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पहचान जाहिर हो

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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सिर्फ रोने से काम नहीं चलेगा मित्र
अब दरों दीवार पर सिर पटकना होगा,
तथाकथित आत्माओं, भूतों की तरह
अतृप्त हो इधर-उधर भटकना होगा,
जिस तरह हाथी के दांत खाने के और
दिखाने के और होते हैं,
उसी तरह लोगों को अपनी संतुष्टि जताने
उछलना कूदना मटकना होगा,
बंधे नहीं हो मोटी जंजीरों में,
आशावादी हो अपनी अनदेखी तकदीरों से,
मगर सिर फंसाए हो अंधभक्ति में,
आश्वस्त हो इसकी शक्ति में,
तो तैयार हो ये सोच कि
मूत्र पी गोबर गटकना होगा,
तब तक स्वीकार्य नहीं हो,
अंधत्व की सारी अदाएं शिरोधार्य नहीं हो,
इन अदाओं के साथ पूरी तरह तैयार हो,
देश को खोखला करने वाले अब अय्यार हो,
तैयार किये गये हो छांट चुनकर,
बर्बाद ए मस्तिष्क को भरोसा है तुम पर,
स्वतंत्र रहने के लिए नियमों को झटकना होगा
सिर्फ रोने से काम नहीं चलेगा मित्र
अब दरों दीवार पर सिर पटकना होगा।।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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