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समझौता
कहानी

समझौता

चित्रलेखा व्यास कानोड़, उदयपुर (राजस्थान) ******************** विंध्याचल की पहाड़ियों पर उस दिन धूप कुछ फीकी-सी थी। मंदिर की सीढ़ियों के बाहर लाजो चुपचाप बैठी थी। सामने घंटियाँ लगातार बज रही थीं- टन...टन...टन... हर एक घंटी की आवाज़ जैसे उसके भीतर उतरकर किसी बंद दरवाज़े को खटखटा रही थी। लाजो मिर्जापुर की रहने वाली थी। उम्र बहुत नहीं थी, मगर आँखों में जाने कितने मौसम उतर चुके थे। वह मंदिर के बाहर बैठी उन घंटियों को सुनते हुए सोच रही थी- क्या ईश्वर के घर में भी किसी लड़की की इच्छा की कोई आवाज़ पहुँचती है? तभी मंदिर के भीतर से पुजारी ने उसे आवाज़ दी। “बेटी, दर्शन कर लो।” वह उठी। माथे पर आँचल खींचा और माँ विंध्यवासिनी के सामने जा खड़ी हुई। आँखें बंद कीं तो मन में कोई प्रार्थना नहीं थी, केवल एक प्रश्न था- “माँ, मेरी जिंदगी का रास्ता मुझे चुनने दोगी?” दर्शन करके वह गंगा किनारे च...
हमारे बाबू जी
कविता

हमारे बाबू जी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन का आधार हमारे बाबू जी सबसे करते प्यार हमारे बाबू जी घबराते न कभी मुश्किल में साहस रख तोडें हर दीवार हमारे बाबू जी सीख सदा ही उत्तम देते हैं हमको जीवन का है सार हमारे बाबू जी चलते सच्चाई पर हरिमोहन जैसे लगते हैं करतार हमारे बाबू जी सबका ध्यान रखें नैतिक शिक्षा देते करते हैं उपकार हमारे बाबू जी पार लगाते नैय्या हरदम बच्चों की तूफाँ में पतवार हमारे बाबू जी पावन हैं मनभावन हैं न्यारे सब से गंगा की रसधार हमारे बाबू जी मेरे जीवन दाता घर के रखवाले रब के हैं उपहार हमारे बाबू जी चरणों में हम शीश झुकाते हैं उनके जिसके हैं हकदार हमारे बाबू जी परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मो...
अधूरे चाँद जैसा इश्क़
कविता

अधूरे चाँद जैसा इश्क़

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** सूनी डगर पे मैं तेरा नाम लेता रहा हाँ... नाम लेता रहा... तू ग़ैरों की महफ़िल में, मैं तन्हाई सहता रहा बेवफ़ा... तन्हाई सहता रहा। तड़पता छोड़ के मुझको, तेरा कारवाँ चल दिया अधूरे चाँद जैसा, मेरा इश्क़ रह गया अधूरे चाँद जैसा, मेरा इश्क़ रह गया। मिले न मौत मुकम्मल, न चैन पूरा आया कफ़न मिला न मुझको, न तेरा साया आया। ज़िंदा जला दिया मुझे तेरी बेरुख़ी ने इस क़दर कि मेरी राख से भी बस, तेरी ही वफ़ा का धुआँ आया। तू मुकम्मल कहानी किसी और की बन गई मैं अधूरा सा अफ़साना तेरा रह गया। तेरी डोली उठी तो मेरा जनाज़ा भी सज गया तू हँस के रुख़्सत हुई, मेरा ख़ुदा भी रो दिया। तड़पता छोड़ के मुझको, तेरा कारवाँ चल दिया... अधूरे चाँद जैसा, मेरा इश्क़ रह गया... परिचय :- बाल कृष्ण मिश्रा निवासी : रोहिणी, (दिल्ली) घोषण...
तुम कब वापस जाओगे मेघराज, एक धरा-नागरिक की दारुण पुकार
व्यंग्य

तुम कब वापस जाओगे मेघराज, एक धरा-नागरिक की दारुण पुकार

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** हे बूंदों के बादशाह, बरसाती महाराज! यह तीसरा महीना है,धरती को सिंचित, पल्लवित, प्लावित और परेशान करते हुए। अब बस भी करो। धरा को थोड़ी धूप चाहिए, मनुष्य को थोड़ी राहत और गृहिणियों को बेसन-तेल का कोटा। तुम्हारी उमड़-घुमड़, ताबड़तोड़ बौछारें अब रोमांच नहीं, विशुद्ध भय पैदा कर रही हैं। हे मेघराज, आखिर तुम कब जाओगे? माना, तुम हमारे ‘अतिथि’ हो, स्वागत में कवियों ने गीत गाए, चारण-भाटों ने छंद रचे, मेंढक-मेंढकियों का ब्याह कराया, शिवलिंग डुबोए गए, गधे गुलाबजामुन खाकर, अघाकर हल चलाने उतारे गए। और हम जैसे व्यंग्यकारों ने तुम्हारी ज़िद्दी पुरवाइयों पर तीर छोड़े, ताकि तुम प्रसन्न होकर धरती को तृप्त कर दो। पर तुम तो उस मेहमान की तरह ठहर गए हो जो “कल जाऊँगा, परसों पक्का” कहते हुए बरामदे में स्थायी न...
दान
हाइकू

दान

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** छपा के नहीं छुपाकर कीजिए अपना दान। ***** इस पृथ्वी का सबसे बड़ा दानी कर्ण महान। ****** कीजिए दान ज़िन्दगी संवारिये सुख पाइये। ****** दान जरुरी अपने लाभांश का दस पर्सेन्ट। ****** कीजिये दान अक्षम व्यक्तियों को पुण्य मिलेगा। ****** नहीं है कुछ दान से बढ़कर इस जहां में। ****** दान के बाद फल की इच्छा व्यर्थ यही है अर्थ। ****** खुश रहेंगे कीजिए गुप्त दान बने महान। ******* तर जायेगी आपकी सात पीढ़ियां गुप्त दान से। ****** नहीं करता जो दान जगत में वो है नादान। ****** दान से होगा भवसागर से पार हर व्यक्ति। ****** परिचय : डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" निवासी : चिनार-२ ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करता हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है। कृपया लिंक को टच...
छोड़ बुराई नेक बन
छंद, दोहा

छोड़ बुराई नेक बन

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** (दोहा छंद) छोड़ बुराई नेक बन, पाप करे शैतान। स्वर्ग नर्क सब कर्म से, तेरे है इंसान।। ************* समझ समझ समझा नहीं, समझ नहीं थी यार। वो तो मेरे पास है, ढूॅंढ रहा बेकार।। ************* नेता बन मंत्री बनो, डिग्री का क्या काम।। पढ़े लिखे बेकार सब, घूम रहे गुमनाम।। ************* ख़त्म सफ़र कब मौत से, आगे भी है और। सोच जहाॅं की छोड़ दे, वहाॅं बना ले ठौर।। ************* सबको जाना एक दिन, भला बुरा क्या संत। रहा सदा कोई नहीं, सबका होगा अंत।। ************* चल मुसाफिर समय हुआ, रुकना है बेकार। हुआ आजाद कैद से, टूट गई दीवार।। ************* हुआ नहीं है कल कभी, मत ले कल का नाम। जो कुछ है वो आज है, कल का कल क्या काम।। ************* झूठ झूठ है सच नहीं, सच से जिंदा झूठ। मिटे झूठ जब सच हटे, जैसे जल कर...
मौर्य काल में भोजन, पाककला और भोजन नियम
आलेख

मौर्य काल में भोजन, पाककला और भोजन नियम

भीष्म कुकरेती मुम्बई (महाराष्ट्र) ******************** भारत में भोजन इतिहास भारतीय इतिहास का मौर्य काल (लगभग ३२२ ईसा पूर्व से १८५ ईसा पूर्व) न केवल राजनीतिक सुदृढ़ता, प्रशासनिक दक्षता और विशाल साम्राज्य के लिए जाना जाता है, बल्कि यह संस्कृति, कला, अर्थव्यवस्था और खान-पान के विकास का भी एक स्वर्ण युग था। मौर्य साम्राज्य के दौरान भारतीय समाज में कृषि का अभूतपूर्व विस्तार हुआ, व्यापारिक मार्ग सुदृढ़ हुए और देश-विदेश से सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ा। इसका सीधा प्रभाव तत्कालीन जनजीवन, भोजन की विविधता, पाककला (Culinary Arts) और भोजन से जुड़े सामाजिक तथा धार्मिक नियमों पर पड़ा। इस काल की भोजन व्यवस्था और पाककला की जानकारी हमें मुख्य रूप से कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा रचित 'अर्थशास्त्र', यूनानी राजदूत मेगास्थनीज के यात्रा वृत्तांत 'इंडिका', अशोक के शिलालेखों तथा उस काल के बौद्ध और जैन ग्रंथों से प्र...
पेंसिल से लिखा अतीत
कविता

पेंसिल से लिखा अतीत

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** जब पेंसिल बचपन में हाथों में पकड़ी जब मुझे मालूम नहीं था। पेंसिल से लिखा क्या था अतीत मेरा। कागज़ पर थोड़ा धुंधला-धुंधला सा। कुछ नाम थे जो घिस गए लिखते-लिखते, कुछ वादे थे जो हल्के पड़ गए। कुछ हँसी के निशान रह गए कोने में, कुछ आँसू थे जो कागज़ में धँस गए। जैसे बचपन की वो अधूरी लकीरें, मन आज भी वहीं रह जाता। पेंसिल का अतीत यही सिखाता, हर चीज़ पक्की नहीं होती। कुछ यादें धुंधली ही अच्छी लगती। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपन...
स्वयंभू भगवानों से सवाल
कविता

स्वयंभू भगवानों से सवाल

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** थोड़ा देकर ज्यादा छीन लेते हो, कम रहता है उसे बहुत गिन देते हो, संवैधानिक हक़ को अहसान बताते हो, गाहे-बगाहे इसे हर मंच से सुनाते हो, हे तथाकथित स्वयंभू भगवानों, नागरिकों को बेवकूफ न जानो, जो खून-पसीना बहाकर टैक्स चुकाता है, वो दो वक़्त की रोटी को तरसाया जाता है, तुम देकर चंद टुकड़े मुफ़्त की खैरात के, दावा करते हो जैसे पाल रहे हो कायनात के, अपनी ही जेब से हम लुटते आ रहे हैं, और तुम हर चौराहे पर ढोल बजा रहे हो, हक़ मांगें तो लाठियां और जेल मिलती है, तुम्हारी चौसर की बिसात पर ज़िंदगी ढलती है, अब आँखों से ये भरम का पर्दा हटेगा, तुम्हारी झूठी रहमतों का ये खेल मिटेगा, ये देश किसी की बपौती या जागीर नहीं, जनता ही लिखेगी अब अपनी तक़दीर नई, उतर जाओ कुर्सी के झूठे गुमान से, बात करो अब अदब और संविधान से, वक़्त बद...
बधाई
कविता

बधाई

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** यमुना की लहरों से पूछा मैंने तुम इतनी क्यों उछल रही हो? लहरों से आवाज है आई, कृष्ण जन्म की देवु बधाई, मेरे द्वार पर कान्हा आए, मेरे प्राण मेरे है स्वामी क्यों ना आज में चरण पखारू, इस अवसर को धन्य कर जाऊ, इस कारण में उछल रही हूं। उछल-उछलकर यमुना है बहती, कान्हा से वह यूं है कहती! एक बार प्रभु चरण धुलवाओ, मेरा जीवन धन्य कर जाओ। कान्हा ने है चरण बढाये, यमुना जल तक प्रभु ले जाए, धन्य हुई यमुना महारानी , चरण पखारे देखो रानी, शांत हुई देखो पटरानी। कान्हा ले वसुदेव है आये, नन्द भवन मै बँटे बधाई, आज गोकुल मे बजे शहनाई। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्र...
भारत की आन बान शान है हिंदी
कविता

भारत की आन बान शान है हिंदी

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** सजे नारी के शीश ज्यों बिंदी, विराजे भारत के शीर्ष यूं हिंदी। ऋषि मुनियों और विद्वानों के, लेखन का श्रृंगार है भाषा हिंदी। जन मानस की बोल चाल में, सहज सरल औ आम है हिंदी। संप्रेषण और जनसंचार का, सबसे सशक्त माध्यम है हिंदी। वीणा के तारों से झंकृत करती, महाग्रंथों में अलंकृत है हिंदी, कवि और लेखकों के सृजन को, कृत कृत्य करती है भाषा हिंदी। कोकिल कंठ सी लगे कर्णप्रिय, मिश्री की डली सी लगती हिंदी, सभी भाषाओं की सिरमौर बनी, हमारी मातृभाषा कहलाती हिंदी। विश्वबंधुत्व औ एकता का भाव, जन-जन में नित जगाती हिंदी। नदी की पावन धारा सी निर्मल, झरने सी शीतल है भाषा हिंदी। प्रगति के नए सोपान है रचती, भारत का मान है बढ़ाती हिंदी, जन जन के मन में है बिराजती, देश की आन बान शान है हिंदी। परिचय :- ...
बेटी
कविता

बेटी

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** बाबुल के नयनों की प्यारी आज चढी है बलिवेदी पर लालची मानव, तू, धिक्कार मन में संजोए पी का प्यार। मजबुरी है नाम जिसका वो बेटी कहलातीं है सह-सह कर अनेक ताने कोसी जाती बार बार। बाबुल का घर आंगन छोड अंग, अंग धानी चुनरिया ओढ मुड़, मुड़ कर देखती घर, गली का अंतिम छोर। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्म...
हम हिंदुस्तान के वीर
कविता

हम हिंदुस्तान के वीर

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** चाहे फांसी पर लटका दो चाहे बिजली का झटका दो चाहे चौराहे पर लटका दो हम देश हित शीष कटाने वाले हम देश हित शीष चढ़ाने वाले हम वीर, पर्वतों से टकराने वाले हम वीर, गंगा के मैदान वाले हम वीर, हिंदुस्तान वाले हम वीर, नहीं डरने वाले हम वीर, भारत के लिए मरने वाले हम वीर, मर कर अमर रहने वाले हमारे नस-नस में बहता स्वाभिमान है हमारे रोम-रोम में बसता हिंदुस्तान है हमारे रोम-रोम में बसता आन बान है हमारे रोम-रोम में बसता हिंदुस्तानी शान है क्रांतिकारी हम, शांति के पुजारी हम जीत कर रहेंगे हम, है हममें इतना दम एक हाथ में तलवार, एक हाथ में संविधान है हमारे हृदय में बसता गीता, पुराण, कुरान है स्वदेश हित दे देते हम बड़े बलिदान हैं परिचय :-  सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' निव...
शिक्षक
कविता

शिक्षक

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** ओजस्वी दीपक युग दृष्टा होते है शिक्षक। नव चेतना ज्ञान वैभव के धारक होते है शिक्षक। वर्ण विधान भाषा अलंकरण होते है शिक्षक। आत्म निर्भर स्वाध्याय के संबल होते है शिक्षक। ज्ञान उद्दीपक अंत प्रेरणा के विश्लेषक होते है शिक्षक। हर युग के नायक अद्भुत चित्रकार होते है शिक्षक। कर्तव्य निष्ठा सृजनशीलता के वाहक होते शिक्षक। कच्ची मिट्टी से महलों के सृजक होते है शिक्षक। खाद और बीज विषय सम्प्रेषक होते है शिक्षक। अमूर्त भावी पीढ़ी के मूर्तिकार होते है शिक्षक। ज्ञान के आलोक से अज्ञान विनाशक होते है शिक्षक। वाष्प कणों से मेघों के शिल्पकार होते है शिक्षक। मां का वात्सल्य पिता का आशीर्वाद होते है शिक्षक। नेह का अहसास बहन का आलिंगन होते है शिक्षक। भव्य व्यक्तिव संस्कार की परिभाषा होते है शिक्षक। वशिष्ठ विश्वामित्र चाणक...
वंदे मातरम्
कविता

वंदे मातरम्

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** आज कह दो शान से है जान वंदे मातरम् देश के हर लक्ष्य का संधान वंदे मातरम् देश की मिट्टी है चंदन शीश तुम धारो इसे हमसे जो करवा दे सब बलिदान वंदे मातरम चीर दो दुश्मन को और ग़द्दार को तुम दो सज़ा आज कर दो जंग का ऐलान वंदे मातरम् बाल गंगाधर तिलक का स्वप्न है साकार अब अब हमारे देश का अभिमान वंदे मातरम् याद कर लो तुम शहीदों ने किया उत्सर्ग जो अपनी आज़ादी की है पहचान वंदे मातरम् पर्व है गणतंत्र लहराता तिरंगा नभ में है आओ सब मिल कर करें जयगान वन्दे मातरम् विश्व नतमस्तक हुआ सम्मुख हमारे देश के आओ बच्चों हम करें गुणगान वंदे मातरम् परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट ...
इतिहास बना है शिलालेख
कविता

इतिहास बना है शिलालेख

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** इतिहास बना है शिलालेख कब, किसने इससे सीखा है परमार्थ किया तभी तक जब तक उसमें स्वार्थ दिखा है दिन के घोर उजाले में तुम सदाचार समझाते हो धवल वस्त्रों तले छिपी रक्त-पिपासा कब दिखलाते हो शोषण की सीढ़ी पर चढ कर सुख के स्वप्न दिखाते हो रजनी के स्याह अंधेरों में संहारक तेवर अपनाते हो षड्यंत्रों का भोजपत्र मानव रक्त से लिखा है कहर तुम्हारा भुजंग बन मासूम यौवन को डसता हैं संस्कारों की चून्नर तले दरिया दर्द का रिसता है दुराचार के दावानल में अक्षत यौवन कुंभल रहा दो वक्त की रोटी खातर हुआ पतित कब संभल रहा रक्षक भक्षक बन बैठा समय वक्त पर चीखा है श्रम साध्य श्रमिक ने जीवन मंदाग्नि में झोंक दिया सूखी रोटी के दो कोरो पर स्वाभिमान को छोड़ दिया साधन के संधानो खातिर स्वर सतत मिमियाते रहे आकुल न...
जब जीवन हारने लगे, तब श्री कृष्ण का जीवन पढ़िए
आलेख

जब जीवन हारने लगे, तब श्री कृष्ण का जीवन पढ़िए

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** आज मनुष्य के पास पहले से अधिक साधन हैं,लेकिन शायद पहले से कम धैर्य। उसके पास संवाद के लिए अनेक माध्यम हैं, फिर भी भीतर का अकेलापन बढ़ता जा रहा है। छोटी-सी असफलता उसे भीतर तक हिला देती है, रिश्तों में आया मामूली तनाव उसे निराश कर देता है और जीवन की कठिन परिस्थितियों के लिए डिप्रेशन जैसे शब्द सहजता से हमारी बातचीत का हिस्सा बन गए हैं।ऐसे समय में प्रश्न यह नहीं कि कठिनाइयां क्यों आती हैं। प्रश्न यह है कि कठिनाइयों के बीच मनुष्य स्वयं को कैसे संभाले? इस प्रश्न का उत्तर हजारों वर्ष पुराना है, श्रीकृष्ण के जीवन में। श्रीकृष्ण को यदि केवल मंदिर में विराजमान भगवान के रूप में देखा जाए तो हम उनके व्यक्तित्व का एक छोटा-सा हिस्सा ही देख पाएंगे। कृष्ण को समझना है तो उनके जीवन को देखना होगा। एक ऐसा जीवन जिसमें जन्म से लेकर अं...
नव निर्माण
कविता

नव निर्माण

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** ये मजबूत मेरी भुजाएं जैसे पर्वत की शिलाएं यह चौड़ी मेरी छाती है जो भारत मां की थाती यह मेरा दमकता उन्नत भाल युद्ध भूमि में करता कमाल मैं बागी बलिया से मैं त्यागी बलिया से मैं बागी बैरिया से मैं हूं हिंद का जवान मैं चाहता हूं करना कुछ महान जिससे विकसित हो हिंदुस्तान करके नव निर्माण चला के कर्म का वाण बना दूं शक्ति शाली हिंदुस्तान उतार लाऊं आसमान बनाऊं धरा को स्वर्ग समान। परिचय :-  सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' निवासी : गुदरी सिंह के टोला, पांडे पुर, बैरिया, बलिया, (उत्तरप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏...
अब इंकलाब बनने दो
कविता

अब इंकलाब बनने दो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मैं हूं ही इंकलाब तो इंकलाब बनने दे, देख लेना मेरे दिल के दाग कभी और, देखो अगन उदर की अभी उसे भरने दो, ये खोखली परंपराएं, ये पाखंड की दीवारें, कब तक सहेंगी भूखे पेट की हुंकारें? तुम पूजते हो पत्थर, इंसानों को दुत्कारते, जात-पात के नाम पर बस्तियां उजाड़ते, अब तोड़ दो ये बेड़ियां, ये भरम सब ढहने दो, देखो अगन उदर की अभी उसे भरने दो, अस्पृश्यता का यह कलंक, समाज का ये रोग है, तुम्हारी नजरों में अछूत, क्या वो नहीं लोग हैं? लहू का रंग एक है, एक जैसी प्यास है, फिर क्यों धरा पर फैला ये नफरत का इतिहास है? इस ऊंच-नीच के भेद को अब राख में मिलने दो, देखो अगन उदर की अभी उसे भरने दो। तिलक, तराजू, ढोंग से अब पेट नहीं भरता, मजदूर अपनी मेहनत से भाग्य खुद लिखता, छल-कपट के इस तंत्र को अब तार-तार हो ...
यमराज मित्र के दोहे
दोहा

यमराज मित्र के दोहे

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** दूर्वा श्री गणेश को, माँ दुर्गा श्रृंगार। भोग लगाओ प्रेम, होगा जन उद्धार।। सभी निभाते भूमिका, जैसा बुद्धि विवेक। सबके अपने रंग हैं, भले विवेक अनेक।। सबकी अपनी भूमिका, सबका अपना सार। कम लोगों को ही मिले, सार्थकता विस्तार।। कुछ लोगों की भूमिका, देती है दुख घोर। सबसे ज्यादा नाचते,बने हुए जो मोर।। अपना कोई अब नहीं, देने वाला भाव। बिना दाम के जेब का, टीस रहा है घाव।। बेगाने ही बन रहे, बगलगीर तो आज। दुनिया के दस्तूर का, उल्टा दिखे समाज।। अपने भारत वर्ष का, बढ़ा विश्व में मान। उनको मिर्ची लग रही, जो जनमे नादान।। आजादी के पर्व का, बना रहे उत्साह। बिना किसी मतभेद के,सबको हो परवाह।। आज तिरंगा विश्व को, देता है विश्वास। हम सबको भी गर्व है, बढ़ती दिखती आस।। हम सबका कर्तव्य है, हो शहीद का मान। क...
विश्वगुरु भगवान श्रीकृष्ण
आंचलिक बोली, कविता

विश्वगुरु भगवान श्रीकृष्ण

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) ओदे आवत हे कन्हैया, बजावत बंसी। झूम-झूम के नाचत हें, जम्मों यदुवंशी।। पहिरे हे मोर मुकुट अउ बैजयंती माला। संग म हवंय सुबल, बलराम, मधु ग्वाला।। गोकुल के बन म, चरावत हे गाय-गरुवा। कदम्ब रुख बइठे हे, मुरलीधर दुलरुवा।। कान्हा के रूप ल देखके, राधा मोहागे हे। मया के जादू म, तोला खोजत आगे हे।। गोपी मन घलो रंग गेहें, पिरीत के रंग म। रासलीला के बेड़ा म, थिरकत हें संग म।। ब्रज म माखन अउ मिसरी के हवय भंडार। चोरी करे बर आवत हे, जग के पालनहार।। जमुना नदिया के तीर, खेलत हे मन-मगन। नाग नथैया के पाँव छुए, कालिया के फन।। बरसे जब करिया बादर, घपटे जब अंधियार। गोबरधन परबत उठाके, करे तँय ह उजियार।। कुरुक्षेत्र म गियान देके, देखाए रुप बिराट। विश्वगुरु तोला कहिथें, जय हो! दीनानाथ।। तँय तो अंतरयामी अस...
चारपाई की अदालत में
कविता

चारपाई की अदालत में

डॉ. अवधेश कुमार "अवध" भानगढ़, गुवाहाटी, (असम) ******************** सुना है कि कर्मों का हिसाब-किताब रखते हैं चित्रगुप्त ईश्वर परिणाम घोषित करते हैं और यमराज लागू न जाने ये कितना सच है, कितना झूठ! किंतु एक ठोस सच हम सब देखे हैं देख रहे हैं और आगे भी देखेंगे हमारी साढ़े तीन हाथ की देह घर के बाहरी कोने में पौने चार हाथ की चारपाई पर हो जाती है निढाल जब करवट बदलने में बेहाल जब लाचार असहाय और बदहाल जब तब...... तब उस देह के कर्मों का हिसाब चित्रगुप्त नहीं, ईश्वर नहीं यमराज भी नहीं संतानें लगाती हैं साथी सहमते हैं, भाई झल्लाते हैं मक्खियां भिनभिनाती हैं बिस्तर पर हुई लीपा पोती वारिस चींख चींखकर बताते हैं परिजन धड़ल्ले से परिणाम सुनाते हैं "बूढ़ा रात-दिन खांस खांसकर जीना मुश्किल कर दिया है न जाने कब जाएगा हम चैन से कब जी सकेंगे......" चारपाई पर ...
मानसून का सरकारी आवंटन
व्यंग्य

मानसून का सरकारी आवंटन

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “सोचिए, अगर ऊपरवाले ने मानसून का ज़िम्मा नीचेवाले सरकारी तंत्र को सौंप दिया होता तो...?” सरकारी तंत्र! बाप रे बाप... यह व्यवस्था नहीं, कोई चमत्कारी प्रयोगशाला लगती। बारिश की बूँदें नहीं, नोटशीटें टपक रही होतीं-एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर तक! मानसून सीधे कैसे आ जाता? पहले फ़ाइलों की मार्किंग होती, फिर रीमार्किंग। अतिरिक्त टिप्पणियाँ लगतीं, और फ़ाइलों की घुड़दौड़ शुरू हो जाती - तहसील से पटवारी, पटवारी से एस.डी.एम., एस.डी.एम. से कलेक्टर और कलेक्टर से लेकर चायवाले तक सभी से सुझाव लिए जाते। जनमत सर्वेक्षण कराए जाते। फिर नेता लोग यह तय करते कि किस क्षेत्र में उन्हें कितने वोट मिले हैं - उसी अनुपात में वहाँ मानसून आवंटित होता। टेंडर भरे जाते, सिफ़ारिशी पत्र लगाए जाते, उन पर वजन डाला जाता। फिर जा...
पत्नी और वाय-फॉय
हास्य

पत्नी और वाय-फॉय

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** घर में आते ही ऐसा जाल बिछाती है, अच्छे-भले जीवन का डेटा खा जाती है। मुफ़्त का हॉटस्पॉट समझकर पास आए थे, उम्र भर "अनलिमिटेड प्लान” का बिल चुकाते हैं। रेंज में रहो तो पूछताछ सुबह-शाम होती है, रेंज से बाहर जाओ तो इमरजेंसी एलान होती है। चैट दोस्तों से करो, तो इसके पास तुरंत 'OTP' जाता है, आधी रात को भी पति का 'बायोमेट्रिक अंगूठा' लग जाता है। सोचा था 'Incognito Mode' में जाकर ज़रा चैन से जिएँगे, ये वो डेंजरस हैकर है जो डिलीटेड चैट भी स्क्रीनशॉट बनाकर लाता है! हर कॉल, हर मैसेज का ऑडिट हो जाता है, घर का ड्रॉइंग रूम ही जाँच आयोग बन जाता है। इसकी मेमोरी ऐसी कि दुनिया दंग रह जाए, दस साल पुरानी गलती भी तारीख़ सहित याद आ जाए। मोबाइल पर मुस्कुराओ तो केस नया बन जाता है, “इतनी खुशी किस बात की?” प्र...
अंतिम मित्र
कविता

अंतिम मित्र

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** आखिरी दोस्त आखिरी उम्मीद हो तुम। जीवन के अंतिम अध्याय की अंतिम कड़ी हो तुम। मोह का पाश नहीं स्नेह का अंतिम चरण हो तुम। मेरे अंतिम जीवन की अंतिम स्पष्ट किरण हो तुम। मेरे अधूरे जीवन की अंतिम मुस्कुराहट हो तुम। सब कुछ खो जाने के बाद भी मेरे अंतिम जीवन का मधुर एहसास हो तुम। थक सा गया था मैं युगों के इंतजार के बाद मेरे अंतिम जीवन के अंतिम समय का मोक्ष का आधार हो तुम। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐...