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चुहिया और बुढ़िया
कहानी

चुहिया और बुढ़िया

=============================== रचयिता : विनोद वर्मा "आज़ाद" एक बुढ़िया कचरा जलाकर खाना बना रही थी, एक चुहिया उधर से गुजरी, देखकर बुढ़िया से बोली-का हम लकड़ी लाय दे तुमको। बुढ़िया ने कहा-लाय दो । चुहिया दौड़ी-दौड़ी गई और लकड़ी लाकर बुढ़िया को दे दी। बुढ़िया रोटी उतार रही थी, ठीक उसी वक्त चुहिया रोटी पर उछलकूद करने लगी । बुढ़िया बोली--ए चुहिया ये का कर रही। चुहिया बोली--मैं डांग गई, डांग से मैं लकड़ी लई, लकड़ी मैंने तोए दय। का एक चंदिया भी नय देगी? बुढ़िया --ले जा । चुहिया चंदिया लेकर जा रही थी, उसकी निगाह एक कुम्हार पर पड़ी जी बच्चे को मिट्टी की गोली दे रहा था। चुहिया --ए भाई तेरे को चंदिया दूँ। वह तुरन्त बोल उठा--हाँ-हाँ.. चुहिया ने चंदिया कुम्हार को दी और उसकी मटकियों पर उछलकूद करने लगी। कुम्हार बोला--ए चुहिया! ये का कर रही? चुहिया --मैं डांग गई, डांग से मैं लकड़ी लई, लकड़ी मैंने...
ख्वाब
कविता

ख्वाब

========================== रचयिता : संगीता केस्वानी  अजीब दास्तान है ख्वाबों की, हक़ीक़त से परे, फिर भी नज़रबंद रहते है, खोये सेहर के उजालों में, निशा में समाए रहते है, बदरंग इस दुनिया मे, रंगीन जिंदगियां सजाये रखते है, बिखरी खाली झोली में, उम्मीदों की रोशनी भरते है, दूर क्षितिज खड़ी मंजिलों को, कदमों से नही हौसलों से करीब कर जाते है, थकी हारी इन साँसों मैं, जीने की नई उमंग भर जाते है, यूं तेरे-मेरे ख्वाब मिलकर, हक़ीक़त का घरोंदा सज्जा जाते है।। लेखिका परिचय :- संगीता केस्वानी आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर मेल कीजिये मेल करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें … और अपनी कविताएं, लेख पढ़ें अपने मोबा...
कुछ बातें अनकही सी
कविता

कुछ बातें अनकही सी

======================== रचयिता : रुचिता नीमा कुछ बातें अनकही सी, अनसुनी सी हर बार रह जाती है बताना चाहती हूँ बहुत कुछ और बहुत कुछ जानना भी हर बार कोशिश करती हूँ पर न जाने क्यों तुम्हारे सामने आते ही सब कुछ, वही का वही रह जाता है कहना होता है कुछ और और कुछ और ही बयां हो जाता है पर जो कुछ भी हो, बस सार यही है, की तुम खुश रहो जहाँ भी रहो।।।।।। मैं तो हमेशा तुम्हें, तुम्हारी परछाई में नजर आऊँगी।। बस एक बार दिल की आँखों से देख लेना ..... लेखिका परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है आपने जूलॉजी में एम.एस.सी., मइक्रोबॉयोलॉजी में बी.एस.सी. व इग्नू से बी.एड. किया है आप इंदौर निवासी हैं। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने...
बिलखे धरा
कविता

बिलखे धरा

==================================== रचयिता :  माया मालवेन्द्र बदेका मत रो धरा मत रो धरा, निर्मोही बादल नहीं झरे। निर्मोही बादल नही झरे, बेदर्दी बादल नहीं झरे। मत रो धरा मत रो धरा_____ हरियाला आंचल तेरा तरस रहा। आंचल का फूल, देखो तरस रहा। वसुंधरा का कैसे हो श्रृंगार । कैसे उपवन में आये बहार। कब तक अवनी बाट जोहे, कब तक प्रतिक्षा करे। मत रो धरा मत रो धरा_____ वन उपवन, बाग सूखे हो जाये। कलियां और फूल न मुसकाये। एक एक बूंद बूंद की प्यास रहे। बादल से मिलने की आस रहे। धरती घट हुआ रीता,बिन बादल इसे कौन भरे। मत रो धरा मत रो धरा_____ मां अचला बड़ी दयालू है तू। अन्नदात्री धरा, अन्नपूर्णा है तू। धरणी तेरे बिन मानव भूखा। कभी  न अकाल न पड़े सूखा। बिन तेरे माता, जीवनयापन कौन करे। मत रो धरा मत रो धरा____ लेखिका परिचय :- नाम - माया मालवेन्द्र बदेका पिता - डाॅ श्री लक्षमीन...
डॉ. अमिता नीरव को कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार
साहित्य समाचार

डॉ. अमिता नीरव को कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार

इंदौर। कथाकार एवं कहानीकार अमिता नीरव को प्रतिष्ठित कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार प्रदान किया गया है। यह पुरस्कार उन्हें उनकी कहानी "झरता हुआ मौन' पर पाठकों के अभिमतों के आधार पर प्रदान किया गया है। साहित्यिक पत्रिका कथाबिम्ब में छपी इस कहानी पर देश भर के सुधि पाठकों ने अपनी प्रतिक्रिया दी थी। अमिता नीरव की कहानियां देश-विदेश की सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं यथा हंस, पाखी, नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी इत्यादि में प्रकाशित हुई हैं। आपका एक कहानी संग्रह "तुम जो बहती नदी हो" भी प्रकाशित हो चुका है, जिसे बेस्ट सेलर घोषित किया गया है। इसके पूर्व प्रतिलिपि पत्रिका द्वारा अमिता नीरव को देश के २५० प्रतिष्ठित रचनाकारों में सम्मिलित किया गया है। अमिता नीरव के दो उपन्यास एवं एक कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन हैं। कमलेश्वर कथा पुरस्कार मिलने पर देश भर के साहित्यकारों ने अमिता नीरव को बधाई दी है।...
आश
लघुकथा

आश

============================== रचयिता : रीतु देवी चाची जोर, जोर से रोए जा रही थी, "अब मैं किसके सहारे रहूँगी? जीवन का अंतिम आश का धागा भी टूट गया। मंगला ग्वालिन लड़की को भगाकर ले गया। अब दिल्ली से कभी नहीं आएगा।" "हमलोग आपके साथ हैं। आपकी हर मुसीबतों को हंँसते-हँसते सुलझा देंगे। मंगला आपका सच्चा लाल है, अवश्य आएगा। पड़ोस की औरते चाची की आँसू पोछते हुए बोली। रो-रोकर चाची आँखें फुला ली। आपस में सभी औरते बात कर रही थी,  बेचारी चाची, किस्मत में ही हर्ष के क्षण विधाता नहीं लिखे हैं। मंगला जब छ: महीने का था तब ही पति का स्वर्गवास कैंसर बीमारी से हो गया। वह खुद को बहुत मुश्किल से संभालकर मंगला का पालन-पोषण की थी। मंगला चाचाजी की जीने की आश था, वह भी छोड़कर बिन कहे लड़की के साथ भाग गया।" "हाँ बहन, आज के बच्चे माता-पिता के ममता, प्यार को महत्व नहीं देते।" पड़ोस की सुषमा बहन बोली। लेखीका परिचय :-...
स्कूल जाती बच्चियाँ
कविता

स्कूल जाती बच्चियाँ

================================================ रचयिता : रशीद अहमद शेख उदासी अपनी छिपाती बच्चियाँ! हौले-हौले मुस्कुराती बच्चियाँ! गीत कोई गुनगुनाती बच्चियाँ! प्रफुल्लित स्कूल जाती बच्चियाँ! बोझ बस्तों का उठाती बच्चियाँ! ज्ञान-पथ पर पग बढ़ाती बच्चियाँ! सुनहरे सपने सजाती बच्चियाँ! प्रफुल्लित स्कूल जाती बच्चियाँ! प्रश्न का उत्तर बताती बच्चियाँ! समस्या का हल सुझाती बच्चियाँ! प्रखर प्रतिभा से लुभाती बच्चियाँ! प्रफुल्लित स्कूल जाती बच्चियाँ! स्नेह अपनों पर लुटाती बच्चियाँ! भूमिका जमकर निभाती बच्चियाँ! सुमन आशा के खिलाती बच्चियाँ! प्रफुल्लित स्कूल जाती बच्चियाँ! सितारों सी झिलमिलाती बच्चियाँ! चन्द्रमा सी चमचमाती बच्चियाँ! धूप जैसी खिलखिलाती बच्चियाँ! प्रफुल्लित स्कूल जाती बच्चियाँ! रूप परियों का चुराती बच्चियाँ! ढंग गुड़ियों सा दिखाती बच्चियाँ! प्रशंसा हो तो लजाती बच्चि...
यार से दूर
ग़ज़ल

यार से दूर

=============================== रचयिता : डॉ. इक़बाल मोदी संभल कर चलता हूँ गिरती हुई दीवार से दूर। हाँ मगर शहर में रहता हूँ मै दो चार से दूर। हर वक़्त कदम दर कदम धोके है इस जहान में, हमेशा जीत की कोशिश करे, रहे हार से दूर। सियासत हर किसी को यूं ही नही आती है रास, हम अपनी बस्ती में रहते है सरकार से दूर। गुलशन में फूलों के बीच गुजर है मेरी अक्सर राह में हर तरफ बचकर चलता हूं खार से दूर। गैर तो गैर है अपनो पे भरोसा नही इक़बाल भहकाये कोई तो मत जाना अपने यार से दूर। परिचय :- नाम - डॉ. इक़बाल मोदी निवासी :- देवास (इंदौर) शिक्षा :- स्नातक, (आर.एम्.पी.) वि.वि. उज्जैन विधा :- ललित लेखन, ग़ज़ल, नज्म, मुक्तक विदेश यात्रा :- मिश्र, ईराक, सीरिया, जार्डन, कुवैत, इजराइल आदि देशों का भ्रमण दायित्व :- संरक्षक - पत्र लेखन संघ सदस्य :- फिल्म राइटर एसोसिएशन मुंबई, टेलीविजन स्क्रीन राइटर एसोसिएशन मुंबई प्रत...
मेरा इंतजार ……..
कविता

मेरा इंतजार ……..

=================================================== रचयिता : रुचिता नीमा उसका वो कहना कि तुम इन्जार करना मैं खुद ही आऊंगा, बड़ी कशमकश में कर गया दिन पर दिन बीतते गये, पर वो इंतजार की घड़ियां कभी खत्म नही हुई इसे मेरा जुनून कहे या दीवानगी मै हर बीतते पल और बड़ी बेसब्री से इंतजार करने लगी।।। फिर एक दिन मिला वो बीच बाजार में, जैसे कोई अजनबी देख कर भी अनदेखा कर निकल गया लेकिन इस बार मेरे साथ जो हुआ वो किसी जादू से कम न था, मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा क्योंकि जो मेरा जुनून था, मुझे सुकून देने लगा था अब।।।। और शायद उसके मिलने का अब मुझे इंतजार ही नही रहा था, मुझे अब खुद के खुद से मिलने का इंतजार था।।। और वो घड़ी करीब आने लगी थी।।। क्योंकि अब मैं ये जान गई थी, कि वक़्त, वक़्त के साथ बदल जाता है, और कुछ कुछ हम भी दुनिया मे कुछ भी अपना नहीं सिवाय अपने परमात्मा के, जो अपने अंदर ही छि...
डाकबाबू
कविता

डाकबाबू

========================================== रचयिता : श्रीमती मीना गौड़ "मीनू माणंक" मोटा चश्मा आँखों पर, कांधे पर चिट्ठियों का बूलदां। सुबह-शाम आते सायकल पर, डाकबाबू ले कर संदेशा।। जोर लगा कर मारते पेडल, फिर भी धीरे चलती सायकल। हो गई थी पूरानी। नहीं रुकते कभी डाकबाबू चिलचिलाती धूप हो , या बारीश का पानी।। बांटते सभी को चिट्ठी...... किसी में होती खुशियों की सोग़ात। तो किसी में आता, ग़म का संदेशा।। जब बुढ़ी माँ को ये देते संदेश, हो गया बेटा शहीद देश पर। तो आँखें भर आती, हटा के ऐनक, पोंछ लेते आँसु ग़म के।। अगले ही पल लिये मुस्कान चेहरे पर, देते शुभ संदेश,,,,,, ख़ुशियाँ बांटो ताऊजी, कुल दीपक आया है। छ्ट गई बदली निराशा की, दादा तुम्हें बनाया है।। बैठी हूँ आस लगाए, पुराने दिन लोट आए। खो गए कहीं डाकबाबू , संदेशा, अब कौन लाए।। लेखिका परिचय...
सबकुछ हैं वो
कविता

सबकुछ हैं वो

=================================== रचयिता : शिवम यादव ''आशा'' क्या होती है माँ वो माँ से पूछो क्या होता है पिता वो एक पिता से पूछो। खुद के सपनों को चकनाचूर करके तुमको क्या क्या दिया जरा मुङकर तो देखो।। तुम अपने ही ख्वाबों में डूबे हो अपनी शौक के खातिर ही जिद् करते हो जरा उनके अरमानों को उनके दिल पर हाथ रखकर तो देखो। कैसा दिल होता है उनका जरा खुद को उनमें ढालकर तो देखो।। माँ-पिता ने तुमसे कितने आसरे लगाए होंगे कभी खुद भी इसपर सोचकर तो देखो। कितने अपने हौंसलों को आग देकर उन्होंने तुमको उजाले में ला खङा किया है ये जरा खुद में झाँककर तो देखो।। लेखक परिचय : नाम शिवम यादव रामप्रसाद सिहं ''आशा'' है इनका जन्म ७ जुलाई सन् १९९८ को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात ग्राम अन्तापुर में हुआ था पढ़ाई के शुरूआत से ही लेखन प्रिय है, आप...
बरखा रितु
कविता

बरखा रितु

==================== रचयिता : मनोरमा जोशी हरित तृणिका मेदनी पर, मोर मनहर दीखते हैं। शरद के पग चिन्ह आली, हर दिशा में दीखते हैं। छट गये बादल बरसते, विहग पुलकित मोर नचते आज ये जलकुंड देखो, झिलमिलाते दीखते हैं। सघन कुजों के किनारे, कृषक धरती के सितारे। झुन्ड के अब झुन्ड देखो, हल चलाते दीखते हैं। गा रही प्राची प्रभाती, किरण फूली न समाती। हर भवन नक्षत्र से ही, मुस्कुराते दीखते हैं। खडी़ फसलें खिलखिलाती मखमली हरियालियों में मोर हसते दीखते हैं। लेखिका का परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा-स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र-सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं।विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी का प्रकाशन होता रहा है। र...
लावा
कविता

लावा

==================================== रचयिता :  माया मालवेन्द्र बदेका जब जब लिपटती है कसकर मुझसे वह जी करता है लावा बन जाऊं बहा ले जाऊं उन दहेज के लोभियों को। पाषाण बन जाती हूं,जब उसके नैन बरसते हैं। समझाती हूं उन सारे तानों का मतलब। जो उस निर्दोष को दिये गये। ताने के अर्थ, हजार बिच्छुओं के डंक मुझे देते हैं। ना समझ, नहीं समझ पाई । पूछती रही मतलब। पहली बार पूछने पर बता देती काश तो उससे ज्यादा, अर्थ समझती में। उस पीड़ा से निकाल देती जो मेरी समझी हुई, नासमझी से भोगी उसने। दहेज के मीठे लोभियों कटाक्षों के कुबेर। घर से बाहर निकलना और दुनियां देखना। धरती कूड़े करकट का ढेर नहीं तुम्हारी गंदी मानसिकता से बोझिल हुई है। बोझिल है उन बेटियों की भस्म से। जो तुम्हारे मन के दानव ने जला दी। चंद सिक्कों के भिखारी। ईश्वर के पास कटोरा लेकर मत जाना। वो बेटियों को बहुत प्यार करता है। ...
ग़ज़ल
ग़ज़ल

ग़ज़ल

================================= रचयिता : प्रेम प्रकाश चौबे जब कोई भूखा सोता है। दिल ये ज़ार ज़ार रोता है। ये भी नहीं आखिरी मौका, ऐसा बार-बार होता है। हैवानियत प्रभावी हो तो, रिश्ता तार-तार होता है। चिनगारी गर भड़क उठे तो, झगड़ा आर-पार होता है। "प्रेम" जुबां से, या तीरों से आखिर वार, वार होता है। लेखक परिचय :  नाम - प्रेम प्रकाश चौबे साहित्यिक उपनाम - "प्रेम" पिता का नाम - स्व. श्री बृज भूषण चौबे जन्म -  ४ अक्टूबर १९६४ जन्म स्थान - कुरवाई जिला विदिशा म.प्र. शिक्षा - एम.ए. (संस्कृत) बी.यु., भोपाल प्रकाशित पुस्तकें - १ -"पूछा बिटिया ने" आस्था प्रकाशन, भोपाल  २ - "ढाई आखर प्रेम के" रजनी  प्रकाशन, दिल्ली से अन्य प्रकाशन - अक्षर शिल्पी, झुनझुना, समग्र दृष्टि, बुंदेली बसन्त, अभिनव प्रयास, समाज कल्याण व मकरन्द आदि अनेक  पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक पत्रिकाओं में कविता, कहानी,...
संयुक्त परिवार
मेरे विचार, संस्कार, संस्मरण, स्मृति

संयुक्त परिवार

=============================== रचयिता : विनोद वर्मा "आज़ाद" पांच भाई एक पुश्तैनी मकान में साथ रहते थे। जिसका पुनर्निर्माण १८००/ ठेके पर ठेकेदार ने किया था। एक बरामद, एक हाल, एक छोटा कमरा, एक दादी का कमरा, किचन, पानी की टँकी, एक शौचालय, एक बाथरूम, खुला बाड़ा, दक्षिण मुखी मकान के पूर्व में गलियारा था, ऊपर मंजिल कमरा एक था बस। पर पेड़-पौधे जगह अभाव में नही लग पाये। इसके पहले जो पुराना घर जब था उसमें बरामदा, बड़ा हाल,खोली और बाड़ा, एक टॉयलेट। बाड़े में शहतूत, कडिंग (विलायती इमली) और मीठी बोर का झाड़ यानी पेड़ पौधे लगे हुए थे। चार भाइयों की शादी हो गई थी, परिवार में माता-पिता, ४ जोड़े, दादी व एक छोटा पांचवे नम्बर का भाई, कुल जमा १२ सदस्यों का संयुक्त परिवार। संघर्षरत परिवार के पास एक सायकल के अलावा कोई वाहन नही। मांगलिक आयोजनों में बस से आना-जाना। एक रात रुकना ही, क्योंकि वाहन सुविधा नामम...
समीकरण
लघुकथा

समीकरण

================================= रचयिता : प्रेम प्रकाश चौबे "मां, मैं भी कॉलेज जाऊंगी, मैं आगे पढ़ना चाहती हूं" बेटी ने अपना निर्णय सुना दिया । "नहीं, जितना पढ़ना था, पढ़ चुकीं" मां ने कहा । "इसे कौन सा डॉक्टर या इंजीनियर बनना है, शादी के बाद, चूल्हा ही तो फूंकना है, उस के लिए १२ वीं तक कि पढ़ाई काफी है", भैया ने अपनी समझदारी झाड़ी, जो सोफे पर मां के पास ही बैठा था। "क्यों, मैं इंजीनयर क्यों नहीं बन सकती? मैं ने गणित विषय लिया है। मुझे पढ़ने-लिखने का बहुत शौक है" बेटी ने रुआंसे से स्वर में कहा। "और आप लोग हैं कि मुझे पढ़ने देना ही नहीं चाहते। मां तो पुरानी पीढ़ी की हैं, उन का ऐसा सोचना स्वभाविक है, भैया, पर तू  तो नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है, फिर भी तू उन्हीं के पक्ष का समर्थन करता है? यदि हर घर में तेरे जैसे भाई रहे तो हो चुका "नारी शिक्षा" का कार्यक्रम पूरा" बिटिया रो पड़ी थी।       "न...
मौन शक्ति
कविता

मौन शक्ति

=================================== रचयिता : शिवम यादव ''आशा'' जो भी पाना है तुम्हें सब कुछ मिल जाएगा आसमाँ भी थोड़ा झुक जाएगा मुझे बस मौन रहना है लोग बुरा कहते हैं वो डराते हैं वो आलोचना करते-करते जीत कर भी हार जाएंगे मुझे बस मौन रहना है कष्ट सहकर,दर्द सहकर मुझे मंजिल की ओर जाना है टूटे गर मौन भी मेरा तो मुझे बस मुस्कराना है मुझे बस मौन रहना है मौन दुनियां की सबसे बड़ी शक्ति है जिसका मुझे उपयोग करना है इसे पाना सबसे साधारण है मुझे बस मौन रहना है लेखक परिचय : नाम शिवम यादव रामप्रसाद सिहं ''आशा'' है इनका जन्म ७ जुलाई सन् १९९८ को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात ग्राम अन्तापुर में हुआ था पढ़ाई के शुरूआत से ही लेखन प्रिय है, आप कवि, लेखक, ग़ज़लकार व गीतकार हैं रुचि :- अपनी लेखनी में दमखम रखता हूँ !! अपनी व माँ सरस्वती को नमन करता ह...
ओ पिता
कविता

ओ पिता

==================================== रचयिता :  माया मालवेन्द्र बदेका पिता जनक लौट आओ दो शुभाषिश शीश धरो हाथ ह्रदय अकुलाता पुकारता निशदिन थामे रखना बचपन खिलौनों सपने खेल झूठे राते सूनी हुई दिन है रिते धड़कन अंश वंश जुड़े नाम अस्तित्व नहीं तुम बिन ठौर ठाम दौलत मेरी तुम जागिर मान संग चले पिता पकड़ हाथ सुख आंनद रहते साथ अबोध के बोध निर्मल तात विस्तृत आकाश जनक देव रुप मुक्तक  स्वरुप चंद्र किरण बांहे खुली जनक पिता ओ लेखिका परिचय :- नाम - माया मालवेन्द्र बदेका पिता - डाॅ श्री लक्षमीनारायण जी पान्डेय माता - श्रीमती चंद्रावली पान्डेय पति - मालवेन्द्र बधेका जन्म - ५ सितम्बर १९५८ (जन्माष्टमी) इंदौर मध्यप्रदेश शिक्षा - एम• ए• अर्थशास्त्र शौक - संस्कृति, संगीत, लेखन, पठन, लोक संस्कृति लेखन - चौथी कक्षा मे शुरुवात हिंदी, माळवी,गुजराती लेखन प्रकाशन - पत्र पत्रिका...
पिता
कविता

पिता

श्रीमती मीना गोदरे 'अवनि' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** पर्वत से ऊंचे आसमान को छूते फौलादी बाहों में नाजुक एहसाश भरे जो मुझे गोद में उठा लेते मेरी मूस्कानो में जो अपनी मुस्कान भर देते सबसे प्यारे सबसे न्यारे  हैं पिता हमारे जिनके घर आते ही ऊर्जा से भर जाता घर का कोना कोना जो बरगद की शीतल छाया से तपन ग्रीष्म की हर लेते सबसे प्यारे सबसे न्यारे हैं पिता हमारे दूर रहकर भी मुझसे जिनको  चैन नहीं आता आंखों में आंसू नहीं होते पर रोता है दिल जिनका सबसे प्यारे सबसे न्यारे  हैं पिता हमारे दिखते हैं जो कठोर से हम को अनुशासित करने में जेब भरी हो या हो खाली सदा तत्पर रहते मेरे सपनों को भरने में सबसे प्यारे सबसे न्यारे वो पिता हमारे वो सूरज हैं मेरे घर के जिनसे होता उजियारा गर्व हमें उनके साहस पर जिनसे भय भी है भय खाता सबसे प्यारे सबसे न्यारे हैं पिता हमारे जिनके मन की हम न जाने सदा आज्...
अविश्वास
कविता

अविश्वास

==================================== रचयिता : मनोरमा जोशी अविश्वास है घात की, घर्म आस्था तथ्य, मानव में ईशवर कहीं, रहता छिपा अवश्य। अविश्वास वह बुन्द है, जो समुद्र से दूर, होकर निज असित्तव को, करता चकनाचूर। अविश्वास से हो रहा, जग जीवन भयभीत, जग जावे विश्वास तो, हो जग स्वर्ण पुनीत। असंतोष दुर्भावना, मन में रहे न लेष, अविश्वास मिट जाये तो, मिटे वर्ग विद्धेष। ईशवर न्याय विधान में, जिसे न कुछ विश्वास, आत्म शान्ति उस को नहीं छुटकारा भय  त्रास। लेखिका का परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा-स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र-सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं।विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी ...
आओ खो जायें
कविता

आओ खो जायें

========================================== रचयिता : श्रीमती मीना गौड़ "मीनू माणंक" आओ खो जायें, गुज़रे ज़माने में। कुछ यादों में, कुछ ख्बों में। चांद-तारों में, वो ढ़लती शामों में। खिड़की-झरोखों में, गुपचुप इशारों में।। कुछ खट्टी-मिट्टी नोक झोक में। वो प्रीत भरी सौग़ातों में।। खुशियों भरी शहनाईयों में। सुहानी उन रातों में।। अपने वा बैग़ानों के साये में। जो खुशियाँ बाँटी प्यार में।। परिवार की खुशियों में। बच्चों की किलकारीयों में।।   लेखिका परिचय :-  नाम - श्रीमती मीना गौड़ "मीनू माणंक" सदस्य - इंदौर लेखिका संघ शुभ संकल्प (पंजीकृत) - कई प्रतिष्ठित अखबारों में रचनाओं का प्रकाशन, व विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ में लेख वा रचनाऐं प्रकाशित लेखन विधा - कहानीयाँ, कविता, लेख, लघुकथा, हायकू ,बालसाहित्य। प्रकाशित रचनाएं  लेख - देश की गुल्लक, वीर जवान आदि। ...
सद्भावना
कविता

सद्भावना

====================================== रचयिता : मित्रा शर्मा अमृत तुल्य समयको सदुपयोग करना होगा सुकर्म के राह में चलकर सद्चरित्र अपनाना होगा। ढल जाती है यह रूप और यौवन तय वक्त पे सद्भावना प्रेम अपनापन सदा हराभरा रहता है। ख्वाहिशें क्या रखना यह नष्वर शरीर के लिए  पर उपकार सदाचार  बेहतर है जीने के लिए। कभी किसी के लिए किया हुआ  दुआ खाली नही जाती है  इस्वर के फैसले हमारे ख्वाहिशों से बेहतरीन होते है। परिचय :- मित्रा शर्मा - महू (मूल निवासी नेपाल) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर मेल कीजिये मेल करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें … और अपनी कविताएं, लेख पढ़ें अपने मोबाइल पर या ...
थोड़ा कर आराम जिंदगी
कविता

थोड़ा कर आराम जिंदगी

================================= रचयिता :  राम शर्मा "परिंदा" भागा-दौड़ी, काम जिंदगी । थोड़ा कर आराम  जिंदगी ।। नाम बड़ा तो  काम बढ़ेगा अच्छी है-गुमनाम जिंदगी ।। मन में जिसके शांति नहीं उसकी है कोहराम जिंदगी ।। सुख-दुख स्थाई नहीं होते देती रोज-पैगाम जिंदगी ।। गांव की चौपाल में  चर्चा कपास-मिर्च के दाम जिंदगी ।। शहर गया तो ये पता चला भीड़-भाड़-जाम जिंदगी ।। जन-जन से ही राष्ट्र बना है राष्ट्र की होती अवाम जिंदगी ।। ठहरता नहीं है वक्त 'परिंदा' गुजरे सुबह-शाम जिंदगी ।। परिचय :- नाम - राम शर्मा "परिंदा" (रामेश्वर शर्मा) पिता स्व जगदीश शर्मा आपका मूल निवास ग्राम अछोदा पुनर्वास तहसील मनावर है। आपने एम काम बी एड किया है वर्तमान में आप शिक्षक हैं आपके तीन काव्य संग्रह १ परिंदा, २- उड़ान, ३- पाठशाला प्रकाशित हो चुके हैं और विभिन्न समाचार पत्रों में आपकी रचनाओं का प्रकाशन होता रहता...
गर्मी
कविता

गर्मी

रचयिता : शिवम यादव ''आशा'' =================================== इस गर्मी में    सिर से बहकर पसीना जब गालों के रेगिस्तान      पर आता है थोड़ा सा ठिठक कर    फ़िसल जाता है । नुनखराहट के साथ     हल्की ठन्डक लेकर सीने रूपी समुंदर में     जा छुप जाता है ।।    हल्की ठंडक पाकर  दिल फिर मचल उठता है   बिछड़े प्रेमी रूपी (सर्दी)     की याद दिलाकर खुद शरीर रुपी    ज़मीन पर शहीद      हो जाता है ।।। लेखक परिचय : नाम शिवम यादव रामप्रसाद सिहं ''आशा'' है इनका जन्म ७ जुलाई सन् १९९८ को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात ग्राम अन्तापुर में हुआ था पढ़ाई के शुरूआत से ही लेखन प्रिय है, आप कवि, लेखक, ग़ज़लकार व गीतकार हैं रुचि :- अपनी लेखनी में दमखम रखता हूँ !! अपनी व माँ सरस्वती को नमन करता हूँ !! काव्य संग्रह :- ''राहों हवाओं में मन " आप भी अपनी कविताएं...
पेड़ हैं सेनापति
कविता

पेड़ हैं सेनापति

================================= रचयिता : मंजुला भूतड़ा पेड़ हैं सजग प्रहरी, अविराम अपनी लड़ाई में संलग्न, एक कर्तव्यनिष्ठ सैनिक की भांति। पेड़ घबराते नहीं हैं, पतझड़ उनके पत्तों को झड़ा दे, या फूल तोड़ दे, पुनः असंख्य फूलों पत्तों के साथ, हरियाली क़ायम रखते हैं। पेड़ शान्त भाव से निरन्तर बढ़ते रहते हैं, एक मोर्चे पर हार भी जाएं, तो थोड़ा रुक कर कई मोर्चे खोल देते हैं। पेड़ कोई एक डाल तोड़ दे तो वे अनेक जगहों से, प्रस्फुटित हो जाते हैं। फूल समाप्त होने लगते हैं तो पेड़ फलों से लद जाते हैं। पेड़ सशक्त निष्ठावान सेनापति की तरह पेड़, हमारी रक्षा हेतु डटे रहते हैं। लेखिका परिचय :-  नाम : मंजुला भूतड़ा जन्म : २२ जुलाई शिक्षा : कला स्नातक कार्यक्षेत्र : लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता रचना कर्म : साहित्यिक लेखन विधाएं : कविता, आलेख, ललित निबंध, लघुकथा, संस्मरण, व्यंग्य आदि सामयिक, सृजन...