
डॉ. अर्पणा शर्मा
उज्जैन (मध्य प्रदेश)
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अँधियारों से भरा हुआ था, मेरा यह संसार,
भटक रहा था इस दुनिया में, पाकर झूठा प्यार।
दिशाहीन थी मेरी नैया, मिला न कोई पार,
तब आपने थाम लिया प्रभु, बनकर सृजनहार।
बिनु गुरुकृपा मैं कुछ भी नाही…
माटी की एक मूरत था मैं, रूप दिया आपने,
जीवन को जीने का सच्चा, अर्थ दिया आपने।
अज्ञानता के इस मानस में, ज्ञान का दीप जलाया,
भटके हुए इस जीव को प्रभु, ईश्वर से मिलाया।
बिनु गुरुकृपा मैं कुछ भी नाही…
जब-जब छाए संकट के घन, ढाल बने गुरुदेव,
मेरी हर भूलों को भूले, कृपालु गुरुदेव।
अहंकार की परतों को काट, निर्मल मन कर डाला,
शब्द-शब्द में मंत्र पिरोकर, जीवन को उजियाला।
बिनु गुरुकृपा मैं कुछ भी नाही…
ना कोई जप, ना तप है मेरा, ना कोई साधना,
चरणों में आपके बीती रातें, यही मेरी प्रार्थना।
सत्य पंथ पर चलता जाऊँ, बस इतना वरदान दो,
जब भी लूँ मैं जन्म धरा पर, चरणों में स्थान दो।
आप ही मेरी साँस, आप ही मेरी भक्ति,
गुरुवर आपकी कृपा ही, मेरी असली शक्ति।
शीश नवाकर करूँ वंदना, सुनो हृदय की तान,
बिनु गुरुकृपा मैं शून्य मात्र हूँ, आप ही मेरी पहचान।
बिनु गुरुकृपा मैं कुछ भी नाही…
परिचय :- डॉ. अर्पणा शर्मा
निवासी : महेश विहार, उज्जैन (मध्यप्रदेश)
शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं
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