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बासंती दौर

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
मंडला, (मध्य प्रदेश)
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सखी ! आज तो भौंरे, कलियों को चूमे।
है पराग की चाह, वनों-उपवन में घूमे।
मन में लिए उमंग, बसंती हवा चल रही,
जिसने पाया मीत, वहीं मस्ती में झूमे।।

आया है ऋतुराज, गीत मौसम के गाता।
सरसों का उल्लास, आज जन-जन को भाता।
वन-उपवन हैं दिव्य, कछारों में है यौवन,
मिलन-नेह का भाव, गीत अभिसारी गाता।।

कामदेव का ताप, आज बौराया हर इक।
अनुबंधों का दौर, पहुँच वासंती मन तक।
टूटे संयम बंध, सभी तो हैं अब विचलित,
है प्रियवर की चाह, सभी के दिल में धक-धक।।

पीत वसन की आभ, सजी है अब अमराई।
कोयल ने मादक होकर के, प्रीति जगाई।
अब युवाओं की बात, अकेले मात्र नहीं है,
ढूंढ रहे हैं मीत वृद्ध भी, हो हरजाई।।

हुईं दूरियाँ ख़त्म, वसंती मौसम चहके।
परिणय की है बात, मिलन के पल हैं महके।
है गृहस्थ की बात, नहीं अब केवल जानो,
तोड़ के संयम अब तो देखो, संत भी बहके।।

परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
जन्म : २५-०९-१९६१
निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश)
शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास)
सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय
प्रकाशित रचनाएं व गतिविधियां : पांच हज़ार से अधिक फुचकर रचनाएं प्रकाशित
प्रसारण : रेडियो, भोपाल दूरदर्शन, ज़ी-स्माइल, ज़ी टी.वी., स्टार टी.वी., ई.टी.वी., सब-टी.वी., साधना चैनल से प्रसारण।
संपादन : ९ कृतियों व ८ पत्रिकाओं/विशेषांकों का सम्पादन। एम.ए.इतिहास की पुस्तकों का लेखन
सम्मान/अलंकरण/ प्रशस्ति पत्र : देश के लगभग सभी राज्यों में ७०० से अधिक सारस्वत सम्मान/ अवार्ड/ अभिनंदन। म.प्र.साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी अवार्ड (५१०००/ रु.)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।

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