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इंसान में भगवान समाए हैं
कविता

इंसान में भगवान समाए हैं

डॉ. रमेशचंद्र मालवीय इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हम मंदिर-मंदिर में भगवान ढूंढते हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। हम इधर-उधर ही भटकते रहते हैं अपनी ही उलझन में अटकते रहते हैं आशा और निराशाओं के झूले पर हम हर दिन-रात हीलटकते रहते हैं हम तीर्थ और धामों में घूम आए हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। हम नहीं जानते कि भगवान कहां है हम नहीं जानते उनकी पहचान कहां है कहते हैं कि वो कण-कण में समाया है लेकिन उनकी धरती-आसमान कहां है हम उनको मूर्तियों में सजाए हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। आखिर भगवान को हम कब पहचानेंगे वो हृदय में बसे है ऐसा हम कब मानेंगे हर इंसान के हृदय में भगवान विराजे हैं इंसान में है भगवान उसे हम कब जानेंगे हम पत्थर में ही भगवान को पाए हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। परिचय :- डॉ. रमेशचंद्र मालवीय निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषण...
मरुधरा रा मान-धणी
कविता

मरुधरा रा मान-धणी

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** (राजस्थानी भाषा) जेता-कूंपा री तलवार घणै, थर-थर कांपै बैरी सारा, मालदेव रा दाह्या-बायां, गूंज्या रण में जकां रा नारा। मारवाड़ री माटी रा वे, मान-बढावण हार, रण में जुंझार बण'र लाड्या, धरम रा राखां धार। चित्तौड़गढ़ रो ऊंचो धज, गौर-बादल री ओळखांण, रतन सिंह रा अंगरक्षक, राख्यो कुल-मर्यादा रो मांण। केसरिया बाना पेर'र वे, रण-खेत में कीनो प्रवेश, छाती ठोक'र मिटा दियो, दुश्मन रो अळगौ भेष। उदय सिंह रा ओजस्वी वे, जयमल-फत्ता अणखिला, चित्तौड़ री प्राचीर माथै, सावळ बण'र उभा खिला। धड़ लड्या अर शीश कड्या, पर पग पाचो नी दियो, वीरता री ओ मूंछ्याळी गाथा, इतिहास माथै लिख दियो। महोबा रा आन-बाण, आल्हा-ऊदल रो प्रताप, रण-भेरी बाज्या पछै, दुश्मन पावै घणो संताप। पृथ्वीराज सूं भिड्या रण में, ओ तो अजब खेल दिखाय...
सतरंगी दुनिया- ३१
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३१

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  एक कंजूस महिला ने अपनी वसीयत तैयार की, लिखा-मैं पुर्नजन्म में विश्वास करती हूँ, इसलिए यह वसीयत अपने नाम कर रही हूँ, ताकि मेरे द्वारा छोड़ी हुई सम्पत्ति अगले जन्म में मुझे ही मिले। बूंद-सा जीवन है इंसान का ? लेकिन अहंकार सागर से भी बड़ा है। *ये ज़िंदगी तब तक हल्की है, जब तक सारे बोझ माँ-बाप ने उठाए होते हैं।* केवल खून के रिश्ते ही महत्वपूर्ण नहीं होते। मुसीबत में हाथ थाम लेने से बड़ा कोई रिश्ता नहीं। सच बोलना तो दूर की बात, आजकल लोग सच सुनना भी पसंद नहीं करते हैं। नियंत्रण जरूरी है यदि आमदनी कम हो तो खर्चों पर और जानकारी कम हो तो शब्दों पर। *बहुत पढ़ाई कर ली, पर मैं भी कुछ सवाल हल नहीं कर पाया। यदि आपके पास इनके जवाब हों तो अवश्य बताइए-यदि भाड़ में जाना हो तो किससे जाय पैदल, आटो या रेलगाड़ी से ? यदि किसी के पाप का घड़ा भर...
जीवित रहने के मायने
कविता

जीवित रहने के मायने

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां देखा है मैंने लोगों को जीवित रहने के लिए करते हुए कवायद, दुआओं से लेकर अपने इष्ठों से करते खुशामद, धन, दौलत, जमीन, घर व बर्तन, सब बेच चाहते हैं रखना स्वस्थ अपना तन-मन, मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारों के साथ ही लगाते रहते हैं इस डॉक्टर से उस डॉक्टर के घर आंगन के निश दिन चक्कर, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक रूप से डटकर, सिर्फ बेहतर स्वास्थ्य के लिए, इनके तन-मन की पीड़ा किया जा सकता है महसूस, नजर आते कोई प्रसन्न तो लगते दिखते कई तो नाखुश, क्या नहीं आता होगा उनके मन में अपनी इह लीला समाप्त कर लेने का ख्याल, संघर्ष कर उबरने का मौका देता कुदरत बेमिसाल, तो बताओ अरबों खरबों के इस अमूल्य तन को समाप्त कर लेने के लिए हम खुदकुशी जैसा वाहियात कदम उठाएं क्यों, अपनी आंतरिक शक्ति को ...
बरखा की बहार
गीत

बरखा की बहार

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** ताल-तलैयां रीत गए थे नदियाँ भी थीं सूखी। बुझा-बुझा मन रहता था और काया भी थी रूखी।। बरखा की बूँदों से पर अब, मिला खुशी का खत है। बहुत दिनों के बाद सभी की खिली-खिली तबियत है।। कंठ शुष्क थे,जी घुटता था, बेचैनी मुस्काती। सारा आलम व्यथित हुआ था, साँसें भी थम जाती हरियाली धरती पर बिखरी, लगता सुखद सतत है। बहुत दिनों के बाद सभी की खिली-खिली तबियत है।। स्वेद बहा करता था निशिदिन पर अब जल साथी है। आसमान से अमिय बरसता, हर शय अब गाती है।। मौसम तो मनभावन लगता, हर पल उल्लासित है बहुत दिनों के बाद सभी की, खिली-खिली तबियत है।। बूँदें लाईं नवल सँदेशे, अमन-चैन के मेले। बच्चे नाव चलाते जल में, लिए हर्ष के रेले।। जीवन को नवरूप मिला, कृषक हुआ आनंदित है। बहुत दिनों के बाद सभी की खिली-खिली तबियत है।। परिचय ...
वंचनाओं की झड़ी है
गीत

वंचनाओं की झड़ी है

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** वंचनाओं की झड़ी है, दूर पर अपना ठिकाना। ढूँढ़ता बेचैन मन है, गीत मनभावन सुहाना।। भोर उजली है नहीं अब, घोर तम हर ओर छाया। पीर किसको हम बताएँ बन कुहासा स्वार्थ आया।। रोज बनती तालियाँ तक, अब शिकारी का निशाना। घाट सब सूने पड़े हैं, शांत है चौपाल देखो। हिल रही बुनियाद सारी, आ गया भूचाल देखो।। नफ़रतों के गिद्ध घूमें, सोच कर पग को बढ़ाना। पश्चिमी आँधी चली है, हो रही निष्पात डाली। धूल में संस्कार सब हैं, तरो रहा बस बैठ माली।। आज वसुधा भी विकल है, देख नूतन यह जमाना। गाँव का सौन्दर्य फीका, शाख - पीपल रोज कटती। वृद्ध तुलसी काँपती है, भींत घर की रोज़ फटती।। आह भरता मन मयूरा, भूल कर जीवन तराना। परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स...
आस्था की विजय: जब पंढरपुर में एक बालक के रक्षक बने स्वयं विट्ठल
संस्मरण

आस्था की विजय: जब पंढरपुर में एक बालक के रक्षक बने स्वयं विट्ठल

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** एक सत्य घटना पर आधारित संस्मरण एक पारिवारिक संस्मरण, जो बताता है कि श्रद्धा का सबसे बड़ा प्रमाण अनुभव होता है, भारत की सांस्कृतिक परंपरा में कुछ पर्व केवल तिथियाँ नहीं होते, वे लोकजीवन की आत्मा बन जाते हैं। आषाढ़ी एकादशी ऐसा ही एक महापर्व है, जो महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। इस दिन "पंढरपुर" स्थित भगवान श्रीविट्ठल-रुक्मिणी मंदिर में दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं। चंद्रभागा नदी में स्नान, हरिनाम, संकीर्तन, वारकरी परंपरा की पदयात्राएँ और"जय जय राम कृष्ण हरी" का अखंड घोष इस तीर्थ को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है। सदियों से यह विश्वास जीवित है कि पांडुरंग विट्ठल अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनते हैं। ऐसी ही आस्था से जुड़ा एक सत्य संस्मरण मध्य प्रदेश के देवास स...
स्त्री
कविता

स्त्री

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** सच में अगर हम कविता रचते स्त्री पर रचे वो प्रकृति का साक्षात् रूप होती कविता और स्त्री दोनों ही सृजन करती और दोनों के बिना तो यह धरती बंजर होने में देर नहीं लगती I कविता और स्त्री जगह पर तमाम मोहक रूपों में दिखती और हम अभिभूत होते जाते जीवन चक्र की भाति। परिचय : संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता : श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि : २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा : आय टी आय निवासी : मनावर, धार (मध्य प्रदेश) व्यवसाय : ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन : देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार पत्रों में निरंतर पत्र और रचनाओं का प्रकाशन, प्रकाशित काव्य कृति "दरवाजे पर दस्तक", खट्टे मीठे रिश्ते उपन्यास कनाडा-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व के ६५ रचनाकारों में लेखनीयता में सहभागिता सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी र...
भरोसा टूटे तो …
कविता

भरोसा टूटे तो …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* भरोसा टूटे तो एक दफ़ा फिर उठ खड़े होना साथी को बिना कोसे बिना कुछ कहे। दुनिया बहुत बड़ी है बहुत से लोग हैं, जो शायद तुम्हें ही ढूँढ़ रहे हों आशा के मोती एक बार फिर पिरो लेना और विश्वास की एक मज़बूत माला बना लेना। यह नितांत व्यक्तिगत है कि तुम फिर कभी किसी को न चाहो या अपना मन किसी और को सौंपने का साहस न कर सको लेकिन, यदि कभी लगे कि साथ की आवश्यकता है तो अपनी इस अनुभूति से लज्जित मत होना उसे आकार देना, एक और प्रतिमा गढ़ना जिसे 'प्रेम' कहा जाए जिसे 'साथ' पुकारा जाए जिसे फिर से खड़े हो जाने का पर्याय माना जा सके। एक बार स्वयं पर यह उपकार करना अपने नए सृजन पर गर्व करना कृतज्ञ रहना उस नए आदम के प्रति जो तुम्हारे अधरों की मुस्कान का कारण बना मन धीरे-धीरे रमेगा तुम थ...
बढ़ती जनसंख्या
कविता

बढ़ती जनसंख्या

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (११ जुलाई विश्व जनसंख्या दिवस) जनसंख्या में देश हमारा, विश्व में अव्वल होगा ! हम दो हमारे दो से इस समस्या का हल होगा !! बेटा-बेटी दोनों को समान शिक्षा व अधिकार दो हर परिवार का हो एक ही नारा हम दो हमारे दो !! बेटा की चाहत में अपने परिवार को ना बढ़ने दो शिक्षा, और संस्कार के लिए बच्चों को खूब पढ़ने दो !! भुखमरी और बेरोजगारी से लोगों की जान बचायेंगे ! छोटा परिवार के नारे को सच कर हम दिखायेंगे !! छोटा सा परिवार हमारा, खुशियाँ का आधार हैं ! मिल जुल कर हम रहते है यही हमारा प्यार है !! शिक्षा-दीक्षा देकर बच्चों को काबिल हम बनायेंगे ! अशिक्षा को दूर भगाकर, शिक्षा की अलख जगायेंगे !! बेटा-बेटी दोनों अच्छा उसमें ना तुम भेद करो ! बेटियाँ, बेटों से कम नहीं यह सच स्वीकार करो ...
किस बात का ग़ुरूर है
दोहा

किस बात का ग़ुरूर है

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** (दोहा उर्दू छंद) किस बात का ग़ुरूर है, चले न कोई साथ। सब मरने के बाद में, छूकर धोते हाथ।। ज़िंदग़ी एक वहम है, कर्मों का है खेल। सच तो है बस मौत ये, दुनिया है इक जेल।। कर्म सही तो सब सही, पटरी पर है रेल। बुरा भला कोई नहीं, क़ुदरत का सब खेल।। डॉक्टर और वैद्य को, सब कहते हैं भगवान। कुछ सौदागर लाश के, बेच रहे ईमान।। हिम्मत सब में है नहीं, सच कहने की बात। सच को सच कहता वही, जो सच पर दिन रात।। आज यहाॅं तो कल वहाॅं, जग में फिरे फ़क़ीर।। अच्छे दिन के आस में, नैनन बरसे नीर।। सच से फ़ुर्सत है नहीं, कैसे बोले झूठ। दुकान उसकी झूठ की, धन्था है मत रूठ।। भाग गया सलवार में, डर की ऐसी पीर। सबको योग सीखा रहा, कहता खुद को वीर।। फ़रियादी अब कर रहे, क़ातिल से फ़रियाद। बुज़दिल इतना मत बनो, सब...
भोले पंछी क़ैद किए सब
गीत

भोले पंछी क़ैद किए सब

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** भोले पंछी क़ैद किए सब, निर्मम हुआ शिकारी। पश्चिम की चलती आँधी में, पूनम रातें कारी।। गईं काल के मुँह निष्ठाएँ, चुप दर्शक भी सारे। अंतहीन पीड़ा मानव की, घूम रही मन मारे। प्रजातंत्र की बलिहारी है, सोते खद्दरधारी। रोज़ समस्या नई खड़ी है, हृदय करें नित क्रंदन। उल्टी चली हवाएँ सारी, मरता प्यासा मधुवन।। पत्थर ही पत्थर राहों में, तपती सड़कें सारी। रही बदलती नित्य नीतियाँ, लुटती है रजधानी। नारों का हर तरफ़ शोर है, करते सब मनमानी।। चौसर के खेलों पर अब भी, लगे दाँव पर नारी। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका स...
आसार
कविता

आसार

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मुझे नफ़रत ज़रा सोच समझ कर करना मोहब्बत होने के आसार होते हैं। मेरी बात औरों से ज़रा सोच समझ कर करना इश्क होने पर सब कुर्बान होते हैं। दिल की बात सोच समझ कर करना अपनों में भी कई गद्दार होते हैं। हमराही को हमसफर सोच समझकर बनाना धोखा मिलने के भी आसार होते हैं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाई...
सफलता की ओर
कविता

सफलता की ओर

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** विपदाओं से लड़कर, जय को तुम पा जाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। वरना कहते रह जाओगे, हाथ न कुछ आया। जो करना चाहा था, वो कर नहीं पाया।। विपदाएँ तो नित ही मंगलगान सुनाती हैं। संघर्षों के भावों को, वे रोज़ जगाती हैं। जीवन हो खुशहाल, यही सबकी है चाहत, जो डर जाता उसको ही,वे रोज़ सताती हैं। साहस से प्रियवर तुम तो पूरे भर जाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। वरना कहते रह जाओगे, हाथ न कुछ आया। जो करना चाहा था, वो कर नहीं पाया।। आपदाएँ कहती हैं बल को लेकर बढ़ना। एक नई गाथा को लेकर खुशियाँ गढ़ना। कभी न पीछे क़दम हटाना,कर्म यही है, अंधकार में उजियारे का वंदन करना। उल्लासित होकर प्रियवर मंगल बरसाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। वरना कहते रह जाओगे, हाथ न कुछ आया। जो करना चाहा था, वो कर नहीं पाया।।...
मैं नहीं मासूम या भोला
कविता

मैं नहीं मासूम या भोला

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मत कह मुझे सीधासाधा, भोला या मासूम, वक्त पड़े तो दिखा सकता हूँ अपना अनदेखा रौद्र रूप। कर लो जितनी मनमानियाँ करनी हैं, जो कर रहे हो, करते रहो, औरों के हिस्से छीनकर अपने महल सजाते रहो। मैं उस दिलासे में नहीं जीता कि ऊपर बैठा कोई देख रहा है, या कहीं छिपकर तुम्हारे कर्मों पर आँखें सेंक रहा है। जिस दिन मैंने देखना शुरू कर दिया, हिसाब लगाना शुरू कर दिया, उस दिन से उठ सकता है ऐसा सैलाब जो बड़े-बड़ों को बहा सकता है, सच, हकीकत और व्यवहार का आईना दिखा सकता है। मैं प्रारंभ से ही खोता आया हूँ जिसे तुमने सहेज रखा है डर, धमकी और दंभ के सहारे। मेरी चुप्पी मेरी कमजोरी नहीं, सहन करना कोई सीनाजोरी नहीं। जिस दिन अपने नुकसान की कीमत ठीक-ठीक आँक लूँगा, उखाड़ दूँगा तुम्हारी किस्मत और भाग्य की जड़ें। ...
ज्ञात नहीं
कविता

ज्ञात नहीं

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हमें लगता है शायद घाटी से घहराते नीचे आते पाषाण का अवसान हो गया परन्तु नहीं पाषाण के जीवन का आरम्भ है, यह उपर घाटी पर निश्तेज, निरीह, निश्चल, निर्विकल्प सा पडा वह बदलते मौसम के झंझावातों से झुकता हुआं पडा था अपनी जगह बनाएं हुएं एक कूप मणडुक की भांति परन्तु अब उसका भविष्य उज्जवल है सोचता है वह, हां वह सोचता है शायद देवो में पूजा जाऊं या किसी राजा की पहचान का प्रहरी बन जाऊं पर, पर उसे यह ज्ञात नहीं वर्तमान में मानव कितना कठोर है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं...
घूंघट की आड़
कविता

घूंघट की आड़

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** (श्रृंगार रस) घूंघट की आड़ में झुकीं वे मृगनयनी आँखें, लज्जा की चाँदनी में सजे अनगिनत मधुर सपने। पलकों की ओट में प्रेम का सागर लहराता, हर चितवन प्रियतम के मन में मधुर राग जगाता। सिंदूरी भोर-सा मुख, मुस्कानों का मधुमास, घूंघट की हर सिलवट में बसता जीवन का उल्लास। नयनों में नवजीवन के रंगीन चित्र सँवरे, हर धड़कन कहती- साथ रहें हम जन्मों-जन्म भरे। लाज से झुकी पलकें, अधरों पर मौन कहानी, मन में प्रीत के दीप जले, महकी जीवन-रानी। सपनों की डोली लेकर आई नव अनुरागिनी, स्नेह, समर्पण, विश्वास बनी घर-आँगन की रागिनी। घूंघट की आड़ नहीं, मन का अनुपम श्रृंगार, जहाँ प्रेम की भाषा बोले हर कोमल व्यवहार। जब उठे घूंघट की कोमल डोरी, मुस्काए सारा संसार, लज्जा, प्रेम और सौंदर्य मिल रच दें जीवन का मधुर त्योहार। परिचय :...
संविधान के आंसू
कविता

संविधान के आंसू

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** संविधान की परिभाषा ही जब नेता न अपना पाया संविधान की आत्मा को लहर लहर संसद में लहराया। अपहरण हुआ तब संविधान का जब मूलमंत्र 'समता' को दबा डाला दस वर्षों के आरक्षण, अल्पसंख्यक को वोटों का हथियार बना डाला। एक देश एक विधान से बना संविधान देश को तोड़ा जातिगत जनगणना ने कैसे 'समता' लागू हो कितना रक्षित है 'संविधान'? सत्तर वर्षों का आरक्षण भी गृहविहीन, भूखे प्यासे अधवसनों को भोजन पानी छत की छाया न दे पाया , न दे पाया नब्बे रखें जेब में अपने दस में निर्बल को बहलाया। लागू हो सब पर समान विधान इस धारणा से बना संविधान पर रिश्वत की लूट मची कहां आत्मा शपथ और निष्ठा की कहां बचा है संविधान??? भ्रष्टाचार विरोधी कानून कड़ा नही‌ कोई बनकर आया आतंकी, अधिवक्ताओं की सांठगांठ से गद्दार वकीलों के बल पर छो...
नित्य मन को मार कर के
कविता

नित्य मन को मार कर के

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** नित्य मन को मार कर के, और विष पी हम जिये हैं, शूल राहों में बिछे पर, घाव अपनों ने दिये हैं।। टूटती आशा कड़ी सब साँस भी बंधक बनी है। घुट रहा है दम धुँए से, मौत से अपनी ठनी है।। लीलता अजगर दुखों का, वेदना हिय में घनी है। टाट का बिस्तर जला सब, वारुणी जी भर पिये हैं।। उड़ गया है प्रीति-पंछी, छटपटाता है शिकारी। वासना का जाल जकड़ा, कर्म गीता देख हारी।। दाँव पर पत्नी लगाते, बैठ कर पागल जुआरी। है छलावा हर कदम पर, ओंठ दुष्टों ने सिये हैं।। दे रहा है जग चुनौती, रूठती भी है प्रभाती। है अँधेरा भी घनेरा, ये अमावश भी सताती।। तामसी हैं नृत्य करते, रोशनी आँखें चुराती। जूगनू भी करते शरारत, आस के बुझते दिये हैं। दोष किसका है कहें क्या, मौन बैठे हैं सितारे। आसुरी माया बढ़ी है, घात करते हैं सहारे।...
बेईमानों की ईमानदारी
व्यंग्य

बेईमानों की ईमानदारी

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** साधो, इस संसार में ईमानदारों की कोई कमी नहीं है। बस उन्हें पहचानने की दृष्टि चाहिए। लोग व्यर्थ कहते हैं कि ईमानदारी खत्म हो गई। सच तो यह है कि वह पहले से कहीं अधिक व्यवस्थित, प्रशिक्षित और प्रोफेशनल हो चुकी है। फर्क बस इतना है कि उसने अपना पता बदल लिया है। अब वह मंदिरों, दफ्तरों और उपदेशों में नहीं, सीधे बेईमानों की गोद में बैठती है। बेईमान आदमी अपने धंधे के प्रति अद्भुत निष्ठावान होता है। जो करेगा, खुलकर करेगा। उसे अपने चरित्र को लेकर कोई भ्रम नहीं होता। वह जानता है कि वह क्या है, क्यों है और किस दर पर उपलब्ध है। ऊपर वाले का भी पूरा ध्यान रखता है,एक परमात्मा और दूसरे वे, जो फाइलों के ऊपर बैठे हैं। चढ़ावे समय पर चढ़ते हैं, हिस्से नियम से पहुँचते हैं और साझेदारी इतनी पारदर्शी होती है कि क...
देव भूमि भारत
भजन

देव भूमि भारत

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** स्वर्ग सी सुंदर धरा भारत, अनेकों इसके प्रमाण है देव भूमि भारत माता पर, हम सब को अभिमान है स्वर्ग सी सुंदर … राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध के हुए यहाँ अवतार है सनातन की संस्कृति ही, इसका मुख्य आधार है सही राहों पर चले उसका, होता स्वप्न साकार है देव वाणी गीता का ज्ञान, सब धर्म ग्रंथ का सार है स्वर्ग सी सुंदर … पर्वत राज हिमालय, इस मात्र भूमि की शान है सन्त ,महात्मा तप कर, पाते आध्यात्मिक ज्ञान है हरी भरी वादियों में छुपा, औषधियों का विज्ञान है गंगा, यमुना, सरस्वती नदियों का उद्गम स्थान है स्वर्ग सी सुंदर … वीरों की जननी धरती, गाथा इतिहास में महान है मात्र भूमि की रक्षा में अपने, आहुति किए प्राण है अनेकों धर्म, अनेक भाषा, विशेषता की पहचान है भारत भूमि सारे जगत मे, यह सबसे पुण्य स्थान है स्वर्ग सी सुंद...
एक ज्योति जो आज भी भारत का पथ आलोकित कर रही है।
आलेख

एक ज्योति जो आज भी भारत का पथ आलोकित कर रही है।

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** कुछ तिथियाँ केवल इतिहास का हिस्सा नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना को झकझोरने वाली स्मृतियाँ बन जाती हैं। ४ जुलाई ऐसी ही एक तिथि है। वर्ष १९०२ के इसी दिन बेलूर मठ में एक युवा संन्यासी ने ध्यानावस्था में अपनी अंतिम सांस ली और महासमाधि को प्राप्त हुए। उनकी आयु मात्र उनतालीस वर्ष थी, किंतु उस अल्प जीवन में उन्होंने जो वैचारिक ज्योति प्रज्वलित की,वह आज भी भारत के पथ को आलोकित कर रही है। इसलिए स्वामी विवेकानंद जी की पुण्यतिथि केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिवस है। यह स्वयं से पूछने का दिन है कि क्या हम उस भारत के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं,जिसका स्वप्न स्वामी जी ने देखा था। महापुरुषों का जाना शून्य अवश्य छोड़ता है, किंतु यदि उनके विचार जीवित रहें तो वह शून्य निराशा नहीं बनता, प्रेरणा बन जाता...
सतरंगी दुनिया-३०
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया-३०

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  इस दुनिया में सिर्फ धोखा एवं धक्का ही मुफ्त में मिलता है, बाकी हर चीज की कीमत चुकानी पड़‌ती है। *देखिए हमारे देश की हालत- कचरा उठाने वाला अनपढ़‌ है और कचरा फेंकने वाले पढ़े-लिखे।* हर कोशिश में शायद सफलता नहीं मिल पाती है, लेकिन प्रत्येक सफलता का कारण कोशिश ही होती है। आपका लहज़ा बता देता है कि जुबान बोल रही है या पैसा। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि १०० में आने वाली पुलिस ११२ में आ रही है। कर्म वो चिठ्ठी है, जो कभी भी गलत पते पर नहीं पहुंचती है, जिसने भेजी है, उसी के पास लौटती है। *सुन लेने से कितने ही सवाल सुलझ जाते हैं और सुना देने से हम फिर वहीं उलझ जाते हैं।* अगर आप सोचते हैं, कि सब दु:ख दूर होने के बाद मन प्रसन्न होगा तो ये आपका वहम है...। मन प्रसन्न रखें, सब दु:ख स्वयं दूर हो जाएंगे। उन रिश्तों को टूटने दें, जिनकी वजह ...
कब आओगे नरसिंह
कविता

कब आओगे नरसिंह

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** कब आओगे असुर मारने ऐ प्रभुवर नरसिंह। तुम तो हो इंसाँ के रक्षक नित्य प्रखर नरसिंह। पाप आज बढ़ता ही जाता, झूठ विहँसता है, कब दिखलाओके इन सबको तुम हनकर नरसिंह। अंधकार अब हरसाता है, गंदापन फैला, नहीं बैठना तुम रस्ते में ऐ थककर नरसिंह। आज नारियाँ सिसक रही हैं, पीड़ा बहुत बड़ी, कब दुष्टों को मारोगे तुम अब बढ़कर नरसिंह। दुराचार फैला है बेहद, रोक नहीं कोई, हन जाओ दुष्टों को अब तुम ऐ आकर नरसिंह। धर्म रो रहा, सत्य बिलखता, खंडित नीति यहाँ, बतला दो तुम कब आओगे ऐ प्रभुवर नरसिंह। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जे...
बरखा का उपहार
कविता

बरखा का उपहार

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** मेघों से फिर अंबार भरा, रिमझिम हो रही फुहार। सकल धारा को है मिला, बरखा का यह उपहार। सोंधी माटी की खुशबू, फैल रही है चहुं ओर। जंगल में मंगल हुआ, थिरक रहे अब मोर। सारे बंधन को तोड़कर, नदिया बह रही स्वतंत्र। जल का विराट स्वरूप, दिखता यत्र तत्र सर्वत्र। रीते रीते सब भर गए, खेत और खलिहान। धान बुआई का फिर, शुरू हुआ अभियान। वर्षा की नन्ही बूंदों से, चहुंओर छाई हरियाली, कृषकों के घर आंगन में, फिरसे आई खुशियाली। प्यासी धरती की देखो, अब बुझ गई है प्यास। कुम्हलाए हुए वृक्षों में, फिर आई अब श्वास। दादुर औ पपीहा ने किया, फिर बरखा का आगाज धानी चुनरिया ओढ़कर, निखरी है वसुंधरा आज। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हि...