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मैं इस दौर के लिए नहीं बनी

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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शायद मैं इस
युग के लिए नहीं बनी
या ये समय मेरा नहीं
जहाँ लोग रिश्ते भूल जाते हैं
मैं दिल से लगा लेती हूँ!!
यहाँ खुद को साबित
करने की होड़ मची है
सही-गलत को तज कर
स्वयं को ही धोखा दे लेते हैं
मैं अकेले चलती रही
अपने पर यकीन कर के
कि शायद समय
मेरा होगा कभी!
लोग बातों को अनसुना कर
“बाद मे बात करते हैं”
कहकर भूल जाते हैं
मैं उस “बाद” का
इंतजार करती हूँ!
सबके सपनों में इंद्रधनुषी
रंग भरती रही जीवन भर
मेरे सपने बेरंग ही रहे नहीं
समझ पाई जीवन मे कभी!
इस छोटे से जीवन मे अगले
पल का अधिकार नहीं
भविष्य के सपनों के लिए
लोग रिश्तों को
दांव पर लगा देते हैं
कहते हैं हमसे,
इतना कौन सोचता है
शायद सच कहते हैं,
पर मेरा दिल हर एहसास को
ज्यादा ही महसूस करता है
क्यूंकि मैं
इस युग के लिए नहीं बनी!!

परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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