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पत्थर और माटी

शिवदत्त डोंगरे
पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
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पत्थर गिरा माटी पर
माटी हो गई चूर
पत्थर हुआ घमंड से भरपूर
बोला अकड़ कर, देखा मेरा बल
तुममें-मुझमें हैं कितना अंतर।

माटी बोली सच कहा तुमनें पत्थर
हैं बड़ा मुझमें और तुममें अंतर,
मैं माटी तुम हो पत्थर,
मैं देती जीवन जड़-चेतन कों,
तुमसे मिलती केवल ढोकर,

मैं खेतों में फसल ऊगाती,
बागों में फू़ल महकाती,
हरी-भरी धरती करती।
पेड़-पौधे , फल-फूल,
धरती का हर प्राणी,
तुमसे होता आहत,
रह जाते सब मन मारकर
तुम देते केवल ठोकर,
तुममें-मुझमें है अंतर
मैं देती जीवन,
तुम देते केवल ठोकर।।

परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक)
पिता : देवदत डोंगरे
जन्म : २० फरवरी
निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है।


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