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सतरंगी दुनिया- ३८
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३८

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *डकार और गैस एक ही माँ के २ बेटे हैं, मगर गैस ने गलत रास्ता चुन लिया है, इसलिए उसकी कोई इज्जत नहीं करता है।* बहुत आसान है किसी पर अंगुली उठाना, परंतु बहुत मुश्किल है किसी को उठाने के लिए उसकी अंगुली पकड़‌ना। ज़िंदगी में इतनी गलतियाँ न करें कि पेन्सिल से पहले रबर घिस जाए और रबर को इतना मत घिसिए कि ज़िंदगी के पेज ही फट जाएं। रंग छोड़ते कपडे और रंग बदलते इंसान चाहे कितने ही ब्रांडेड हों, उनकी कोई इज्जत नहीं करता है। किसी के गुस्से को उसकी नफरत समझने की भूल ना करें, क्योंकि गुस्सा वही करता है; जो आपकी फिक्र करता है। स्टीकर और विश्वास दोनों एक समान है। दोबारा जरूरत पड़ने पर काम कम करते हैं। 'पत्थर' तब तक सलामत है, जब तक वो पर्वत से जुड़ा है। 'पत्ता' तब तक सलामत है जब तक वो पेड़ से जुड़ा है और 'इंसान' तब तक सलामत है, जब तक वो...
अब और क्या चाहती है तू?
कविता

अब और क्या चाहती है तू?

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** अब बता भी दे जरा, और क्या चाहती है तू मुझसे, तंग आ चुका हूं तुझसे, विवाहोपरांत मेरी पत्नी, क्लोज नहीं हो पायी उतनी, उतना दखलंदाजी कर रही है मेरे मन मंदर में, किनारे पाने के लिए मार रहा हूं हाथ पांव डूबता जा रहा हूं तुझ जैसे समंदर में, क्या जादूगरनी है तू, क्या मेरे पल-पल की विवरणी है तू, रील्स की आभासी दुनिया में, कैसा यह जाल बिछाया है, बैठे हैं सब एक ही छत के नीचे, पर हर शख्स यहां पर पराया है, बच्चे की किलकारी छूटी, रिश्तों की वो गर्माहट टूटी, तेरी नीली रोशनी के चक्कर में, अपनों की हर शिकायत रूठी, तूने फुसफुसाकर कानों में, अपनों की आवाज को छीन लिया, नोटिफिकेशन के इस दलदल ने, मेरा चैन, मेरा हर दिन लिया, अब बस भी कर ऐ काली स्क्रीन, मुझे मेरी दुनिया वापस दे, जहाँ स्क्रीन नहीं, बस चेहरे ह...
रक्षा-सूत्र
लघुकथा

रक्षा-सूत्र

डॉ. राम रतन श्रीवास बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ******************** "राधे" को सुबह-सुबह आँगन में खड़ा वह आम का पेड़ आज कुछ अधिक ही अपना-सा लग रहा था। उसकी शाखाओं पर चिड़ियाँ चहचहा रही थीं और पत्तियाँ हवा के साथ ऐसे झूम रही थीं, जैसे किसी उत्सव की तैयारी कर रही हों। "राधे" पेड़ के तने पर हाथ फेरा और धीरे से बोला.... “तूने हमारे परिवार को वर्षों से छाया देते आ रहे हो!... सु स्वादिष्ट फल देते हो!... साँसों के लिए शुद्ध हवा दे रहे हो!… आज मैं तेरी भी रक्षा का वचन देता हूँ।” "राधे" ने आम की कलाई पर (राखी) रक्षा सूत्र बाँधा और मन में एक अनोखा बंधन का अहसास.... पास खड़ा "आर्यन" बेटा आश्चर्य से पूछ बैठा!... “पापा! राखी तो भाई की कलाई पर बाँधी जाती है, फिर पेड़ को क्यों?” "राधे" मुस्कुराया!.. पेड़ की ओर देखते हुए बोला... “बेटा!.. जो हमारी रक्षा करे, उसकी रक्षा करना भी तो हमारा धर्म है। बहन-भाई...
ठहराव
कविता

ठहराव

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** एक पड़ाव सा आ गया एक ठहराव सा आगया। खोजती नजरों में भटकाव सा आ गया जिन्दगी की राह में बहाव सा आ गया। आ गया कोई मन द्वार के अन्दर दिल के कोने को कोई भा गया छू गया कोई चंचल मन को धानी आंचल जो लहराया। दृगों के दर्पण में मन प्राण को देखकर आ गया कोई, छा गया कोई अरे, वो तो नीर भरा बादल हैं जो मेरे आंगन में बरस गया। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्...
शिव बसे हैं मेरे दिल में
कविता

शिव बसे हैं मेरे दिल में

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** शिव बसे हैं मेरे दिल में किस्मत जगी। शिव करे हैं सुमंगल किस्मत जगी।। चेतना, कामना, भावना पल्लवित। जिन्दगी को नया मोड़ किस्मत जगी।। शिव की नगरी, बनी मेरी कुटिया अभी। बनके मंदिर सुसज्जित बहुत है सजी।। शिव बसे हैं मेरे दिल में किस्मत जगी। शिव बने हैं मेरे नाथ किस्मत जगी।। अब नहीं पीर, मातम, निराशा बची। जिन्दगी को नवल एक भाषा मिली।। माह सावन का है शिवजी करते दया। इक नये राग से अब तो सरगम सजी।। गीत, गजलों, भजन की हैं स्वरलहरियाँ। मांगलिक-शुभ की गुंजित सुखद ध्वनियाँ।। शिव बसे हैं मेरे दिल में किस्मत जगी। शिव बने हैं परमधाम, किस्मत जगी।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति ...
चाँद
गीत

चाँद

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** माता मुझको चाँद दिलाओ। तोड़ गगन से इसको लाओ।। मुझको लगता है यह प्यारा। अपनी माँ का बहुत दुलारा।‌ उसको मीठी खीर खिलाओ। रौशन करता है जग सारा। सबकी आँखों का है तारा।। उसके गुण बस गाते जाओ। साथ चले यह बनकर छाया। मनमोहक है सबको भाया।। उसे गोद में मातु सुलाओ। कभी घटे बढ़ मोटा होता। और कभी वह छोटा होता।। दावत पर घर उसे बुलाओ। परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सतर्कता समिति जबलपुर की भूतपूर्व चेयरपर्सन। प्रकाशित पुस्तक : पंचतंत्र में नारी, ...
रक्षा बंधन
कविता

रक्षा बंधन

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** धागे का बंधन पक्का है, भाई उसमें बंध जाता है। जब बहना की साड़ी खिंचती, साड़ी में वो समा जाता है। धागे का ... बहने सावन भर भोले को, जल अर्पित कर शक्ति पाती। भाई कर पर बांध के राखी, बहने उसका भाग्य जगाती। भाई इस पवित्र बंधन पर, समय पड़े तो लुट जाता है। धागे का ... जो सक्षम हैं बहनों को वे, ये पुनीत अवसर देते हैं। मोदी, योगी इस पुनीत दिन, बहनों का आशीष लेते हैं। सैनिक भी राखी बंधवाकर, रक्षा हेतु खड़ा रहता है। धागे का ... इस पवित्र त्यौहार को हिंदू, पूरी निष्ठा से हैं मनाते। बनते हैं पकवान अनेकों, बहिन और भाई मिलकर खाते। बहन ने राखी बांधी जिसको, वो रक्षक बनकर रहता है। धागे का... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचि...
राखी की महत्ता
दोहा

राखी की महत्ता

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** राखी में तो लाज है, जिसमें शामिल फर्ज। नहीं मानना है बुरा, निश्चित ही है हर्ज़।। नेह भरा रिश्ता फले, बन जाता उपहार। राखी बँधती है जहाँ, वहाँ पले उजियार।। ख़ूब कलाई धन्य है, हर्षित भ्राता-माथ। अक्षत करता वंदना, देता युग-युग साथ।। बहना ने भेजी दुआ, भाई है परदेश। शुभ-मंगल के भाव ने, हर डाला सब क्लेश।। कितना पावन लग रहा, सज्जित राखी थाल। आशीषों से हो रहा, व्यापक आज कमाल।। बचपन है अब तो जवाँ, गुंजित नेहिल गीत। निश्छलता मुखरित हुई,हर पल में है जीत।। उमड़ रहा दोनों तरफ, भावों का आवेग। आज निष्कपट पर्व ने, दिया हर्ष का नेग।। दूरी भौतिक है मगर, डाक निभाती साथ। मीलों चलकर राखियाँ, बँध जाती हैं हाथ।। भले हैं बहुत दूरियाँ, नहीं घटे पर प्यार। बचपन से ही दिव्य है,राखी का त्योहार।। बढ़ता ही बढ़ता रहे,...
सतरंगी दुनिया- ३७
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३७

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  ईमानदारी से काम करने वालों के शौक भले पूरे ना हों, लेकिन नींद जरूर पूरी होती है। पैसा सिर्फ आपकी लाईफ-स्टाईल बदल सकता है- दिमाग, नीयत और किस्मत नहीं। इस दुनिया में आपकी कद्र तब तक है, जब तक आप किसी की जरूरत बने रहते हैं। जिस दिन जरूरत खत्म हो जाती है, उस दिन कई रिश्तों का असली रंग भी सामने आ जाता है। *हमारी पड़ोसन ने अपने घर में एक बोर्ड लगा रखा था, जिस पर लिखा था- कृपया अपनी चप्पलों के साथ-साथ अपनी गलत सोच... गलत हरकत... सास-बहू... देवरानी-जेठानी और ननद की चुगली... बाहर ही उतार कर आएं और एक महत्वपूर्ण बात- अपनी तिरछी नजरों से मेरे पति को ना देखें, वो बहुत सीधे हैं; किसी के भी बहकावे में आ जाते हैं।* हमें वो ही लोग अच्छे लगते हैं, जो हमारी हाँ में हाँ मिलाते हैं। जो सही को सही और गलत को गलत बोलते हैं, ऐसे लोग सबकी ...
गोहरावत हे हसदेव
आंचलिक बोली, कविता

गोहरावत हे हसदेव

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) चिचियावत डोलत हांसत हे, मन ल देख वो थरथर कांपत हे, कइसे बचावंव तन, डारा अउ पाना ल, छिटका कुरिया म लावंव कइसे दाना ल, बता बघवा बेटा अब कइसे गुंर्राबे रे, हाथी बेटा कोन पत्ता ल तैं खाबे रे, हुंआ हुंआ कइसे अब कहिबे कोलिहा, झोल डारत हे मोला परदेशी झोलहा, मोर कोरा म आही कइसे मिट्ठा पानी, धन फेंका जाही मोर कर्मठ कहानी, कोन लकरी छवाही कुंदरा के छानी, का किस्सा सुनाही अब नाना अउ नानी, बुटूर-बुटूर घर के मुखिया देखत हे, खीसा भर डारे अउ आंखी सेंकत हे, सुध हवा पानी अब कहां ले लाबे, मोर हिरदे के पीरा कहां गोहराबे, इंखर आंखी के पीरा ल कइसे कसबे, अब तो पर गे तोला सूरी अउ फांसी, कहां जावय बता ए भई, गोहरावत हे हसदेव, हसदेव... कइसे बचाहीं अपन जंगल ल, कइसे बचाहीं अपन पानी, कइसे बचाहीं चिरई-चुरग...
पुष्प वाटिका
कविता

पुष्प वाटिका

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** अंखियों से अखियां जब है मिले फूलों की ओट में जानकी के। तिरछी नैनो से जब है मिले राम के नैना जानकी से। फूल बगिया में प्रकृति बिखर गई जब राम जानकी मिलन हुआ। देखते ही नैना चार हुए जब राम सिया का मिलन हुआ। मन ही मन पति रूप स्वीकार किया गौरा से पति वर मांग लिया। श्री राम प्रभु की सुंदर छवि को सीता ने मन में बसाय लिया। सीता ने जब वर मांग लीया, मूर्ति मुस्काई वर है दिया। सुंदर सुशील मनमोहक है, हे राम सिया की जोड़ी है, एक आदर्श दंपति का मिलन हुआ, सीता ने पाया राम को है किरण कर वंदन प्रभु चरणों में तुलसी के राम अमर है सदा। जय हो जय हो सीताराम के स्वर, जब गुंज उठा मिथिला मे है। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉ...
अभी बाकी है
कविता

अभी बाकी है

डॉ. राम रतन श्रीवास बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ******************** ┈┉═❀❀═┉┈ अभी आँखों में कुछ सपने, अभी अरमान बाकी है। अभी इस जिंदगी में कुछ, नया अभियान बाकी है।। अगर इंसान हैं हम तो, किसी के काम आ जाएँ.... अभी मंज़िल नहीं आई, अभी गगन के पार बाकी है।। अभी माँ की दुआओं में, वहीं दूध की शक्ति बाकी है। अभी पिता के आशीष में, वही वज्र सा बल बाकी है।। अभी बहन की हँसी और, बच्चों में खुशियां खिलानी है... अभी रिश्तों की साँसों में, बहुत-सा प्यार बाकी है।। अभी बच्चे किताबों में, नया संसार पढ़ते हैं। अभी सपनों के पंखों से, नई ऊँचाइयाँ चढ़ते हैं।। उन्हें कैसी धरा देंगे, यही प्रश्न आज अपना है?... अभी आने वाली पीढ़ी का, हम पर भार बाकी है।। अभी रूठे हुए अपनों को, हमें फिर पास लाना है। अभी टूटे हुए रिश्तों का, भरोसा फिर से जगाना है।। न दौलत साथ जाएगी, न ये ऊँची हव...
जड़ें
कविता

जड़ें

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ज़मींदोज जड़ों के जंजाल को जीवित रखने के लिए, वृक्षों की विभिन्न शाखाएं अवनि, अम्बर से समझोता करने को अडिग हैं। तुंग श्रृंग शिखर वृक्ष का सन्देश सुनाता अम्बर को कहता अवनि आश्वस्त हैं तप्त रवि जब किरणें फैलाता। पसरे वृक्ष छाया करतें अवनि पर गोलाई, चोडाई, चतुर्भुज, लंम्बाई गणित बैठाती है शाखाएं। झुमकर ठण्डी पवन तपती दुपहरी में पर्णो का स्वर संगीत सुनाती आडी, तिरछी शाखाएं वृक्षों की आलिंगन करती अवनि का। मानो वृक्ष शाखाएं कह रही हों हे अवनि हम तुझे सम्भाल लेंगी हां, क्योंकि नीचे की जड़ों का तुम ही आधार हो हैं वृक्षों के कई आकार छोटे, लम्बे, गोलाकार देते सदैव अम्बर को अवनि का अस्तित्वाकार। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी...
राखी का दीप
लघुकथा

राखी का दीप

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** "भैया तुम कितनी देर में आओगे?" आता हूँ जरा बिजी हूं। "भैया बहुत देर हो गई, अब तो आ जाओ।" "ट्रिन ट्रिन......" "........" "ट्रिन ट्रिन......" "........" "अरे तुम क्यों परेशान हो रही हो? तुम्हारा मिनिस्टर भाई विधवा आश्रम की महिलाओं से राखी बँधवाने में व्यस्त होगा न?" पति ने भाई को राखी बाँधने के लिए व्याकुल हो रही अपनी पत्नी से कहा, जो बार-बार भाई को फोन कर रही थी। "दरअसल बात यह है कि हम दोनों साल भर के अंतर वाले बहन-भाई हैं। साथ ही खेल-कूदकर बड़े हुए हैं। चूँकि भाई शुरू में छात्र राजनीति में रहा। कालेज का प्रेसीडेंट रहा, फिर छात्र संगठनों में शामिल होकर पार्टी पोलिटिक्स में चला गया...और फिर विधायक बनकर मिनिस्टर बन गया, पर भैया ने मुझे वचन दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, कैसे भी हालात हों, वह मुझसे राखी बँधवाने मेरे ...
अनुभूतियां
कविता

अनुभूतियां

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** आज इंसान की अनुभूतियां विकृत हो रही हैं, स्मृतियाँ क्षत- विक्षत हो गई हैं ! धर्म-कर्म-कर्तव्य बिसर रहा है "थोड़ा ठीक हो जाय" ये प्रयास नहीं करते, क्योंकि हमारी कल्पनायें भी चोटिल हो चुकी हैं, "समय के साथ सब ठीक हो जाएगा," ये कहकर समय पर ही टाल देते हैं। वर्तमान- भविष्य के साथ बस आधा आधा जी रहे हैं ! इंसान मानव होने की पहचान खोने लगा है, निजी अभिज्ञान को सांचे में ढालकर, सामुदायिक पहचान का जामा पहना रहा है ! दिन-रात, रिक्तता और द्वंद्व के झूले में संतुलन बनाए रखने में बीत रहा है ! किसी दिन स्वयं का अतिक्रमण कर इंसान अस्तित्वहीन हो जाएगा, इस तिलस्मी दुनिया से कूच कर जाएगा , फिर भी कुछ आभास नहीं कर पायेगा!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश क...
पुरुष्कार का दर्शन शास्त्र
व्यंग्य

पुरुष्कार का दर्शन शास्त्र

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** हर ‘पुरस्कार’ को नमस्कार है… पुरस्कार- नाम ही ऐसा है, जैसे पुरुषत्व की विजयघोषणा हो। सुनते ही लगता है मानो पितृसत्ता का तमगा पहन लिया हो। अब तो महिलाएं भी कहने लगी हैं- “ये पुरस्कार क्यों? कुछ तो ‘महिलाकार’ जैसा होना चाहिए!” सही पूछें तो कई साहित्यकारों को पुरुष्कार की फांक लेते ही साहित्यिक मर्दानगी के लक्षण प्रकट होने लगते हैं! बिना पुरस्कार के देखो न साहित्यकार की हालत, बिल्कुल नामर्दी के शिकार मरीज़ की तरह, जो अपनी मर्ज़ का इलाज ढूंढते हुए इधर-उधर काशी, कलकत्ता, कराची, हर चांदसी, देसी और नकली आयुर्वेदिक दवाखाने की खाक छान चुका है । मिल ही जाएंगे ऐसे लोग... हाँ, आजकल इसका इलाज शर्तिया गारंटी के साथ पुरस्कार की चटनी-चूर्ण से होने लगा है! जगह-जगह लग गए हैं पुरुष्कार के ऐसे ही लंगर, खु...
नंगे को डर कैसा
कविता

नंगे को डर कैसा

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** प्रश्न उठा डर नहीं लगता उत्तर मिला कैसा डर... किससे डर... ये दुनिया है ही नंगों की नंगे को नंगे से डर कैसा..... ये तो हमाम है यहाँ सब नंगे हैं बस.. अंतर इतना सा कि कोई है छोटा नंगा तो कोई बड़ा नंगा कोई मात्र हेराफेरी से चलता है तो कोई सौदा कर लेता आत्मा का जैसा भी हो नंगा तो बस नंगा है नंगे को नंगे से डर कैसा..... क्यों सोचते हैं नंगे के पास आत्मा होगी जिसे अहसास हो जिसमें संवेदन हो... दर्द हो.. नंगा कब सचेत होता है कि जमीर जागता रहे नंगा कब अचेत होता है कि प्रतिहिंसा दफन हो कौन पड़े चेतन-अवचेतन के पंगे में नंगे तो सिर्फ नंगे होते हैं फिर नंगे को डर कैसा..... नंगे को तो मतलब है मात्र अपने मतलब से अपनी आकांक्षा से अपनी महत्वाकांक्षा से अगर कुछ होता और तो क्यों कहलाता नंगा...
अगर कभी हार मानने का मन करे
कविता

अगर कभी हार मानने का मन करे

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* एक बीज के बारे में सोचो जो धरती में बहुत गहरा दबा है अंधेरे से घिरा हुआ बिना जाने बस इंतज़ार कर रहा है। वो बढ़ने से पहले टूटता है देखने से पहले ऊपर की ओर बढ़ता है खालीपन को चीरते हुए आगे बढ़ता है उस पर भरोसा करके जिसे वो देख नहीं सकता। अंधेरा अंत नहीं है टूटना असफलता नहीं है इंतज़ार करना बेकार नहीं है कुछ नया आकार ले रहा है। अगर कभी हार मानने का मन करे तो अपने अंदर छिपे उस बीज के बारे में सोचो शायद अभी तुम्हें वो दिखाई न दे लेकिन हो सकता है तुम बनते जा रहे हो। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मान...
जंग जारी है
कविता

जंग जारी है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जंग जारी है... अंग्रेजों के चले जाने से ही खत्म नहीं हो जाती आजादी की लड़ाई, अभी भी भरे पड़े हैं इस देश के भीतर बहुत से अंग्रेज़परस्त लोग, व्यक्तिगत लालसा पाले लोग। लाखों हैं जिन्हें नहीं पता बमुश्किल मिली आजादी की कीमत, बुनियाद हिलाने बैठे हैं दीमक पर दीमक। हमें नहीं शिकायत वतन के शूरवीरों से, पर कैसे भूल जाएँ कि हो रहा है देश घायल भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, आतंकवाद और पाखंड जैसे तीरों से। शकुनि जैसे लोग चल रहे रह-रहकर चाल पर चाल, आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश हो रहा निढाल। बेरोजगारी बढ़ रही जैसे सुरसा का मुख, कौन सुने नौजवानों के दुख? स्वतंत्रता की जंग अभी भी जारी है, बाहर आ ही जाने है खबर किसकी देशद्रोहियों से गहरी यारी है। परिचय :-  र...
लोकतंत्र की पहली पाठशाला में लौटती रौनक
आलेख

लोकतंत्र की पहली पाठशाला में लौटती रौनक

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** संदर्भ छात्रसंघ चुनाव- विश्वविद्यालयों केवल डिग्रियाँ नही गढ़ते, वे राष्ट्र का भविष्य गढ़ते हैं। करीब नौ वर्षों के लंबे मौन के बाद मध्यप्रदेश के महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनावों की आहट फिर सुनाई दे रही है। कैंपस एक बार फिर जीवंत हैं। गलियारों में चुनावी नारों की गूंज है, कक्षाओं में प्रत्याशी विद्यार्थियों से संवाद कर रहे हैं,छात्र अपने भविष्य के प्रतिनिधियों पर चर्चा कर रहे हैं और परिसर का वातावरण लोकतांत्रिक ऊर्जा से भर उठा है। यह दृश्य केवल चुनावी गतिविधियों का नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक संस्कृति की वापसी का प्रतीक है, जिसकी शुरुआत शिक्षा संस्थानों से होती है। मेरे लिए यह दृश्य केवल वर्तमान नहीं, बल्कि स्मृतियों का भी हिस्सा है। छात्र जीवन के वे दिन अनायास ही सामने आ खड़े होते हैं, जब मैं स्वयं छात्रसंघ...
सतरंगी दुनिया- ३६
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३६

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** एक बात समझ में नहीं आ रही है कि सर में दर्द होता है तो उसे सरदर्द कहते हैं और अगर नाक में दर्द होगा तो उसे 'दर्दनाक' कहेंगे क्या? *हर दवा में एक्सपायरी डेट लिखी रहती है, पर शराब क्या अमृत है कि उसमें एक्सपायरी डेट नहीं लिखी रहती है। विश्व का सबसे बड़ा आश्चर्य- यहाँ 'लेबर रूम' में 'लेबर' नहीं रहते हैं।* एक लड़का बड़ी उम्र की औरत को बार-बार घूरकर देख रहा था तो उस औरत ने कहा-कुछ तो शर्म करो मैं तुम्हारी माँ की उम्र की हूँ। लड़के ने उत्तर दिया- मैं भी अपने लिए नहीं, अपने अब्बू के लिए लड़‌की देख रहा हूँ। जो चीज मन की शांति को छीन ले, उसे छोड़ देना ही समझदारी है-चाहे वह आदत हो, सोच हो या कोई रिश्ता। झूठे लोगों के मुँह मत लगिए, आप बहस में उनसे कभी जीत नहीं पाएंगे, क्योंकि यह कलियुग है। यहाँ सच अकेला चलता है और झूठ बारात लेक...
अधूरा सफर
कविता

अधूरा सफर

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** अधूरे सफर की अधूरी कहानी लिख रहा हूं मोहब्बत तो कभी मिली नहीं ग़म की दास्तान लिख रहा हूं। जीवन सफर में मिलते रहे जाने पहचाने चेहरे मगर हमराही कोई मिलकर भी मिला नहीं। सोचा था हमराही को हमसफर बनाकर सुनाऊंगा अपनी हर गम-ऐ-दास्तां सारी। मगर वक्त के तराजू पर हमराही हमसफर के मुकाम पर कभी पहुंचा ही नहीं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हे...
राखी और मायका
कविता

राखी और मायका

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** राखी आती है हर साल, पर हर साल मायके जाना कहाँ हो पाता है... कभी बच्चों की पढ़ाई, कभी घर की जिम्मेदारियाँ, कभी समय की कमी, तो कभी हालात रोक लेते हैं। भैया की कलाई तक राखी पहुँच जाती है, पर बेटी का मन आज भी मायके की देहरी पर बैठा रहता है। सब कहते हैं - "अब तो ससुराल ही तुम्हारा घर है" पर कोई ये नहीं समझता कि बेटियाँ मायका छोड़ती हैं, मायके से जुड़ी यादें नहीं... राखी के दिन सबसे ज़्यादा याद आता है वो आँगन, जहाँ भाई के साथ बचपन खेला था। परिचय :- इंदौर (मध्य प्रदेश) की निवासी अपने शब्दों की निर्झर बरखा करने वाली शशि चन्दन एक ग्रहणी का दायित्व निभाते हुए अपने अनछुए अनसुलझे एहसासों को अपनी लेखनी के माध्यम से स्याह रंग कोरे कागज़ पर उतारतीं हैं, जो उन्हें खुशियों के आसमानी रंग देते हैं। घोषणा पत्...
प्रकृति ईश्वर रुप
कविता

प्रकृति ईश्वर रुप

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** नीला अम्बर, सागर तल, मन करता है उड़ान। दिलों में ये ख़ुशियाँ लाये, ओठों पर मुस्कान । नीला अम्बर… प्रकृति का रुप अद्भुत, विविध इसकी पहचान। बिन मांगे करती है सबके जीवन का कल्याण। धरती उगले हीरे मोती ओर कई रत्नों की खान। भरणपोषण का भार उठा कर करती अन्न दान। नीला अम्बर… पेड़ पौधों देते हैं सब के जीवन को वायु प्राण। हरियाली में छुपा हुआ है औषधी का विज्ञान। छांव में बैठो वृक्षों के तो दूर हो जाती थकान। जल की वर्षा में भी सहायक इसका योगदान। नीला अम्बर… नदियाँ हमको सिखा रही है सदा रहे गतिमान। समाहित कर लेतीं सब कुछ सागर के समान। जल बिन जीवन होता न संभव जैसे रहे न मीन। जल जीवन के मूल तत्व में इसका प्रमुख स्थान। नीला अम्बर… सूरज करता सारे जन जीवन को उष्मा प्रदान। पकता अन्न न पाते भोजन रहता भूखा किस...
हम बागी बलिया वाले
कविता

हम बागी बलिया वाले

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** हम बागी बलिया वाले हम बागी बैरिया वाले हम गंगा के किनारे वाले हम घाघरा के किनारे वाले हम हिम्मत वाले हम कीमत वाले हमारे नस नस बहता स्वाभिमान है हम बागी बलिया वाले देते बलिदान हैं डर का कहीं नहीं नामोनिशान है स्वर्ग से ऊंचा हमारा स्वाभिमान है। परिचय :- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' निवासी : गुदरी सिंह के टोला, पांडे पुर, बैरिया, बलिया (उत्तरप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हम...