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हिंदी का गुरुत्व सम्मान
कविता

हिंदी का गुरुत्व सम्मान

डॉ. विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** हिंदी पर अभिमान हमको हिंदी शान में गोष्ठी कर लेना। मगर हिंदी दिवस मनाने जरूरी पहल अनूठी कर लेना। रस्साकसी के खेल जैसे राज्य भाषा हिंदी फसी पड़ी है। संस्कारित संस्कृत से उदित हिंदी भाषा महिमा बड़ी है। तुलसी भारतेंदु रचित संसार में हिंदी कोहिनूर जड़ी है। राष्ट्र आन बान शान जन गण मन वंदे मातरम गा लेना। हिंदी पर अभिमान हमको हिंदी शान में गोष्ठी कर लेना। मगर हिंदी दिवस मनाने जरूरी पहल अनूठी कर लेना। कुरीति दोहन शोषण की रचनाएं सर चढ़कर जो बोली। साहित्य कला कौशल से अन्याय जगत की डगर डोली। देश प्रेम के गीतों नारों ने गुलामी पटकथा गठान खोली। नवोदित सृजन लेखन में हिंदी संकल्प शक्ति जड़ लेना। हिंदी पर अभिमान हमको हिंदी शान में गोष्ठी कर लेना। मगर हिंदी दिवस मनाने जरूरी पहल अनूठी कर लेना। हिंदी दिवस शुद्ध हिंदी प्रेम ...
क्या डर …?
कविता

क्या डर …?

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** बरसात का मुझे क्या डर? जब नहीं है मेरा अपना घर जब हूं मैं सड़क पर जब हूं मैं फुटपाथ पर तो मुझे क्या डर है लुट जाने का? जब नहीं है छत मेरे ऊपर तो छत टूट जाने का क्या डर? कैसा डर? क्यों डर? परिचय :-  सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' निवासी : गुदरी सिंह के टोला, पांडे पुर, बैरिया, बलिया, (उत्तरप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को खोलकर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद...
सीट नंबर ७ : भारतीय रेल का अवैतनिक कार्यालय
व्यंग्य

सीट नंबर ७ : भारतीय रेल का अवैतनिक कार्यालय

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** भारतीय रेल में जब आप थर्ड एसी की टिकट बुक करते हैं तो आपसे बड़ी विनम्रता से पूछा जाता है, लोअर चाहिए या अपर, मिडिल चलेगी या साइड लोअर? यह प्रश्न लोकतंत्र का भ्रम पैदा करता है। असल में फैसला पहले ही हो चुका होता है। और अगर आपकी किस्मत ने ज़रा भी आपकी लेनी चाही है, तो वह फैसला होता है सीट नंबर ७ ... सीट नंबर ७ कोई साधारण सीट नहीं है। यह रेल व्यवस्था की काली स्याह आत्मा है। यह वही सीट है जो कोच के दरवाज़े से सटी होती है, जहाँ से पूरी बोगी की दुखती नब्ज़ गुजरती है। इसे देखकर लगता है कि रेलवे ने इसे यात्री के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था के दुरूपयोग के लिए बनाया है। अगर आपकी टिकट वेटिंग या आरएसी में रही है, तो समझ लीजिए कि आपका अंतिम पड़ाव यही सीट है। टीटी के लिए यह सीट पनौती नहीं, संभावनाओं क...
श्रीगणेश
कविता

श्रीगणेश

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा फतेहाबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) ******************** जय-जय श्रीगणेश मूषक वाहन, गजमुख दर्शन शुभ-सुख। रिद्धि -सिद्धि दाता लड्डू भोग लगाता।। जय-जय श्रीगणेश सर्व विघ्नहर्ता शुभ मंगल कर्ता। शिवसुत बुद्धिदाता प्रथमपूज्य वर दाता।। जय-जय श्रीगणेश गणनायक देवा स्वीकार करो सेवा। मां पार्वती के प्यारे सबके राजदुलारे।। जय-जय श्रीगणेश तुम्हीं सर्व सहारा लगा जय-जयकारा। प्रभु छवि उजियारी शुभ मंगलकारी।। परिचय :- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा निवासी : फतेहाबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को खोलकर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कव...
उम्र का तकाज़ा
कविता

उम्र का तकाज़ा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सफेद बालों को देखकर अपनी पत्नी से कह दिया कि अब तो तुम बूढ़ी हो रही हो, अपने आज में खो रही हो, उसने तपाक से कहा, बुढ़ापे की निशानी तुम पर भी बहुत भारी है, बताओ क्या करने की तैयारी है? मैंने हँसकर फिर धीमे से कहा, चाह रहा हूँ बच्चे बड़े हो जाएं, अपने पैरों पर खड़े हो जाएं, पर ये बड़े होना क्यों नहीं चाह रहे? समुद्र से भी गहरे जीवन को क्यों नहीं थाह रहे? बचपन की उस मासूम छांव में न जाने क्या ढूंढ रहे हैं, कागज़ की कश्तियों से अपनी खुशियों को मूंद रहे हैं, ज़िम्मेदारी के इस लंबे सफ़र से शायद ये थोड़े अनजान हैं, तभी तो खिलौनों की दुनिया में इनके बसते अभी प्राण हैं, चलो, वक़्त को अपनी रफ़्तार चलने दें, इनकी नादानियों को कुछ दिन और पलने दें, जब वक़्त का थपेड़ा आएगा, यह समंदर इन्हें खुद तैरना...
विश्व मंगल की कामना
आलेख

विश्व मंगल की कामना

माधवी तारे लंदन ******************** आज के समय में समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि युवा पीढ़ी का ध्यान सही दिशा में कैसे लगाया जाए। कई लोग विदेशी जीवनशैली को अपनाकर स्वयं को आधुनिक मानते हैं, किंतु इस कारण भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। हर घर में यह स्थिति दिखाई देती है कि कई बार वृद्धजनों की बात को युवा नहीं सुनते और दादा-दादी को पुराने जमाने का बता कर अनसुना कर देते हैं. लेकिन ऐसे समय में कई लोग और संस्थाएं ऐसी हैं जो हमारी सनातन परंपरा को बचाने के लिये सतत प्रयत्नशील हैं। महिलाओं और बच्चों को सुरक्षा देने के लिये ये संस्थाएं जी जान लगा कर काम कर रही हैं। ऐसी ही एक संस्था है विश्वमांगल्य उसके एक सम्मेलन में सौभाग्य से मुझे आमंत्रित किया गया था। मांगल्य जैसा संस्कृत शब्द पढ़ कर वैसे भी मेरी जाने की इच्छा प्रबल हो गई थी। संस्था के दस साल पूरे होने...
प्रधान सेवक मोदीजी
कविता

प्रधान सेवक मोदीजी

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** जिनको सब याद करें, जिनको सब प्यार करे, ऐसे यशस्वी मोदीजी को हर कोई लाइक करे। "क्यों ना" लाइक करे दुनिया? दुनिया मै प्यार लुटाया है, शांति के मसीहा, क्राँति के विपक्ष धार, हे सबको जोड़ सबको परख कर हाथ बढ़ाया दोस्ती का। भारत को सोने की चिड़ियाँ कर दी ऐसे सपूत अपनी मैया का। कह कर नही करके दिखलाया कायाकल्प बदल दी भारत की ऐसे निडर बहादुर यशस्वी प्रधानमंत्री जी को लाखों बार बधाई। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्...
बदलते युग में भारत भूमि की पुकार
कविता

बदलते युग में भारत भूमि की पुकार

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मैंने वो देखा है, जो शायद किसी ने नहीं देखा। युग बदलेगा, बदला भी है, सुन रही हूं। पर मैंने तो इंसान बदलते देखा है। पैबंद लगे थे मेरे जंफर में, और पेट मेरा, पकवानों से भरा था। हर कोई शामिल था, मेरी दावत में, पर अंदर सभी के जहर भरा था। मिठास भर सकूंगी, पकवानों से, और जहर के लिए जगह ही नहीं होगी। भूल जाऊंगी मैं, पैबंध लगे जंफर को, और मेरे चारो ओर, खुशी की चुनरी होगी। पर बह गया सब आंसुओं में, मैंने जो देखा। युग तो युग, मैंने तो इंसान बदलते देखा। इंसान बदलते देखा। परिचय : आशा शर्मा पति : श्रीहनुमान प्रसाद शर्मा निवासी : धरमपुरी सांवेर रोड इंदौर (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : शिक्षिका हायरसैकैंडरी स्कूल साहित्यिक परिचय : कविता, भजन, लघुकथा, लेख, आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। शिक...
हिन्दी पर दो मुक्तक
मुक्तक

हिन्दी पर दो मुक्तक

डॉ. कोशी सिन्हा अलीगंज (लखनऊ) ******************** हिन्दी तन मन है, हिन्दी है प्राण यही है अपंनी भाषा, यही पहचान हिन्दी के गुण गाकर, शीश चढायें बोल कर हिन्दी, बढायें अपना मान अनुदित हो हिन्दी, बढाती निज की आन गा कर रम कर, समृद्ध करें इसका गान इसकी महिमा को हृदय में रखें सदा बोलें सब मिल, जय हिन्दी जय हिन्दुस्तान परिचय :- डॉ. कोशी सिन्हा पूरा नाम : डॉ. कौशलेश कुमारी सिन्हा निवासी : अलीगंज लखनऊ शिक्षा : एम.ए.,पी एच डी, बी.एड., स्नातक कक्षा और उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं में अध्यापन साहित्य सेवा : दूरदर्शन एवं आकाशवाणी में काव्य पाठ, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में गद्य, पद्य विधा में लेखन, प्रकाशित पुस्तक : "अस्माकं संस्कृति," (संस्कृत भाषा में) सम्मान : नव सृजन संस्था द्वारा "हिन्दी रत्न" सम्मान से सम्मानित, मुक्तक लोक द्वारा चित्र मंथन सृजन सम्मान, महात्मा गाँधी शांति स...
पहरे बहुत, गुमी आजादी
गीत

पहरे बहुत, गुमी आजादी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** पंच तत्त्व निर्मित काया पर, पहरे बहुत, गुमी आजादी। क्षणभंगुरता जीवन का सच, भूला मन लिप्सा का आदी।। मोह-लोभ की महाव्याधि में, अतिवादी मानव जकड़ा है अहंकार के पिँजरे में मन, चेतन खो, बन सुआ खड़ा है।। काम पिपासा में है डूबे, आत्मबोध तज प्रभुतावादी। पंच तत्त्व निर्मित काया पर, पहरे बहुत, गुमी आजादी।। गठरी सिर पर रखे पाप की, जग में भटके नश्वर काया। मर्यादा की रेखा टूटी, छल जाती रावण-सी माया।। अमल दृष्टि छल भेद न पाती, याचक हैं याअवसरवादी। पंच तत्त्व निर्मित काया पर, पहरे बहुत, गुमी आजादी।। सत्यं-शिवम-सुंदरम भूला, परहित राह नहीं पहचानी। कर्म-फलन है सद्गति-दुर्गति, काल करे हरदममनमानी।। यम का पाश सदा है कसता, मनुज दीन रोता अवसादी। पंच तत्त्व निर्मित काया पर, पहरे बहुत, गुमी आजादी।।...
महादेवी वर्मा जी को श्रद्धांजलि
कविता

महादेवी वर्मा जी को श्रद्धांजलि

चेतना सिंह प्रकाश "चितेरी" प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** स्त्री होकर स्त्री को समझा, आँखों में आँसू जब छलका, निर्मोही बादल बनकर बरसा, आँगन की तुलसी को सींचा। साध्वी-सा जीवन जीकर, एक सीधी-सी रेखा खींची। स्मृतियाँ सदैव बनती रहीं, उर में दीपक सदा जलता रहा। मन-मस्तिष्क में चेतना का अंतर्द्वंद्व चलता रहा। प्रश्न पर प्रश्न पूछती रहीं, कौंधकर बिजली चमकती रही, स्त्री की अस्मिता को स्वर देती रहीं। “कितनी करुणा कितने संदेश, पथ में बिछ जाते बन पराग।” “बीन भी हूँ मैं तुम्हारी, रागिनी भी हूँ!” “मैं नीर भरी दुःख की बदली, परिचय इतना इतिहास यही।” जैसी प्रसिद्ध पंक्तियाँ हृदय में गूँजती रहीं। नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत में सजती रहीं। छायावाद की सुदृढ़ स्तंभ थीं, आधुनिक युग की मीरा, वीणापाणि की साधना में विरह-वेदना, करुण-भावना थी। दी...
उर्मिला का विश्वास
कथा

उर्मिला का विश्वास

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा फतेहाबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) ******************** लक्ष्मण जीवन और मृत्यु के बीच की स्थिति मूर्छित अवस्था में थे। उन्हें मेघनाद ने युद्ध में घायल कर दिया था। रामभक्त हनुमान वेद्यों के आदेशानुसार संजीवनी बूटी लेने हिमालय चले गये। लौटते समय अयोध्या से गुजरे तो भरत जी ने राक्षस समझ कर बाण मार दिया। जय श्री राम के उच्चारण से हनुमान व भरत की आपसी शंका दूर हुई। सारा वृत्तांत हनुमान जी ने अयोध्या वासियों को कह सुनाया। सभी दुःखी हो गये सिवाय उर्मिला को छोड़कर... हनुमान जी से उर्मिला की प्रसन्नता देखी न गई। हनुमान जी बोले- ‘देवी! तुम्हारा पति मृत्यु के साये में है। सूर्य उदय होते ही सूर्यकुल का दीपक बुझ जायेगा और तुम विधवा हो जाओगी। तुम्हें तनिक भी अपने पति के प्राणों के संकट की चिंता नहीं। तुम्हारा चेहरा तनिक भी न मुरझाया।’ उर्मिला ने हनुमान की बातों को सुनकर जो ...
गोसइनीन गियाँ के परछो
आंचलिक बोली, कविता

गोसइनीन गियाँ के परछो

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) मोर गोसइनीन गियाँ ह, आज मइके जाहूँ कहिथे। नइ भेजँव कहिथंव त, मुँह-कान ल फूलोए रहिथे।। ओहा का करथे कहिके, ओखर लेवत हवँव परछो। तीजा तिहार ल मनाए बर, ओला भेज दुहूँ परसो।। मुँह ल मुरेर-मुरेर के, थारी-लोटा मन ल पटकत हे। आभा-ताना मार-मार के, एती-ओती मटकत हे।। झगरा करत हे खुरखेद, बात के खोदी निकाल के। रोवत हवय कुरिया म, जिनिस मन ल पसार के।। बोलत नइहे मोर मेर, कलेचुप भात-साग ल रांधथे। गोबर-खरसी निकाल के, गाय-गरुवा मन ल बाँधथे।। लइका ल चेचकारत हे, तोर ददा के बाढ़े हे फाल। नइ जावव तुमन ममागाँव, घर म रइहव ए साल।। मोला खाए ल नइ देवत हे, हेर के मँय ह खाए हँव। चल झटकुन तियार हो कहिके, ओला मनाए हँव।। अतका कहेंव त, ओखर खुशी के नइहे ठिकाना। कहिथे- तोर सही जोड़ीदार हर जनम म हे पाना।। जोर डरिस लुगरा ...
ऐ वतन, तुझपे जान लुटा जावां
गीत

ऐ वतन, तुझपे जान लुटा जावां

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** ऐ वतन, तुझपे ... जान लुटा जावां, तेरी मिट्टी में मिल जावां... बन के खुशबू हवाओं .... में घुल जावां, तेरी मिट्टी में मिल जावां... तेरी मिट्टी में मिल जावां... सरहदें चूम कर जो अमर हो गए, देश के वास्ते विष जो पी कर गए। याद रखेगी सदा ये ज़मीं-...आसमां, खून उनका है इस देश की हर रवां! वही शोला दिलों में जला जावां, तेरी मिट्टी में मिल जावां... माँ के आंचल का हर एक वो ...लाड़ला, बलिदान दे कर बना देश का ...रखवाला। उनके चरणों की रज शीश पर धर के मैं, देश की शान पे खुद को मिटा ....जावां! हजारों अमर कथा वो सुना ....जावां, तेरी मिट्टी में मिल जावां... गुल बन के मैं खिल जावां... ऐ वतन, तुझपे जान लुटा जावां, तेरी मिट्टी में मिल जावां... परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "न...
किताबों का रिक्शा
सत्यकथा

किताबों का रिक्शा

माधवी तारे लंदन ******************** शहर की गलियों में रघु का रिक्शा रोज़ सुबह सबसे पहले दिखाई देता था। नीली पेंट उधड़ी हुई थी, पुरानी सी रिक्शा थी लेकिन थी साफ सुथरी। ऐसे ही एक दिन एक मैडम उनके रिक्शे में बैठीं। कलफ लगी, सूती लेकिन साफ साड़ी और शालीन व्यक्तित्व। मैडम ने रास्ते में रघु से बहुत बातें की, रघु सारी बातों का जवाब दे रहा था। जब मैडम नीचे उतरी तो रघु ने कहा “मैडम रुकिये, मुझे आपको कुछ देना है।” रास्ते में हो रही आध्यात्म की बातों के आधार पर रिक्शा की सीट के नीचे से उसने ईशावास्य उपनिषद पर एक किताब निकाली औऱ मैडम को दी। मैडम हैरान रह गई कि रिक्शा चलाने वाला एक साधारण, शायद अनपढ़ आदमी कितनी समझ रखता है। मैडम ने हैरानी से पूछा, आपके पास इतनी किताबें हैं? आप पढ़ते हैं ...? रघु कुछ देर चुप रहा फिर कहा, “मैडम, मैं यह सोचकर किताबें लोगों को देता हूँ कि जो पढ़ा-लिखा दिखता है, वही कि...
श्रीकृष्ण जीवन गान
भजन

श्रीकृष्ण जीवन गान

12इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** सारे दुख दुनिया के, पाए कृष्ण गोपाल ने। सारे सुख दुनिया के, चरणों में उस ग्वाल के।। जनम हुआ कारागृह में, संकट जिंदा रह जाने का। काली रात और भारी वर्षा में, यमुना से बच पाने का।। वसुदेव ने पहुचाया गोकुल, आनंद पाया नन्दलाल ने ... सारे... रात दिवस सर के ऊपर, मौतों का ही साया था। लोगों की भय ग्रंथि को मिटाने ही, वो तो आया था।। एक एक करके सारे मारे, राक्षस कंस कराल के ... सारे... नंदगाँव के मुखिया के घर, कमी होगी क्या राशन की? ग्वाल बाल के लिए की चोरी, दही, दूध और माखन की।। बना लिया था अपना सबको, गाँव के गाँव खंगाल के... सारे... कंस और चाणूर को मारा बुरा नही कोई काम किया। नरकासुर से मुक्त रानियों को केवल अपना नाम दिया।। शोधन करते रहे समाज का एक से एक कमाल थे ... सारे... मणी चोरी का आरोप सहा और...
गणपति वंदन
भजन

गणपति वंदन

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** आज घर मे पधारे हमारे गजानन। झूमें नाचे गायें ख़ुश होकर मगन| रिद्धि सिद्धी को लेकर आये संग। वक्रतुण्डाय महाकाय गौरी नन्द। आज घर ... जहाँ रखते है गणपति जी चरण। भक्तों के कष्टों का होता हरण। सब कार्य निर्विघ्न होते हैं सिद्ध। कामना होती है सब की पूरण। आज घर … भोग मोदक का कर के अर्पण उतारते आरती और करते वंदन। धन्य हुए अर्पित कर श्रद्धा सुमन। हुई बाधा दूर घर मे आया अमन। आज घर… आज घर मे पधारे हमारे गजानन। झूमें नाचे गायें ख़ुश हो कर मगन। आज घर… परिचय :- कमल किशोर नीमा पिता : मोतीलाल जी नीमा जन्म दिनांक : १४ नवम्बर १९४६ शिक्षा : एम.कॉम, एल.एल.बी. निवासी : उज्जैन (मध्य प्रदेश) रुचि : आपकी बचपन में व्यायाम शाला में व्यायाम, क्षिप्रा नदी में तैराकी और शिक्षा अध्ययन के साथ कविता, गीत, नाटक लेखन मंचन आदि में गहन...
हिन्दी भाषा
छंद

हिन्दी भाषा

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** (आल्हा छ्न्द) हिन्दी भाषा भारत माता की गरिमा की है पहचान। अपनी अद्भुत विशेषता पर, संविधान में पाया स्थान। भाषाओं की वह साम्राज्ञी, सुख-दुख की सरगम का सार। मंत्र कि सूत्रात्मकता का वह, जीवन मूल्यों का भण्डार। संघर्षों का किया सामना, अन्यों को करके स्वीकार। दृढ प्रण, धैर्य, प्रयास शील से, पाया हिंदी ने अधिकार।। माह सितंबर की चौदह तिथि, थी सन् उन्नीस सौ उन्चास। मिला राजभाषा का दर्जा, फैला भारत में उल्लास।। नहीं वर्णमाला हिन्दी-सी, वैज्ञानिकता भी अन्यत्र । हिन्दी भावात्मकता लेकर हुई प्रतिष्ठित है सर्वत्र।। सीमा पर बंधुत्व भाव से, करती है सबसे व्यवहार। गले लगाती अमित प्रेम से, करती सबका है सत्कार।। आत्मोत्सर्ग प्रजा में जागृत करने का हिन्दी आधार। हिन्दी वीर शहीदों का है, त्याग समर्पण का शृ...
गवां बैठे
कविता

गवां बैठे

प्रतिभा दुबे "आशी" ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** वो ज़माने हम गंवा बैठे, वो ख़ज़ाने हम गंवा बैठे आज कुछ नहीं जोड़ने को, सलीक़े पुराने हम गंवा बैठे।। महफ़िलें तो सजी हैं आज बहुत, पर वो हँसने के बहाने हम गंवा बैठे ईंट-पत्थर के मकां तो बना लिए, मिट्टी के वो घराने हम गंवा बैठे।। जिसे ढूँढती है आज ये दुनिया, वो सुकून-ए-दिल हम गंवा बैठे रफ़्तार तो मिल गई है ज़िंदगी को, ठहरने के वो ज़माने हम गंवा बैठे।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे "आशी" (स्वतंत्र लेखिका) निवासी : ग्वालियर (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को खोलकर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित ...
हिंदी हमारी है भाषा
कविता

हिंदी हमारी है भाषा

आशा जाकड़ 'आस' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** अरे! भारतवासी जागो विदेशी सभ्यता छोड़ो भारतीय संस्कार सीखो बड़ों का सम्मान सीखो भारत की संस्कृति पुरानी, हम हैं हिंदुस्तानी ... हम हिंदी प्रेम से सीखे यह जन-जन को जोड़ें जीवन में खुशहाली लाए हिन्दी कण-कणमें घोलें हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा हम हैं हिंदुस्तानी ... आओ हँस के करे नमस्ते अब हाथ मिलाना छोड़ें बड़ों के हम पैर छुएगे उनका आशीर्वाद लेवें यह संस्कार की है रवानी, हम हैं हिंदुस्तानी ... हमारा प्यारा भारत देश अनेक भाषा अनेक वेश भिन्न धर्म के फूल खिले पर मिलकर रहते हैं एक एकता ही है निशानी, हम हैं हिंदुस्तानी ... इंग्लिश-विंग्लिश छोड़ो हिंदी से नाता जोड़ो विदेशी सभ्यता छोड़ो भारतीय संस्कार सीखो संस्कार की अपनी कहानी, हम हैं हिंदुस्तानी ... हिंदी है हमारी भाषा संस्कारों की है भाषा प्रेम दया, म...
ज्ञानदीप का उजियारा
कविता

ज्ञानदीप का उजियारा

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** अज्ञान-तिमिर में डूबी धरा को, प्रज्ञा की ज्योति से अलख जगा दो। कण-कण में बसी चेतना, उसे सत्य-मंत्र से महका दो। जो भाव छुपा है हृदय-तल में, उसे प्रेम-सुधा से सजा दो। ईर्ष्या, घृणा, द्वेष की कालिख को, करुणा-नीर से धो, बहा दो। सौहार्द, एकता, बंधुत्व का, अमृत-घृत हर दीप में मिला दो। शब्दों में शक्ति भरें, हर वाणी को महामंत्र बना दो। सत्य जहाँ मौन पड़ा हो, वहाँ धर्म का शंख बजा दो। न कोई बैरी, न कोई पराया, सब में अपना रूप दिखा दो। अंधकार मिटाकर, हर हृदय में ज्ञान द्वीप का उजियारा कर दो। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को खोलकर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख क...
११ सितंबर १८९३- शिकागो के मंच से विश्व ने सुना भारत का शाश्वत दर्शन
आलेख

११ सितंबर १८९३- शिकागो के मंच से विश्व ने सुना भारत का शाश्वत दर्शन

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** शिकागों दिवस पर विशेष - कभी-कभी इतिहास में कोई एक क्षण सदियों की मौन साधना को स्वर दे देता है। ११ सितंबर १८९३ का दिन ऐसा ही एक क्षण था। अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद का विशाल मंच सजा था और दुनिया के अनेक धर्मों एवं सभ्यताओं के प्रतिनिधि वहाँ उपस्थित थे। उसी मंच पर भारत का एक युवा संन्यासी खड़ा हुआ। उसके पास न कोई राजनीतिक सत्ता थी, न किसी साम्राज्य का समर्थन और न पश्चिमी दुनिया में कोई स्थापित पहचान। उसके पीछे था तो केवल भारत का हजारों वर्षों का चिंतन, उसकी तपस्या से अर्जित दार्शनिक दृष्टि और समूची मानवता को एक परिवार मानने वाली उसकी सांस्कृतिक चेतना। जब उस संन्यासी ने कहा “अमेरिका के मेरे भाइयों और बहनों” तो यह केवल एक संबोधन नहीं था, यह भारत की आत्मा का विश्व से आत्मीय संवाद था। उस दिन स्वामी विवेकानंद...
क्या पहाड़ बूढ़ा हो गया
कविता

क्या पहाड़ बूढ़ा हो गया

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जो कल तक था अडिग पहाड़, वो आज बोझ बन गया, बदले वक्त के इस दौर में, बाबा आदम की खोज बन गया, जिस कंधे पर बैठकर कभी तुम मेला देखा करते थे, आज वो कंधा कांप रहा, तो तुम दूर हटा करते थे, तुम्हारी एक हंसी की खातिर, वो सौ-सौ बार मरा होगा, फट गई थीं बिवाइयां पैर की, पर वो मीलों चला होगा, तुम्हें सूट और बूट पहनाकर, खुद फटे कुरते में जिया, स्वाभिमान बेचकर अपना, उसने तुम्हारी फीस का कर्ज दिया, वो धूप में जला,वो रातों को जागा, ताकि तुम्हारा कल संवर सके, तुम बड़े शहर के साहिब बनो, और दुनिया में तुम्हारा नाम चल सके, पर आज जब उसकी आंखों का पानी, थोड़ा सा धुंधलाया है, तुम्हें उसका कांपता हाथ और बूढ़ा चेहरा, पुराना सा साया नजर आया है, जिंदगी भर जो ढाल बना, हर मुश्किल को हंसकर झेला था, सोचो जरा उस बूढ़े दि...
है हिंदी हमारी पहचान
कविता

है हिंदी हमारी पहचान

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** है हिंदी हमारी शान है हिंदी हमारी पहचान हैं हिंदी में, दिनकर, मैथिली शरण और रसखान है हिंदी के पट्ट पर, पंत, प्रसाद, निराला का निशान है हिंदी के पट्ट पर, कबीर, तुलसी, महादेवी का निशान है हिंदी में सुभद्रा कुमारी चौहान हैं हिंदी में 'सहज' के मधुमय गान हिंदी से करेंगे हम नव निर्माण है हिंदी से हिंदुस्तान का सम्मान है हिंदी जन जन की भाषा है हिंदी हमारे मन की भाषा है हिंदी हमारे नील गगन की भाषा हैं हमारी सारी भाषाएं पल्लवित पुष्प, हजारों पुष्पों से बनी यह माला है है हिंदी हमारे भारत मां का मुकुट हिंदी ने हम सबको संभाला है है हिंदी हमारी विशाल समंदर समाती सारी नदियां इसके अंदर बोलूंगा हिंदी, लिखूंगा हिंदी सीखूंगा हिंदी,सिखाऊंगा हिंदी है हिंदी हमारे अंदर है हिंदी हमारी अवनी और अंबर।...
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मुकेश कुमार ऋषि वर्मा फतेहाबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) ******************** मां के आंचल सी पावन हिंदी आंगन में तुलसी सी महके हिंदी। गंगा की निर्मल धारा सी बहती हिंदी दादी मां की मीठी लोरी सी हिंदी। भारत भू के माथे पर सजी हिंदी जन-जन के हृदय में बसी हिंदी। मीरा के भजन सी मधुर हिंदी प्रेमचंद की कथा-व्यथा कहती हिंदी। आज हमारी अमिट पहचान बनी हिंदी आओ राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाएं हिंदी। लाल किले से दहाड़ती शेरनी सी हिंदी देश-दुनिया में परचम लहराती हिंदी। खेतों में खलिहानों में चहकती हिंदी नगरों में महानगरों में बुलंद होती हिंदी। कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्यारी हिंदी हैं हम बहुभाषी, एकसूत्र में पिरोती हिंदी। आओ सब जन मिल गुणगान करें हिंदी सब मतभेद भूल, मान बढाएं हिंदी। परिचय :- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा निवासी : फतेहाबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र...