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चार लोग कुछ नहीं कहेंगे तो क्या होगा

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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चार लोगों की चिंता इस दुनियादारी में सभी को है। सभी एक-दूसरे को बस यही नसीहत देने में लगे रहते हैं, “देखो, ऐसा मत करो। अगर ऐसा किया तो चार लोग क्या कहेंगे, पता है? चार लोग देख लेंगे तो… अरे, चार लोगों का तो ख्याल करो!” लेकिन सोशल मीडिया ही एक ऐसी जगह है, जहाँ इसके उलट, इन चार लोगों का इंतजार किया जाता है। सोशल मीडिया में वही चार लोग अचानक देवता बन जाते हैं। हसरत भरी निगाह से बस चार लोग आ जाएँ मेरी पोस्ट पर… कुछ कह जाएँ, और कुछ नहीं तो कम से कम लाइक का बटन ही दबा जाएँ। वरना पोस्ट की आत्मा अधर में लटक जायेगी मित्र ।
पोस्ट डालते ही मन की स्थिति किसी मछुआरे जैसी हो जाती है। काँटा पानी में फेंका और आँखें लहरों पर टिकीं हुई, कब कोई कमेंट रूपी मछली फँसे। मोबाइल स्क्रीन उस तालाब का पानी है, जिसमें हर कुछ सेकंड में झाँककर देखा जाता है, “कुछ हलचल हुई क्या?” सोशल मीडिया ने इंसान को लेखक से ज्यादा लेखा-जोखा रखने वाला बना दिया है। दिनभर का पूरा बैलेंस शीट सामने होता है, पोस्ट की इकोनॉमी समझाई जाती है। आपकी सोशल मीडिया पर हुई बढ़त, GDP के आँकड़े, आपकी सोशल स्टेटस और अर्निंग, प्रॉफिट और लॉस का पूरा लेखा-जोखा।
कितने लोगों ने देखा, कितनों ने अनदेखा किया, किसने दिल दिया, किसने अंगूठा दिखाया। यहाँ भावनाओं से ज्यादा आँकड़ों का बोलबाला है।
आपकी पोस्ट की “रीच” अब आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा की नई मुद्रा बन चुकी है। और फिर शुरू होता है ज्ञान का महाभारत,
“थोड़ा और एक्टिव रहिए।”
“दूसरों को लाइक कीजिए, तभी आपकी पोस्ट चलेगी।”
“थोड़ा प्रमोशन करिए… कुछ खर्च करिए… ये निवेश है!”
ऐसा लगता है मानो पोस्ट नहीं, कोई स्टार्टअप लॉन्च कर दिया हो, जिसे फंडिंग चाहिए।

लेकिन सच्चाई यह है कि हम जैसे लोग पोस्ट डालकर “नेकी कर दरिया में डाल” वाले संत नहीं बन पाते। हम तो दरिया में डाली नेकी के पीछे-पीछे तैरते रहते हैं, देखने कि कहीं वह बहकर लाइक के किनारे लगी या नहीं। दस मिनट तक कोई प्रतिक्रिया न आए, तो मन में आत्मचिंतन की आंधी चल पड़ती है,
“शायद लिखना ठीक नहीं था…”
“लोगों को समझ नहीं आया…”
और जब आत्मविश्वास पूरी तरह डगमगा जाए, तो दोष सीधे एल्गोरिदम महाराज के सिर पर डाल दिया जाता है,
“उन्होंने ही पहुँच घटा दी होगी!”
फिर भी उम्मीद का दीपक टिमटिमाता रहता है, कम से कम चार लाइक तो आ ही जाएं।
क्योंकि यही चार लोग अब डिजिटल मोक्ष के द्वारपाल बन चुके हैं। चार लाइक मिल जाएं, तो लगता है पोस्ट ने गंगास्नान कर लिया। सोशल मीडिया का यह खेल बड़ा दिलचस्प है, यहाँ “तुम मेरे यहाँ, मैं तुम्हारे यहाँ” का सिद्धांत चलता है। गिव एंड टेक का मामला..l हां, चार
लाइक, क्योंकि चार लोगों के बिना यह दुनिया अधूरी लगती है। बस चार लोग मिल जाएं, तो मेरी पोस्ट गंगा नहा जाए।फिर वो नेटवर्क मार्केटिंग वाले का प्रेरक वाक्य याद आता है, ’अरे मुर्दा आदमी भी चार लोग कन्धा दें के लिए जुटा लेता है, तुम तो अभी ज़िंदा हो।’
व्हाट्सएप ग्रुप में तो यह खेल और भी रहस्यमय हो जाता है। जिस दिन अपनी पोस्ट डालो, उसी दिन सन्नाटा छा जाता है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने समूह पर ग्रहण लगा दिया हो। मन में तुरंत संशय उठता है,
“कहीं मेरी पोस्ट ही पनौती तो नहीं है?”
“हटा दूं क्या? लेकिन एडमिन क्या सोचेंगे?”

और फिर खुद पर भी शक होने लगता है, “अगर मैं दूसरों की पोस्ट पर प्रतिक्रिया दूँगा, तो लोग समझेंगे कि मैं अपनी पोस्ट का ट्रैफिक
बढ़ा रहा हूँ।” मानो हर लाइक एक मार्केटिंग साजिश हो! हालांकि भीतर का इंसान अभी पूरी तरह मरा नहीं है। वह जानता है कि प्रतिक्रिया देना सिर्फ दिखावा नहीं, संवाद भी है। लाइक और कमेंट से शब्दों को साँस मिलती है, और समूह में जीवंतता बनी रहती है।
लेकिन यह भावना भी अब “डिस्क्लेमर” बनकर रह गई है, मानो पहले ही सफाई देनी पद रही हो।
अब पोस्ट डाल दी है। मोबाइल सामने रखा है, दिल धड़क रहा है। देखते हैं, आज कितने “चार लोग” कृपा दृष्टि डालते हैं। “अल्लाह के नाम पर एक लाइक दे दो… बदले में तुम्हें हजार मिलें ,ऐसी दुआ है मेरी।”

परिचय :-  डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन)  किताबगंज   प्रकाशन,  गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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