
नरेंद्र सिंह
मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार)
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आज का सायंकाल मेरे लिए केवल एक सामान्य संध्या न होकर श्रद्धा, संस्कृति, मित्रता और आध्यात्मिक अनुभूति का एक अविस्मरणीय अवसर बन गया। गया जी में फल्गु नदी के पूर्वी तट पर स्थित पुराने पुल के निकट भास्कर घाट पर नवनिर्मित भव्य विराट सूर्य मंदिर और भगवान भास्कर के दर्शन और पूजन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह यात्रा केवल देवदर्शन तक सीमित नहीं रही, अपितु उसने मन को भारतीय सनातन संस्कृति की गहराइयों तक पहुँचाने का कार्य किया।
सूर्य अस्ताचल की ओर अग्रसर थे। उनकी स्वर्णिम किरणें अंतः सलिला फल्गु के शांत तट पर बिखरकर एक अलौकिक छटा उत्पन्न कर रही थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं मार्तण्ड अपनी अंतिम किरणों से नव-निर्मित मंदिर का अभिषेक कर रहे हों। मंदिर की भव्यता, उसकी स्थापत्य-कला, उद्यान और वातावरण की पवित्रता ने प्रथम दृष्टि में ही मन को आकर्षित कर लिया। भारतीय संस्कृति में सूर्य केवल एक ग्रह या प्रकाश-पुंज नहीं, अपितु प्रत्यक्ष देवता माने गए हैं। वे जीवन, ऊर्जा, स्वास्थ्य, ज्ञान और कर्म के प्रतीक हैं। वेदों में जिन देवताओं का सर्वाधिक गुणगान हुआ है, उनमें सूर्य का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस पावन अवसर पर मेरे साथ मेरे बाल्यकाल के सहपाठी श्री विजय कुमार सिंह, (ग्राम :करजनी, अतरी ) उपस्थित थे। वर्षों पुरानी मित्रता की स्मृतियाँ इस आध्यात्मिक यात्रा में एक विशेष आत्मीयता का संचार कर रही थीं।
साथ ही भास्कर घाट एवं सूर्य मंदिर निर्माण के प्रमुख प्रेरणा-स्तंभ वैभव परमार (ग्राम:बैरका, अतरी) भी हमारे साथ था। उसके समर्पण, परिश्रम और दूरदर्शिता के कारण ही यह पवित्र स्थल आज क्षेत्रवासियों के लिए आस्था का केंद्र बन सका है। ऐसे लोकहितैषी और धर्मनिष्ठ व्यक्तित्व समाज के लिए प्रेरणा के स्रोत होते हैं। बताते चलें कि इस मंदिर में सूर्यदेव की प्राणप्रतिष्ठा गत माह में ही पूर्ण विधि विधान और सूर्य यज्ञ के साथ हुई थी।
मंदिर परिसर में पहुँचकर हमने विधिवत भगवान भास्कर का पूजन-अर्चन किया। हाथ जोड़कर जब सूर्यदेव के समक्ष खड़ा हुआ तो मन में आदित्यहृदय स्तोत्र, गायत्री मंत्र और वैदिक ऋचाओं की स्मृतियाँ जाग उठीं। ऐसा लगा मानो समस्त जीवन-यात्रा के सुख-दुःख, संघर्ष और उपलब्धियाँ उसी दिव्य तेज के समक्ष समर्पित हो रही हों। मंदिर के शांत वातावरण में घंटियों की मधुर ध्वनि और श्रद्धालुओं की प्रार्थनाएँ एक अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण कर रही थीं।
पूजनोपरांत हमने घाट और मंदिर परिसर का अवलोकन किया। स्वच्छता, सुव्यवस्था और धार्मिक सौंदर्य ने मन को अत्यंत प्रसन्न किया। यह स्थल भविष्य में निश्चय ही धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को केवल पूजा का अवसर ही नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का भी अवसर प्राप्त होगा।
इसके पश्चात हम वहीं स्थित खाटू श्याम मंदिर पहुँचे। संयोगवश आज एकादशी का पावन पर्व था, अतः मंदिर में श्रद्धालुओं की उल्लेखनीय भीड़ उपस्थित थी। “हारे के सहारे” श्री श्याम प्रभु के जयघोष से संपूर्ण परिसर गुंजायमान था। भक्तजन भक्ति-भाव से परिपूर्ण होकर दर्शन के लिए पंक्तिबद्ध थे। कहीं भजन-कीर्तन हो रहा था, कहीं श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण कर रहे थे, तो कहीं परिवार सहित लोग प्रभु के चरणों में अपनी मनोकामनाएँ अर्पित कर रहे थे।
खाटू श्याम मंदिर का वातावरण भक्तिभाव से ओतप्रोत था। श्याम प्रभु की सुसज्जित प्रतिमा के दर्शन ने मन को गहन शांति प्रदान की। भारतीय भक्ति परंपरा में श्याम बाबा त्याग, समर्पण और करुणा के प्रतीक माने जाते हैं। उनके प्रति जन-जन की आस्था देखकर यह अनुभव हुआ कि आधुनिक युग में भी धर्म और अध्यात्म की जड़ें समाज में कितनी गहराई तक विद्यमान हैं।
जब लौटने का समय आया, तब संध्या का अंधकार धीरे-धीरे धरती पर उतर रहा था, किंतु मन के भीतर श्रद्धा और संतोष का प्रकाश और अधिक प्रखर हो उठा था। फल्गु तट पर स्थित सूर्य मंदिर और खाटू श्याम मंदिर की यह यात्रा केवल एक धार्मिक भ्रमण नहीं, बल्कि आत्मिक ऊर्जा और सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण एक अविस्मरणीय अनुभव बन गई।
निस्संदेह, ऐसे पवित्र स्थलों का निर्माण और संरक्षण हमारी सांस्कृतिक धरोहर के संवर्धन का महत्वपूर्ण माध्यम है। ईश्वर से प्रार्थना है कि भास्कर घाट का यह नव-निर्मित सूर्य मंदिर निरंतर श्रद्धा, सेवा, संस्कृति और लोकमंगल का केंद्र बना रहे तथा आने वाली पीढ़ियों को सनातन परंपराओं से जोड़ने का कार्य करता रहे।
निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार)
सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (पी.एन.बी.)
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