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एक सैनिक का प्रेम
कविता

एक सैनिक का प्रेम

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* हाथों में यह कलम ना होती, निकलते न ये भाव, आंखें कभी ना रोती तन्हाई हमें यूं न चुभती यदि तुम मेरे पास होती आने वाला पल याद तुम्हारी लाता है जाने वाला पर टीस पीछे छोड़ जाता है जितना चाहा तुम्हें भूलना उतना ही तुम याद आती हो तुम्हें याद करने की जरूरत ना होती यदि तुम मेरे पास होती तुम्हें कुछ लिखना चाहा, जब भी मैंने भावों को शब्दों में ना बांध पाया दिल की आवाज सुन लेती आंखों की जुबान समझ लेती यदि तुम मेरे पास होती बाहों में तुझे ले लूँ, चाह ये बार-बार होती दामन में तेरे, सर रख रोता सिंदूर मांग में तेरी भर देता सोचते-सोचते दिन कितने गुजर गए हालत हमारी यूं ना होती यदि तुम मेरे पास होती।। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी ...
दास्तान-ए-सांड
व्यंग्य

दास्तान-ए-सांड

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** मेरा जन्मदिन अभी दूर है, लेकिन हमारे यहाँ जन्मदिन की तैयारियाँ किसी चुनाव से कम नहीं होतीं-घोषणापत्र पहले, कार्यक्रम बाद में। इस बार तय हुआ है कि गायों को चारा और गुड़ खिलाकर जन्मदिन मनाया जाएगा। शहर में इन दिनों गौ-प्रेम फैशन में है। हर मोहल्ले में गौ-आश्रम उग आए हैं-कुछ श्रद्धा से, कुछ फोटो से और कुछ फेसबुक प्रेमियों के सेवा सेल्फी प्रेम से। जब से हमारे योग-गुरु बाबा ने सौंदर्य प्रसाधन से लेकर दवा-दारू तक में गाय का तड़का लगाया है, गाय पाँच सितारा शो-रूम की वस्तु बन चुकी है। देसी गाय अब श्रद्धा की नहीं, औकात की चीज़ हो गई है। गाय से हमारा रिश्ता नया नहीं है। बचपन से पाठ्यक्रम में थी-“गाय हमारी माता है।” निबंध में, उपलों में, होली की बालुडियों में, और सुबह के मक्खन में गाय बराबर मौजूद ...
सतरंगी दुनिया- २८
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- २८

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  पत्नी ने घर में ज्यादा खाना बनाया तो पति ने पूछा कि घर में खाने वाले हम ३ लोग हैं, फिर तुमने ढेर सारा खाना किसके लिए बनाया है। पत्नी ने प्यारा-सा उत्तर दिया,- मुझे बचे हुए भोजन से विविध व्यंजन बनाने की विधि सीखनी है। आजकल की नौकरानी का हाल देखिए, मालकिन ने नई नौकरानी को समझाते हुए कहा, देख मैं ज्यादा बोलना पसंद नहीं करती। अगर में अंगुली का इशारा करूं तो समझ लेना कि में बुला रही हूँ। नौकरानी बोली,- मैडम मैं भी ज्यादा बोलना पसंद नहीं करती। अगर मैं सर हिला दूं तो आप समझ लेना कि मैं नहीं आ सकती। *एक ६० साल की उम्र वाले व्यक्ति की टी शर्ट पर एक शानदार वाक्य लिखा था- मेरी उम्र ६० साल नहीं है, मैं तो केवल १६ साल का हूँ ४४ साल के अनुभव के साथ। इसे कहते हैं नजरिया।* परमात्मा कभी किसी का भाग्य नहीं लिखता है, बल्कि जीवन के ...
मिला दो राम से हनुमत
भजन

मिला दो राम से हनुमत

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** मिला दो राम से हनुमत, तेरा गुणगान गाएंगे। बताओगे जो भी युक्ति, उसे करके दिखाएंगे। मिला दो राम से हनुमत... प्रभु आराध्य है तेरे, मेरे आराध्य तो तुम हो। कृपा जो राम की पाए, उसे क्या कर दुष्कर हो। तेरी भक्ति फलित होगी, तो प्रभु भक्ति को पाएंगे। मिला दो राम से हनुमत... तुम्ही ने की कृपा सुग्रीव पर, तो राम को पाया। दिया सेवा का अवसर, और उसे भय मुक्त करवाया। तेरी करुणा कृपा से ही, तो दिल मेरा राम आएंगे। मिला दो राम से हनुमत... तेरे स्वामी की सेवा का, जो अवसर मैंने पाया है। तुम्ही से शक्ति लेकर के, उसे मैंने निभाया है। हैं जब तक प्राण तन में, हम तो यह सेवा निभाएंगे। मिला दो राम से हनुमत... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रच...
कंचन मृग छलता है अब भी
गीत

कंचन मृग छलता है अब भी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** कंचन मृग छलता है अब भी, जीवन है संग्राम। उथल-पुथल आती जीवन में, डसती काली रात। जाल फेंकते नित्य शिकारी, देते अपनी घात।। चहक रहे बेताल असुर सब, संकट आठों याम। बजता डंका स्वार्थ निरंतर, महँगा है हर माल। असली बन नकली है बिकता, होता निष्ठुर काल।। पीर हृदय की बढ़ती जाती, तन होता नीलाम। आदमीयत की लाश ढो रहे, अपने काँधे लाद। झूठ बिके बाजारों में अब, छल दम्भी आबाद।। खाल ओढ़ते बेशर्मी की, विद्रोही बदनाम। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सत...
मेरे पिता
कविता

मेरे पिता

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** मेरे लिए आन बान, शान है पिता धरती का साक्षात भगवान है पिता..!! सब रिश्तों का एक मिसाल है पिता अपनों के लिए बनते ढाल है पिता..!! छाले हो पांव में नहीं दिखाते है पिता कंधे पर बैठाकर भी घुमाते है पिता..!! पैरो पर खड़ा होना सिखाते है पिता सही, गलत का राह दिखाते है पिता..!! जिम्मेदारियों का बोझ उठाते है पिता गम सहकर खुद मुसकुराते है पिता..!! अपनो कि हर चाह पूरी करते है पिता दो में से दो रोटी देना जानते है पिता..!! भूखा रहकर बच्चों को खिलाते है पिता जिंदगी जीना बच्चों को सिखाते है पिता..!! डगमगाते कश्ती का खेवनहार है पिता बच्चों के लिए मानो पूरा संसार है पिता..!!! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा य...
डिजिटल रिश्ते
कविता

डिजिटल रिश्ते

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सोशल मीडिया पर आकर रख जाते दिल का हाल, पर जब कोई पूछे रिश्तों का सच, तो चुप हो जाते तत्काल। डिजिटल रिश्तेदार हजारों-लाखों में मिल जाएंगे, मगर अपने ही घर के रिश्ते अक्सर भूखे रह जाएंगे। मन हुआ तो स्टेटस देखा, लाइक किया, इमोजी भेज दिया, औपचारिकता की चादर ओढ़ स्नेह का कर्तव्य पूरा कर लिया। लगाव कब का खत्म हो चुका, बाकी नहीं बचा एक प्रतिशत, भावनाएं अब फाइलों जैसी, रिश्ते बन बैठे हैं डेटा-संचित। घर में कोई शुभ आयोजन हो, निमंत्रण जाए हर द्वार, कुछ लोग बेमन से आएंगे, निभाने भर को व्यवहार। खाया-पीया, सलाहें दीं, व्यवस्था पर टिप्पणी सुनाई, फिर यह कहकर चल देंगे- "घर में बहुत व्यस्तता भाई।" और जो कल तक निखट्टू थे, बदनाम थे जिनके नाम, वही शायद सबसे ज्यादा बताये घर में है अपना काम। रि...
पतझड़ जरूरी हैं
कविता

पतझड़ जरूरी हैं

प्रतिभा दुबे "आशी" ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** नई शाख़ों को आने के लिए, बसंत की बहार में नवीन, कोंपलों को खिलने के लिए...।। पतझड़ अंत नहीं मुक्ति है नवीन संचार के माध्यम से, प्रकृति की संरचना के फिर जीवंत हो उठने के लिए...।। पतझड़ भी ज़रूरी है फिर से बसंत आने के लिए क्योंकि चक्र यही चलता रहेगा मुरझाए मन को खिलाने के लिए...।। रौशनी जरूरी है... अंधकार को मिटाने के लिए जीवन यह क्षण भंगुर मात्र संतुष्टि जरूरी है यहाँ से जाने के लिए...।। तलाश करते रहे सुकून हम तलाशते रहे खुशियाँ मुस्कुराने के लिए ये पतझड़ एहसास दिलाता है एक जिंदगी काफी है मुस्कुराने के लिए...।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे "आशी" (स्वतंत्र लेखिका) निवासी : ग्वालियर (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना...
छाया वृक्ष की जड़ों से बंधी होती है
आलेख

छाया वृक्ष की जड़ों से बंधी होती है

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हमारी परंपराएं हमारी जड़ हैं, और हमारे बुजुर्ग वो पेड़ हैं, जिनकी छत्रछाया में हमारे घर परिवार का सम्मान सुरक्षित है। आज इतनी उच्छृंखलता श्री पीढ़ी में देखने को मिलती है, उसका मूल कारण है कि, आज बुजुर्गों को बेकार सामान समझकर रातों उन्हें वृद्ध आश्रम भेज दिया जाता है, अथवा घर में कोई भी उनकी सलाह लेना आवश्यक नहीं समझता है बस एक गैरजरूरी सामान समझकर उनका अपमान किया जाता है। वे दुखी होकर चुपचाप बैठे रहते हैं और समझौता कर लेते हैं। नतीजा हमारे सामने है। माता पिता आधुनिकता की दौड़ में बच्चों को मंहगी शिक्षा तो दिलवा रहे हैं, परंतु मर्यादित जीवन जीने की और संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा जो केवल जो जी चुके है, जीवन को उन्हें ही पता है। वह शिक्षा नहीं देता रहे हैं। बच्चे भटक रहे हैं। मनमानी न होने पर जीवन तक समाप्त करने को ...
खुद अपना हॉलमार्क बनिए
कविता

खुद अपना हॉलमार्क बनिए

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** खुद अपना हॉलमार्क बनिए, पहचान उधार न लीजिए, सत्य, श्रम और संस्कारों से जीवन का श्रृंगार कीजिए। भीड़ के पीछे चलने से व्यक्तित्व नहीं निखरता है, अपने कर्मों की चमक से ही हर चेहरा सँवरता है। सोने की शुद्धता जैसी हो मन की निर्मलता आपकी, ऐसी छाप छोड़ जाइए कि मिसाल बने हस्ती आपकी। आंधियाँ लाख आएँ पथ में, धैर्य कभी मत खोइए, अपने आदर्शों की ज्योति से हर अंधियारा धोइए। खुद अपना हॉलमार्क बनिए, यही सफलता का सार, चरित्र की खुशबू से महके जीवन का हर द्वार। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन का कार्य शुरू...
सपने
कविता

सपने

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मैंने कभी संजोए सपने सपनों मे खो, खो कर कई महल ढहाए मैंने सपनों में बना, बना कर। आया कोइ दूर गगन से तारागणों का समूह कर गया आंगन को दिप्त मेरे समा गया पुनः सपनों में अंजली में पुन्ज उलिचा मैंने सपनों के दोने से गति प्रकाश की देखी मैंने कोसों, मीलों थी जो दूर मन बवरा उड, उड जाता गगन क्षितिज से दूर। ये पर्वतों की हरियाली ये वृक्षों की छाया शाख, शाख पर क्यों पुकारें पी, पी पपिहा गान। सपने में जो मन्जर देखा देखा स्वयं को चहकते हुए आंख खुली तो न था पर्वत ना ही उलिजा गया कोइ पुन्ज। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के ल...
योग करो
कविता

योग करो

आशा जाकड़ 'आस' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** योग करो, योग करो, तन को रोग मुक्त करो। प्रातः उठ योगा करो, सारी बेचैनी दूर करो।। व्यायाम करने से मिलती है ऊर्जा स्फूर्ति। आध्यात्मिक, मानसिक व शारीरिक शक्ति। योग करने से रहता स्वस्थ तन-मन प्रसन्न। मन में अच्छे विचारों का होता है आगमन।। शुद्ध वायु मिले, प्रातः प्रतिदिन भ्रमण करो। पेड़ पौधे लगाओ, ऑक्सीजन प्राप्त करो।। योग हमारे जीवन का अच्छा सुलभ व्यायाम। प्रतिदिन करो अनुलोम, विलोम व प्राणायाम।। जीवन में यदि करोगे प्रतिदिन नियमित योग। कभी समीप न फटकेगा कोई चिंता या रोग।। परिचय :- आशा जाकड़ (शिक्षिका, साहित्यकार एवं समाजसेविका) शिक्षा - एम.ए. हिन्दी समाज शास्त्र बी.एड. जन्म स्थान - शिकोहाबाद (आगरा) निवासी - इंदौर (मध्य प्रदेश) व्यवसाय - सेन्ट पाल हा. सेकेंडरी स्कूल इन्दौर से सेवानिवृत्त शिक्षिका प्रकाशन कृति...
बहिनी
आंचलिक बोली, कविता

बहिनी

कामता साहू भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) सगा बरोबर दु दिन बर, मोर अंगना मा पाँव मड़ाथस।। दुख पीरा ल बिसरा के अपन, मया के गोठ गोठियाथस।। तोर आये ले घर दुवार हा, होरी, देवारी कस लागथे।। जइसे बसंत के आये ले, चिरई-चुरगुन मन चहकथे।। परिचय :- कामता साहू (शिक्षक) निवासी : भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) सम्प्रति : शिक्षक घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 60360 पर सूचित अवश्य करें …...
जिनगी के रद्दा
आंचलिक बोली

जिनगी के रद्दा

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी - गीत)12 वो दिन बढ़ सुघ्घर हो जाथे, दाई के भुवना म जोत जंवारा लहराथे, चैत के महीना खुशहाली के नवा बिहान लाथे, फेर नवा बछर के अंजोर बगराही कोन? मोर जिनगी के रद्दा बताही कोन? महिना बैसाख के हमाथे। अक्ति के भंवर लइका मन पुतरी पुतरा के परवाथे, ऐसो के लगिन म मोरो लग जातिस, दाई अपन मन के बात बताते, कैसे समझावव मैं तोला वो दाई, बिना रोजगार मोला, अपन बेटी के हाथ धराही कोन? मोर जिनगी के रद्दा दिखही कोन? मुंधेरहा के घाम मंझनिया कस जनाथे, सुरुज नारायण तरवा म चढ़ जाथे, जब महिना जेठ के आते, जरत भोंभरा तीपत हे छानी, बूंद-बूंद पानी बर तरसत परानी, जल बिन सुन्ना हमर जिगानी, फेर जल संरक्षण में महत्तम ला बताही कोन ? मोर जिनगी के रद्दा दिखही कोन? पियासे भुंईया के जी जुड़ाथे जब महीना आषाढ़ संग बरखा आते, ...
पिता का फर्ज
कविता

पिता का फर्ज

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** पिता हूँ, पिता का दर्द जानता हूँ ! गम छिपाकर मुसकुराने का मर्म जानता हूँ..!! छाले हो पांव में कोई गम नहीं ! कंधे पर बैठाकर दुनिया घुमाना जानता हूँ..!! ना दे कोई मुझे नसीहत जीने का ! अच्छी जिंदगी जीने का हर राज जानता हूँ..!! जिम्मेदारियों ने जकड़ लिए है पर मेरे ! वरना ख्वाबों के शहर में उड़ना जानता हूँ..!! अपनों की खुशी और अपनों का प्यार ! लक्ष्य है पिता की जिंदगी का मैं भी जानता हूँ..!! जी रहे है हम भी बेहतर जिंदगी ! पर पिता हूँ, पिता का हर फर्ज जानता हूँ…!! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं ...
सतगुरु चालीसा एवं आरती
चौपाई, दोहा

सतगुरु चालीसा एवं आरती

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** सतगुरु चालीसा -:दोहा:- गुरुवर की कर वंदना, नित्य झुकाऊँ माथ। प्रभु जी विनती आप से, रखना सिर पर हाथ।। -:चौपाई:- सतगुरु का जो वंदन करते। ज्ञान ज्योति निज जीवन भरते।।१ गुरू शिक्षा का तोड़ नहीं है। इससे सुंदर जोड़ नहीं है।।२ गुरु वंदन का शुभ दिन आया। सकल जगत का उर हर्षाया ।।३ गुरु चरणों में खुशियाँ बसतीं। सुरभित जीवन नदियाँ रसतीं।।४ गुरु दरिया में आप नहाओ। जीवन अपना स्वच्छ बनाओ।।५ गुरुवर जीवन साज सजाते। ठोंक-पीटकर ठोस बनाते।।६ पाठ पढ़ाते मर्यादा का। कष्ट मिटाते हर बाधा का।।७ गुरू कृपा सब पर बरसाते। समय-समय पर गले लगाते।।८ गुरुवर जीवन मर्म बताते। जीवन से अवरोध हटाते।।९ साहस शिक्षा गुरुवर देते। ज्ञान सीख उर में भर देते।।१० गुरू शिष्य का निर्मल नाता। जीवन को है सहज बनाता।।११ भेद-भा...
गुरुजनों की याद आती वाणी
कविता

गुरुजनों की याद आती वाणी

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** बचपन में पढ़ते वक्त, गुरूजी रहते रोज साथ कहते थे, पढोगे मन से, जीवनभर रहेगी बातें याद।। गुरुजी के मुखारबिंद से निकलते है ज्ञान के अनमोल वचन, ज्ञान की घुंटी पिलाकर सुनते रहे गुरूवचन बचपन के दिन याद करें याद आते अनमोल वचन, बच्चो सदैव याद रखना अनमोल महानवचन, गुरुजन के आजीवन अनमोलवचन ये है सच्चे धन, आते है याद, कहते रहे गुरुजी, भूलना कभी नहीं ज्ञान की मूलबात, हमेशा संग रखना अनमोल बात अटके जब जीवन में जब कोई काज करना लेना गुरुजी की बातें दिल से याद, विपत्ति में गुरुदेव की हो न हो आती है कही बात की याद, कहते सदैव गुरुजी, माता पिता, गुरुजनों परिवारजनों कुटुम्बजनों, और आत्मीयजनों से सदैव बनाये रखो प्रेम सदभाव व्यवहार और रखना सदैव आपसी अपनापन, स्नेहप्यार, मुलाकात बनाये रखो ऐसे मजबूत रिश्ते, अनुभव...
विषधरों को पालते हैं
गीत

विषधरों को पालते हैं

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** विषधरों को पालते हैं, जो डुबोते प्रेम-बेड़े। आह भरती है गरीबी, और पैसा तन उधेड़े।। क्षीण होती आस है अब, गाज छाती पर गिरी है। प्रेम निष्ठा खो गयी सब, जेब स्वारथ से घिरी है।। बह रही तृष्णा हृदय में, काल के खाकर थपेड़े। जब चुनावी दौर आता, सैकड़ो उत्पात होते। चाल चलते हैं शकुनि- सी, नित नए आघात होते।। लालचों के शाल मिलते, जीत के फिर साथ पेड़े। कागजी अखबार निशदिन, खोलते दिन-रात पोलें। फिर धजी का साँप बनता, मूक बहरे बोल बोलें।। किस तरह सागर तरेंगे, जर्जरित नावों के बेड़े। चोंच लंबी मौत की है, रोग करता देख हमला। पैंतरा बदला सभी ने, हो रहा है नित्य घपला।। आपदा की ये सदी है, सुत पिता को हैं खदेड़े। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट ...
ओलम (अनन्त प्रेम)
कविता

ओलम (अनन्त प्रेम)

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** जी रहा हूँ जीवन बड़ी ही शिद्दत से क्या मेरी पीड़ा का कारण बन तुम मुझे शून्य करोगे ? हारा तो कभी था ही नहीं मैं पर क्या छेड़ मेरे जज्बातों की तरंगों को मुझे तुम अधूरा करोगे? मानता हूं तुम्हें भेजा है उस खुदा ने स्वयं मेरे पास क्या छेड़ प्रेम का राग मुझे हीरा करोगे ? परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी मे...
गया जी का भास्कर-धाम-दर्शन : एक आध्यात्मिक संस्मरण
संस्मरण

गया जी का भास्कर-धाम-दर्शन : एक आध्यात्मिक संस्मरण

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** आज का सायंकाल मेरे लिए केवल एक सामान्य संध्या न होकर श्रद्धा, संस्कृति, मित्रता और आध्यात्मिक अनुभूति का एक अविस्मरणीय अवसर बन गया। गया जी में फल्गु नदी के पूर्वी तट पर स्थित पुराने पुल के निकट भास्कर घाट पर नवनिर्मित भव्य विराट सूर्य मंदिर और भगवान भास्कर के दर्शन और पूजन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह यात्रा केवल देवदर्शन तक सीमित नहीं रही, अपितु उसने मन को भारतीय सनातन संस्कृति की गहराइयों तक पहुँचाने का कार्य किया। सूर्य अस्ताचल की ओर अग्रसर थे। उनकी स्वर्णिम किरणें अंतः सलिला फल्गु के शांत तट पर बिखरकर एक अलौकिक छटा उत्पन्न कर रही थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं मार्तण्ड अपनी अंतिम किरणों से नव-निर्मित मंदिर का अभिषेक कर रहे हों। मंदिर की भव्यता, उसकी स्थापत्य-कला, उद्यान और वातावरण की पवित्रता ने...
मनुष्य होने का अर्थ
कविता

मनुष्य होने का अर्थ

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** मनुष्य होना केवल दो पैरों पर चलना नहीं है, न ही ऊँची इमारतें बनाना, समुद्रों को मापना या आकाश को छू लेना। मनुष्य होना एक भावना है, एक उत्तरदायित्व है, एक सतत संघर्ष है अपने भीतर की रोशनी को बचाए रखने का। जब पृथ्वी पर पहला मनुष्य आया होगा, तब उसके पास न धन था, न सत्ता, न विज्ञान। उसके पास केवल जीवन था और जीवन के प्रति एक आश्चर्य था। वह नदी को देखकर मुग्ध होता था, पेड़ों को देखकर प्रसन्न होता था, और आकाश को देखकर अपने छोटे होने का एहसास करता था। समय बीतता गया सभ्यताएँ बनीं, नगर बने, राज्य बने, और फिर महत्त्वाकांक्षाएँ भी। मनुष्य ने ज्ञान अर्जित किया, नई खोजें कीं, असंभव को संभव किया। उसने पर्वतों को काटकर रास्ते बनाए, नदियों पर पुल बनाए, और अंतरिक्ष तक पह...
पत्थर और माटी
कविता

पत्थर और माटी

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* पत्थर गिरा माटी पर माटी हो गई चूर पत्थर हुआ घमंड से भरपूर बोला अकड़ कर, देखा मेरा बल तुममें-मुझमें हैं कितना अंतर। माटी बोली सच कहा तुमनें पत्थर हैं बड़ा मुझमें और तुममें अंतर, मैं माटी तुम हो पत्थर, मैं देती जीवन जड़-चेतन कों, तुमसे मिलती केवल ढोकर, मैं खेतों में फसल ऊगाती, बागों में फू़ल महकाती, हरी-भरी धरती करती। पेड़-पौधे , फल-फूल, धरती का हर प्राणी, तुमसे होता आहत, रह जाते सब मन मारकर तुम देते केवल ठोकर, तुममें-मुझमें है अंतर मैं देती जीवन, तुम देते केवल ठोकर।। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मानि...
मुखौटे
कविता

मुखौटे

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** दर्द की दरारें चेहरे पर उभरने लगी जो इस कदर , होठों की सलवटें और मुखौटे दिखने लगे हर तरफ। मुफलिसी की निशानी पैबंद लिबास न होते अगर, मासूम की मासूमियत को मौसम की होती नहीं खबर। बाजारों की भीड़ में खोजते रहे वो आईना उम्र भर, बिंब सच के नकार, मुखौटे ही बदलते रहे मगर। पद मद शान ओ संपत्ति लिए भटकते रहे सदा दर ब दर, मिथ्या स्वार्थ के पसीने ही मुखौटे से रिसते रहे तर ब तर। कोई भूख से लड़ता रहा कोई उठ गया नींद से हार कर, मुखौटों के पीछे कोई ख्वाब की होती नही नजर। सब अपने हिस्से का अंधेरा ढो रहे हर डगर, यहां मुखौटों में उजाले की किसको कहां खबर। परिचय :- सूर्यपाल नामदेव "चंचल" शिक्षा : एम ए अर्थशास्त्र , एम बी ए ( रिटेल मैनेजमेंट) व्यवसाय : उद्यमी, प्रबंधन सलाहकार, कवि, लेखक, वक्ता निवासी : जयपुर (राज...
स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक
आलेख

स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर के पन्नों पर अंकित दिन नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना में सदैव जीवित रहने वाली प्रेरणाएँ बन जाती हैं। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, ६ जून १६७४ का दिन भारतीय इतिहास की ऐसी ही एक अमर तिथि है, जब रायगढ़ की पवित्र धरती पर श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ। यह घटना किसी राजा के सिंहासनारोहण का मात्र राजकीय आयोजन नहीं थी, बल्कि भारतीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वाधीन शासन की उद्घोषणा थी। उस दिन एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक हुआ था। सत्रहवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक अस्थिरता, विदेशी प्रभुत्व और सामाजिक निराशा के दौर से गुजर रहा था। सत्ता का केंद्र जनता से दूर था और शासन का उद्देश्य लोककल्याण के बजाय साम्राज्य विस्तार बन चुका था। ऐसे सम...
देवलोक का अमृतकाल बनाम मृत्युलोक में मानवता का पतनकाल
व्यंग्य

देवलोक का अमृतकाल बनाम मृत्युलोक में मानवता का पतनकाल

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** देवराज इंद्र की सभा सजी थी। देवलोक में "अमृतकाल महोत्सव" चल रहा था। अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं, अमरबेल के पुष्प बरस रहे थे और सोमरस की स्टॉल पर ऐसी भीड़ थी जैसी मृत्युलोक में तंदूरी रोटी की दुकान पर लगती है। तभी सभा में देवर्षि नारद का आगमन हुआ। इंद्र ने मुस्कुराकर कहा, “अहोभाग्य! आजकल तो आपका अधिक समय मृत्युलोक में ही बीतता है। कहीं किसी गठबंधन सरकार में मंत्री पद मिल गया क्या?” नारद ने कटाक्ष अनसुना कर पूछा, “देवराज, बताइए, देवता, दानव और मानव में श्रेष्ठ कौन है?” इंद्र चौंके, “अब आप भी हमारी श्रेष्ठता पर प्रश्न उठाने लगे? कहीं मृत्युलोक की विपक्षी शक्तियों ने आपको प्रभावित तो नहीं कर दिया?” नारद मुस्कराए, “नहीं इंद्र, पर सत्य यही है कि आज सबसे शक्तिशाली मानव है। उसने अपना अलग संसार ब...