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कुछ तो दोष मेरा भी है

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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सारा दोष दूसरों पर मढ़ कर
मैं अपनी जिम्मेदारी
से भाग नहीं सकता,
लोग स्वेच्छा से चलने लगे हैं
सामाजिक जागरूकता की राहों पर
तो क्या मैं खुद जाग नहीं सकता,
ताउम्र मैं, मैं, मैं की नीति पर चला हूं,
अपना कर्तव्य भूल बहुतों को छला हूं,
स्वार्थी परमारथ की राह में नहीं जाते,
कांटे बोने वाले कभी कांटे नहीं उठाते,
मगर राह के हमें ही उठाने होंगे,
उन टेढ़े-मेढ़े राहों पर
हमें ही आने जाने होंगे,
पढ़ने की औकात नहीं थी पर पढ़ा,
बाबा साहब के अहसानों से
एक उचित स्थान गढ़ा,
खुद को देखता रहा
अपनी राह गया आया,
अभी तक समाज
को कुछ नहीं लौटाया,
न किसी की शिक्षा में सहयोग,
न किसी के उत्थान में सहयोग,
सारी कमाई का करता
रहा स्वयं उपभोग,
प्रचलित परिपाटी के
विरुद्ध मुंह नहीं खोला,
सामाजिक मुद्दों पर
कभी खुल कर नहीं बोला,
खुद पर सिमट
कर खोजता रहा
सामाजिक चिंतन
मनन के अनुयायी,
समाज को लगती चोट की
कभी किया ही नहीं भरपाई,
हर रात के बाद होता सवेरा भी है,
खुद के आकलन पर पाता हूं कि
कुछ तो दोष मेरा भी है।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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