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वक्त
लघुकथा

वक्त

वक्त रचयिता : माधुरी शुक्ला दसवीं कक्षा में पहुंचे पोते मनु के बदले रंग ढंग को दादा ब्रजकिशोर की बूढ़ी और अनुभवी आंखों ने मानो पढ़ और समझ लिया है। फिर कल उसे मोहल्ले के बिगड़ैल लड़कों के साथ घूमते  देख उनकी फिक्र बढ़ गई है। ब्रजकिशोर बेटे दिनेश से कह रहे हैं सिर्फ कमाने में ही मत लगा रहा कर घर की तरफ भी थोड़ा ध्यान दे। मनु की फिक्र भी किया कर वह बड़ा हो रहा है और गलत संगत में भी पड़ता दिखाई देने लगा है। उनका इतना कहना था कि बहू सरिता बरस पड़ती है बाबूजी की तो पता नहीं क्यों मनु से आजकल कुछ दुश्मनी हो गई है। वह कुछ भी करे इन्हें गलत ही लगता है। यह सुन ब्रजकिशोर खामोश हो जाते हैं। जानते हैं अब कुछ बोले तो बहस हो जाएगी। इस बीच दिनेश ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगता है खूंटी पर टंगा मनु की पैंट गलती से उससे नीचे गिर जाती है। जब पैंट  टांगने लगता है तो जेब से सिगरेट का पैकेट बाहर झांकता ह...
वाह क्या नजारा था
कविता

वाह क्या नजारा था

वाह क्या नजारा था रचयिता : वंदना शर्मा एक दिन घर से निकलते ही दिखा वाह क्या नजारा था? एक आदमी एक हाथ में खंजर लिए दूसरे को काट रहा था |  पहले तो देखकर कुछ समझ नहीं आया | फिर सोचा कि शायद कोई पागल है या कोई जादूगर, क्योंकि एेसा अचम्भा जीवन में पहली बार देखा था | देखकर रहा नहीं गया, जाने लगी उसे रोकने तो सहेली ने मुझे रोक दिया कि रहने दो क्यों व्यर्थ के पचड़े में  पड़ती हो | पर समस्या गम्भीर है स्त्री स्वभाव और कवि हृदय पूछना आवश्यक हो गया था | नहीं पूछें तो पेट दर्द | मुझसे रहा नहीं गया | पास जाकर बोली , कि चाचाजी क्या कर रहे हो? अपने ही हाथों स्वंय अपने ही हाथ क्यों काट रहें है ? आप शक्ल से पागल भी तो नहीं लगते तो ये पागलपन क्यों? त्यौरियाँ  चढ़ाते हुए उन्होने मुझे घूरा|  क्षण भर ठहर कर फिर कहा, कि बिटिया  बात तो समझ की करती हो| पर  ये नहीं  दे...
प्रहार कर
लघुकथा

प्रहार कर

प्रहार कर रचयिता : शिवम यादव ''आशा'' ===================================================================================================================== कुनाल अपनी जिंदगी से इतना नाखुश था कि उसे कुछ भी सूझ ही नहीं रहा था, उसकी जिंदगी मानों थमती और चलती जा रही थी, कुनाल की जिंदगी में सबने ही दखल डाला था यहाँ तक की उसकी खुद भी जिंदगी ने उसपर दखल ऐसे दी थी कि उसने हार मानते मानते भी हार नहीं मानी थी, कुनाल के परिवार में छः सदस्य थे जिसमें कुनाल सबसे छोटा है उसके ऊपर लेकिन बोझ इस प्रकार है मानों वो परिवार में सबसे बङा हो, घर का सारा काम देखना अपने पिता की खेती का सारा काम देखता और स्वयं खेती में काम भी मेहनत से करता फसल आती बेची जाती और सारा धन घर के कामों व भाई बहन की पढ़ाई में खर्च होता है जिसपर कुनाल ने कभी भी जरा सा सोच भी नहीं किया कि आखिर मुझे भी पढ़ना है और क्या करना है सिवाय क...
पल दो पल की खुशियां
कहानी

पल दो पल की खुशियां

पल दो पल की खुशियां रचयिता : जितेंद्र शिवहरे संध्या आज पहली बार प्रभात के साथ सफ़र कर रही थी। त्यौहार के सीज़न के कारण बस वाले छोटी यात्रा करने वाले पेसेन्जर को बस में बैठा नहीं रहे थे। उस पर जो बस वाले बैठा भी लेते तो बैठने की सीट मिलना मुश्किल थी। संध्या की समस्या अभी खत्म नहीं हुयी थी। उसने देखा सड़क पर चक्काजाम की स्थिति निर्मित हो गयी है जो इस सड़क पर एक आम समस्या थी। संध्या ने विचार किया की आज स्कूल पहुंचने में वह निश्चित ही विलंब से पहुंचेगी। स्कूल के हेडमास्टर की डांट से वह भली-भांति परिचित थी। उसका विलंब से स्कूल पहुंचने का कारण अधिकतर सड़क जाम होना ही होता था। सड़क पर वाहनों के जाम की स्थिति का हवाला देते-देते वो थक गई थी। क्योंकि हेडमास्टर चिरपरिचित इस समस्या का हल संध्या को पुर्व में बहुत बार सुझा चूके थे। या तो संध्या मोपेट से स्कूल आया करे क्योंकि मोपेट से आने-जाने में सड़क...
मेरा राम मेरे साथ है
लघुकथा

मेरा राम मेरे साथ है

मेरा राम मेरे साथ है रचयिता : डॉ सुरेखा भारती शाम हो गई थी राधिका ने अपने को, थोड़ा संवारा और वह तुलसी क्यारी में दीपक लगाकर अपने पूजा घर में रामायण पढ़ने बैठ गई। यह उसका रोज का नियम जो था। अंकुर की शादी हुए दो महिने बीत गए थे। अंकुर की पसंद-नापंसद, उसके लिए क्या बनाना है, क्या नहीं, पहले उसकी चिंता रहती थी, पर यह सब तो अब बहु ही देखने लगी थी। बहु तो अच्छी है पर राधिका और अधिक अकेला पन महसूस करने लगी थी। अंकुर भी अब आते से ही पूछने लगा है, सीमा ऽ सीमा तुम कहां हो .......?, लगता था अब माँ को वह भूल गया है। पहले जरूर उसके इस बदलाव से मन में अजीब सी चुभन होती थी। पर अब अपना मन भगवान के स्मरण में लगाना सीख लिया था। रामायण पढ़ते हुए, वह श्री रामचरित्र में खो गई थी, की सहसा फूलों की सुगंध वातावरण में घूमने लगी, उसने सोचा अंकुर बहु के लिए फूल ले कर आया होगा, आज उसका जन्मदिन जो है। पर अचानक उस...
डाॅ. हीरा इन्दौरी के दोहे
कविता

डाॅ. हीरा इन्दौरी के दोहे

डाॅ. हीरा इन्दौरी के दोहे रचयिता : डाॅ. हीरा इन्दौरी प्राईम मिनिस्टर होय वो , या भारत के प्यून । मिलती भ्रष्टाचार से , यहाँ सभी की ट्यून ।। ---~~~~ धारा सत्तर तीन सौ , भूले मन्दिर राम । जब सत्ता ही मिल गई , तो इनसे क्या काम ।। ~~~~ सब दल सत्तासीन है , जनता ढोती भार । नेताजी करते यहाँ , कुर्सी का बेपार ।। ~~~~ चोरों का सरदार वो , बनता वो साहूकार जनता भी यकीन करे , डूबा भारत यार ।। ~~~~~ देश पङे जब आपदा , काल जलजला बाढ । नेता अफसर के घरों , लक्ष्मी छप्पर फाड़ ।। संयासन मंत्री बनी , ~~~~~ खेला लव का खेल । दीवानी गोविन्द से , ना कर पाई मेल ।। ~~~~ मूँछ मरोङे जेल में , नेता अफसर दोइ । सिद्ध अदालत में करे , दाग हमारे कोई ।। ~~~~ बागी दागी सूरमा , चले चुनावी चाल । जो दे टिकट चुनाव का , वो घण्टा घङियाल ।। परिचय :- नाम : डाॅ. "हीरा" इन्दौरी  प्रचलित नाम डाॅ....
उसूल
कविता

उसूल

रचयिता : डॉ. बी.के. दीक्षित कौन रोक सकता है खुशियाँ, अग़र याद का कोषालय हो। मन नहीं घबड़ाता है बिल्कुल,,,,दिल जब एक शिवालय हो। जीवन सदा पुष्प सा खिलता,ख़ुश्बू सराबोर कर देती। छोटे छोटे दांत दिखाकर,बेटी जब खुल कर हंस देती। मन बृन्दावन,तन है मथुरा,पर प्रीति उन्हीं से कर पाता हूँ। कहने को वो अपने हैं,पर अपनों से ही डर जाता हूँ। रिश्तों की मंहगी मंडी में,मोल भाव कर बिकते रिश्ते। बोली लगती है रिश्तों की,मंहगे कहीं और कहीं सस्ते। अपनी दुनिया अपना रुतबा,सख़्त उसूल भूल ना जाना। जहाँ मिले ना नेह प्रीति,उस घर बिजू कभी न जाना। परिचय :- डॉ. बी.के. दीक्षित (बिजू) आपका मूल निवास फ़र्रुख़ाबाद उ.प्र. है आपकी शिक्षा कानपुर में ग्रहण की व् आप गत ३६ वर्ष से इंदौर में निवास कर रहे हैं आप मंचीय कवि, लेखक, अधिमान्य पत्रकार और संभावना क्लब के अध्यक्ष हैं, महाप्रबंधक मार्केटिंग सोमैया ग्रुप एवं अवध समाज साहि...
रणवाँकुणे
कविता

रणवाँकुणे

रचयिता : शिवम यादव ''आशा''  वो तो रणवीर वाँकुणे थे,  जिनको राणा कहते थे लाखों दुश्मन से लङने की, अकेले हिम्मत रखते थे तूफान सा तेज चेतक में था उनके हर वार पे दुश्मन मरता था तीव्र तेज था भाले का, जिससे दुश्मन का सीना, मस्तक फटता था था चेतक में अदम्य साहस जिससे दुश्मन भय खाता था रण में चेतक जहाँ ठहरता था वहाँ सून सान हो जाता था...-2 वीर राणा प्रताप वीर राणा के भाले से, दुश्मन मात खाते थे वही राणा के वंशज आज भी भारत भूमि पे जिंदा हैं... जरा तू होश आ दुश्मन नहीं मिट्टी मिला देंगे हम राणा के वंशज है तुम्हें मरना सिखा देंगे लेखक परिचय : नाम शिवम यादव रामप्रसाद सिहं ''आशा'' है इनका जन्म 07 जुलाई सन् 1998 को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात ग्राम अन्तापुर में हुआ था पढ़ाई के शुरूआत से ही लेखन प्रिय है, आप कवि, लेखक, ग़ज़लकार व गीतकार हैं रुचि :- अपनी लेखनी में दमख...
धुरी
लघुकथा

धुरी

रचयिता : माधुरी शुक्ला अरे, पूजा जल्दी करो, देर हो रही है डॉक्टर साहब निकल जायेंगे। अजय का यह स्वर कई बार गूंज चुका है। आई बस, कुछ देर और यह कहती पूजा बेटे चिंटू और सास के लिए खानपान का पूरा इंतजाम करने में जुटी है। उसे लग रहा है कि बुखार तो उतरने का नाम ही नहीं ले रहा ऐसा ना हो डाॅक्टर अस्पताल में एडमिट होने को कह दे। ऐसा सोचती है तभी इस बार अजय कड़क आवाज़ में पुकारता है कितनी देर, छोड़ो यह सब बाद में देख लेना। पसीना पोंछती वह किचन से निकलती है और अजय के साथ डाॅक्टर के पास जाती है। डाॅक्टर उसकी हालत देख तुरंत एडमिट होने को कह देता है। अब अजय का चेहरा देखने लायक हो जाता है। वह डाॅक्टर से पूछता है शाम तक छुट्टी हो जाएगी ना। वह हंसते हुए कहते हैं इलाज तो शुरू होने दो पहले। अजय के सामने बूढ़ी मां और चार साल के बेटे का चेहरा घूमने लगता है। सोचता है अगर  यह एक-दो दिन अस्पताल में रह गयी तो घर ...
ये राह नहीं है आसान
कविता

ये राह नहीं है आसान

रचयिता : शशांक शेखर ये राह नहीं है आसान उन्नीस है जिसका नाम || देशभक्ति सुरक्षा सैनिक, पांच सालों की कार्य शैली, सब पर भारी है बहत्तर हज़ार, आदायगी का बस नाम || तुम किस मुँह से दुत्कारोगे, कैसे मुफ्तखोरी नहीं है जायज़, अब और कहोगे , बांटे हैं तुमने भी बहुतेरे चीज़ तमाम. || ये राह नहीं है आसान उन्नीस है जिसका नाम. || जहाँ एक ओर बैठे हैं ठेगेरे बहुतायत आम वहीं तुम्हारे तालाब में भी मछलियाँ हो रही हैं खराब. अब कदम बस इतना उठा दो नोटबन्दी की भांति एक रात से सारे नेताओं की सुविधाओं पर एक सर्जिकल स्ट्राइक करा दो. कहते हो मेरा देश मेरे दल, परिवार और मुझसे आगे है तो फिर मोह को तोड़ दो और कलंकितों को संसद विहीन कर दो ना आए पुनः सरकार तुम्हारी गम नहीं वादे नहीं हुए पुरे गम नहीं दुर्गतरेते की तरह सड़क से संसद तक कोई न हो दागी भ्रष्टाचारी दूर हो भारत से यह बीमारी फिर हम कहें ...
कहां गए वो दिन
कविता

कहां गए वो दिन

कहां गए वो दिन ====================================== रचयिता : मित्रा शर्मा दिल की किताब को खोलूं कैसे। रूह में बसी बचपन की याद को भूलूं कैसे। गर्मी की छुट्टी का रहता था इंतजार। प्यारा लगता था पगडंडी वाला मामा का घर। गिल्ली डंडा ,चोर सिपाही सबसे बड़े खेल होते थे। मोजे की गेंदों से दिनभर मारपीट में ढेर होते थे। वह चारपाई या खाट गोदड़ी के बिछोने। हक जमाते भाई बहनों पर मिट्टी के खिलौने। पिपरमेंट और हाजमोला खास हुआ करते थे । इमली बेर कच्ची केरी के ढेर हुआ करते थे। कहां आरो और वाटर कूलर मीठा लगता था प्याऊ का पानी । कहां टीवी और मोबाइल प्यारे लगते थे नाना नानी परिचय :- मित्रा शर्मा - महू (मूल निवासी नेपाल) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु हिंदी में टाईप करके हमें hindi...
समय बड़ा बलवान
कविता

समय बड़ा बलवान

समय बड़ा बलवान =========================================== रचयिता : डॉ. इक़बाल मोदी समय बड़ा ही बलवान है, वो कहाँ का पहलवान है, कई आये और गए यहाँ, न कोई टिका धनवान है। हम हिफाज़त अब करते है वह कौन सा दरबान है।। यहाँ हर कोई कलाकार है, सब तीसमारखाँ सलमान है अपना चमन खुद उजाड़े , आज का ऐसा बागवान है शिद्दत से किये कार्य व्यर्थ है दिखावे में सारा जहान है। ये देख हैरान है, इक़बाल इंसा खुद बन बैठा,भगवान है। परिचय :- नाम - डॉ. इक़बाल मोदी निवासी :- देवास (इंदौर) शिक्षा :- स्नातक, (आर.एम्.पी.) वि.वि. उज्जैन विधा :- ललित लेखन, ग़ज़ल, नज्म, मुक्तक विदेश यात्रा :- मिश्र, ईराक, सीरिया, जार्डन, कुवैत, इजराइल आदि देशों का भ्रमण दायित्व :- संरक्षक - पत्र लेखन संघ सदस्य :- फिल्म राइटर एसोसिएशन मुंबई, टेलीविजन स्क्रीन राइटर एसोसिएशन मुंबई प्रतिनिधित्व :- विश्व हिंदी सम्मेलन भोपाल ...
प्रजातंत्र बोलेगा
कविता

प्रजातंत्र बोलेगा

रचयिता : विनोद सिंह गुर्जर आये हैँ चुनाव, लगे दिल पर घाव अब प्रजातंत्र बोलेगा । जनसेवक होशियार तू रहना, सिंहासन डोलेगा।।. .. . पाँच बर्ष तक मनमानी की, नेताजी झूठे तुम। भोली जनता को छल बल से, कई बरस लूटे तुम।। कई योजना बनी तुम्हारी सार्थक एक नहीं । जहां से गिनती शुरू हुई थी , पहुंचे आज वही ।। दंगे और फसादों को अब, जन - जन तौलेगा ।। जनसेवक होशियार तू रहना, सिंहासन डोलेगा ।।. ... राम का मंदिर बना नहीं, कसमें झूठी तुम खाए । राम लला तंबू में रोवे, माँ सीता घबराये।। बेशर्मी की हद होती है, किंतु लांघ तुम पार गये। सत्ता के मद में सब भूले, वादे, स्वर्ग सिधार गये।। आने वाला कल पापों की, गठरी खोलेगा।।.... जनसेवक होशियार तू रहना, सिंहासन डोलेगा ।।. ... वर्ण व्यवस्था छिन्न-भिन्न कर, आपस में लड़वाते । न्यायपालिका के आंगन, अन्याय का वृक्ष लगाते।। स्वर्ण-दलित आंदोलित होकर...
दहेज प्रथा: आदर्श विवाह द्वारा उन्मूलन
आलेख

दहेज प्रथा: आदर्श विवाह द्वारा उन्मूलन

रचयिता : डाॅ. संध्या जैन दहेज हमारे समाज को लगी हुई कैंसर से भी अधिक भयानक बीमारी है। यदि शीघ्र ही इस बीमारी से ग्रसित समाज को राहत नहीं दिलाई गई तो वह पतन के गड्ढे में जा गिरेगा। ऐसी कुत्सित प्रथा के पक्ष में लिखना तो ठीक वैसा ही है जैसा कि ‘अन्धे को लाठी दिखाना।’ समाज में व्याप्त इस दहेज-प्रथा ने अनके परिवारों को उजाड़ दिया है। विशेषतः निम्न और मध्यम वर्ग के परिवार इसके शिकार हुए हैं। इस दहेज की कुत्सित वृत्ति के कारण अनेक माता-पिता विवश होकर अपनी लड़की को कुरूप या वृद्ध वर के हाथों बेच देते हैं। यही नहीं वरन् लड़कियों की जिंदगी को भ्रष्ट करने में भी दहेज-प्रथा का बहुत बड़ा हाथ है। कितनी ही लड़कियाँ जीवन से हताश हो आत्म-हत्या कर लेती हैं तथा गलत कामों की ओर उन्मुख हो जाती हैं। तलाक, बाल-विवाह, अनमेल-विवाह, आर्थिक ढाँचा चरमराने पर माता-पिता द्वारा आत्म-हत्या, बहू को जिंदा जलाकर मार डालन...
छोटा- सा जीवन
कविता

छोटा- सा जीवन

छोटा- सा जीवन रचयिता : डॉ. इक़बाल मोदी छोटा- सा जीवन है ये, तो मस्त रहे हर हाल में। गाड़ी का क्यो रस्ता देखे , मस्त रहे पदचाल में।। हर पल मुस्काते ही बोले , आंसू में क्यो दुबे हम, जीवन सुंदर मौज मनाये ,मस्त रहे हर काल मे।। ऊंचे ख्वाब तसव्वुर झूठे, लगते सब बेमानी ये, क्यो पनीर के ख्वाब सजाये, मस्त रहे घर-दाल में।। जीवन है तो नित चुनौतियां ,आएंगी ही सदा यहाँ, करे सामना डटकर इनका, मस्त रहे हर ताल में।। कौन करोड़ीमल, कौन अरबपति हो,इससे क्या, फटेहाल' इक़बाल' ठीक है, मस्त रहे निज माल में।।   परिचय :- नाम - डॉ. इक़बाल मोदी निवासी :- देवास (इंदौर) शिक्षा :- स्नातक, (आर.एम्.पी.) वि.वि. उज्जैन विधा :- ललित लेखन, ग़ज़ल, नज्म, मुक्तक विदेश यात्रा :- मिश्र, ईराक, सीरिया, जार्डन, कुवैत, इजराइल आदि देशों का भ्रमण दायित्व :- संरक्षक - पत्र लेखन संघ सदस्य :- फिल्म राइटर एसोसिएशन...
परीक्षाव्रत
कविता

परीक्षाव्रत

परीक्षाव्रत रचयिता : भारत भूषण पाठक दोहा - परीक्षापुरी के घाट पर भई परीक्षाव्रती के भीर।           परीक्षार्थी कलम घिसै ध्यान देत परीक्षक बलबीर।। सुन्दर पावन पुनीत बेला । चहुँओर दृश्य अलबेला।। कभी अधिगम कभी समागम। और मध्य में बार-बार फूटता बम।। कलरव का था लगा समाहार । हर तरफ केवल एक प्रश्न की गुहार।। प्रतीत था होता हाहाकार । उस पर प्रचण्ड गर्मी का प्रहार।। चल रहा था विषय पर्यावरण। था निर्मित अद्भुत वातावरण ।। था हो रहा हर तरफ पूछताछ का अधिगम । और परीक्षक फूट रहे  थे बन कर बम।। मेरी दशा को देखकर। कहा परीक्षक ने तनिक सोचकर।। आप भी  कुछ जुगाड़ बिठाइए । तभी मैंने कहा मैं शाकाहारी हूँ ...... इसलिए मुहतरमा आप मुझसे परे हो जाइये।। उसने पुन: कहा मैं समझी नहीं । मैंने तब उन्हें समझाया ।। मुहतरमा आज अपन का उपवास है। संग अपने पर पूर्ण विश्वास है। इतने में आने को हुए ...
पर्यावरण दिवस 
कविता

पर्यावरण दिवस 

पर्यावरण दिवस  रचयिता : मनोरमा जोशी हरे भरे उपवन का बन जाये, हर घटक राष्ट्र का माली। क्लेश काल का बने ग्रास नित, काल निशा हो कभी न काली। लेकर के संकल्प आज हम, ऐक ऐक पेड़ लगाएं, पर्यावरण बचाएं। वन जब घटा हैं बड़ा है प्रदूषण, जन जन में फैली है बीमारी भीषण। यह संताप मिटाएं। आओ ऐक पेड़ लगाएं। पर्यावरण बिन सूना जग सारा, इसी से है जीवन सारा, इससें ही हैं सब गतिमान, हम सब रक्खे इसका ध्यान , स्वस्थय सुखी संसार बसायें। आओ हम एक पेड़ लगायें। अपना देश बचायें। लेखिका का परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा-स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र-सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं।विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी का...
गिरकर उठना
कविता

गिरकर उठना

गिरकर उठना रचयिता : मनोरमा जोशी गिरकर उठना, उठकर चलना यह काम है संसार का। कर्म वीर को फर्क न पड़ता, कभी जीत और हार का। जो भी होता है घटना क्रम, रचता स्यंम विधाता है। आज लगे जो दंड वहीं पुरस्कार बन जाता हैं। निशिचत होगा प्रबल समर्थन, अपने सत्य विचार का, कर्म वीर को फर्क न पड़ता, कभी जीत और हार का। कर्मो का रोना रोने से, कभी न कोई जीता है, जो विष धारण कर सकता है, वह अमृत को भी पी लेता है। संबल यह विश्वास ही है, अपने दृढ़ आघार का। कर्म वीर को फर्क न पड़ता, कभी जीत और हार का। लेखिका का परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा-स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र-सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं।विभिन्न पत्र...
लड़की
लघुकथा

लड़की

लड़की रचयिता : अविनाश अग्निहोत्री ===================================================================================================================== अपने पिता के माथे पर चिंता की गम्भीर लकीरे देख। गरिमा उससे बोली, पिताजी हमे पहले तत्काल दादी का मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवा लेना चाहिये। उसकी बात सुन उसके पिता ने कहा, बेटा अगले महीने तेरी शादी है। अभी उसकी सारी तैयारी बाकी है। अब इतनी छोटी सी जमापूंजी में ये दोनों काम एक साथ भला कैसे हो पाएंगे। तब वह बोली तो मैं अभी कहाँ बूढ़ी हुए जा रही हूँ। शादी हम कुछ माह बाद कर लेंगे। पर क्या तेरे ससुराल वाले इस बात पर राजी होंगे, पिता ने आशंकित हो पूछा। गरिमा बोली पिताजी मैं अनिमेष से बात करके देखती हूँ, वह सुलझे विचारों वाले व्यक्ति है। वे जरूर अपने परिवार को इसके लिये मना लेंगे। गरिमा की बात सुन उसके पिता सहित सारे परिवार का उदास चहरा खिल ...
पॉकेट मनी 
लघुकथा

पॉकेट मनी 

पॉकेट मनी  रचयिता : विजयसिंह चौहान मृद्धि कॉलेज क्या गई उसकी पॉकेटमनी दिन-ब- दिन छोटी पड़ने लगी, अत्यधिक  खर्च को लेकर मिथिलेश अक्सर टोकती रहती है । आज फिर समृद्धि ने उसके पापा से पॉकेट मनी बढ़ाने को लेकर 'दुलार' किया।  इस बार उसका तर्क था ....ग्रीष्म ऋतु है इसलिए कुछ ज्यादा पैसे दे देना। पिताजी ने भीआंखों ही आँखों मे नजरें घुमाई और सोचा की गाड़ी का पेट्रोल फुल टैंक है, मोबाइल का रिचार्ज भी है, ड्रेसेस तो कल परसों ही खरीद लाई थी । खैर.... बिटिया ने कहा है, तो पिताजी ने भी हा कर दी। पॉकेट मनी पाकर समृद्धि चहक रही थी, वही मिथिलेश बड़बड़ा रही थी ....बेटी को ज्यादा पैसे मत दिया करो, कुछ कंट्रोल रखो, नहीं तो नाम  निकालेगी। शाम को जब पिताजी घर लौटे तो घर के कोने में कुछ मिट्टी के सकोरे और अनाज का थैला देख उत्सुकतावश पूछा कि यह क्या है ? ...तभी मिथिलेश ने मुस्कुरा कर कहा बेटी आज अपनी पॉके...
हिस्से में माँ
गीत

हिस्से में माँ

रचयिता : शिवम यादव ''आशा'' अब मुझे किस बात, की तन्हाई है जब मेरे हिस्से में, मेरी माँ आई है जब भी कोई मुसीबत मुझे सताने लगे माँ के चरणॊ में मेरा ध्यान जाने लगे, घर का कोना-कोना मेरी माँ से सजा देखकर मेरे मन ने ये खुशी से अँगड़ाई ली है अब मुझे किस बात, की,तन्हाई है जब मेरे हिस्से में मेरी माँ आई है आसमाँ भी खुशी और जहाँ भी खुशी मस्ती में झूमे पवन और रवि अब फिर माँ की चर्चाएं दुनियाँ में शुरू हुई हैं अब मुझे किस बात, की तन्हाई है जब मेरे हिस्से में, मेरी माँ आई है लेखक परिचय : नाम शिवम यादव रामप्रसाद सिहं ''आशा'' है इनका जन्म 07 जुलाई सन् 1998 को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात ग्राम अन्तापुर में हुआ था पढ़ाई के शुरूआत से ही लेखन प्रिय है, आप कवि, लेखक, ग़ज़लकार व गीतकार हैं रुचि :- अपनी लेखनी में दमखम रखता हूँ !! अपनी व माँ सरस्वती को नमन करता हूँ !! काव्य संग्रह :-...
फिर इस बार होली पर वो …
कविता

फिर इस बार होली पर वो …

फिर इस बार होली पर वो ... पवन मकवाना (हिंदी रक्षक) इंदौर मध्य प्रदेश ******************** फिर इस बार होली पर वो, सच कितना इठलाई होगी.. सत रंगों की बारिश में वो, छककर खूब नहाईं होगी….। भूले से भी मन में उसके, याद जो मेरी आई होगी.. होली में उसने नफरत अपनी, शायद आज जलाई होगी….। फिर इस बार होली पर वो ....!! ये क्या हुआ जो बहने लगी, मंद गति शीतल सी ‘पवन’.. याद में मेरी शायद उसने, फिर से ली अंगड़ाई होगी….। फिर इस बार होली पर वो ....!! कैसी है ये अनजान महक, चारों तरफ फैली है जो.. मुझे रंगने को शायद उसने, कैसर हाथों से मिलाई होगी….। फिर इस बार होली पर वो ....!! पीले,लाल, गुलाबी रंग की, मेहँदी उसने रचाई होगी.. आएगा कोई मुझसे खेलने होली, उसने आस लगाई होगी….। फिर इस बार होली पर वो ....!! डबडबाई आँखों से उसने, मेरी राह निहारी होगी..। पूर्णिमा के चाँद पे जैसे, आज चकोर बलिहारी होगी….। फिर इस बार होली...
घर पर योग करने के 10 आसान टिप्स
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घर पर योग करने के 10 आसान टिप्स

1. सुविधाजनक समय चुनें पतानाजली योग सूत्र में योग के लिए सबसे बढ़िया समय जो बताया गया है वो है- ब्रह्ममुहूर्त यानि की सुबह का समय जब सूर्य उदय हनी का समय होता है. परन्तु येह कोई नियम नहीं है की आप सिर्फ सुबह ही योग कर सकते है. आप दिन के समय जब भी समय मिले जैसे शाम को दोपहर को भी योग कर सकते है. बस एक चीज का ध्यान रखे, खाना खाने के तुरंत बाद योग ना करें. 2. सुविधाजनक जगह चुनें योग करते वक्त आपको विभिन्न आसन करने पढ सकते है जिसके लिए थोड़ी खाली जगह चाहिए, ज्यादा नहीं आप अपने हॉल या किसी खाली कमरे में भी योग कर सकते है. आप चाहें तो टेरेस पर या बरामदे में भी योग कर सकते है परन्तु मौसम का ध्यान रखें. 3. योग खाली पेट करें योग का नियम है की इसे खली पेट करना है. इसका यह मतलब नहीं है की आपको उपवास रखना है या भूखे रहना है अपितु आपको खाना खाने के तुरंत बाद योग नहीं करना है. De...