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संगीत
कविता

संगीत

==================================== रचयिता :  माया मालवेन्द्र बदेका जीवन एक मीठी धुन, मधुर संगीत है। प्यार का निर्झर झरना, अनुपम गीत हैं। आओं संवारे प्रेम से यह, फूलों की डलियां। चुन चुन कर इसमें लगाये, प्रेम की कलियां। मनुज जन्म उपहार ईश्वर का, यूं मिलता नहीं। नफरत,धोखे छल, कपट पर नेह की जीत है। जीवन एक मीठी धुन, मधुर संगीत है। प्यार का निर्झर झरना, अनुपम गीत हैं। बजने दो जीवन में, शहनाईयों का गान। भर दो झनकती, मीठी बांसुरी की तान। झूमे गगन, धरा झूमती फूलों की डालियां। अंबर से धरा तक पसरी, प्यार की रीत है। जीवन एक मीठी धुन, मधुर संगीत है। प्यार का निर्झर झरना, अनुपम गीत हैं। लेखिका परिचय :- नाम - माया मालवेन्द्र बदेका पिता - डाॅ श्री लक्षमीनारायण जी पान्डेय माता - श्रीमती चंद्रावली पान्डेय पति - मालवेन्द्र बधेका जन्म - ५ सितम्बर १९५८ (जन्माष्टमी)...
आओ बच्चों
कविता

आओ बच्चों

========================================== रचयिता : श्रीमती मीना गोड़ "मीनू माणंक" आओ बच्चो, तुम आज की खुशहाली। आने वाले कल का भविष्य हो।। आस लगाए, तकती तुम्हैं धरती। प्रकृति है, देखो बाहें पसारे।। किया है हमने खिलवाड़ पर्यावरण से। तुम दो सम्मान धरती को हरियाली फैला के।। ओ नौनिहालों, फूलों से करो प्यार। पौधे तुम लगाओ, बारम्बार।। रूठ गई है जो चिरैया हमारी, देख, फल-फूल से लदी डाली वो भी लोट अएगी।। कल-कल करती बहेगीं, जब नदियाँ बूझेगी, तब प्यास धरती की।। मद-मस्त बादल, गरज कर शंखनाद बजाएगें। झूम कर बदली, रिमझिम बूंदों से घूंघरू की झनकार सुनाएगी।। इंद्रधनुषी ये चुनरी सतरंगी। जब चारों ओर छा जायेगी।। रंग-बिरंगें इन फूलों से। वसुंधरा, दुल्हन सी सज जायेगी।। आओ बच्चों, तुम आज की खुशहाली। आने वाले कल का भविष्य हो।।   लेखिका परिचय :-  नाम...
जानलेवा तम्बाकू का सेवन
आलेख

जानलेवा तम्बाकू का सेवन

रचयिता : विनोद वर्मा "आज़ाद" विश्व मे ८० लाख लोग प्रतिवर्ष तम्बाकू सेवन के पश्चात होने वाले असाध्य रोगों की वजह से काल के गाल में समा रहे है, वही भारत देश मे प्रतिवर्ष १० लाख लोग जान गंवा रहे है।       विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ विश्वभर के राष्ट्र और समाजसेवी संगठन तम्बाकू के सेवन से होने वाले रोग और होने वाली मौतों से बचाने के लिए विश्वव्यापी अभियान चलाए हुए है। इतना कुछ होने के बावजूद लोग इस कचरे को खाना नही छोड़ रहे है। इसके बनाये उत्पादों पर स्पष्ट चेतावनी लिखी होने के पश्चात भी इसका सेवन करने वालों की संख्या में कमी ना के बराबर हो रही है।      मैं दो घटनाएं और तम्बाकू के उत्पादन के बारे में बताने जा रहा हूँ, घटनाएं तो दिलचस्प है पर उत्पादन गन्दगी से सराबोर......        मैं कक्षा तीसरी का छात्र था, मेरे समाज बन्धु और पुराने घर के सामने वाले जो मेरे साथ पढ़ रहे थे, मुझे बड़े प्य...
तेरे बिन
कविता

तेरे बिन

रचयिता : शिवम यादव ''आशा'' =================================== कितनी राते कितने दिन   मैं जिया हूँ तेरे बिन मिलती थी तन्हाई मुझसे      मेरे यारा जब         तेरे बिन होकर द्रवित तन-मन मेरा बहस खुद से कर लेता था बनकर के लहू के आँशू मेरा दिल रो उठता था         तेरे बिन ख्वाब सजाए वो बैठा था कई भोरों से शामों तक शीशा जैसी बिखर गई थी    उसकी खामोशी फिर            तेरे बिन कई सपनें व वादे      टूटे थे लाखों पथिक निकल     चुके थे उसके दिल की राहें सूनी थीं        तेरे बिन लेखक परिचय : नाम शिवम यादव रामप्रसाद सिहं ''आशा'' है इनका जन्म ७ जुलाई सन् १९९८ को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात ग्राम अन्तापुर में हुआ था पढ़ाई के शुरूआत से ही लेखन प्रिय है, आप कवि, लेखक, ग़ज़लकार व गीतकार हैं रुचि :- अपनी लेखनी में दमखम रखता हूँ !! अपनी व माँ सरस्वती को न...
विछोह की पीड़ा
कविता

विछोह की पीड़ा

============================================ रचयिता : सौरभ कुमार ठाकुर पता नही किस शहर में, किस गली तुम चली गई। मै ढूँढ़ता रह गया,तुम छोड़ गई। पता नही हम किस मोड़ पर फिर कभी मिल पाएँगे। इस अनूठी दुनिया में फिर किस तरह से संभल पाएँगे। पता नही तेरे बिन हम, जी पाएँगे या मर जाएँगे। हम बिछड़ गए उस दिन,जिस दिन तुम मुझसे मिलने वाली थी मै तुमसे मिलने वाला था। इस अंधी दुनिया ने कभी हमको समझा ही नही। काश समझ पाती दुनिया, तो हम कभी बिछड़ते ही नही। प्यार करते थे हम तुमसे, पर कभी कह ही न पाएँ। आज भी सोचता हूँ की, काश वो दिन वापस लौट आए। बहुत समय लगा दिया हमने इजहार में। कब तक भटकेंगे हम तेरे इन्तजार में। हम बिछड़ गए थे उस दिन,जिस दिन, तुम मुझसे मिलने वाली थी, मै तुमसे मिलने मिलने वाला था। परिचय :- नाम- सौरभ कुमार ठाकुर पिता - राम विनोद ठाकुर माता - कामिनी देवी पता - रतनपुरा, जिला...
पानी की महामारी
लघुकथा

पानी की महामारी

========================================================== रचयिता : श्रीमती मीना गोदरे 'अवनि' शहर में पानी के लिए त्राहि-त्राहि हो रही थी सप्ताह में एक दिन नल आते थे लोग मीलों दूर लंबी कतार बनाकर पानी के लिए भागते नजर आते थे। वह बड़े घर की बहू थी नौकर चाकर ठाट बाट सब कुछ था, महलनुमा घर के पिछवाड़े में गहरा कुआं था जिससे पाइपलाइन जोड़कर घर के सभी नलों में पानी आता था उन्हें पानी की कमी कभी न होती किंतु इस बार तो उसके कुएं से भी लोग पानी ले जाने लगे, धीरे धीरे वह भी सूख गया। अब तो पाइप सेभी पानी नहीं चढ़ता उन्हें भी पानी की परेशानी होने लगी किंतु अब तो गजब हो गया जिसे कुएं से पानी खींचना आता था वह नौकर बीमार पड़ गया। तीन दिन बाद हालात ये थे कि घर में केवल दो लोटे पानी बचा था, मालकिन ने दो दिन का निर्जला व्रत रख लिया, क्योंकि बच्चों को पानी बचाना जरूरी था किंतु वह भी खत्म हो गया। सड़क प...
वार्तालाप
लघुकथा

वार्तालाप

============================================ रचयिता : वन्दना पुणतांबेकर सड़क की पगडंडियों से गुजरता अनुपम गर्मी की तपिश से परेशान हो रहा था। सरकारी स्कूल की नौकरी ऐसी थी। कि गाँव की पाठशाला का भार उसी के जिम्मे आ गया था। गर्मी में स्कूल की छुट्टियां होने के बावजूद भी कोई ना कोई काम से उसे जाना ही पड़ता। आज उसे नए नियमों से स्कूल की भर्तियों को लेकर प्रारूप तैयार करना था। इसी सिलसिले को दिमाग में रखते हुए, वह धूल भरे गुबार से गुजर रहा था। तभी जोरो से आँधी शुरू हो गई। वह सिर छुपाने के लिए जगह की तलाश कर रहा था। तभी उसे वहाँ एक सूखा सा बंजर पेड़ दिखाई दिया। वह उसी पेड़ के नीचे थोड़ी देर के लिए रुका तो ऊपर से उस पर कुछ बूंदे पानी की गिरी। उसने देखा आसमान तो साफ है। फिर यह पानी की बूंद कहां से गिरी। उसने ऊपर नजर उठा कर देखा। तो उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया। वह आँधी के रुकने का इंतजार कर रहा था। ...
खुद की खोज जारी रखो
कविता

खुद की खोज जारी रखो

======================================== रचयिता : शिवांकित तिवारी "शिवा" खुद की खोज जारी रखो, मरनें की रोज तैयारी रखो, कब कौन कहां बदल गया, इसकी पूरी जानकारी रखो, खुद पर यकीन करना सीखो, नियत सच्ची और जुबां प्यारी रखो, वहम और अहम मत पालों कभी, चुनिंदा लोगों से हरदम यारी रखो, हक के लिए सदा आवाज़ उठाओं, अपनी बातों  में  वजनदारी  रखो, अपने मां-बाप को कभी धोखें में मत रखो, उनके साथ हरदम ईमानदारी रखो, लेखक परिचय :- शिवांकित तिवारी "शिवा" युवा कवि, लेखक एवं प्रेरक सतना (म.प्र.) शिवांकित तिवारी का उपनाम ‘शिवा’ है। जन्म तारीख १ जनवरी १९९९ और जन्म स्थान-ग्राम-बिधुई खुर्द (जिला-सतना,म.प्र.) है। वर्तमान में जबलपुर (मध्यप्रदेश) में बसेरा है। आपने कक्षा १२ वीं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की है, और जबलपुर से आयुर्वेद चिकित्सक की पढ़ाई जारी है। विद्यार्थी के रुप में...
‘ताज’ वतन का वंदन कर 
ग़ज़ल

‘ताज’ वतन का वंदन कर 

======================== रचयिता : मुनव्वर अली ताज हर  दुख  का अभिनंदन  कर चिंता मत कर चिंतन  कर खुशियों के पल निकलेंगे दुख सागर का मंथन  कर हर मानव को गंध मिले तन मन धन को चंदन  कर जिन शब्दों से दिल ख़ुश हो उन शब्दों का चुंबन  कर भँवरा बन कर ग़ज़लों का सारे जग में गुंजन कर जाना है उस पार अगर मौजों का उल्लघंन कर प्यार का शुभ  संदेश है ये 'ताज' वतन का वंदन कर लेखक का परिचय :- मुनव्वर अली ताज उज्जैन आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर मेल कीजिये मेल करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें … और अपनी कविताएं, लेख पढ़ें अपने मोबाइल पर या गूगल पर www.hindirakshak.com खोजें...🙏🏻 आपको यह रचना अच्छी लगे तो साझा जरु...
बेटे का खत माँ के नाम
लघुकथा

बेटे का खत माँ के नाम

============================== रचयिता : अर्चना मंडलोई थैक्यू माँ ....      ओह! माँ तुम पास हो गई। कितनी खुश हो तुम आज मेरा रिजल्ट देखकर। टीचर जी ने तुम्हें मिठाई खिलाते हुए बधाई दी तो तुम रो ही पडी थी। मैं पास खडा, ये सब देख रहा था, और मन ही मन ईश्वर को शुक्रिया कह रहा था - यहाँ धरती पर तुम जैसी माँ जो मिली है, मुझे संभालने के लिए। मुझे पता है, माँ मैं उन आम बच्चों में शामिल नहीं हूँ, जिसे दुनिया नार्मल कहती है। और तुम भी दुनिया की तमाम माँ के समान ही हो। पर माँ मेरे साथ तुम भी खास हो गई हो। मैं जानता हूँ माँ हर रोज तुम मेरे स्कूल के गेट पर छुट्टी होने के समय से पहले ही खडी रहती हो। दौडते भागते बच्चों को हसरत भरी निगाहों से देखते हुए, मैं जानता हूँ उन बच्चों में तुम मुझे खोजती हो। वैसे तो माँ तुमने कभी किसी से मेरी तुलना नहीं की, फिर भी मेरी क्लास के टापर्स बच्चों की तुम खुशामद करती हो औ...
कहावतों की कविता – 1
कविता

कहावतों की कविता – 1

=========================================== रचयिता : विनोद वर्मा "आज़ाद" हिंदी स्वर का प्रथम अक्षर "अ" को लेकर कहावतों को कविता में ढालना......एक प्रयास..  (१) अपनी नरमी दुश्मन को खाय, अधजल गगरी छलकत जाय, अमरौती खा के कौन है आय, अति का फूल सैंजना डाल पात से जाय। अर्थ :-- सुखद व्यवहार से शत्रु भी पराजित हो जाता है, अधूरी योग्यता छुपती नही, संसार मे कोई अमर नही, घमंडी का सदैव नुकसान होता है।              (२) अपना हाथ जगन्नाथ, अपने मन से पूछिए मेरे मन की बात, अब की अब के साथ, जब कि जब के साथ, अपनी जांघ उघारिये आपन मरिये लाज। अर्थ :-- आत्म निर्भरता, मेरे ह्रदय की बात तुम्हारा ह्रदय ही समझ सकता है, वर्तमान को महत्व देना, किसी अपने की बदनामी करने से आपकी भी बदनामी होगी। लेखक परिचय :-  नाम - विनोद वर्मा सहायक शिक्षक (शासकीय) एम.फिल.,एम.ए. (हिंदी साहित्य), एल.एल.बी., बी.टी., वैद्य विशार...
फ़र्ज़
लघुकथा

फ़र्ज़

========================================================= रचयिता : श्रीमती पिंकी तिवारी करीब बारह वर्ष की थी गुड़िया।  दादाजी के सभी पोते और पोतियों में सबसे लाड़ली थी वो। "चलो गुड़िया, आज "बड़े-घर" जाना है हमको, बड़ी दादी के पास। उनकी तबियत ठीक नहीं है। "ऐसा कहते हुए दादाजी ने गुड़िया को लाल कपडे में लिपटी हुई एक किताब थमा दी और कहा "इसका एक पाठ बड़ी दादी को पढ़ कर सुनाना है तुम्हें, अब चलो।" "बड़े-घर" में एक चारपाई पर बड़ी दादी लेटी हुई थीं। गाँव के डाक्साब (डॉक्टर) भी बैठे थे। पूरा परिवार बड़ी दादी के पास इकठ्ठा हो चुका था। दादाजी के इशारा करते ही गुड़िया ने किताब खोली और दादाजी के कहे अनुसार उसका अट्ठारहवाँ पाठ पढ़ना शुरू कर दिया। पाठ पूरा होते ही बड़ी दादी ने अपना कंपकपाता हाथ गुड़िया के सिर पर फेरा और आशीर्वचन देते हुए चिर-निद्रा में सो गयी। ये वृतांत गुड़िया के कोमल मन पर गहराई से अं...
बिछुड़ना
कविता

बिछुड़ना

=================================================== रचयिता : कुमुद दुबे खडे़-खडे़ निहारती रही सोचती रही, कितना दुर्बल था वह जब मेरे हाथों में सौंपा था, गर्मी सर्दी बरसात हर संकट से बचाकर उसे पोषित किया, दिन प्रतिदिन बढ़ते देखती रही आनन्दित होती रही, आज भी मैं उस दिन को भूल नही पायी हूँ जिस दिन उसे छोड़कर जाने को मजबूर हुयी थी, दुखी हुयी थी दूसरों को सौंप कर उसे। अरसा बीत गया आज अचानक सामने से गुजरी, चुपके से निहारते न जाने कब उसके समीप पहुंच गई, फलों से लदा वह कटहल का पेड़ नतमस्तक हो जैसे कह रहा हो जो देकर ना ले वही तो प्यार है बाकी सब व्यापार है फिर मैं नम आँखे लिये अनमने मन से चल पड़ी अपने गन्तव्य को। लेखिका परिचय :-  कुमुद के.सी.दुबे जन्म- ९ अगस्त १९५८ - जबलपुर शिक्षा- स्नातक सम्प्रति एवं परिचय- वाणिज्यिककर विभाग से ३१ अगस्त २०१८ को स्व...
तुम गए
कविता

तुम गए

रचयिता : शशांक शेखर ============================================================= तुम गए सुबह और दिन गए और हम ओस बन कर घास पर बिछ गए और हम आसमान से टपकते रहे आँसू बनकर और हम आज भी बारिश की बूँदे छतरी से टकराती हैं गीत कोई तुम्हारे नाम की गाती हैं और हम भागते हैं यहाँ से वहाँ तुम्हारी तलाश में और हम सायों को पकड़ते हैं जैसे चिढ़ा कर हमें तुम चुप गयी हो कहीं ओट में और हम उँगलियाँ शाम की थामे हुए पुकारते हैं तुम्हें मासूम का चेहरा तुम्हारा आवाज़ देता है हमें और दूर से धड़कन अपनी आप ही सुनते हैं और हम   लेखक परिचय :- आपका नाम शशांक शेखर है आप ग्राम लहुरी कौड़िया ज़िला सिवान बिहार के निवासी हैं आपकी रुचि कविताएँ आलेख पढ़ने और लिखने में है।...
कहानी घर की
कविता

कहानी घर की

============================================ रचयिता : ईन्द्रजीत कुमार यादव कोई बताए कैसे बनेगा घर मेरा ? कुछ मिट्टी और कुछ गिट्टी का इंतेजाम कराना है, लेकिन इससे पहले पेट में लगी आग बुझाना है। कोई बताए कैसे बनेगा घर मेरा ? कुछ ईंट कुछ पत्थर का भी इंतेजाम कराना है, लेकिन उससे पहले कुछ कर्ज भी चुकाना है। कोई बताए कैसे बनेगा घर मेरा ? घर के किसी कोने में रशोईघर भी बनवाना है, लेकिन पहले आज केलिये रशोई का समान भी लाना है। कोई बताए कैसे बनेगा घर मेरा ? एक कमरे में हमे अपने भगवान को बसाना है, मगर मित्रों एक घर बनाने केलिये पहले पैसों को भगवान बनाना है। लेखक परिचय :-  नाम : ईन्द्रजीत कुमार यादव निवासी : ग्राम - आदिलपुर जिला - पटना, (बिहार) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्र...
तो ईद हो
कविता

तो ईद हो

================================================ रचयिता : रशीद अहमद शेख पुण्य का विस्तार हो तो ईद हो! हर्ष का संचार हो तो ईद हो! हो सुलभ जन-जन को भोजन वस्त्र-वंचित हो नहीं तन कोई पथशायी नहीं हो, सबके हों अपने निकेतन आर्थिक आधार हो तो ईद हो! हर्ष का संचार हो तो ईद हो! संतुलित अभिव्यक्तियां हों नियंत्रित आसक्तियां हों शुभ समर्पित शक्तियां हों, चाहे ऊँची भित्तियां हों भावना का द्वार हो तो ईद हो! हर्ष का संचार हो तो ईद हो! अहिंसक धारा विषम है कहीं भय है, कहीं भ्रम है मांग शस्त्रों की अधिक है, संधियों की चाह कम है पुष्प का व्यापार हो तो ईद हो! हर्ष का संचार हो तो ईद हो!   लेखक परिचय :-  नाम ~ रशीद अहमद शेख साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम• ए• (हिन्दी...
यह नदी अभिशप्त सी है
कविता

यह नदी अभिशप्त सी है

========================= रचयिता : रामनारायण सोनी यह नदी अभिशप्त सी है जल नही बहता यहाँ यह लगभग सुप्त सी है घाट सब मरघट बड़़े है प्यास पीते जीव जन्तु धार, लहरें लुप्त सी है यह नदी अभिशप्त सी है पालती थी सभ्यताएँ धर्ममय और तीर्थमय हो संस्कृति विक्षिप्त सी है यह नदी अभिशप्त सी है खेत बनती थी उपजती तरबूज, खरबूज ककड़ियाँ अब रेत केवल तप्त सी है यह नदी अभिशप्त सी है प्राण उसके पी गई लोलुपी जन की पिपासा वासनाएँ लिप्त सी है यह नदी अभिशप्त सी है हम विकासों के कथानक तान कर सीना दिखाते सब शिराएँ रिक्त सी है यह नदी अभिशप्त सी है बस बाढ़ ही ढोती रहेगी शेष दिन निःश्वास होंगे जिन्दगी संक्षिप्त सी है यह नदी अभिशप्त सी है   परिचय :- नाम - रामनारायण सोनी निवासी :-  इन्दौर शिक्षा :-  बीई इलेकिट्रकल प्रकाशित पुस्तकें :- "जीवन संजीवनी" "पिंजर प्रेम प्रकासिया", जिन्दगी के कैनवास लेखन :- गद्य, पद्य ...
तेरे बिन दर्पण लगता झूठा
कविता

तेरे बिन दर्पण लगता झूठा

============================== रचयिता : रीतु देवी झूठ को सच बयां करता दर्पण, सारे भाव हम अपना करते अर्पण, फिर भी तेरे बिन झूठा लगता दर्पन, हूँ बाबड़ी करूँ मुखमंडल तेरे नयनों में दर्शन। देख तेरे चक्षुओं में अपना मुख, प्राप्त होती मुझे सांसारिक अलौकिक सुख। गाऐं तू श्रृंगार रस , करूँ मोहिनी श्रवण तुझ बिन नीरस है जीवन करके श्रृंगार न देखूँ दर्पण, आ जाओ सनम करूँ तहे दिल अर्चन। दर्पण दिखा सब करते मेरे सौंदर्य का व   लेखीका परिचय :-  नाम - रीतु देवी (शिक्षिका) मध्य विद्यालय करजापट्टी, केवटी दरभंगा, बिहार आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर मेल कीजिये मेल करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें … औ...
रे माधो
कविता

रे माधो

रचयिता : लज्जा राम राघव "तरुण" ================================================ रे माधो! सुख है दुख के आगे।.. मन की तनिक लगाम खींच, फिर सोई आत्मा जागे। रे माधो सुख है दुख के आगे।.. मन तुरंग पर चढ रावण ने सीता जाय चुराई। हनुमत संग सुग्रीव लिए श्री राम ने करी चढ़ाई। देख सामने मौत दुष्ट को नहीं समझ में आई। फिर राम लखन ने जा लंका की ईंट से ईंट बजाई। लंका भस्म हुई सारी सब छोड़ निशाचर भागे। रे माधो! सुख है दुख के आगे।.. बाली ने कर घात भ्रात से पाप किया था भारा। भाई की घरवाली छीनी नाम सुमति था तारा। गदा युद्ध प्रवीण बालि सुग्रीव बिचारा हारा। राम सहायक बने तुरत पापी को जाय संहारा। बड़े बड़े बलवान सूरमा काल के गाल समागे। रे माधो! सुख है दुख के आगे।. भक्ति में हो लीन 'ध्रुव' तारा बन नभ में छाये। शबरी की भक्ति वश झूठे बेर राम ने खाए। भागीरथ तप घोर किया गंगा धरती पर लाये। दानव सुत प...
प्रकृति
कविता

प्रकृति

====================================== रचयिता : मित्रा शर्मा सूखते खेत खलिहानों से बंजर पड़े भूमि से बर्वाद होते जंगल से बेजार होते पेड़ पौधे से। पूछो उनकी अभिलाषा देखो बदलते परिभाषा । सुनो उनकी स्पंदन करते हुए क्रंदन। एक बूंद पानी की आस में ह्रास होते सम्बेदना के त्रास में। देख रही प्रकृति रोती बिलखती चीत्कार करती। भूल गया है तू अपना मानविय कर्तब्य पालना और सुरक्षा का फर्ज। खुदगर्ज हुआ है तू मानव समेटने में लगा है दानव । अब नही समझोगे तो कब मिटने वाला है तेरा अस्तित्व । प्रकृति प्रदत्त उपहार को बचाने के लिए अग्रसर होना पड़ेगा तुम्हे जीवन सँवारने के लिए। बचाना होगा पानी और पेड़ जंगल तय होगा तब जीवन मे सुकून और सम्बल। परिचय :- मित्रा शर्मा - महू (मूल निवासी नेपाल) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, अपनी कविताएं...
जीत
कविता

जीत

============================== रचयिता : रीतु देवी अरमानों की ख्यालों में लगा पंख, सीढियाँ दर सिढियाँ चढ फूंक विजयी शंख, देखकर अस्ताचल-उदयमान रवि , अहर्निश पग बढा खिला छवि, सहस्त्रों बार चींटी भाँति गिर-गिरकर, प्रयास करते रहना न पीछे पलटकर। फंसना न कभी राहों के जाल में सागरों की झंझावतों से निकलते रहना हर हाल में कठोर तपस्या के लगाकर आसन, अपने चमन के गगन का बढाना शान, स्मरण कर कन्हैया संग मिश्री -माखन, थामे रहना प्रतिपल श्रेष्ठजनों का दामन।   लेखीका परिचय :-  नाम - रीतु देवी (शिक्षिका) मध्य विद्यालय करजापट्टी, केवटी दरभंगा, बिहार आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर मेल कीजिये मेल करने के बाद हमे हमारे नंबर...
तो फिर क्यों आ रहे हो
कविता

तो फिर क्यों आ रहे हो

======================================== रचयिता : शिवांकित तिवारी "शिवा" मुझे क्यों आजमाने आ रहे हो, बताओं क्या जताने आ रहे हो, तुम्हीं ने मुझको ठुकराया था एक दिन, तो फिर क्यों अब मुझे वापिस मनाने आ रहे हो, क्यों पिंजरें में रखा था तुमने अब तक कैद करके, क्यों पिंजरें से मुझे अब तुम छुड़ानें आ रहे हो, गिराया था मुझे तुमने कभी नीचा दिखाकर, तो फिर क्यों आज तुम ऊँचा उठाने आ रहे हो, तुम्हीं ने था रुलाया मुझको पहले जख़्म देकर, तो अब क्यों जख़्म में मरहम लगाने आ रहे हो, तुम्हीं ने तो कहा था तुम न कोई काम के हो, तो फिर क्यों आज मेरी उपलब्धियाँ गिनानें आ रहे हो, मैं मतलब से नहीं मिलता न मतलब से मेरा रिश्ता, तुम्हीं थे मतलबी जो हाथ मुझसे फिर मिलाने आ रहे हो,   लेखक परिचय :- शिवांकित तिवारी "शिवा" युवा कवि, लेखक एवं प्रेरक सतना (म.प्र.) शिवांकित तिवा...
जल हम सब की जीवन रेखा है
कविता

जल हम सब की जीवन रेखा है

================================= रचयिता : मंजुला भूतड़ा मैंने पानी से रिश्ते बनते देखे हैं, मैंने पानी से रूठे मनते देखे हैं। मैंने देखा है पानी का मीठा कडवा खारा होना, मैंने देखा है इस का सबमें सबके जैसा हो जाना। घुलने मिलने आकार बदलने का गुण है, कोई नहीं ऐसा जो इसके बिना मौन या चुप है। यह हम सब की जीवन रेखा है, क्या इस का भविष्य हमने कभी सोचा है। क्यों नहीं दे पाते इसे कोई भाव, क्यों नहीं रखते इसे बचाने का भाव। एक दिन नहीं होने पर गृहयुद्ध छिड़ जाता है, इस से हम सब का गहरा नाता है। जल संरक्षण की बात प्रबल करनी होगी, जल संवर्धन की तकनीक अमल करनी होगी। तभी भविष्य- सुख सरल तरल हो पाएगा यह जल का नहीं अपना भविष्य बनाएगा। जो आज किया परिणाम वही फिर पाना है, वरना पानी की बर्बादी पर पानी पानी हो जाना है। बिन पानी क्या जीवन सम्भव हो पाना है  नई पीढ़ी के सम्मुख क...
हे मोदी!
कविता

हे मोदी!

================================================== रचयिता : भारत भूषण पाठक हे मोदी ज्ञान पयोधि तुम्हारा अभिनन्दन । है नरेन्द्र माँ भारती के मृगेन्द्र। तुम्हारा वन्दन माँ भारती के मान का करने वर्धन।। है विकासपुरुष ।स्वीकार हो स्नेहपुष्पगुच्छ।। धन्य हो पंकज संरक्षक।भयाक्रान्त रहते तुमसे आतंकपोषक।। धन्य हो तुम है महात्मन।भारत भक्ति को भारत करता है तेरे नमन।। है मोदी स्थापित रहे तेरा कीर्तिमान । बस अब और शहीद न हों रखना इतना सा ध्यान।। धन्य है तुम्हारी नेतृत्त्व शक्ति। स्वीकार हो शुभकामना भारत को बनाने विश्वशक्ति।। धन्य है तुम्हारी ओजस्विता ।धन्य तेरी दूरदर्शिता।। लेखक परिचय :-  नाम - भारत भूषण पाठक लेखनी नाम - तुच्छ कवि 'भारत ' निवासी - ग्राम पो०-धौनी (शुम्भेश्वर नाथ) जिला दुमका(झारखंड) कार्यक्षेत्र :- आई.एस.डी., सरैयाहाट में कार्यरत शिक्षक योग्यता - बीकाॅम (प्रतिष्ठ...
मेरे शैक्षिक नवाचार एवं उनके प्रभाव
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मेरे शैक्षिक नवाचार एवं उनके प्रभाव

=========================================== रचयिता : विनोद वर्मा "आज़ाद" हमारे राज्य की मानक भाषा हिंदी है। यद्धपि प्रदेश में मालवी, निमाड़ी, बघेली, बुंदेली भीली आदि कई क्षेत्रीय व स्थानीय भाषाएं व बोलियां है।जो समूचे प्रदेश में बोली जाती है और वो समाज की संपर्क भाषा बन गई है। ये सभी स्थानीय भाषाएं जहाँ हिंदी से प्रभावित है वही हिंदी भाषा भी इन भाषाओं, बोलियों के रस-रूप और उसकी सुगंध ग्रहण करके अपने को समृध्द बनाती है। ठीक इन बोलियों के अनुसार ही हम शैक्षिक नवाचार को ले सकते है। नवाचार भी ऐसा हो जो अनुकरणीय हो। सम्पूर्ण प्रदेश ही नही देश में भी खेलकूद गतिविधियां एक जैसी होने लगी है। यथा-कबड्डी, खो-खो, क्रिकेट, दौड़, स्लो सायकल रेस, लम्बी कूद......आदि। ये खेल सम्पूर्ण राष्ट्र में एक साथ प्रारम्भ नही हुए, बल्कि एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने में काफी समय लगा, देशी खेल के साथ विदेशी खेल ...