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दादी का गांव
कविता

दादी का गांव

डॉ. आभा माथुर उन्नाव (कानपुर) ******************** सुबह हो गई मीठी-मीठी लाली छाई चारों ओर चीं-चीं, चूं-चूं, काँव-काँव का सारे नभ में छाया शोर आशु उठा अँगड़ाई लेकर जल्दी उसे नहाना है नाश्ता कर बस्ता लेकर जल्दी स्कूल जाना है तभी उसे आ गई याद कल दीदी की कही बात कल से गर्मी की छुट्टी है एक मास की छुट्टी है मन उड़ गया सैर करने लगा गगन में मन उड़ने "पक्षी चूँ-चूँ क्यों करते हैं? क्या यह हमसे कुछ कहते हैं?" उसने पूछा कौए भाई तुम काँव-काँव क्यों करते हो? जो कहना है स्पष्ट कहो, संकेतों में क्यों कहते हो?" कौआ बोला काँव-काँव आशु चलो दादी के गाँव गाँव में दादी रहती हैं राह तुम्हारी तकती हैं कल से गर्मी की छुट्टी है एक मास की मस्ती है आशु गया मम्मी के पास बोला "मम्मी सुन लो बात कल से गर्मी की छुट्टी है एक मास की मस्ती है दादी के घर जाना है नदी में ख़...
सत्य की पुकार
कविता

सत्य की पुकार

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मेरे भीतर का संत मुझसे कुछ कहता है। कहता है उठो देखो नया सूरज निकला है। शास्त्र का प्रकाश फैला है, शास्त्र पढ़ो। शास्त्रों को गुनों, सुनो और समझो। शास्त्र जीवन का निर्माण करते हैं, सँवारते हैं। वे उजाले का सबको नित दान करते हैं। सत्य लेकर संघर्ष करो, तो मंज़िल पाओगे। नित सुख-आनंद के नग़मे, नित गाओगे।। सूरज की नियत गति भी तो यही सिखाती है। जगहित का भाव सतत् फैलाती है।। शास्त्र लेकर हरदम बढ़ना ही होगा। बाधाएँ राहों में उनसे लड़ना ही होगा।। काँटे ही तो फूलों का मोल बताते हैं। जो योद्धा हैं तूफ़ाँ से नित भिड़ जाते हैं।। चलना है तो चलो भले कदम थक जाते हैं। मंगलगान सुनाओ क्यों पग रुक जाते हैं।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इत...
मुड़ता कलम का रुख
कविता

मुड़ता कलम का रुख

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** परेशां अरमानों का रुख मोड़ दिया, कलम का वो निर्भीक दौर ही छोड़ दिया, सच की स्याही अब बोझिल लगने लगी, इसलिए झूठ का सहारा थाम लिया। झूठ लिखो तो वाह-वाह के फूल खिलें, सच लिखो तो शब्दों के कंठ ही सिलें, इतना भारी हो गया है झूठ का ताज, सच दम तोड़े, नीचे गिरते ही मिलें। हाथी अब हवा में उड़ने लगे हैं, बाज़ों के पर भी झुकने लगे हैं, थूकों से लड्डू बंधने लगे जहां, वहां सच के दीप भी बुझने लगे हैं। झांसे की चादर में लिपटी हकीकत, विज्ञापन ही बन बैठा है अब इबादत, जीवन की राहों में भ्रम का ये जाल, सपनों को सच मान खोती है चाहत। चांद को धरती पे लाने की बातें, हर आका करता है मीठी सौगातें, पर इन मीठी बातों के नीचे दबकर, सांसें भी पूछें- कहाँ हैं हकीकतें? जैसे-तैसे पटरी पर आती जो जिंदगी, ऐलानों की आंध...
छल की छाया
कविता

छल की छाया

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** अंतर्मन की गहराई में जो मोती प्रतीति के पलते हैं, थाह समंदर सी उद्गारों की शांत चित्त को धरते हैं। चेहरों के कुछ भ्रम जाल से मर्यादा जब कुंठित होती, पल में छल की छाया से क्षदम रावण भी सीता को हरते हैं। व्याकुल धाराएं उत्पात मचाती सागर सौम्य रसातल मिलते हैं, अक्षम्य कुटिल और छल के जो खेल विसात पर चलते हैं। छल के आडंबर में आकर धर्म कर्म भी भ्रमित होते, अपने ही अपनों में छल से चाल शकुनि सी चलते हैं। छल के क्षणभंगुर बुलबुले पल में उठते मिटते हैं, निष्कलक निष्पाप आत्मा, प्रतिबिंब निर्दोष उभरते हैं। मन मिलन में, भूल जलन से प्रेमगंध के पुष्प हैं खिलते, मन मस्तिष्क स्वासों की डोरी से रिश्ते विषम भी बंधते हैं। परिचय :- सूर्यपाल नामदेव "चंचल" शिक्षा : एम ए अर्थशास्त्र , एम बी ए ( रिटेल मैनेजमेंट) व्यव...
कुछ स्त्रियाँ
कविता

कुछ स्त्रियाँ

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* तुम्हारी किताबों से इतर हैं तुमारी क़लम उनको रच नही पाई कुछ स्त्रियाँ सिमोन की लेखनी से भी बच गयीं और अमृता भी उनको स्याही से उकेर नही पाई कुछ स्त्रियाँ जिनके बारे में अरस्तू नही जान पाया जबकि वो आधा ब्रम्हांड जान चुका था वो कुछ स्त्रियाँ जिनको पिकासो रंग नही पाया अपनी कूची से और न ही लियोनार्डो उनकी मुस्कान को मोनालिसा बना पाया वो कुछ साधारण सी स्त्रियाँ जिनको प्रेमचंद देख नही पाये और जो महादेवी की लेखनी से भी चूक गयीं वो अलबेली गुलाबी स्त्रियाँ रेगस्तानी, झुरमुटी बालों वाले रेतीले से लड़कों के माथे चूमती उन पर बिखर बिखर जाती हैं वो कुछ अनगढ़ सी सुरीली स्त्रियाँ अपने होने का शगुन जिंदगी को देती हैं खुद अपनी बलाएं उतार कर पेड़ पर खोंस आती हैं उन्होंने उतार दिए तुम्हारी आ...
आदेश
कविता

आदेश

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** शमशान की राख को सीने से लिपटाए फिरता हूँ, महाकाल का भगत हूँ उनका नाम लिए फिरते हूँ, मैं चुपचाप सभी की सुनता हूँ किसी को कुछ बोलता नहीं। आदेश है माँ महाकाली का बेमतलब इसलिए किसी को सताता नहीं। गुर्राता है कोई तो मैं चुप रहता हूँ फिर भी बेमतलब किसी को मौत की नींद सुलाता नहीं। खामोशियां है बहुत दफन मेरे इस सीने में मगर अपनी माँ काली के अलावा किसी को सुनाता नहीं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 रा...
सियान बबा
कविता

सियान बबा

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) पहुँना के संदेशा देय कउँवा हर उड़ागे। बड़े-छोटे के नाता ल मनखे हर भुलागे।। घर के सियान बबा के कोनों नइ सुनय। सुन घलों लिहि त कोनों नइ गुनय।। मनखे हर मनखे ले आज दूरिहा होगे। बेईमानी के कमाई आय के जरिया होगे।। बबा संग ठिठोली करइया कोनो नइ हे। सगा बरोबर अब तो कुरूर करिया होगे।। जुन्ना जिनिस आज फिर ले नवा होगे। खातिरदारी म जरूरी मंद महुँवा होगे।। बबा के गोहार ल आज कोनो नइ सुनय। कान रहिके मनखे हर आज कनवा होगे।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता ...
राम वनगमन (आल्हा/वीर छंद)
छंद

राम वनगमन (आल्हा/वीर छंद)

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** (आल्हा/वीर छंद) राम संग भी लक्ष्मण सीता, वन में जाने को तैयार। कौशल में सब लगे विलखने, छाती मुक्का दे-दे मार।। कैसे अब तो राज चलेगा, बुरा नगर का होगा हाल। यही सोचकर जनता प्यारी, रो-रो कर हो रही निढाल।। उधर महल में राजा दशरथ, हाय राम कर रहे पुकार। अंतिम साँसे गिन-गिन राजा, भोग रहे थे कष्ट अपार।। जीव-जंन्तु भी चौंक रहे थे, झेल रहे सदमे की मार। कोहराम सर्वत्र मचा था, सबके नयन बहाये धार।। इक कैकेई का मुखमंडल, चमक रहा था मानो खास। कुल कलंकिनी चहक रही थी, मानो उसके उर उल्लास ।। मना रही थी जल्दी वह तो, राम चले जाए वनवास। राज तिलक हो शीघ्र भरत का, कोई बाधा रहे न पास।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (प...
पृथ्वी दिवस
कविता

पृथ्वी दिवस

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मात्र एक दिन जिसको हमने नाम दिया "पृथ्वी दिवस" पर क्या कोई एक दिन पर्याप्त है हमारी उस "माँ" के लिए, जो हर पल, हमारी साँस में, वायु, जल अन्न, बनकर धड़कती है, हमारे जीवन मे। कभी थकती नहीं, कभी हारती नहीं, हम निरन्तर उसको रौंदा करते हैं, अद्भुत रंगों से सजी धरती का हम रक्त बहाया करते हैं, फिर भी वो हमे देती ही जाती है "जीवन"।। इस माँ ने हमें अनमोल उपहार दिए, रंग-बिरंगे, वन-उपवन, जीव-जंतु, पशु-पक्षी। कुछ नादानी, कुछ विकास की धुन... हमने इन चीजों को नष्ट किया। पर्वत-नदियां वन-उपवन सबका सीना छलनी किया, जीवों का संहार किया।। माँ की छटपटाहट को भी ना समझ सके, हजारों बार वो चीखी पहाड़ क्रोध से गरजे, फिर भी हम इस "माँ" का आँचल रक्तरंजित करते रहे। धरती माँ का कर्ज है हम पर ...
हिमाचल प्रदेश और केरल की संस्कृति, भूगोल और परंपराओं की तुलनात्मकता
आलेख

हिमाचल प्रदेश और केरल की संस्कृति, भूगोल और परंपराओं की तुलनात्मकता

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हिमाचल प्रदेश और केरल भारत के दो विविध राज्यों हैं, जहाँ पहाड़ी ठंडक और उष्णकटिबंधीय समुद्र तट अपनी-अपनी संस्कृति, भूगोल और परंपराओं को समृद्ध करते हैं। ये राज्य प्रकृति, त्योहारों और लोक जीवन से भरे हैं। हिमाचल प्रदेश (उत्तर भारत) और केरल (दक्षिण भारत) की संस्कृति और भूगोल एकदम भिन्न हैं। हिमाचल ठंडी घाटियों, ऊनी वस्त्रों, सेब के बागानों और लोक नृत्यों (नाटी) के लिए जाना जाता है, जबकि केरल गर्म तटीय जलवायु, सूती परिधानों, नारियल/मसालों और शास्त्रीय कलाओं (कथकली) का केंद्र है। दोनों राज्य उच्च साक्षरता और पर्यटन के लिए प्रसिद्ध हैं। हिमाचल प्रदेश और केरल की भौगोलिक स्थिति :- हिमाचल प्रदेश हिमालय की गोद में बसा पहाड़ी राज्य है, जिसका क्षेत्रफल लगभग ५५,६७३ वर्ग किलोमीटर है। यह उत्तर में जम्मू-कश्मीर, पूर्व में तिब्ब...
नफ़रत दिलों में
ग़ज़ल

नफ़रत दिलों में

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** वज़्न- २२१ २१२१ १२२१ २१२ अरकान- माफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईल फ़ाइलुन नफ़रत दिलों में अक़्ल पे छाई ग़ुबार है। हम आ गए कहाॅं पे ये कैसा दयार है।। बरसो बरस जो साथ रहे वो बदल गए। रिश्तो में कैसे आज ये आई दरार है।। मुझसे बिछड़ गए वही अपने थे जो कभी। आ जाओ पास मेरे की दिल बेकरार है।। घबरा न साथ वक़्त के चलना है सीखना बूढ़ा है पेड़ देख लो उस पे बहार है।। झूठों मे होड़ चल रही झूठा बड़ा है कौन। झूठों से बोले झूठ जो झूठा अपार है।। दुनिया में आया कैसे वो पैदा हुआ न जो। ऐसा अजूबा मुझको दिखा पहली बार है।। जो वो कहेंगे सच वही बाक़ी निज़ाम झूठ। मानो न मानो बात तुम्हें इख़्तियार है।। परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) भारत शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौ...
ईश्वर की करुणा
स्तुति

ईश्वर की करुणा

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** कोई भी सत्कर्म करे तू, प्रभु खाते में लिख लेता है। नहीं उधार वो रखता कुछ भी, तुरत तुझे फल दे देता है। कोई भी सत्कर्म... ईश्वर ने मानव देकर , बहुत बड़ा उपकार किया है। बुद्धि और विवेक भी देकर, मानव जीवन धन्य किया है। जब दुष्कर्म भाव आता, वो अंतर में डर भरता है। कोई भी... प्रभु सुमिरन और मानव सेवा, मित ये नर तन तूने पाया। वो बन गया दुलारा प्रभु का, जिसने सन्मार्ग अपनाया। जो धन व्यय करता दीनो मित, उनको और अधिक देता है। कोई भी... सृष्टि प्रभु की, तू भी प्रभु का, वो सबका पालन करता है। भक्त प्रहलाद की रक्षा करता, हिर्नाकश्यप वध करता है। पूर्ण समर्पण जो कर पाए, मां बनकर चिंता करता है। कोई भी ... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी ...
हंसती हुई औरत
कविता

हंसती हुई औरत

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ******************** हंसतीं हुई औरत अच्छी लगती है जैसे खिल गये हो गुलमोहर फैल गई हो सुगंधित बयार या सूरज की लालिमा या हंस रहा हो चांद समेट कर सारी धरती को अपने आगोश में असंख्य सितारे नभ में जगमगा उठे हों और दीपावली के दीप सी लौ अंधेरे को चीरकर उजास फैलाने आ गई हो। जब औरत हंसतीं है हंसते हैं उसके कान के झुमके मोतियों का कंठहार मांग का सिंदूर माथे की बिंदिया गाल में पड़े गढ़्ढे आंखों में प्यार के नगमे। जब औरत हंसतीं है हंसता है घर आंगन द्वार और रिश्ते हंसता है वक्त भी उन नगमों के लिए जिन्हें औरत हंसते हुए छेड़ देती है। स्तब्ध रह जाती है प्रकृति उस गुनगुनाहट को सुनकर इसलिए औरत जब हंसतीं है धरा गगन भी गुनगुनाने लगते हैं तुमने देखा है हंसतीं औरत को। हंसतीं हुई औरत अच्छी लगती है। परिचय :- सुधा गोयल निवासी : बुलंद श...
संतरंगी दुनिया- २०
व्यंग्य

संतरंगी दुनिया- २०

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** यदि आप अपनी पत्नी को खुश रखना चाहते हैं तो अपने पर्स का मुँह खुला रखें और अपना मुँह बंद रखें। वक़्त बदल गया है, पहले लड़कियाँ सफेद घोड़े पर राजकु‌मार की कल्पना किया करती थी, आजकल बीएमडब्ल्यू में गधा भी आ जाए तो चलता है। *दुनिया में सिर्फ एक दिल ही है, जो बिना रूके काम करता है; इसलिए दिल को खुश रखो, वो आपका हो या पराया।* कोई इंसान अगर आपको केवल जरूरत पड़‌ने पर याद करता है, तो उस बात का बुरा मत मानिए, क्योंकि जब अंधेरा हो जाता है, तभी दीए की याद आती है। डाकू और नेता दोनों ही डाका डालते हैं, पर देखिए- डाकू को कारावास मिलता है और नेता को कार-आवास !! *हमारे देश में लॉजिक कोई नहीं मानता, सबको मैजिक चाहिए, इसलिए यहाँ साइंटिस्ट के बजाय बाबा फेमस है।* मैं नास्तिक हूँ, क्योंकि मैंने धर्म की आड़ में धंधे देखे हैं; ईश्वर नहीं। हमार...
बचकर रहना कुटिल मुस्कानों से
कविता

बचकर रहना कुटिल मुस्कानों से

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** नफ़रतों के इस अंधे दौर में यदि कोई मोहब्बत लुटा जाए, तो उसे सिर माथे बिठाइए, दुआओं में उम्र उसकी बढ़ा जाए। ये यूँ ही नहीं उतरती धरती पर, ये कुदरत की कोई सौगात है, जहां हर ओर धुआँ ही धुआँ, वहीं ये सुकून की बरसात है। कहीं रंग पर जंग छिड़ी है, कहीं धर्म बना तलवार, कहीं जाति की जंजीरों में जकड़ा, इंसानियत हुई लाचार। अमीरी-गरीबी के खांचों में बंट चुका हर एक अहसास, इतनी गहरी धँसी है नफ़रत, कि डूबते को भी है भेद का त्रास। सैलाब में भी जाति पूछे, धर्म का हिसाब लगाया जाए, दया, करुणा, मर्म भुलाकर अहम का झंडा लहराया जाए। क्या सच में अब ज़रूरत नहीं इस दुनिया को अच्छाई की? या फिर आदत पड़ गई है हर बुराई पर वाहवाही की? वक्त है अब ठहरकर सोचने का, अपने भीतर झाँकने का, न कि झूठे बहकावों में आक...
पीपल सी बेटियां
कविता

पीपल सी बेटियां

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ******************** दीवार में उगे पीपल सी हो जाती हैं बेटियां उग आती हैं कहीं भी हरी भरी सी बेटियां चाहा था उगाना बेटों को पर उग आती हैं बेटियां बिना हवा पानी के भी जी जाती हैं बेटियां फिर भी चहकती रहती हैं दीवार में पीपल सी बेटियां धूप ताप पानी में भी मुस्करातीं है पीपल सी बेटियां। जो थीं कभी आंख का तारा पिता की राजकुमारियां शीतल छांह सी कहीं भी मुस्कराने लगतीं हैं बेटियां। अपने लिए कहीं भी स्थान बना लेती हैं बेटियां झूम लेती हैं हवा के झोंके सी दीवार में पीपल सी बेटियां। परिचय :- सुधा गोयल निवासी : बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐...
शांति का कोहराम
दोहा

शांति का कोहराम

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** दुकान किसान डेयरी, गत पीढ़ी के काम। फसी डोर सुलझी रहे, घर निवास सुखधाम।। अल्प इच्छा साधन सदा, रमती पीढ़ी थाह। बिन शोर ही बढ़ा बहुत, अदभुत थी परवाह।। खुद से ज्यादा और का, रखते थे जो ध्यान। ढ़ोल पीटकर ना दिए, वांछित था जो ज्ञान।। कम शब्द और मौन में, निहित रहा मंतव्य। अर्जित सार समेटकर, कोशिश पाने नव्य।। अनुशासन रचता रहा, मिलती वक्त भभूत। खतरों को जब भांपकर, चला चले जो दूत।। रहती आंखों में हया, सम्मान हद के पेंच। इसी डोर दोनों सिरे, बहुत संभलकर खेंच।। बुजुर्ग पीढ़ी देखता, वंश चरम बदलाव। यश दौलत से कम हुआ, केवल वक्त अभाव।। कमोबेश ही ये कथा, बनती ऐसी ढाल। कुछ बुजुर्ग बदहाल से, टाला करें बवाल ।। विवश युक्त ये दौर अब, करता है फरियाद। पूछ परख में झोल है, खुद सुनता वो नाद।। बच्चे सिर्फ दो या तीन, फिर दो...
पद का मद
छंद

पद का मद

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** सरसी (कबीर) छंद पद के मद में चूर हुआ जो, उससे रहिए दूर। भूल गया वो कल तक क्या था, आज हुआ मगरूर।। खुद को खुदा समझ बैठा है, हुआ बहुत अभिमान। तनिक नहीं अब शेष बचा है, उसके भीतर ज्ञान।। कल को जब ठोकर खायेगा, संग पीटेगा माथ। कहाँ समझता आज भला वो, नहीं मिलेगा साथ।। बँधी हुई आँखों पर पट्टी, उड़ता है आकाश। अपने हाथों स्वयं लिख रहा, खुद के आप विनाश।। शिकवा और शिकायत सबकी, चढ़े शीश बन पाप।। अपने पैरों मार कुल्हाड़ी, लेता है अभिशाप।। ईर्ष्या द्वेष दंभ में प्राणी, कहाँ कभी खुशहाल। अपनी स्वयं प्रशंसा कर ले, चलकर टेढ़ी चाल।। हाल-चाल कोई जब पूछे, मुँह बिचकाता जोर। नहीं किसी की वो है सुनता है, लगे व्यर्थ का शोर।। ऐसे लोगों का नहीं भरोसा, करें मित्र हम आप। ईश भरोसे आगे बढ़िए, मिटे सभी संताप।। अपने पथ से आप भटकक...
चुनाव में खड़े होने का नहीं, बैठने का मज़ा है
व्यंग्य

चुनाव में खड़े होने का नहीं, बैठने का मज़ा है

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आप कहेंगे, चुनाव तो खड़े होने के लिए होते हैं। बिल्कुल होते हैं, पर जनाब, चुनावी गणित यूँ ही नहीं जमता। यहाँ असली खेल यह नहीं कि कौन खड़ा है, बल्कि यह है कि कौन किसे बैठा सकता है। जो जितने ज़्यादा प्रत्याशियों को अपने पक्ष में “बैठा” ले, वही असली विजेता होता है। कई नेता तो जनता से वोट माँगने से पहले ही आधे प्रत्याशी खड़े कर लेते हैं,ताकि समय आने पर उन्हें अपने पक्ष में बैठा सकें। और कुछ को जानबूझकर खड़ा रहने दिया जाता है, ताकि वे विरोधी के वोट काट सकें। यह भी लोकतंत्र का एक सूक्ष्म, किंतु सशक्त गणित है। इसी गणित के स्थायी अध्यापक हैं हमारे मोहल्ले के बब्बन चाचा,चुनाव चाहे विधानसभा का हो, संसद का, पार्षद का या सरपंच का,चाचा हर बार खड़े मिलेंगे। ऐसे खड़े जैसे बगुला ध्यान लगाए किसी शिकार ...
सेवा निवृत्त और छड़ी
संस्मरण

सेवा निवृत्त और छड़ी

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** सेवा निवृत्त होने पर मन अत्यंत प्रसन्न था। सुबह से शाम तक रोज़ाना की भागदौड़ से छुटकारा मिलने की ख़ुशी के साथ यह सोचते हुए घर लौट रहा था कि आज घर मे सब लोग बहुत ख़ुश होगे किन्तु रोज़ आफिस से घर लौटने पर चाय पानी से स्वागत करने वाले आज कोई भी चाय व पानी के लिये नहीं पूछ रहा था। घर का वातावरण एकदम शांत लगने पर मेने पत्नी से पूछा सब ठीक है, उसने भी हाँ मे अपना सिर हिला दिया। ईश्वर कृपा से बच्चे शिक्षा पूरी कर अच्छे ओहदे पर नौकरी कर रहे थे। घर की समसत रुप से ज़िम्मेदारी पूरी कर भविष्य के जीवन यापन के लिये पर्याप्त धन संचय के साथ किसी प्रकार की चिंता फ़िक्र नहीं थी। समय के इस बदलाव के साथ सुबह देरी से उठना, अनियमित समय भोजन करना, टीवी के सामने दिन गुजारना व देर रात तक जागने के कारण स्वभाव मे चिड़चिड़ापन के साथ स्वास्थ्य भी कुछ ख़राब र...
शक
कविता

शक

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** बिना आग का धुँआ होता है शक दम तो घुटेगा ही जब हो जाये मन धुँआ धुँआ येे शक कहते हैं होता है लाइलाज बस उठता है धुँआ ही धुँआ जलती मनाग्नि में घी का काम करता है इन्सान का अपना अहम्..... दायरे विशाल हैं दुसरे तो सदैव ही रहते हैं शक के दायरे में कभी आ जाते हैं खुद अपने ही शक के दायरे में मगर कभी कोई पनप पाया है इन शक के दायरों में.... वर्चस्व जहाँ हो शक का प्रश्न ही कहाँ उठता है किसी और के अधिकार या फिर उसके हक का बस सुलगता रहता है धुँआ शक का... सबसे कमजोर कड़ी होती है इन्सानी जज्बात और प्यार वहीं लटकी रहती है सदा शक की सुई सड़ांध लाशों की भी रह जाती है दब कर जहाँ उठती है महक शक की.... प्रताड़ित करते औरों को पर स्वयं भी तिल तिल मरते हैं जहाँ फैला हो दबदबा बेरहम शक का मिलती ...
भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश
आलेख

भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत की सांस्कृतिक चेतना विविधताओं से परिपूर्ण है, जहाँ प्रत्येक क्षेत्र अपनी विशिष्ट पहचान और आध्यात्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र इसी परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है। यह भूमि केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध रही है। इसी क्षेत्र (जानापाव) से जुड़ी भगवान परशुराम की परंपरा इसे एक विशिष्ट गौरव प्रदान करती है। भगवान परशुराम का व्यक्तित्व भारतीय चिंतन में शक्ति, तप, ज्ञान और न्याय का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। उनका जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के यहाँ हुआ। वे भृगु वंश के थे और विशेष बात यह है कि वे एकमात्र ऐसे अवतार हैं, जिन्होंने ऋषि कुल में जन्म लेकर भी क्षत्रिय धर्...
दर्द मिटा दूँगा
कविता

दर्द मिटा दूँगा

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** तेरे दर्द को अल्फ़ाज़ दूंगा मत सोच तू अकेला हैं हर कदम पर तेरा साथ दूंगा। दर्द का समुंदर जो तेरे अंदर नित्य रफ़्ता-रफ़्ता बहता है उसको भी एक दिन किनारा दूंगा। जिस ख़ामोशी में समा रखा है छटपटाता तूने दर्द अपना उसको भी एक दिन आवाज़ दूंगा। एक शमां जो तूने रौशना रखी है खुद को ही मर मिटाने को बुझा उसको एक दिन तुम्हें अपने गले लगा लूंगा। जो अश़्क बहाते हो तुम चोरी-चोरी बैठे किसी कोने में उनको पोंछकर तेरे चेहरे पर जादू सी मुस्कराहट ला दूँगा। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच...
रोटी: “एक मुकम्मल दास्तां”
कविता

रोटी: “एक मुकम्मल दास्तां”

संगीता शुक्ला 'स्वरा' शहडोल (मध्यप्रदेश) ******************** तपते हुए सूरज का मंज़र है रोटी, मज़दूर के हाथों का ज़ेवर है रोटी। जो तोड़ता है दिन भर पत्थर, उसके पसीने का ही तेवर है रोटी। फटी हुई जेबों का मुक़द्दर है रोटी, सब्र की देहरी पर सबसे सादर है रोटी। तपती हुई भट्टी के बाहर है दुनिया, मगर चूल्हे की आग के अंदर है रोटी। छालों भरी हथेलियों की जुबानी है ये, थकी हुई आँखों का समंदर है रोटी। न सोने की चाहत, न चांदी की हसरत, गरीब के घर का तो कलंदर है रोटी। मिट्टी में दबकर जो सोना बनी है, मेहनत के बागों का अंबर है रोटी। महलों को क्या इल्म इसकी तपिश का, झोंपड़ी के लिए तो पैग़ंबर है रोटी। परिचय :  संगीता शुक्ला 'स्वरा' निवास : शहडोल (मध्यप्रदेश) संप्रति : साहित्यकार, मंचीय कवयित्री पुस्तक एकल संग्रह : स्वरा प्रवाहिनी चयनीत साहित्य अकादमी मध्य...
रिश्ते सभी व्यापार देखो
गीतिका

रिश्ते सभी व्यापार देखो

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** बस बुरे से कर रहा जग प्यार देखो। हो गया कैसा विकट संसार देखो।। मित्र भी बनते प्रतिष्ठा देखकर अब। हो गए रिश्ते सभी व्यापार देखो।। दंभ का भव रोग मानव को गया लग। है नहीं इसका कहीं उपचार देखो।। मुफ्त छोड़ो बॉंटना दो नौकरी अब। हो गरीबों का सही उद्धार देखो।। टूट जाते अब तनिक-सी बात में घर। आज नातों में न दृढ़ आधार देखो।। जब बुलावा आ गया तो चल दिए हम। काल-सम्मुख हैं सभी लाचार देखो।। आइना सच का लगा शिमला चटकने। झूठ का बढ़ने लगा बाजार देखो।। परिचय :- श्रीमती शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" निवासी : ग्वालियर (मध्यप्रदेश) रुचि : गद्य/पद्म लेखन एवं गायन घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में ...