Monday, October 19राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

Tag: राजेन्द्र लाहिरी

अभी उड़ान बाकी है
कविता

अभी उड़ान बाकी है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जितना रोकना था रोक चुके, जितना टोकना था टोक चुके, अभी बनाना पहचान बाकी है, बिटिया की लंबी उड़ान बाकी है। देवी, देवता, आस्था, संस्कार, थामे हुए थी आपकी संसार, मान्यता, धागा, डोरी, पाखंड, करते रहे हो उन्हें खंड-खंड, कितनी उड़ेगी देखना एक दिन पाने को पूरा आसमान बाकी है। झाड़ू-पोछा, बर्तन, चूल्हा-चौका, हर स्तर पर टोका न दे मौका, देहरी से किंचित क्या निकला कदम, कुत्ते चुप रहे हर बार तूने भौका, टूटेगी जिस दिन तेरा उच्चता भाव, गिरेगा भरभराकर तमतमाता ताव, दुनिया के हर ग्रंथों का होगा चीरफाड़ होना स्त्री का पूरा आख्यान बाकी है। जब तक न दोगे पूर्ण रूप से तवज्जो उनके नजरिये से संपूर्ण समाधान बाकी है। जितना रोकना था रोक चुके, जितना टोकना था टोक चुके, अभी बनाना पहचान बाकी है, बिटिया की लंबी उड़ान बाकी है। ...
सच्चा भारत
कविता

सच्चा भारत

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** दलित, पिछड़े और सवर्ण हम सबको पास बुलाते हैं, हैं सभी नागरिक इस देश के, सबको गले लगाते हैं, इंसानियत ही धर्म है अपना, पीड़ा महसूसना मर्म है अपना, ईद, दीवाली और क्रिसमस मिलकर हम मनाते हैं, कर देते हैं सबको ताकीद, हक़ और अधिकार से सब हों वाकिफ़, छल-कपट कर लोगों को हरिजन नहीं बनाते हैं, तोड़ कुरीति की जंजीरें, हम नया दौर अब लाएंगे, जात-पात के ठेकेदारों को आईना रोज दिखलाएंगे, संविधान की शपथ उठाकर, हर आंचल को खुशहाल करें, मजहब से ऊपर उठकर हम, इंसान गले से लगाएंगे, नफरत की जो आंधी उठी, उसे मोहब्बत से मोड़ेंगे, टूटे हुए जो दिल हैं उनको, भाईचारे से जोड़ेंगे, अनेकता में एकता ही, इस पावन धरा की शक्ति है, तिरंगे की इस शान की खातिर, खुद का सर्वस्व निचोड़ेंगे। परिचय :-  राजेन्द्र ल...
सच्चा शिक्षक
कविता

सच्चा शिक्षक

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मेरी जाति जानने के इच्छुक मेरे नन्हे विद्यार्थियों, अब मैं तुम्हें रोज नई बातें सिखाऊंगा, जाति-पांति जरूरी या मजबूरी नहीं बताऊंगा। लील चुकी है इस प्रश्न में छुपी भावनाएं कई अबोध और मासूम जिंदगियां, इसने समाज को केवल गरल ही दिया, विभाजन की दीवारों को अब मैं ढहाऊंगा। न मैं अगड़ा हूँ, न मैं पिछड़ा हूँ, न मैं किसी ऊंचे-नीचे भेद में बिखरा हूँ, मेरी कलम, मेरा ज्ञान ही मेरी पहचान है, तुम्हारे भविष्य को सँवारना ही मेरा ईमान है। तुम्हें किताबों के अक्षरों से आगे सोचना सिखाऊंगा, भेदभाव की इस संकीर्ण सोच से तुम्हें बचाऊंगा, मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है इस जहाँ में, तुम्हारे कोमल मनों में यही अलख जगाऊंगा। छोड़कर पीछे जात-पात के हर झूठे बंधन को, ज्ञान के प्रकाश से महकाऊंगा तुम्हारे जीवन को, कल...
उम्र का तकाज़ा
कविता

उम्र का तकाज़ा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सफेद बालों को देखकर अपनी पत्नी से कह दिया कि अब तो तुम बूढ़ी हो रही हो, अपने आज में खो रही हो, उसने तपाक से कहा, बुढ़ापे की निशानी तुम पर भी बहुत भारी है, बताओ क्या करने की तैयारी है? मैंने हँसकर फिर धीमे से कहा, चाह रहा हूँ बच्चे बड़े हो जाएं, अपने पैरों पर खड़े हो जाएं, पर ये बड़े होना क्यों नहीं चाह रहे? समुद्र से भी गहरे जीवन को क्यों नहीं थाह रहे? बचपन की उस मासूम छांव में न जाने क्या ढूंढ रहे हैं, कागज़ की कश्तियों से अपनी खुशियों को मूंद रहे हैं, ज़िम्मेदारी के इस लंबे सफ़र से शायद ये थोड़े अनजान हैं, तभी तो खिलौनों की दुनिया में इनके बसते अभी प्राण हैं, चलो, वक़्त को अपनी रफ़्तार चलने दें, इनकी नादानियों को कुछ दिन और पलने दें, जब वक़्त का थपेड़ा आएगा, यह समंदर इन्हें खुद तैरना...
क्या पहाड़ बूढ़ा हो गया
कविता

क्या पहाड़ बूढ़ा हो गया

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जो कल तक था अडिग पहाड़, वो आज बोझ बन गया, बदले वक्त के इस दौर में, बाबा आदम की खोज बन गया, जिस कंधे पर बैठकर कभी तुम मेला देखा करते थे, आज वो कंधा कांप रहा, तो तुम दूर हटा करते थे, तुम्हारी एक हंसी की खातिर, वो सौ-सौ बार मरा होगा, फट गई थीं बिवाइयां पैर की, पर वो मीलों चला होगा, तुम्हें सूट और बूट पहनाकर, खुद फटे कुरते में जिया, स्वाभिमान बेचकर अपना, उसने तुम्हारी फीस का कर्ज दिया, वो धूप में जला,वो रातों को जागा, ताकि तुम्हारा कल संवर सके, तुम बड़े शहर के साहिब बनो, और दुनिया में तुम्हारा नाम चल सके, पर आज जब उसकी आंखों का पानी, थोड़ा सा धुंधलाया है, तुम्हें उसका कांपता हाथ और बूढ़ा चेहरा, पुराना सा साया नजर आया है, जिंदगी भर जो ढाल बना, हर मुश्किल को हंसकर झेला था, सोचो जरा उस बूढ़े दि...
स्वयंभू भगवानों से सवाल
कविता

स्वयंभू भगवानों से सवाल

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** थोड़ा देकर ज्यादा छीन लेते हो, कम रहता है उसे बहुत गिन देते हो, संवैधानिक हक़ को अहसान बताते हो, गाहे-बगाहे इसे हर मंच से सुनाते हो, हे तथाकथित स्वयंभू भगवानों, नागरिकों को बेवकूफ न जानो, जो खून-पसीना बहाकर टैक्स चुकाता है, वो दो वक़्त की रोटी को तरसाया जाता है, तुम देकर चंद टुकड़े मुफ़्त की खैरात के, दावा करते हो जैसे पाल रहे हो कायनात के, अपनी ही जेब से हम लुटते आ रहे हैं, और तुम हर चौराहे पर ढोल बजा रहे हो, हक़ मांगें तो लाठियां और जेल मिलती है, तुम्हारी चौसर की बिसात पर ज़िंदगी ढलती है, अब आँखों से ये भरम का पर्दा हटेगा, तुम्हारी झूठी रहमतों का ये खेल मिटेगा, ये देश किसी की बपौती या जागीर नहीं, जनता ही लिखेगी अब अपनी तक़दीर नई, उतर जाओ कुर्सी के झूठे गुमान से, बात करो अब अदब और संविधान से, वक़्त बद...
अब इंकलाब बनने दो
कविता

अब इंकलाब बनने दो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मैं हूं ही इंकलाब तो इंकलाब बनने दे, देख लेना मेरे दिल के दाग कभी और, देखो अगन उदर की अभी उसे भरने दो, ये खोखली परंपराएं, ये पाखंड की दीवारें, कब तक सहेंगी भूखे पेट की हुंकारें? तुम पूजते हो पत्थर, इंसानों को दुत्कारते, जात-पात के नाम पर बस्तियां उजाड़ते, अब तोड़ दो ये बेड़ियां, ये भरम सब ढहने दो, देखो अगन उदर की अभी उसे भरने दो, अस्पृश्यता का यह कलंक, समाज का ये रोग है, तुम्हारी नजरों में अछूत, क्या वो नहीं लोग हैं? लहू का रंग एक है, एक जैसी प्यास है, फिर क्यों धरा पर फैला ये नफरत का इतिहास है? इस ऊंच-नीच के भेद को अब राख में मिलने दो, देखो अगन उदर की अभी उसे भरने दो। तिलक, तराजू, ढोंग से अब पेट नहीं भरता, मजदूर अपनी मेहनत से भाग्य खुद लिखता, छल-कपट के इस तंत्र को अब तार-तार हो ...
अब और क्या चाहती है तू?
कविता

अब और क्या चाहती है तू?

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** अब बता भी दे जरा, और क्या चाहती है तू मुझसे, तंग आ चुका हूं तुझसे, विवाहोपरांत मेरी पत्नी, क्लोज नहीं हो पायी उतनी, उतना दखलंदाजी कर रही है मेरे मन मंदर में, किनारे पाने के लिए मार रहा हूं हाथ पांव डूबता जा रहा हूं तुझ जैसे समंदर में, क्या जादूगरनी है तू, क्या मेरे पल-पल की विवरणी है तू, रील्स की आभासी दुनिया में, कैसा यह जाल बिछाया है, बैठे हैं सब एक ही छत के नीचे, पर हर शख्स यहां पर पराया है, बच्चे की किलकारी छूटी, रिश्तों की वो गर्माहट टूटी, तेरी नीली रोशनी के चक्कर में, अपनों की हर शिकायत रूठी, तूने फुसफुसाकर कानों में, अपनों की आवाज को छीन लिया, नोटिफिकेशन के इस दलदल ने, मेरा चैन, मेरा हर दिन लिया, अब बस भी कर ऐ काली स्क्रीन, मुझे मेरी दुनिया वापस दे, जहाँ स्क्रीन नहीं, बस चेहरे ह...
गोहरावत हे हसदेव
आंचलिक बोली, कविता

गोहरावत हे हसदेव

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) चिचियावत डोलत हांसत हे, मन ल देख वो थरथर कांपत हे, कइसे बचावंव तन, डारा अउ पाना ल, छिटका कुरिया म लावंव कइसे दाना ल, बता बघवा बेटा अब कइसे गुंर्राबे रे, हाथी बेटा कोन पत्ता ल तैं खाबे रे, हुंआ हुंआ कइसे अब कहिबे कोलिहा, झोल डारत हे मोला परदेशी झोलहा, मोर कोरा म आही कइसे मिट्ठा पानी, धन फेंका जाही मोर कर्मठ कहानी, कोन लकरी छवाही कुंदरा के छानी, का किस्सा सुनाही अब नाना अउ नानी, बुटूर-बुटूर घर के मुखिया देखत हे, खीसा भर डारे अउ आंखी सेंकत हे, सुध हवा पानी अब कहां ले लाबे, मोर हिरदे के पीरा कहां गोहराबे, इंखर आंखी के पीरा ल कइसे कसबे, अब तो पर गे तोला सूरी अउ फांसी, कहां जावय बता ए भई, गोहरावत हे हसदेव, हसदेव... कइसे बचाहीं अपन जंगल ल, कइसे बचाहीं अपन पानी, कइसे बचाहीं चिरई-चुरग...
जंग जारी है
कविता

जंग जारी है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जंग जारी है... अंग्रेजों के चले जाने से ही खत्म नहीं हो जाती आजादी की लड़ाई, अभी भी भरे पड़े हैं इस देश के भीतर बहुत से अंग्रेज़परस्त लोग, व्यक्तिगत लालसा पाले लोग। लाखों हैं जिन्हें नहीं पता बमुश्किल मिली आजादी की कीमत, बुनियाद हिलाने बैठे हैं दीमक पर दीमक। हमें नहीं शिकायत वतन के शूरवीरों से, पर कैसे भूल जाएँ कि हो रहा है देश घायल भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, आतंकवाद और पाखंड जैसे तीरों से। शकुनि जैसे लोग चल रहे रह-रहकर चाल पर चाल, आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश हो रहा निढाल। बेरोजगारी बढ़ रही जैसे सुरसा का मुख, कौन सुने नौजवानों के दुख? स्वतंत्रता की जंग अभी भी जारी है, बाहर आ ही जाने है खबर किसकी देशद्रोहियों से गहरी यारी है। परिचय :-  र...
ओढ़ ली खामोशी मैंने
कविता

ओढ़ ली खामोशी मैंने

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** ओढ़ ली खामोशी मैंने, किसी हथियार के रूप में नहीं, बस अपने बचाव के लिए, महसूस हो रहे दुराव के लिए, करता रहा अब तक निर्देशित सबको, नास्तिक मन द्वारा मान चुके, अपने परिवार रूपी रब को, पर अब निर्देशन किसी को सुहाता नहीं है, मेरी मौजूदगी भी किसी को सुहाता नहीं है, चकित हूँ अचानक से आए मेहमान के लिए, जिसने एकांत का यह कमरा सजा दिया, और मेरी ही महफ़िल में मुझे पराया बना दिया, वक्त बदला तो रिश्तों के मायने बदल गए, जो कभी साए थे, वो धूप बनके ढल गए, मेरी हर सलाह अब इक दीवार सी लगती है, अपनों के बीच भी यह जिंदगी बीमार सी लगती है, शब्द थक चुके हैं अब मिन्नतें करते-करते, थक गया हूँ मैं भी अंदर ही अंदर मरते-मरते, इसलिए अब मैंने चुप रहने का हुनर सीख लिया, शिकायतों के पन्नों को भीतर ही भ...
आदिवासी मूलनिवासी
कविता

आदिवासी मूलनिवासी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जल, जंगल और जमीन के असली मालिक, आपकी दुर्गति के कारण हैं खुद को सभ्य कहने वाले असभ्य, बर्बर, नोचकर संपत्ति बनाने वाले वो लोग जो आज भी लगे हैं अपनी उसी जुगत में, धर्म, संस्कृति, आविष्कार और विकास की बात करते हुए, ले आये हैं धरती को विनाश के कगार पर, एक दिन वे भी मारे जायेंगे अपनी अकड़ के साथ ही, और हां अपनी लालसा की सजा प्रकृति द्वारा दिलवाएंगे सभी जीवों को व धरतीपुत्रों को भी। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित कर...
आधुनिक दरबार का तमाशा
कविता

आधुनिक दरबार का तमाशा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** चारों तरफ धुआँ उठा है, तुम सिंहासन पर आँख मूँदे बैठे हो, राजकोष खाली पड़ा है, पर चेहरे पर शाही नूर ओढ़े बैठे हो, रंगमंच का वो मूक अभिनेता भी, तुमसे ज़्यादा समझदार निकला, तुम जलते हुए शहर में भी, जीत का जश्न साधे बैठे हो, शुक्र मनाओ इस बहरे दौर का, जिसने तुम्हें 'प्रधान' किया, वरना जनता के तीखे सवालों ने, कब का बेनकाब कर दिया होता, भूख की लंबी कतारों को, अब तुम 'अनुशासन की परेड' बताते हो, खाली पेट राष्ट्रवाद का राग फूंककर, तुम उत्सव मनाते हो, आईटी सेल के चारण-भाटों ने, तुम्हें एक ही मन्त्र सिखाया है, "साहेब अमर हैं", चाहे देश ने अपना सब कुछ गँवाया है, बेरोजगारी का ज्वर बढ़ा है? तो आंकड़ों से उसे डराओ तुम, संविधान की साँसें कम हैं? तो विज्ञापनों का ठहाका लगाओ तुम, नेताओं के चुनावी जुमलों पर, अब ...
सिधवा आदमी अउ सोझ गोठ
आंचलिक बोली, कविता

सिधवा आदमी अउ सोझ गोठ

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) सिधवा आदमी अउ सोझ गोठ, फांक मिलय चाहे कड़कड़ नोट, छल-कपट के रस्ता ला छोड़, सच्चाई से सदा रखथें जोड़, मन के भीतर कोनो कसर नइ, बाहर तौने, भीतर घलो वोइ, नइ जानय वो चलाकी के खेल, सबो संग रखथे मया के मेल, अमृत बरोबर ओकर बानी, सरल सुभाव ह ओकर निसानी, दुनिया भले कहय ओला भोला, परम संतोख के ओढ़े हे चोला, मेहनत के ओ खाय कमाय, कुटिल मन ओला कभू नइ भाय, बांटय मया अउ बांटय हांस, ओकर रहनी-कहनी म बिस्वास, झूठ के कोठार ले वो दूर, अपन धरम म रहिथे चूर, पर पीरा ला अपन वो जानय, सबो ला अपन संगी मानय, लइका मन असन निस्छल हांस, चंदन कस महके ओकर सांस, दुनिया म अइसन मनखे हे अनमोल, कोनो नइ लगा सकय ओकर मोल, सिधवा रहि के जियत हे जीवन, ओकरे दुआरे खुश हे भुवन। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी नि...
भ्रम का विसर्जन
कविता

भ्रम का विसर्जन

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां हम छोड़ेंगे, तुमसे डरना छोड़ेंगे, सदियों का जो गुरूर11 पाल रखे हो मन में वो भ्रम भी तोड़ेंगे, डरना हमारी बपौती नहीं था, वो थी हमारी मजबूरी, अब खाल खींच लेंगे तुम्हारे ओछी अकड़, तुम्हें अंदाजा नहीं हमारे पकड़ की, गुड़ खाने वालों, क्यों है तुम्हें परहेज गुलगुलों से, कर जाते हो ज्यादती कपोत और बुलबुलों से, तुमने जो बांटी थी नफ़रत की दीवारें, तुमने जो रची थी ऊंच-नीच की कतारें, अब उन बेड़ियों को जड़ से उखाड़ रहे हैं, तुम्हारे पाखंड का पन्ना-पन्ना फाड़ रहे हैं, अब न कोई दबा कुचला, न कोई लाचार रहेगा, बराबर का हक होगा, बराबर का अधिकार रहेगा, उठ खड़ा हुआ है अब इंसानियत का सैलाब, मांग रहा है तुमसे सदियों का हिसाब, पहचान लिया है हमने तुम्हारी चालों को, अब ढहा रहे हैं तुम्हारे इन महलों ...
ख़ामोशी का फ़ैसला
कविता

ख़ामोशी का फ़ैसला

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** तोड़े हैं गलतफहमियों ने मेरे सारे रिश्ते, जिन्हें मैं समझता था फरिश्ते, अब पता नहीं उन सबको खुन्नस किस बात की थी, शायद कभी उनके दिल में नहीं कदर मेरे जज्बात की थी, जिनकी जबान लड़खड़ाती थी आते ही सामने मेरे, आज बदलते वक्त के साथ उनके तेवर बदल गए, उन जबानों से निकले आग से झुलसा है मेरा तनबदन, मेरे खामोश भरोसे का सरेआम कत्ल कर गए, जो कभी साया बनकर साथ थे, आज वो अजनबी से भी बदतर हैं, हर सफाई यहाँ अब एक गुनाह है, और सुनने वाले सब पत्थर हैं, इसलिए, अब मैंने भी बेजरूरत सफाइयां देने की जरूरत नहीं समझता, जो मुझे समझ न सका, उसे समझाने की जहमत नहीं करता, अब मैंने खुद को समेट लिया है, अपनी खामोशी की चादर में, क्योंकि हर रिश्ते की भीख मांगना अब मेरी फितरत में नहीं। परिचय :-  राजेन...
नेता जी के टारच
आंचलिक बोली, कविता

नेता जी के टारच

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) नेताजी अड़ गे, कहिथे हमर सरकार आय ले प्रदेश हर किलोमीटर भर आघु बढ़ गे, मय अकचका गंय, त फेर हमन काबर अपन जगेच म हवन, खिसकीच नहीं काबर हमर कुंदरा वाला भवन, कथे तैं नइ समझे जोजवा, तोर आंखी हेवय नवा खोजवा, हमर सरकार हर घर-घर गइच हवय, जेला जउन चीज के जरूरत रहिच वो हर चीज ल बांटिच हवय, फेर मय कहेंव तुंहर किलोमीटर भर वाला टारच कति कति बारे हवा, कति के अंधियार ल संघारे हवा? भाषण के उजियार ह नेताजी, सिरिफ पोस्टर म चकाचक दिखथे, हमर गाँव के नरवा-गरवा म, आज घलो अंधियारी रेंगथे, तुंहर बिकास ल कोन गरुवा हुदेनथे, कका,भतीजा,नोनी,बाबू, जम्मो झन अइसने बेहाल हवन, तुंहर आघु बढ़े के गोठ सुनके, हमन अपन जगे म थिरक आय हवन, बतावा त अइसन बिकास कति पाय हवन? परिचय :-  राजे...
जरा आगे बढ़कर तो देखो
कविता

जरा आगे बढ़कर तो देखो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** परंपराओं से आगे ज़रा बढ़कर तो देखो, पुरातन झंझावातों से थोड़ा उबरकर तो देखो। बदल दो उस व्यवस्था को, जो रोकती हो आगे बढ़ जाने से, समय के साथ कदमताल मिलाने से। हर व्यवस्था समय के साथ बदलती है, हर युग अपनी नई मान्यताएँ गढ़ती है। यदि जकड़े रहोगे बीते हुए विचारों में, तो जड़ता किसी की भी चेतना को ही कुतरती है। पगडंडियों और बैलगाड़ियों से निकलकर, हम रेल और हवाई सफ़र तक आ गए। जिन्होंने समय की चाल पहचानी, वे दुनिया भर में अपनी पहचान बना गए। जब उड़ने को नए पंख निकल आते हैं, घिसी-पिटी राहें फिर कहाँ सुहाते हैं। जब व्यवस्था किसी योग्य को ठुकरा देती है, तभी एक नया विचार जन्म लेता है, और संभावनाओं का नया आकाश देता है। न्यूटन, डार्विन, आइंस्टीन आज भी इसलिए याद हैं, क्योंकि उनके विचा...
जन्मदिवस
कविता

जन्मदिवस

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बढ़ता चला जा रहा हूँ के करीब, शनैः शनैः,अनवरत- आगे बढ़ने की प्रक्रिया जारी है सतत... दिन-ब-दिन कुछ खोते हुए, सबकी बधाइयाँ लेते हुए, काफी समय बाद जब देखता हूं पीछे मुड़कर, लगता है जैसे बचपन से बुढ़ापे में आ गया हूँ उड़कर। खेलकूद, शिक्षा, प्रेयसी, पत्नी, पुत्र और पुत्री- जीवन चलता रहा मानो एक ही सूत्र में बँधी कड़ी। मौके आए कई अच्छे पद के, पर आड़े आईं सीमाएँ मेरी औकात और सामाजिक स्थिति की- वही सरहदें जो हर कदम पर मुझे रोकती रहीं, तोड़ती रहीं। भरोसा दिलाने वाले अपने एक-एक कर मुकर गए, अपनी जिम्मेदारियों का बोझ मुझ पर छोड़कर उबर गए। फिर शुरू हुआ दौर संघर्ष का- चंद सिक्के कमाने का, और शिक्षा के विमर्श में खुद को बचाए रखने का। राहें गुज़रीं कठिन परिश्रम से, मैं दूर होता गया अप...
जीवित रहने के मायने
कविता

जीवित रहने के मायने

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां देखा है मैंने लोगों को जीवित रहने के लिए करते हुए कवायद, दुआओं से लेकर अपने इष्ठों से करते खुशामद, धन, दौलत, जमीन, घर व बर्तन, सब बेच चाहते हैं रखना स्वस्थ अपना तन-मन, मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारों के साथ ही लगाते रहते हैं इस डॉक्टर से उस डॉक्टर के घर आंगन के निश दिन चक्कर, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक रूप से डटकर, सिर्फ बेहतर स्वास्थ्य के लिए, इनके तन-मन की पीड़ा किया जा सकता है महसूस, नजर आते कोई प्रसन्न तो लगते दिखते कई तो नाखुश, क्या नहीं आता होगा उनके मन में अपनी इह लीला समाप्त कर लेने का ख्याल, संघर्ष कर उबरने का मौका देता कुदरत बेमिसाल, तो बताओ अरबों खरबों के इस अमूल्य तन को समाप्त कर लेने के लिए हम खुदकुशी जैसा वाहियात कदम उठाएं क्यों, अपनी आंतरिक शक्ति को ...
मैं नहीं मासूम या भोला
कविता

मैं नहीं मासूम या भोला

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मत कह मुझे सीधासाधा, भोला या मासूम, वक्त पड़े तो दिखा सकता हूँ अपना अनदेखा रौद्र रूप। कर लो जितनी मनमानियाँ करनी हैं, जो कर रहे हो, करते रहो, औरों के हिस्से छीनकर अपने महल सजाते रहो। मैं उस दिलासे में नहीं जीता कि ऊपर बैठा कोई देख रहा है, या कहीं छिपकर तुम्हारे कर्मों पर आँखें सेंक रहा है। जिस दिन मैंने देखना शुरू कर दिया, हिसाब लगाना शुरू कर दिया, उस दिन से उठ सकता है ऐसा सैलाब जो बड़े-बड़ों को बहा सकता है, सच, हकीकत और व्यवहार का आईना दिखा सकता है। मैं प्रारंभ से ही खोता आया हूँ जिसे तुमने सहेज रखा है डर, धमकी और दंभ के सहारे। मेरी चुप्पी मेरी कमजोरी नहीं, सहन करना कोई सीनाजोरी नहीं। जिस दिन अपने नुकसान की कीमत ठीक-ठीक आँक लूँगा, उखाड़ दूँगा तुम्हारी किस्मत और भाग्य की जड़ें। ...
कलम न उठाने के कारण
कविता

कलम न उठाने के कारण

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** तुम्हारे सहे हुए उत्पीड़न का दर्द, जो तुमने कभी नहीं लिखा, उसकी सज़ा तुम्हारी औलादें क्यों और कब तक भुगतें? काश! तुमने उसे शब्दों में ढाला होता, दुनिया को उसका चेहरा दिखाया होता, तो शायद अत्याचारी सबक ले चुके होते, फिर बहती गंगा में हाथ न धोते। या तुम्हारी पीड़ा पढ़कर कोई अपना हाथ इतना मजबूत कर चुका होता, कि किसी की हिम्मत न पड़ती वही अत्याचार दोहराने की, जिन्हें न संविधान का भय है, न परवाह जमाने की। हाँ, यह भी संभव था कि तुम्हारे ही रक्त के लोग बदले की राह पर निकल पड़ते, पर तुमने संतोष कर लिया उन्हीं के दिए हुए नामों के आगे गिड़गिड़ाती प्रार्थनाओं से। यह कैसी नज़ीर गढ़ रहे हो इतने विशाल समाज के सामने, कि लोग डर-डरकर जीते रहें, कायर बनकर सब सहते रहें, और पुरखों की तरह अपन...
जवाब एक विकृत मानसिकता को
कविता

जवाब एक विकृत मानसिकता को

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मत भूल, नारी केवल घर की नहीं, समाज और सभ्यता के सम्मान की पहचान होती है, संस्कारों की धड़कन, परिवार की मुस्कान होती है। पर तू तो जाति के मद में डूबा हुआ, अपने ही बनाए दायरों में कैद खड़ा है, मानवता से कोसों दूर, अहंकार के शिखर पर चढ़ा है। सोचता हूं, तू अपनी माँ, बहन, बेटियों को किस दृष्टि से देखता होगा, क्या अब भी उन्हें पुरानी जंजीरों में ही बांधता होगा? तेरी पीड़ा का कारण यही है कि जिन्हें तुमने सदियों तक पायदान से अधिक नहीं समझा, उन्हीं में से एक बेटी ने जन-जन के विश्वास का मुकाम रचा। संविधान की राह पर चलकर न्याय और प्रशासन का मान बढ़ाया, समाज के हर वर्ग को साथ लेकर समानता का दीप जलाया। लेकिन जाति के संकरे नालों में पलने वाले खुले आकाश का अर्थ कहाँ जानेंगे, स्वयं को विश्लेषक क...
डिजिटल रिश्ते
कविता

डिजिटल रिश्ते

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सोशल मीडिया पर आकर रख जाते दिल का हाल, पर जब कोई पूछे रिश्तों का सच, तो चुप हो जाते तत्काल। डिजिटल रिश्तेदार हजारों-लाखों में मिल जाएंगे, मगर अपने ही घर के रिश्ते अक्सर भूखे रह जाएंगे। मन हुआ तो स्टेटस देखा, लाइक किया, इमोजी भेज दिया, औपचारिकता की चादर ओढ़ स्नेह का कर्तव्य पूरा कर लिया। लगाव कब का खत्म हो चुका, बाकी नहीं बचा एक प्रतिशत, भावनाएं अब फाइलों जैसी, रिश्ते बन बैठे हैं डेटा-संचित। घर में कोई शुभ आयोजन हो, निमंत्रण जाए हर द्वार, कुछ लोग बेमन से आएंगे, निभाने भर को व्यवहार। खाया-पीया, सलाहें दीं, व्यवस्था पर टिप्पणी सुनाई, फिर यह कहकर चल देंगे- "घर में बहुत व्यस्तता भाई।" और जो कल तक निखट्टू थे, बदनाम थे जिनके नाम, वही शायद सबसे ज्यादा बताये घर में है अपना काम। रि...
आपबीती
कविता

आपबीती

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** रिश्ते मजबूर है हमसे, इसीलिए सब दूर है हमसे, जो नादानियां नहीं की हमने कहा उसका सुरूर है हमसे, पलकों पर बिठाये, खिलाये, पिलाये, वो दिखाते गुरूर है हमसे, अन्न की कमी का अहसास होने नहीं दिया कभी हमने, हमी को कहते मगरूर हमसे, कांधे पर बिठाया, पढ़ाया लिखाया, अब उन्हें शिकवा भरपूर है हमसे, दिल में बसे रहे रात दिन जो पता नहीं क्यों दूर है हमसे, जा ले ले घर जमीं और खुशियां अब बता भी जा क्या फितूर है हमसे, वारने ही वाला था सब कुछ हर सितम ढाना मंजूर है हमसे, आपबीती सुनाऊं और कितना कहा सबने यही दस्तूर है हमसे। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया...