Monday, April 20राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

Tag: श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी

अंतःकरण
कविता

अंतःकरण

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मनुष्य का संघर्ष बाहरी मुश्किलों से नहीं स्वयं से होता है, इंसान का मन कई परतो में विभाजित है, इनमे न्याय, स्वार्थ, अन्याय के विचारों में द्वंद सदैव चलता है। मान- सम्मान और पहचान की आकांक्षा मनुष्य को विचारों के जाल में उलझा देती है। मनुष्य की विशेष प्रवृत्ति, स्वयं को सही साबित करने हेतु तर्क-वितर्क करता है स्वयं को नैतिक समझता है! शक्ति और नियन्त्रण के प्रति आकर्षित हो अपने विचार मनवाना चाहता है! दूसरों को प्रभावित कर स्वयं की स्थित दृढ़ करना चाहता है! मनुष्य की यही मनोदशा संबंधो को कमजोर करती है, आपसी संवाद में दूरिया पैदा करती हैं, संवाद एवं सहयोग के स्थान पर प्रतिस्पर्धा जन्म लेती है !! शुद्ध परिवर्तन स्वयं के भीतर से ही जन्म लेता है मनुष्य जब अपनी कमजोरियों को ...
क्यों परेशान रहता है मन
कविता

क्यों परेशान रहता है मन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** अक्सर परेशान होता है मन जबकि, अपने दर्द को जुड़ाव में बदल सकता है पत्थर पर सहानुभूति को निखार सकता है फिर भी परेशान रहता है मन!! सब कहते हैं, अंधेरे दिनों में मोमबत्तियां जलाना सीखो, यादों की चिंगारी को रूह से हटाना सीखो, अवसाद में रहना जिंदगी के सही मायने नहीं होते . ये समझता है, फिर भी परेशान. रहता है मन!! अवसाद से भरा जीवन भीतर खालीपन भार देता है, हृदय का खोखलापन, धड़कनों की लय को धीमा कर देता है, आशा और निराशा जीवन के दो पहलू हैं, खुशी एक निर्णय है, जो स्वयं से हमे लेना होता है , सब कुछ जानता है, फिर भी क्यों परेशान होता है मन!! जिंदगी के तूफान आत्मा को तोड़ देते हैं, बदलते समय की बरसाती किसी चमत्कार से कम नहीं लगती, मन के उमड़ते ज्वालामुखी को शांत कर देती है, स्वयं...
डायरी के पन्ने
कविता

डायरी के पन्ने

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** तुम उसे चुनना खुद के लिए जो तुम्हें पसंद हो मैं हर बार तुम्हें ही चुनूंगी। कभी जो मेरी याद आये, मेरी डायरी के पन्नों को पलट लेना जो बात जुबां कभी कह ना सकीं वो उन पन्ने में दिखाई देंगे।। कुछ शब्दों मे अधूरे सपने सजे होंगे, कुछ पन्नों में पाप-पुण्य का लेखा-जोखा होगा, उन्हीं पन्नों में कुछ शब्द, तुम्हें देखकर मुस्कुरायेंगे! सब कुछ बटोर पाऊँ इन कांपते हाथों में अब दम नहीं है, तुम कहोगे तो बीते पलों की दास्तान तुम्हें सुना दूंगी! जिंदगी किसे मिली है यहां सदा के लिए एक दिन हम सबकी सांसे थम जानी है! अगर कभी मूंद ली आंखे हमने वक्त के पहले, तो कुछ अधूरे कुछ पूरे के पन्नों को समझेगा कौन।। परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५...
बसंत के दिन
कविता

बसंत के दिन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** तुम्हें देती हूँ बसंत के दो दिन क्या अपने हाथों की लकीरों से थोड़ी सी दूब मुझे दोगे, जिसको रख शिव के चरणों में मांग लूंगी तुम्हारे सुने पलों की रौनक !! प्रकृति का जो स्नेह बरसा है तुम पर वो स्नेह वो करुणा मुझे प्यारी है, ये धरा ये गगन ये जीव इन सभी में तुम्हें पाती हूँ, क्या इन बिखरे इंद्रधनुषी रंगों में मुझे समेट पाओगे ! क्या ले चलोगे एकबार नदी के तट पर मुझे मांग लूँगी उसकी कोमलता- निर्मलता, तुम्हारे उम्र भर के लिए , अच्छा लगता है रोज मुझे चांद को निहारना क्या थोड़ी देर मेरे पास बैठ पाओगे!! जीवन जीने का नाम है मगर जो कभी धड़कने टूटी मेरी, क्या ढलते सूरज के बसंती रंगों से मुझे सजा पाओगे !! ज्यादा कुछ नहीं मांगती इस पल-पल बदलते दौर मे, क्या आपने अंतर्मन में मुझे थोड़ी सी...
होली का गुलाल
कविता

होली का गुलाल

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** होली का एक रत्ती भर गुलाल का रंग जो घरों में रहने वाले वृद्ध के माथे पर नहीं सजा वो गुलाल, रंगहीन हो जाता है! वृद्ध होते-जन के लटकते चेहरे देखकर लगता है मानो वो जप कर रहे, रंगोत्सव में लीन नहीं होते, क्योंकि उनके परिजन उनसे कोसों दूर चले गए होते हैं ! आंगन में बँधी गाय और बकरियों की खुली खूंटी ये बताती है कि, इस आंगन की बेटियाँ खूंटी से बहुत दूर चली गई हैं, यदा कदा ही दिखती हैं ! किसी जानवर के रंगों में डूबे चेहरे और उसकी दर्दनाक बेचैनी, सारी खुशियों को मलिन कर जाते हैं , ये सोच कर की क्या इनके लिए खुशी नहीं बनी ?? दूर किसी मंदिर में कीर्तन बजता है लगता है कोई सोहर गीत गा रहा हो, साँझ ढले किसी पँछी की आवाज लगता है मानो कोई अपना दर्द बयान कर रहा है ! घर के आंगन में कहीं...
नारी तुम
कविता

नारी तुम

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** नारी तुम वंदनीय हो, जीवन धन यंत्र हो, सृष्टि के कपाल पर लिखा हुआ मंत्र हो, ममता की खान हो, रिश्तों की आन हो1135 प्रकृति के माथे की बिंदिया की शान हो!! दुर्गा हो, काली हो, लक्ष्मी और माँ हो देवी के रूप मे विश्व मे पूजनीय हो!! जीवन है कष्टकार, राहें पथरीली हैं इतना सशक्त हो, अबला क्यों कहलाती हो?? पुरुष प्रधान देश मे आज भी परतंत्र हो खुद के अस्तित्व को चिता पर क्यों सजाती हो?? सजग बनो, सचेत हो, सबल और समर्थ हो निर्बल नहीं हो तुम, स्वयं में बलधारी हो!! ना झुका सके तुम्हें कभी वो प्रचंड आसमान हो, संघर्ष के चट्टानों का पूर्व होता आकाश हो!! शिव का गुमान हो, कण-कण में विराजमान हो, नारी ही नहीं जहान हो प्रकृति के माथे की बिंदिया की शान हो!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श...
मौन हूँ … अनभिज्ञ नहीं
कविता

मौन हूँ … अनभिज्ञ नहीं

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शांत हूँ, मौन हूँ किन्तु अनभिज्ञ नहीं हूँ दर्द को मुस्कराहट में छुपाना जानती हूँ एक कहानी हूँ, पर अधूरी नहीं!! प्रेम धर्म निभाती हूँ करुणा से भरा हृदय रखती हूं संवेदनाओं से भरी हूँ आरंभ हूँ अंत नहीं! कभी उकेरी हुई भावनाओं से ओतप्रोत, कभी भ्रमित होती कल्पनाओं एवं वास्तविकता में, कभी तराशी गई कभी नकारी गई हूँ दिलों की अभिव्यक्ति बनी हूँ खामोशी नहीं!! खुशियों की बरसात में छुपकर रहने वालों को, हँसी की दो बूंद के लिए तरसते देखा है, अभिमान मे डूबे रहने वालों को तन्हाई में छुपकर रोते देखा है, सपनों को पूरा करने का हौसला रखती हूँ नारी हूँ, किन्तु बेबस-लाचार नहीं!! जीवन के सही अर्थ को समझना चाहती हूँ, स्नेह और करुणा का दीपक चारों ओर जलाना चाहती हूँ, स्व चेतना के प्रकाश से आंतरि...
मेरे जाने के बाद
कविता

मेरे जाने के बाद

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मेरे चले जाने के बाद, मेरा अस्तित्व भी मिट जाएगा, मेरा सबकुछ मेरे साथ चला जाएगा!! ये सफ़र यूँ ही चलता रहेगा, इस भीड़ में कोई हमारा नहीं रह जाएगा!! जीवन भर अपना व्यक्तित्व शून्य रखा था, वो शून्य भी शून्य में विलीन हो जाएगा! ना किसी के पास फैलेगा मेरी हंसी का धुंआ, ना मेरी याद में कोई एक दीपक जलायेगा!! वो आंगन, वो किवाड़, वो चूल्हा चौका जिनमे हम प्यार परोसा करते थे, उनकी सिसकियाँ घर मे सुनाई देंगी!! वो चूडी वो बिंदी, कतार में सजी साडियाँ उनके आँसू मेरी अलमारी में दिखाई देंगे!! प्रकृति को संजोया था हमने जीवों की मुस्कराहट में, वो अपने आसपास हमें ढूंढा करेंगे!! इनकी आवाज मुझ तक भी पहुंच जाएगी, जब हम इस दुनिया से बहुत दूर निकल जाएगें!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा...
शांत चेहरा
कविता

शांत चेहरा

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शांत चेहरा कभी कमजोर नहीं होता स्थिर चेहरे के पीछे अनकहे तूफान छिपे होते है उनके चेहरों पर कल के संजोए स्वप्न नहीं होते समाज के थपेड़ों से चेहरे की लकीरें गहरी हो जाती हैं ! अश्रु उनके कभी दिखाई नहीं देते सबकी खुशी में वो बस मुस्करा देते हैं उनके खामोश झूले की पेंग बहुत ऊंची होती है दर्द का गीत उनकी धड़कनों में पिरोया होता है! उनकी जिंदगी की किताब का हर एक पन्ना किस्सा होता है किसी पन्ने पर चैन तो किसी पर कठिनाइयों का बसेरा होता है! शांत चेहरा उनकी कमजोरी नहीं होती उनकी ताकत, उनके संयम और दृढ़ता की परिभाषा होती है ऐसे व्यक्तित्व में कोई दिखावा नहीं होता इसीलिये उम्र भार ये चेहरा भीड़ में तन्हा होता है! उनके दिलों के टूटने की आवाज नहीं होती आग का एक दरिया बहता है जिसमें बहुत कु...
कभी कभी सोचती हूँ मैं
कविता

कभी कभी सोचती हूँ मैं

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** कभी कभी सोचती हूँ मैं कौन हैं हम, खुद को साबित करने के लिए क्यों बनना चाहते हैं कुछ हम। बाहर से रंगों से भरे हुए तन की सजावट को प्राथमिकता देते हैं हम भले ही भीतर से खोखले हों मगर रंगीन आवरण से ढके हैं हम। शांत चेहरे की मुस्कान काफी नहीं लगती खुद को ओहदे की चमक से संवारना चाहते हैं हम सूकून हमारा क्यों पर्याप्त नहीं सब कुछ पाने की होड़ में लगे हैं हम। मन की शांति कोई धन नहीं प्रकृति ने जो दिया उसका का कोई मोल नहीं अर्थिक धन से तौल रहे रिश्ते क्यों राजगद्दी की दौड़ में शामिल हैं हम। परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार) निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ...
पिता-पुत्र
कविता

पिता-पुत्र

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक पिता अपने नन्हें से पुत्र का पालन पोषण करते उसे स्नान कराते, खाना खिलाते कितना खुश हो रहा है खिलखिलाहट से गूंज रहा है उसका घर-आंगन-आशियाना! नन्हें-नन्हें पांव शैतानियां करते कभी इधर तो कभी उधर इठलाते अद्भुत है प्रेम पिता का अपने पुत्र के प्रति समेटना चाहता है पिता इन अनमोल लम्हों को अपने सीने में ! समय मानो पंख पर लगा कर उड़ता जा रहा है, पिता के बाजुओं में ताकत है, नन्हा बच्चा अपने को सुरक्षित महसूस करता है। समय अपनी गति से चलायमान हो रहा है। वहीं आशियाना, वहीं घर-आंगन है, किन्तु आज पिता के कंधे झुके हुए से है हाथों में कंपकंपाहट है, आज वो पिता चलने से लाचार है, पिता की नजरे झुकी है मानो उनसे कोई गुनाह हुआ हो ! वही पुत्र आज पिता को खिला रहा है किन्तु कोई खिलखिलाहट नहीं, कोई खु...
कलयुग
कविता

कलयुग

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** आज के युग मे मानो कलियुग प्रगट हो गया है, लगता है कोई बुरा समय एक आकर लेकर दुनिया पर छा गया है ! चारों ओर अशांति विद्रोह और भय व्याप्त हो गया है, विचारों में जहर और व्यवहार में आक्रोश हृदय में घर कर गया है ! गलत को सही साबित करने की कला आ गई है, झूठ को सच का मुखौटा पहनने का हुनर आ गया है ! पाप-पुण्य के मायने बदल गए हैं हर इंसान स्वार्थी हो गया है ! कलयुग कोई तिथि या युग नहीं जब अनाचार- मन और विचारों में मे व्याप्त हो जाए, वही कलयुग अवतरित हो जाता है ! ये मन के पापों की एक अवस्था है, जो सब कुछ तहस नहस कर देता है, पाप समाज में नहीं इंसान के भीतर जन्म लेता है और वही विचार कर्म बनते है ! कलयुग की स्तिथि से हमको स्वयं से ही बाहर निकलना होगा, करुना और प्रेम का मार्ग पकड़ना होगा, ...
कभी  तो थक जाया करो
कविता

कभी तो थक जाया करो

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** थक गई हो क्या, नहीं यू ही लेट गई हूँ, क्या चाय बना दूँ!! कभी थकती नहीं वो दिनरात जूझते-जूझते ! बच्चों की नींद की निगरानी करती बिना खटपट काम निबटाती ! स्कूल, ऑफिस से आने पर गर्म-गर्म भोजन, नास्ता परोसती क्या कभी थकती नहीं होगी? दिन में सबके आराम के पलों मे कपड़े तहाती, इस्त्री कर सब की अलमारियों में सजाती, अम्माँ क्या चाय मिलेगी कि पुकार पर, चौके में दौड़ जाती, कभी तो थकती होगी !! इतना आसान कहाँ होता है उसको खुद की मन की करना , सारे प्रलोभन छोड़ने पड़ते होंगे! इनको ना कहने की आदत नहीं होती इनके सपनों में भी दूध उबल कर गिरता होगा, इनकी आँखों की पलकें भी घर के दरवाजों पर बिना झपके लगी होती हैं कि शायद कोई मेहमान आता होगा ! सपने में भी इनको चैन नहीं मिलता है! हे नारी त...
कहाँ गई तुम दीदी
कविता

कहाँ गई तुम दीदी

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** घर के नींव की ईंट थी दीदी तुम सहसा पतझड़ी हवा ने बिखेर दिए हर ईट इस घर की, विरान कर गई वो आंगन जिसमें तुम्हारी मुस्कुराहटें खिलखिलाती थी!! हम एक वृक्ष से उत्पन्न पत्ते, नहीं जानते थे, कहाँ जाते है शाख से टूटकर धरा पर सूखे पत्ते सा कर गई जीवन हम सबका, नहीं समझ पाये तुम्हारा यूँ चले जाना आजतक !! जिंदगी के हर उतार-चढाव की साथी थी तुम, आज भी आंखों की नमी हो तुम, मेरी हंसी में कौन हॅसेगा साथ मेरे, दुःख में कैसे मुस्कराते हैं, सिखाती थीं तुम !! तुम्हारा चले जाना पिताजी सह ना सके , टूट कर बिखरे हम अब तक जुड़ ना सके थोड़ा तो ठहर जाती साथ हमारे माँ को कैसे ऐसे छोड़ गई तुम ?? आज भी हर एक के हृदय में बसी हो तुम, मुझे पता है मेरे आसपास ही हो तुम, बार बार दिल कहता है कहीं से लौट ...
अर्द्धनारीश्वर
कविता

अर्द्धनारीश्वर

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** रूप लिया अर्द्धनारीश्वर का, शिव-शक्ति कहलाते, शिव प्रारम्भ शक्ति है ब्रह्मांड तभी तो अर्द्धनारीश्वर कहलाते!! आधा भाग नर का, आधा बना नारी का, शिव बिन शक्ति अधूरी- शक्ति बिन शिव अधूरे हो जाते!! प्रश्न एक कौंधा मन मे बार बार, पुरुष का रूप लेकर जो करते नारी सा शृंगार, कौन हैं ये लोग, क्यों दर दर पाते तिरस्कार!! घर घर आशीर्वाद पहुंचाते, बधाई के गीत गाते, फिर भी समाज से बहिष्कृत हो स्नेह को तरसते! आसान नहीं इनका जीवन, हर मोड़ पर चुनौतियां आती, तिल तिल दम तोड़ते, शिव शक्ति का सृजन ये, किन्नर कहलाते! अर्द्धनारीश्वर जब घर-घर पूजे जाते ईश्वर की ही रचना हैं ये, फिर क्यों अधूरे कहलाते?? प्रश्न बड़ा है समाज के ठेकेदारों से मेरा, क्यों नहीं इनको हम अपनों जैसा अपनाते??? प...
कैसा वो दिन था
कविता

कैसा वो दिन था

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** कैसा वो दिन था, प्रारम्भ का अंत था, प्रचंड पराक्रम था, कर्म अखंड था। सनातन की रक्षा हेतु चढ़ा वो धर्म की सूली पर प्राण दिए अपने, स्वाभिमानी बलिदानी था! ना स्वयं की चिंता ना घर-बार की खबर कोई, दृढ़ संकल्प लिए गा रहा पवित्र राम नाम था। नमन है, प्रणाम है, कोटि कोटि वंदन है युवक था, बालक था, बुजुर्ग भी पर भगवा था। शौर्य- वीरता, पराक्रम का अद्भुत वो पल था, ना भुला सके इतिहास कभी, वो ज्वलंत क्षण था। ६ दिसंबर १९९२ का दिन था धर्म के दाग को सेवकों ने स्वयं के रक्त से धोया था। नमन तुम्हें हे बालक यशवर्धन तू यज्ञ था, कितनों की आहुतियों से खड़ा हुआ ये आज का मंदिर है। अवध था, अवध है, जय श्री राम का ब्रम्हांड में जय घोष था। भारत के लाल थे कैसा वो जोश था। अमर हुए, इतिहास ब...
देह  से परे
कविता

देह से परे

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** काया से परे, एक स्त्री के भूगोल को जान पाए हो कभी ? उसके भीतर उलझी हुए सडकों को कभी समझ पाये हो क्या ? एक खौलता हुआ इतिहास है भीतर उसके, क्या पढ़ पाये हो कभी!! नहीं समझ पाये आज तक उसको रसोई और घर-परिवार से परे भी एक दुनिया है उसकी, पुरुष से परे क्या उसकी जमीन समझा सकते हो उसको ? सदियों से तितर-बितर हुई ढूंढ रही अपने घर का पता बता सकते हो उसे ? कभी विस्थापित कभी निर्वाचित हुई उसके सम्मान को समझा सकते हो समाज को? उसकी दहलीज पर पड़े मौन शब्दों को जाना है कभी ? इस कुरुक्षेत्र में कई बार छली गई उसके मर्म की अनुभूति तुमको हुई है कभी ? उसकी पीठ पर पड़े अनगिनत गांठों को टटोला है तुमने, नहीं ना .....? वो कहना चाहती है" "इस देह से परे भी स्त्री की एक दुनिया है!! पर...
स्वयं से स्वयं की पहचान
कविता

स्वयं से स्वयं की पहचान

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** हो तिमिर घना, अधीरता नही स्वयं पर विश्वास हो, क्योंकि अमावस की रात मे भी निर्वाण घटित होता है कीचड़ कितना भी हो, कमल भी वहीं खिलता है दिया मिट्टी का ही हो रोशनी भरपूर देता है वो धरती का हिस्सा होता है! ईश्वर की कोई भाषा नहीं होती उस तक पहुचने का एक ही सेतु होता है , मौन का, मौन रह साधना का मौन रह कर्म करने का ! बुद्ध, महावीर या कोई संत नहीं बनना है स्वयं को अंगीकार कर स्वयं से स्वयं की पहचान कराना है ! इस राह में कुछ भी प्राप्त नहीं होता जो मिलेगा वही "स्वयं" को सार्थक करेगा, बहुत कुछ खो जाएगा, चिंता, महत्वाकांक्षा, भय, लालच, इर्ष्या, द्वेष, बेचैनी, साथ-साथ, अमूर्त दुनिया का फैलाव भी जो इंसान स्वयं बनाता है जिसमें सारा जीवन व्यतीत होता है! जिस दिन स्वयं को जानकर ...
मुझमें मेरा विश्वास जिंदा रहने दो
कविता

मुझमें मेरा विश्वास जिंदा रहने दो

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** जिसको जो भी कहना है, उसे कहने दो थोड़ा बाकी है जीवन सूकून से अब रहने दो! बेमतलबी रिश्तों के कच्चे धागे टूट जाने दो जिस राह पर ले जाए वक़्त उस राह पर चलने दो! बहुत मुश्किल होता है सबके सांचों में खुद को ढालना, थोड़ा सा ही सही मुझमे "मैं" जिंदा रहने दो! सीख लिया है सबक जीवों की मुस्कराहट में मुस्कराने का, लोगों को मेरी मुस्कान से जलन होने दो! हँस के जीना है हर हाल में, परिभाषा है जीने की, हर ओर यही किस्सा अब मशहूर होने दो! यूँ ही नहीं मिट जाएगा अस्तित्व मेरा , मुझमें ये विश्वास मेरा जिंदा रहने दो!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार) निवासी...
नारी के दो मन
कविता

नारी के दो मन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक नारी के दो मन की कहीं व्याख्या नहीं मिलती !! एक मन जो सब कुछ चुपचाप सहन करता है, तो दूसरा विद्रोह करने को आतुर ! एक मन छोड देना चाहता है सबकुछ, क्योंकि वो जानता है सब निरर्थक है, दूसरा मन लालायित होता है सब सुविधाएं भोगने हेतु ! एक मन सदैव झुका रहता है, करुना, ममता और परवाह में, दूसरा मन निश्चिन्त-मस्तमौला बन चलना चाहता है ! कभी-कभी ये दोनों मन शांत हो जाते हैं, भीतर ही भीतर संवाद करते हैं ! एक मन दूसरे को मौन साधने को कहता है, बोलने से बिखराव का भय दिखाता है, दूसरा मन मंद मंद ध्वनि में अपनी व्यथा कहना चाहता है ! वो पूछना चाहता है, कितनी पीड़ाओं से और गुजरना होगा, सब कुछ सम्भालने के लिए?? स्वयं के अस्तित्व को खो जाने का डर भी बताना चाहता है ! वह शांति और प्रकृति ...
प्रेम करना सीखें
कविता

प्रेम करना सीखें

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** प्रेम निभाना सीखें प्रेम तो हर कोई कर लेता है, प्रेम का अर्थ समझे बिना प्रेम व्यर्थ है ! इस जीवन के सफर में सब कुछ पीछे छूटता जाता है, केवल स्मृतियाँ ही शेष रह जाती हैं , समय के साथ ये स्मृतियां भी धुंधली पड़ने लगती हैं , मानो रेत की गहराई में दब कर कहीं गुम हो जाती हैं ! बाकी बच जाता है, रिक्तता-मौन, जो बचा खुचा प्रेम भी सोख लेती है ! मौन का अर्थ अहंकार नहीं होता, कभी-कभी भावनाओं की थकान होती है, टूटते विश्वास और थकते दिल की गवाही होती है, निःशब्द अन्तराल के बाद वेदनाओं की बहती कहानी होती है!! मौन इतना गहरा हो जाता है, जहां से शब्द टकरा कर वापस लौट आते हैं एक प्रतीकात्मक प्रतीक्षा रह जाती है, अंतहीन प्रतीक्षा, जहां प्रेम के लौटने की कोई आहट नहीं आती!! परिचय ...
साकार रूप लेता सपना
कविता

साकार रूप लेता सपना

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक दिन मैं यूँ ही सड़क पर गुजर रहा था, रास्ते पर कुछ गिरा पड़ा था, बीमार, भूख-प्यास, से निढाल, सड़क के आध बीच लगा जैसे मेरा स्वप्न पड़ा हो !! एक श्वान था, जीवित किन्तु मरणासन्न स्थिति में! आत्मा सहित अपनी श्वास की तरह समेत लिया स्वयं में!! उस दिन बहुत कुछ गिरा मेरे अस्तित्व से मोह- माया, राग-द्वेष, क्रोध- अहंकार, तमाम संपत्तियां भी मेरे जेब से गिरी थी, मेरी गृहस्थी भी गिरी थी उस दिन!! मेरे पास था नन्हा जीवन जिसकी आंखों में मुझे मेरे सपने दिखाई दे रहे थे, ममता- करुणा, स्नेह से भरे जीवन जीने का स्वप्न! उसी दिन मैंने ईश्वर से ऋग्वेद के चरवाहों की करुणा-स्नेह और संरक्षण मांगा जीवों के जीवन के लिए ! धरती से बस अपने शरीर जितनी जगह मांगी, प्रकृति माँ से हल जितनी शक्ति से जुट स...
जगत पालनहार माँ
कविता

जगत पालनहार माँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शक्ति का स्वरूप हैं माँ हम सब की भक्ति का रूप हैं माँ मुक्ति का धाम हैं माँ हर जीव के जीवन का आधार है माँ !! माँ के नौ रूप निराले करुणा, ममता, मिले अपार दया-प्रेम से सुशोभित है रूप सभी रूप अद्भुत साकार!! विध्वंस किया सब असुरों का ज़न-ज़न का कल्याण किया धरा, गगन, नदियां, उपवन अद्भुत अनुपम उपहार दिया, निज स्वार्थ वश अंधे होकर हमने इनका तिरस्कार किया!! माता की सवारी है सिंह, मयूर, गर्दभ, गजराज, हंस और मृग गजराज, वृषभ और गौ माता सारे जीवो से सजा स्वरूप!! सारे जीवों में जब वास है इनका तब क्यों होता इनका दोहन, इनका भक्षण इनका शोषण?? कैसे हम भक्त कहलाते हैं, कैसी भक्ति, कैसा पूजन??? चहुँ ओर मचा है हाहाकार हर घर मे आया है काल हे माँ तुम ही हो पालनहार करो दया दृ...
मैं जब भी जाऊंगी
कविता

मैं जब भी जाऊंगी

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** जब भी जाऊंगी, कोई प्रश्न अधूरा नहीं छोड़ूगीं, पूर्ण विराम लगा कर जाऊँगी! अर्धविराम रिश्तों को जीवित नहीं रहने देता है, जीवन मे समर्पण होना चाहिए! प्रेम जीवन का आदि और अंत दोनों होता है! प्रेम में अधूरेपन की कोई जगह नहीं होती उसमे पूर्ण समर्पण होना चाहिए, अपने आराध्य के प्रति संपूर्ण समर्पण! दिल मे कोई दुविधा नहीं, मन मे कोई प्रश्न नहीं, प्रेम स्पष्ट निर्णय होना चाहिए! शांत भाव से भीतर ही मिट जाना, फिर शब्दों मे कोई ठहराव नहीं होता! कोई अपूर्णता नहीं छोड़कर जाऊँगी, प्रेम की परिभाषा पूर्ण करके विदा होऊँगी!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवा...
मेरी बूढ़ी अम्माँ
कविता

मेरी बूढ़ी अम्माँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** सुघड़ता और संस्कारों की बुलन्द इमारत हैं बूढ़ी अम्मा, भोजन, पापड़ और अचार बनाती, बिना नाप जोख के अद्भुत स्वाद, दिलाती। जो घर के सारे काम, एक साथ करते हुए, सारे प्रबंधन को मात देती उनके हर काम में सुघड़ता दिखती! फिर भी नहीं कही गई कोई कहानी कोई किस्से उनके लिए, जिसने अपने हाथों के स्वाद से, अपने व्यवहार से, पीढ़ी-दर-पीढ़ी को तृप्त किया और सँवारा है ! बल्कि उन बूढ़ी होती काया पर आधुनिक न होने का प्रश्न चिन्ह लगाया है !! सभी को खुश रखना, सदा सबका आभार जताते रहने में सारी उम्र बिता दी ! समय ऐसा भी आया नहीं कोई और अम्मा, उन बूढ़ी अम्मा के पद चिन्हों को ग्रहण करना चाहती, नहीं आत्मसात करना चाहती उनके सद्गुण भरे आचरण को, क्यूँ की इनकी योग्यता की कोई डिग्री, कोई प्रमाणपत्र नही...