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मरने की फुर्सत नहीं

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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डेस्कटॉप पर वे सारे काम खुले पड़े थे, जिनकी उम्मीद सामान्यतः किसी डॉक्टर से नहीं की जाती- सोशल मीडिया, लेखन, फोटोशॉप, कैनवा और न जाने कितनी रचनात्मक टैबें। तभी श्रीमतीजी का चिर-परिचित ताना कानों में पड़ा-
“कंप्यूटर पर आँखें गड़ाए रहते हो, कभी हॉस्पिटल पर भी ध्यान दे लिया करो!”
रोज़ ऐसे वाक्य चाय के साथ निगल जाता हूँ, लेकिन उस दिन चाय पहले ही समाप्त हो चुकी थी, इसलिए ताना गले में अटक गया। मैंने निश्चय किया कि आज दुनिया को दिखाऊँगा कि मैं भी एक गंभीर और व्यस्त डॉक्टर हूँ। बाथरूम में चिड़िया-स्नान किया, गीला तौलिया बिस्तर पर छोड़ा, अधोवस्त्र फर्श पर और अलमारी से एक जोड़ी कपड़े निकालते हुए चार जोड़ियाँ नीचे गिरा दीं। डॉक्टर होने में भले कमी रह गई हो, पतिपन के संस्कारों का प्रदर्शन पूरे मनोयोग से किया।
हॉस्पिटल पहुँचा तो पूरा स्टाफ एक बेंच पर बैठा मोबाइल में रील-दर्शन कर रहा था। मुझे समय से पहले देखकर उनके चेहरों पर वही भाव आया, जो किसी पिकनिक में अचानक प्रधानाचार्य के पहुँच जाने पर आता है। मेरा स्टाफ मुझसे अत्यंत प्रसन्न रहता है। मैं डॉक्टरी के अतिरिक्त दस काम करता हूँ, इसलिए उन्हें भी ड्यूटी के दौरान मनोरंजन, ऑनलाइन खरीदारी और घरेलू समस्याएँ निपटाने की पूरी स्वतंत्रता मिलती है। न कोई लक्ष्य, न डाँट, न अनुशासन। फिर भी उस दिन मैंने ठान लिया था कि मुझे “असली डॉक्टर” बनना है। श्रीमतीजी अक्सर शहर के सफल डॉक्टरों की सूची सुनाती हैं। उनके अनुसार असली डॉक्टर वही है, जो गंभीर, भावहीन और इतना व्यस्त हो कि उसके पास मरने की भी फुर्सत न हो। उसके चैम्बर के बाहर भीड़ हो, फोन व्यस्त हो और परिवार उससे मिलने के लिए अपॉइंटमेंट ले। इसके विपरीत मेरे पास समय ही समय है।
मैं निमंत्रण में सबसे पहले पहुँचता हूँ। संस्था का कोई कार्यक्रम नहीं छोड़ता। मैं हर फोन उठा लेता हूँ और मरीजों को प्रतीक्षा भी नहीं करवाता। यही मेरी सबसे बड़ी व्यावसायिक विफलता मानी जाती है।
सफल डॉक्टर की प्रतिष्ठा उसके ज्ञान से नहीं, प्रतीक्षालय की भीड़ से तय होती है। मरीज जितना अधिक प्रतीक्षा करे, डॉक्टर उतना ही बड़ा। कुछ चिकित्सक तब तक मरीज देखना प्रारम्भ नहीं करते, जब तक बाहर पर्याप्त भीड़ जमा न हो जाए। फिर लोग गर्व से कहते हैं- “देखो, डॉक्टर साहब के यहाँ मरीज टूटकर पड़ते हैं। उन्हें मरने की फुर्सत नहीं!” मेरे यहाँ मरीजों को टूटकर पड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वे आराम से आते हैं, दिखाते हैं और चले जाते हैं। इससे मेरे प्रति संदेह स्वाभाविक है।

ऊपर से मैंने फोटोग्राफी और लेखन जैसे संदिग्ध शौक पाल रखे हैं। लोग पूछते हैं- “आपको लिखने का समय कैसे मिल जाता है?” मानो डॉक्टर के हाथ में कलम दिखना चिकित्सा परिषद के नियमों का उल्लंघन हो। कभी सुबह अँधेरे में फोटोग्राफी करने निकलता था, ताकि कोई पहचान न ले। पहचान भी लेता तो स्वयं को समझाता- “डॉक्टर साहब तो हो नहीं सकते, कोई हमशक्ल होगा।” उस दिन ओपीडी में बैठा मरीजों की प्रतीक्षा कर रहा था कि एक परिचित आ पहुँचे। मुझे खाली देखकर उनकी बाँछें खिल गईं। वे कुर्सी पर धम्म से बैठे और एक टाँग आगे फैलाकर बोले- “टाँगों में दर्द है, सोचा दिखा लूँ। मुझे लगा भीड़ होगी, लेकिन यहाँ तो सन्नाटा है! मरीज कम हो गए क्या?”
मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना वे स्वयं ही कारण बताने लगे- “शहर में इतने ऑर्थोपेडिशियन हो गए हैं, फर्क तो पड़ेगा ही। मैंने तो पहले ही कहा था, सरकारी नौकरी कर लो। लेकिन आपने मानी नहीं।” फिर अपने बेरोजगार बेटे, उसकी प्रतियोगी परीक्षाओं और विवाह की समस्या पर पहुँच गए। अंत में बोले- “आपने अच्छा किया, जल्दी शादी कर ली।” इस वाक्य का अर्थ स्पष्ट था- यदि निजी प्रैक्टिस की वास्तविकता पहले सामने आ जाती, तो शायद विवाह भी कठिन हो जाता।
इसके बाद उन्होंने सफल डॉक्टरों की वार्षिक प्रगति रिपोर्ट सुनानी प्रारम्भ की- “फलाँ के यहाँ शाम तक नंबर नहीं आता। फलाँ ने चार मंजिला हॉस्पिटल खड़ा कर लिया। फलाँ ने नई जमीन खरीद ली। और एक आप हैं…” अंतिम वाक्य उन्होंने पूरा नहीं किया, पर उसका अर्थ चैम्बर में पर्याप्त देर तक घूमता रहा- “आपने इतने वर्षों में किया क्या? सिर्फ झक मारी है l” मैं चिकने घड़े की तरह बैठा रहा। उनके व्यंग्य-बाण फिसलते गए। तभी बाहर दो मरीज पर्ची बनवाते दिखाई दिए। मैंने राहत की साँस ली। श्रीमतीजी ने भी चाय भिजवा दी। वैसे मैंने श्रीमती जी से अलिखित निवेदन कर रखा है कि जब कोई अतिथि चैम्बर में अधिक देर टिके, तो चाय तुरंत भेजी जाए, ताकि “अतिथि, तुम कब जाओगे?” की भावना सम्मानपूर्वक व्यक्त की जा सके। किंतु मेरा आवेदन सरकारी फाइल की तरह विचाराधीन है। मैंने मोबाइल कान पर लगाकर किसी काल्पनिक व्यक्ति से अत्यंत आवश्यक बातचीत शुरू कर दी। परिचित संकेत समझ गए। उठते हुए बोले- “डॉक साहब, मुझे लगता है आप पर किसी ने टोना-टोटका कर दिया है। एक बड़े पंडित को जानता हूँ, अनुष्ठान करवा दूँ?” मेरी सहमति की प्रतीक्षा किए बिना वे चले गए।

परिचय :-  डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन)  किताबगंज   प्रकाशन,  गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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