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अंधभक्ति का कोल्हू

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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देश की मिट्टी पुकारे,
पर वो सुनते ही नहीं,
ज़ख्म गहरे हैं बहुत,
पर ख़्वाब बुनते ही नहीं,
विकट परिस्थितियों में
जिनकी आंखें भीगती नहीं,
ऐसे देशद्रोहियों को
बरबादी दिखती नहीं,
सच्चाई का आईना देखो,
धूल से है पट गया,
तर्क की हर बात पर,
विवेक उनका कट गया,
अजीब सी नशे में
वे झूम रहे हैं,
कोल्हू की बैल सा
गोल घूम रहे हैं,
झूठ के दरबार में वे,
सच की बलि चढ़ा रहे,
बिना सोचे-समझे बस,
जयकारे लगा रहे,
व्यक्ति पूजा की
बिसात बिछा रहे हैं,
नक्कालों के गीत
अहमक खूब गा रहे हैं,
बढ़ रही है बेरुखी और
चेतना सब सो गई,
लगता है इंसानों की
मानवता कहीं खो गई,
भूख से लाचार जनता,
बिलखती हर मोड़ पर,
मस्त हैं वे चेले सारे,
हकीकत को छोड़ कर,
सवाल जो भी पूछता,
उसे विद्रोही बताते हैं,
नफरतों के बीज बोकर,
रोटियां वे सेकते हैं,
चाटुकारी के हुनर में,
हर कोई उस्ताद है,
सोचते नहीं कि इससे,
देश ही बर्बाद है,
जब होश आएगा उन्हें,
तब वक़्त निकल जाएगा,
यह अंधा चश्मा एक दिन,
पूरे चमन को खाएगा,
जागो कि अब ढल रही है,
लोकतंत्र की यह ढाल,
मूर्खता के जाल में,
फंस रहा है हर लाल।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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