियों से गहरी यारी है। परिचय :-  र...
लोकतंत्र की पहली पाठशाला में लौटती रौनक
आलेख

लोकतंत्र की पहली पाठशाला में लौटती रौनक

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** संदर्भ छात्रसंघ चुनाव- विश्वविद्यालयों केवल डिग्रियाँ नही गढ़ते, वे राष्ट्र का भविष्य गढ़ते हैं। करीब नौ वर्षों के लंबे मौन के बाद मध्यप्रदेश के महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनावों की आहट फिर सुनाई दे रही है। कैंपस एक बार फिर जीवंत हैं। गलियारों में चुनावी नारों की गूंज है, कक्षाओं में प्रत्याशी विद्यार्थियों से संवाद कर रहे हैं,छात्र अपने भविष्य के प्रतिनिधियों पर चर्चा कर रहे हैं और परिसर का वातावरण लोकतांत्रिक ऊर्जा से भर उठा है। यह दृश्य केवल चुनावी गतिविधियों का नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक संस्कृति की वापसी का प्रतीक है, जिसकी शुरुआत शिक्षा संस्थानों से होती है। मेरे लिए यह दृश्य केवल वर्तमान नहीं, बल्कि स्मृतियों का भी हिस्सा है। छात्र जीवन के वे दिन अनायास ही सामने आ खड़े होते हैं, जब मैं स्वयं छात्रसंघ...
सतरंगी दुनिया- ३६
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३६

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** एक बात समझ में नहीं आ रही है कि सर में दर्द होता है तो उसे सरदर्द कहते हैं और अगर नाक में दर्द होगा तो उसे 'दर्दनाक' कहेंगे क्या? *हर दवा में एक्सपायरी डेट लिखी रहती है, पर शराब क्या अमृत है कि उसमें एक्सपायरी डेट नहीं लिखी रहती है। विश्व का सबसे बड़ा आश्चर्य- यहाँ 'लेबर रूम' में 'लेबर' नहीं रहते हैं।* एक लड़का बड़ी उम्र की औरत को बार-बार घूरकर देख रहा था तो उस औरत ने कहा-कुछ तो शर्म करो मैं तुम्हारी माँ की उम्र की हूँ। लड़के ने उत्तर दिया- मैं भी अपने लिए नहीं, अपने अब्बू के लिए लड़‌की देख रहा हूँ। जो चीज मन की शांति को छीन ले, उसे छोड़ देना ही समझदारी है-चाहे वह आदत हो, सोच हो या कोई रिश्ता। झूठे लोगों के मुँह मत लगिए, आप बहस में उनसे कभी जीत नहीं पाएंगे, क्योंकि यह कलियुग है। यहाँ सच अकेला चलता है और झूठ बारात लेक...
अधूरा सफर
कविता

अधूरा सफर

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** अधूरे सफर की अधूरी कहानी लिख रहा हूं मोहब्बत तो कभी मिली नहीं ग़म की दास्तान लिख रहा हूं। जीवन सफर में मिलते रहे जाने पहचाने चेहरे मगर हमराही कोई मिलकर भी मिला नहीं। सोचा था हमराही को हमसफर बनाकर सुनाऊंगा अपनी हर गम-ऐ-दास्तां सारी। मगर वक्त के तराजू पर हमराही हमसफर के मुकाम पर कभी पहुंचा ही नहीं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हे...
राखी और मायका
कविता

राखी और मायका

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** राखी आती है हर साल, पर हर साल मायके जाना कहाँ हो पाता है... कभी बच्चों की पढ़ाई, कभी घर की जिम्मेदारियाँ, कभी समय की कमी, तो कभी हालात रोक लेते हैं। भैया की कलाई तक राखी पहुँच जाती है, पर बेटी का मन आज भी मायके की देहरी पर बैठा रहता है। सब कहते हैं - "अब तो ससुराल ही तुम्हारा घर है" पर कोई ये नहीं समझता कि बेटियाँ मायका छोड़ती हैं, मायके से जुड़ी यादें नहीं... राखी के दिन सबसे ज़्यादा याद आता है वो आँगन, जहाँ भाई के साथ बचपन खेला था। परिचय :- इंदौर (मध्य प्रदेश) की निवासी अपने शब्दों की निर्झर बरखा करने वाली शशि चन्दन एक ग्रहणी का दायित्व निभाते हुए अपने अनछुए अनसुलझे एहसासों को अपनी लेखनी के माध्यम से स्याह रंग कोरे कागज़ पर उतारतीं हैं, जो उन्हें खुशियों के आसमानी रंग देते हैं। घोषणा पत्...
प्रकृति ईश्वर रुप
कविता

प्रकृति ईश्वर रुप

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** नीला अम्बर, सागर तल, मन करता है उड़ान। दिलों में ये ख़ुशियाँ लाये, ओठों पर मुस्कान । नीला अम्बर… प्रकृति का रुप अद्भुत, विविध इसकी पहचान। बिन मांगे करती है सबके जीवन का कल्याण। धरती उगले हीरे मोती ओर कई रत्नों की खान। भरणपोषण का भार उठा कर करती अन्न दान। नीला अम्बर… पेड़ पौधों देते हैं सब के जीवन को वायु प्राण। हरियाली में छुपा हुआ है औषधी का विज्ञान। छांव में बैठो वृक्षों के तो दूर हो जाती थकान। जल की वर्षा में भी सहायक इसका योगदान। नीला अम्बर… नदियाँ हमको सिखा रही है सदा रहे गतिमान। समाहित कर लेतीं सब कुछ सागर के समान। जल बिन जीवन होता न संभव जैसे रहे न मीन। जल जीवन के मूल तत्व में इसका प्रमुख स्थान। नीला अम्बर… सूरज करता सारे जन जीवन को उष्मा प्रदान। पकता अन्न न पाते भोजन रहता भूखा किस...
हम बागी बलिया वाले
कविता

हम बागी बलिया वाले

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** हम बागी बलिया वाले हम बागी बैरिया वाले हम गंगा के किनारे वाले हम घाघरा के किनारे वाले हम हिम्मत वाले हम कीमत वाले हमारे नस नस बहता स्वाभिमान है हम बागी बलिया वाले देते बलिदान हैं डर का कहीं नहीं नामोनिशान है स्वर्ग से ऊंचा हमारा स्वाभिमान है। परिचय :- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' निवासी : गुदरी सिंह के टोला, पांडे पुर, बैरिया, बलिया (उत्तरप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हम...
कृष्ण प्रेम और विश्वास
भजन

कृष्ण प्रेम और विश्वास

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हे कृष्ण तेरी पूजा, तन-मन से करती हूं। कुछ पास नहीं मेरा, बस नाम ही रखती हूं।।टेक।। सब अर्पण करती हूं, चरणों में तेरे माधव। जग भूला बिसरा सा, एक सपना सहती हूं। हे कृष्ण तेरी पूजा तन-मन से करती हूं।। तुम मात-पिता बंधु, और सखा हमारे हो। मत भूलो हमें जाना, तेरी याद में जीती हूं। हे कृष्ण तेरी पूजा तन-मन से करती हूं।। मन सूना-सूना है, संसार के सागर में। बस पार लगा देना, यही विनती करती हूं। हे कृष्ण तेरी पूजा तन-मन से करती हूं।। जब प्राण मेरा निकले, तुम सामने हो केशव। "आशा"है जीवन में, बस दीप ये रखती हूं। हे कृष्ण तेरी पूजा तन-मन से करती हूं।। कुछ पास नहीं मेरा, बस नाम ही रखती हूं।। परिचय : आशा शर्मा पति : श्रीहनुमान प्रसाद शर्मा निवासी : धरमपुरी सांवेर रोड इंदौर (मध्य प्रदेश) ...
मृत्यु
कविता

मृत्यु

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** क्यों तुमसे सब डरते हैं क्यों रोते हैं तुम आने पर तुमसे हैं जो सुखद शान्ति देता नहीं कोई जीवन भर। तुम असीम शांति दात्री अवसादों से दो मुक्ति तुम सम्बल हो जीवन जीने का तुमसे सीख धैर्य की। तुम पावन शान्त स्थिर जल सी तुम अट्टहास जीवन का जीवन की ज्वलंत मुर्ति तुम निरंन्तर चलायमान न रुकने वाली न मुड़ने वाली पगडंडी। तुम क्या हो, कुछ तो कहो कही तो दिखो क्यों है, तुम्हारी अदृश्य अनुभुति भय विषाद के साथ होता है आगमन तुम्हारा कुछ क्षण, दहलीज़ पर रुकतीं कब कैसे पता नहीं। कहीं नदी, पहाड़, झरनें, पगडंडी पर पतंग सी फड़फड़ाती आती या कहुं गिद्ध सी घात लगाती और, क्षण में विभत्स दृष्य दिखा स्वयं चुपचाप निकल जाती। क्यों करता नहीं कोई तूम्हारी अगवानी क्यों नहीं बान्थता तुम्हारे नाम का सेहरा तुम्हे, हां तुम्हें बु...
तिरंगे की महिमा
कविता

तिरंगे की महिमा

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** भारत की पहचान तिरंगा, त्याग और बलिदान तिरंगा, समृद्धि और प्रकृति है तिरंगा, हिंदुस्तानियों का मान और सम्मान तिरंगा। इस तिरंगे के खातिर कितने युद्ध किये सैना ने गुलामी की जंजीरों से मुक्त तिरंगा, बलिदानियों का मान तिरंगा शहीदों का सम्मान तिरंगा आन बान और शान तिरंगा गर्व और स्वाभिमान तिरंगा जान और जहान तिरंगा शक्ति और साहस से तिरंगा, कुछ कर गुजरने की प्रेरणा है तिरंगा। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहि...
नागपंचमी
दोहा

नागपंचमी

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** नाग देव की वंदना, का जो दिवस महान। नागपंचमी नाम है, लें सब ही यह जान।। नाग देव को पूजना, देता शुभ परिणाम। शिवजी का जो अंश है, मंगलमय आयाम।। सावन का महिना फलित, शुक्ल पंचमी जान। पूजेगा जो नाग को, पायेगा वरदान।। करो दूध अर्पित उसे, लो झुककर शुभ भाव। नाग नहीं काटे कभी, बना रहे सत् ताव।। नागपंचमी पर्व पर, तवा चढ़े नहिं आँच। परंपरा के मान को, लो सारे ही बाँच।। पुरी औ' हलुआ भखो, लगे प्रेम से भोग। मन प्रसन्न होगा सदा, भागेगा हर रोग।। नागपंचमी पर लगें, मेले और दुकान। श्रद्धा का हो भाव तो, पूरे हों अरमान।। नागपंचमी वर्ष में, आती है इक बार। पर दे जाती है हमें, खुशियों का संसार।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) ...
ओढ़ ली खामोशी मैंने
कविता

ओढ़ ली खामोशी मैंने

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** ओढ़ ली खामोशी मैंने, किसी हथियार के रूप में नहीं, बस अपने बचाव के लिए, महसूस हो रहे दुराव के लिए, करता रहा अब तक निर्देशित सबको, नास्तिक मन द्वारा मान चुके, अपने परिवार रूपी रब को, पर अब निर्देशन किसी को सुहाता नहीं है, मेरी मौजूदगी भी किसी को सुहाता नहीं है, चकित हूँ अचानक से आए मेहमान के लिए, जिसने एकांत का यह कमरा सजा दिया, और मेरी ही महफ़िल में मुझे पराया बना दिया, वक्त बदला तो रिश्तों के मायने बदल गए, जो कभी साए थे, वो धूप बनके ढल गए, मेरी हर सलाह अब इक दीवार सी लगती है, अपनों के बीच भी यह जिंदगी बीमार सी लगती है, शब्द थक चुके हैं अब मिन्नतें करते-करते, थक गया हूँ मैं भी अंदर ही अंदर मरते-मरते, इसलिए अब मैंने चुप रहने का हुनर सीख लिया, शिकायतों के पन्नों को भीतर ही भ...
आलमारियों का दर्शन शास्त्र
व्यंग्य

आलमारियों का दर्शन शास्त्र

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** वैवाहिक जीवन में सुख का सबसे सरल सूत्र मैं आपको बता देता हूँ, पत्नी के वॉलेट में पासवर्ड सहित एकप्लैटिनम क्रेडिट कार्ड रख दीजिए और घर में भरपूर आलमारियाँ बनवा दीजिए। या यूँ कहें कि घर नहीं, आलमारियों का ही घर बना दीजिए। वे सभी दंपत्ति सचमुच सुखी हैं, जिन्होंने मकान बनवाते समय पत्नी की आलमारी-दृष्टि को गंभीरता से लिया। डिज़ाइन पत्नी की पसंद का, ऊँचाई छत तक, और संख्या इतनी कि गिनती भूल जाए। दिन में दस बार डिज़ाइन बदलवाने पर यदि आप परेशान हो रहे हैं, तो समझ लीजिए आप अभी गृहस्थी के प्रारंभिक चरण में हैं। मेरे यहाँ तो दो आर्किटेक्ट केवल इस प्रश्न पर बदले जा चुके हैं कि “बाथरूम में आलमारी कैसे निकालें?” एक ने तो यह भी कह दिया कि ड्रॉइंग रूम में एक ही आलमारी काफी होगी। उस दिन से वह आर्किटेक्ट ह...
नित्य प्रात …
भजन

नित्य प्रात …

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** नित्य प्रात जोन भाव आ रहे, उनको मै लिपिबद्ध कर रहा। हनुमत है करुणा बरसाते, उनका मैं गुणगान कर रहा। नित्य प्रात... वो दयालु करुणा निधान हैं, प्रभु *राम* के सच्चे सेवक। वो ही मुक्ति मार्ग दिखलाते, भक्तों के है वो ही प्रेरक। जो श्रद्धा से शीश नवाते, उन पर ईश्वर कृपा कर रहा। नित्य प्रात... तू भी हनुमत के चरणों में, शीश झुकाकर उन्हें रिझा ले। *राम* नाम मुक्ति का साधन, बतलाते *वो* हृदय बसा ले। मान सका जो युक्ति को उनकी, वो बस उसमें मगन हो रहा। नित्य प्रात... हनुमत हैं प्रभु *राम* के सेवक, उनसे सेवक के गुण ले ले। राम नाम लेखन में लगकर, राम नाम श्वासों में बसा ले। जग माया से बच जाएगा, यदि तू प्रतिपल नाम जप रहा। नित्य प्रात... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मै...
सब्र
कविता

सब्र

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** निसंदेह सब्र के साथ सब कुछ सम्भल जाता है, किन्तु इस लंबे सफर में काफी कुछ छूट जाता है! मौन हो जाती हूँ निशब्द नहीं, आवाज भी आती है पर वाणी सुनाई नहीं देती भावनायें उबलती हैं किन्तु बहने नहीं देती शब्द भी आते हैं किन्तु लय नहीं। व्याख्या बन चुकी हूँ उस पुस्तक की जिसके पहले पन्ने पर प्रेम की परिभाषा लिखी है, अंतिम पन्ना आघात का, मध्यभाग में है जज़्बातों से खिलवाड़। भय नहीं की हार जाऊँगी, बस अब हार जीत की आस नहीं, आइना हूँ टूटती नहीं, सब्र से भरी हूँ टूट के बिखरने का डर है, किन्तु जीना छोड़ती नहीं, क्योंकि रचयिता ने रचा है जीवों का जीवन संवारने के लिए जीवन संग्राम में निमित्त बन इतिहास बनने के लिए!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी ...
मौसम की शरारत
कविता

मौसम की शरारत

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** मौसम ने की शरारत और बहारों ने पैगाम लिख दिया नभ से दूर चाँद आज देखो स्याह जुल्फों ने छिपा लिया पवन पालने झूले अरमान तारों को हँसना सिखा दिया बहना अल्हड़पन में झरनों को झरते नयनों ने सिखा दिया घंघरू खनक गजरे महक बहकना सुरों को सिखा दिया सतरंगी सपनों ने मन के हया में हिना का रंग मिला दिया खंजनी अखियों का जालिम वार हुश्न को कातिल बना दिया अधरों की छुअन से सरगम ने भँवरों को गाना सिखा दिया यौवन भार से झुकी देह ने शर्माना फूलों को सिखा दिया मिलना दिलों का चुपके-चुपके राज को राज रहना सिखा दिया पीहू पीहू करे प्रेम में मनवा प्रीत का उन्माद बढा दिया जमुना तट पर रास रचे फक्कड़ राधा माधव को मिला दिया दिन चढे चाहे रात ढले पल पल प्यार में बस गुजार दिया बिखरा रंग प्यार का ऐसा नफरत करना ...
पवित्र होती नदियां
कविता

पवित्र होती नदियां

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** नदियों में छोटी बड़ी नदियाँ पवित्र कहलाती ये नदियाँ आस्थाभक्ति की आत्मानदियाँ तृप्तकराती मानव को, नदियाँ।। नदियों में पवित्र, गंगा महानदी शिव की जटा से, बही गंगा नदी करते स्नान ध्यान, करते आचमन श्रद्धालु करते पूजा, मिलता शगुन।। मित्र श्रद्धालु भक्त बन्धु सह परिवार डुबकी लगाने को, सब रहते तैयार बहती गंगा की, जहाँ तेज जलधार आत्मसन्तुष्टि करातीगंगा, बून्द धार।। हर हर गंगे से गूँजता, गंगा का धाम गंगा नदी बही जहाँ, वही पुण्य धाम उमड़ता है बेसुमार, भक्तों का रैला भक्तिभावना में उमड़ता, गंगा मेला।। पिंडदान से,साही करते गंगा स्नान परम्परा में गंगा की पूजा होता ध्यान सगुन शान्ति में मिलती गंगा के धाम गंगा आरती गंगा स्तुति करते प्रणाम।। गंगा नदी बनी एक विकास का धाम गंगा एक पुण्य पवित्र मिलन स्थान भक्त पर्...
आदमी का व्यवहार
कविता

आदमी का व्यवहार

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** आदमी को समझना इतना आसान नहीं होता, चेहरा तो हर कोई पढ़ लेता है, लेकिन चेहरे के पीछे छिपे आदमी को पढ़ना हर किसी के बस की बात नहीं। वह मुस्कुराता है तो जरूरी नहीं कि भीतर खुश हो, कई बार मुस्कान भी दर्द छिपाने का सबसे सुंदर तरीका होती है। वह चुप रहता है तो जरूरी नहीं कि उसके पास कहने को कुछ नहीं, कभी-कभी बहुत कुछ कह देने के बाद आदमी चुप होना सीख जाता है। रिश्ते भी अजीब हैं- जब तक आदमी काम आता है, तब तक अपना है। जिस दिन उसके हाथ खाली हो जाएँ, उसी दिन कई रिश्तों की असलियत सामने आने लगती है। कुछ लोग आपके सुख में आपसे ज्यादा खुश दिखाई देंगे, लेकिन आपके दुख में उनकी व्यस्तताएँ अचानक बढ़ जाएँगी। कुछ लोग आपके आँसू देखकर कंधा नहीं देंगे, बस इतना पूछेंगे- "हुआ क्या?" ...
पुस्तक के प्रश्न
कविता

पुस्तक के प्रश्न

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** पुस्तकों की गोद सूनी हो चली है कि शब्द अब गर्भधारण नहीं करते, मशीनी मस्तिष्क की फसल आ रही है कि भाव अब सृजन का कारण नहीं लगते। पुस्तकालय की अलमारियां बांझ बन रही हैं, धूल की चादर ओढ़े, कोई दिलासा से सहलाते हाथ तारण नहीं बनते। तकनीक ही खुद से कलम बन रही है, शब्दकोश से शब्द चुनकर कविता गढ़ रही है। पुस्तकें ही प्रश्नचिन्ह बन खुद खड़ी हो रही हैं कि स्याही की बूंदों में अब विचारों के भाषण नहीं सजते, फिर भी कोई कोने में बैठा कागज़ काला करता है, भूखे पेट, गीली आँख से सच को शब्दों में भरता है। क्योंकि जब तक एक भी कलम रक्त से लिखेगी, पुस्तकों की गोद फिर से हरी-भरी होगी। परिचय :- सूर्यपाल नामदेव "चंचल" शिक्षा : एम ए अर्थशास्त्र , एम बी ए ( रिटेल मैनेजमेंट) व्यवसाय : उद्यमी, प्रबंधन सलाहकार, कवि, लेखक,...
तिरंगे की शान
कविता

तिरंगे की शान

रूपेश कुमार चैनपुर (बिहार) ******************** वतन की ख़ाक में जन्नत का सिलसिला देखा, हर एक वीर के लहू में मैंने हौसला देखा। तिरंगा जब भी खुली धूप में लहराता है, हर एक दिल में नया देश का हौसला देखा। न धर्म बाँट सका, न कभी ज़ुबाँ ने बाँटा, हमारी एकता में मैंने काफ़िला देखा। क़लम भी हाथ में हो, हाथ में हुनर भी रहे, यही तो देश के उजले कल का रास्ता देखा। बेटियाँ जब भी पढ़ीं, रोशन हुआ हर इक आँगन, उन्हीं के साथ बदलता हुआ फ़लसफ़ा देखा। खिलाड़ियों ने जहाँ तिरंगा ऊँचा कर दिखाया, वहीं भारत का चमकता हुआ हौसला देखा। न भ्रष्ट सोच रहे, न किसी से द्वेष रहे, यही स्वतंत्र भारत का आईना देखा। चलो प्रण आज यही, देश सबसे पहले हो, इसी विचार में भविष्य का उजाला देखा। दुआ है "हिंद" सदा अमन का चमन महके, हर एक दिल में तिरंगे का ही उजाला देखा। परिचय ...
सबल दाँव
गीतिका

सबल दाँव

भीमराव 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** बड़े दिनों के बाद अचानक, फोन किया है आज गाँव ने।। कुशल-क्षेम तो सब है लेकिन, सुबह-शाम कुहरा आ घेरे। चौतरफ़ा तांडव की खबरें, आकर सम्मुख आँख तरेरे।। भीतर का भय बढ़ा दिया पर, पक्के घर की घनी छाँव ने।। आवाजाही में बिजली के चिंताग्रस्त खड़ी हैं फसलें।। मोबाइल के बीहड़ में गुम, खोज रही है फ्यूचर नस्लें।। घर-घर मौन पत्र भेजा है चौपालों की काँव-काँव ने।। बैनर झंडों के झगड़े में, अलगू जुम्मन काँप रहे हैं। कितने दिन की गई दिहाड़ी, पोर-पोर पर नाप रहे हैं।। श्वास-श्वास में दहशत बोई, जमींदार के सबल दाँव ने।। परिचय :- भीमराव 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को ल...
स्वतंत्रता का उत्सव नहीं, कर्तव्य का संकल्प भी
आलेख

स्वतंत्रता का उत्सव नहीं, कर्तव्य का संकल्प भी

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** शहीदों के सपनों का भारत नारों से नहीं, नागरिकों के चरित्र और कर्म से बनेगा १५ अगस्त केवल तिरंगा फहराने,राष्ट्रगान गाने और देशभक्ति के नारों का दिन नहीं है। यह वह अवसर है, जब राष्ट्र को अपने अतीत के बलिदानों को स्मरण करते हुए वर्तमान का आत्ममंथन और भविष्य का संकल्प करना चाहिए। स्वतंत्रता हमें संघर्ष, त्याग और असंख्य बलिदानों के बाद मिली। इसलिए यह सवाल आज भी प्रासंगिक है कि जिस भारत का सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था, क्या हम उसके निर्माण की दिशा में उतनी ही ईमानदारी से आगे बढ़ रहे हैं? भगत सिंह का साहस, चंद्रशेखर आजाद का आत्मविश्वास, नेताजी सुभाष चंद्र बोस का राष्ट्रसमर्पण, महात्मा गांधी का सत्य-अहिंसा का मार्ग और सरदार पटेल की राष्ट्रीय एकता के प्रति प्रतिबद्धता केवल इतिहास के अध्याय नहीं हैं। वे स्वतंत...
सावन आया रे सखी
कविता

सावन आया रे सखी

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** देख सखी सावन आया रे, सावन की झड़ी संग, बूंद-बूंद मोती सजे। देख नजारा सावन खुद, महादेव को जल चढ़ाने आया। देख सखी बरसे सावन झूमके। बदरा भी ढोल बजाता आया। आराधना के तीज त्यौहारों से, चौमासा का मौसम आया। उमड़-घुमड़ घटा गरजे, बरसे सावन। नव-श्रंगार कर सखियां मिले, मन मोतियों से झूला सजाया। अमवा की डाली पर, उमंगों का झूला लहराया। खुशियों में सबका मन समाया। झरते झरने मन को रिझाया, कोयल ने भी गीत गुन गुनाया। पेड़ों की डाली झुक झुक जाए, हरियाली की बिछी चादर, धरा भी घूंघट उड़ाये। भीगे तन-मन, देख री सखी बरसे सावन। दिल झूम-झूम जाए, सावन आया रे सखी, सावन की घटाएं। बदरा भी ढोल बजाये। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्...
आदिवासी मूलनिवासी
कविता

आदिवासी मूलनिवासी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जल, जंगल और जमीन के असली मालिक, आपकी दुर्गति के कारण हैं खुद को सभ्य कहने वाले असभ्य, बर्बर, नोचकर संपत्ति बनाने वाले वो लोग जो आज भी लगे हैं अपनी उसी जुगत में, धर्म, संस्कृति, आविष्कार और विकास की बात करते हुए, ले आये हैं धरती को विनाश के कगार पर, एक दिन वे भी मारे जायेंगे अपनी अकड़ के साथ ही, और हां अपनी लालसा की सजा प्रकृति द्वारा दिलवाएंगे सभी जीवों को व धरतीपुत्रों को भी। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित कर...