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पिता

सौरभ डोरवाल
जयपुर (राजस्थान)

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आज फिर वो शख्स याद आया,
मेरे साथ मेरा बचपन खेला।
मेरी जरुरत पूरी करते-करते,
बड़ी कठिनाइयों को झेला।।

सर्द, गर्म बारिश झेली,
दिन रात कर दिए एक।
मन में इच्छा यही बसी थी,
मेरा बेटा बन जाए नेक।।

दुःख देखा, सुख देखा,
समय नही था उनको
खुद के अरमान के लिए।
सब कुछ किया,
सब कुछ सह कर किया,
सिर्फ मेरी मुस्कान के लिए।।

गया जिस दिन वो शक्स,
मेरा सारा सुरूर चला गया।
मेरे पिता के साथ ही,
मेरा सारा गुरुर चला गया।।

पिता ने परिवार संभाला,
संभाली घर की सारी जिम्मेदारी।
घर को घर बनाया, सुविधाएँ करी,
पर उन सबमे नही थी
उनकी हिस्सेदारी।।

देखा है संघर्ष पिता का मैंने,
उन्ही के पदचिन्हों पर चल रहा हूँ।
लोग ना जाने क्या समझते है,
मैं तो आज भी उन्ही की
मेहनत से पल रहा हूँ।।

परिचय : सौरभ डोरवाल
निवासी : भोजपुरा, जिला- जयपुर (राजस्थान)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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2 Comments

  • P S khangarot

    अति सुंदर और पिता की मन का सही भाव लिखा हे आप ने संतान के लिए जो अपनी आखिरी सांस तक एक पिता के मन की इच्छा होती हैं

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