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समय नहीं है

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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बड़े परिवार चार
लोगों में सिमट गए
घण्टों की दूरी
मिनिटों में सिमट गई
फिर भी आज इंसान
के पास समय नहीं है।

महीनों इंतजार के बाद
अपनों का चेहरा देखना
नसीब होता था,
आज वो चेहरे मिनटों में
दिखाई दे जाता है
फिर भी इंसान के पास
समय नहीं है।

राशन, पानी, जमीन, को
पाने के लिए घंटों, धूप में
कतार में खड़े रहना पड़ता था
आज मोबाइल पर सब काम
कुछ ही पल में होता है
फिर भी इंसान रोता है
समय नहीं है।

कहीं भी जल्दी पहुचने की
रेस में सारे नियम कानून
तोड़ अपनी अलग
गति बनाता है,
फिर भी यही कहता है
यार समय नहीं है।

घंटों मोबाइल पर चैटिंग,
यू ट्यूब, सीरियल चलाता है
लेकिन बूढे माँ बाप से मिलने
उनसे बात करने का
समय नहीं है।

एक दिन यही इंसान वृद्ध-
असहाय अकेला हो जाता है
कोई इसको देखने
पूछने नहीं आता है,
क्योंकि किसी के पास
समय नहीं है।

उस समय इंसान सोचने
पर मजबूर हो जाता है,
समय तो बहुत था
काश हमने बूढे माता-पिता
की सेवा की होती उनके साथ
समय बिताया होता,
काश हमने भी दोस्तों
रिश्तेदारों का हाल-चाल
जानने के लिए
समय निकाला होता
तो शायद आज
हम अकेले ना होते।।

परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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