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सतरंगी दुनिया -२६
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया -२६

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *अजीब बात है, कि वो इंजीनियर नहीं है फिर भी तारीफ के पुल बाँध लेता है।* हँसना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है, पर दूसरों पर हँसना हमारे लिए हानिकारक है। उम्र बढ़ने के साथ हमें यह नहीं सोचता चाहिए कि हम ओल्ड हो गए हैं, बल्कि ऐसा सोचना चाहिए, कि हम तपकर गोल्ड हो गए हैं। उमर कहती है कि अभी थोड़ी भक्ति कर ले, पर दिल कहाँ है, मानता वो तो कहता है कुछ मस्ती कर ले। *यदि आप उम्र को हराना चाहते हैं, तो आप अपने शौक जिन्दा रखिए।* यदि आप खुश रहना चाहते हैं तो इस बात पर ध्यान मत दीजिए कि कौन क्या कर रहा है, कब कर रहा है और क्यों कर रहा है ? अब मुझे उम्र समझाती है कि अब जिंदगी की शाम हो गयी है, परतुं दिल कहता है कि महफिल तो शाम को ही शुरू होती है। बुढ़ापे में भी जवानी का जोश रखिए। माना हमारा तन कछुआ होता है, मगर जनाब हमारा मन तो खरगो...
माता कैकेई – चरित्र वर्णन
आलेख

माता कैकेई – चरित्र वर्णन

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** सूक्ष्म परिचय- माता कैकेई कैकय देश की राजकुमारी थी। वे शास्त्र और शस्त्र विद्या में निपुण थीं। उन्हें राजनीति का भी सम्यक ज्ञान था। इसीलिए वे देवासुर संग्राम में राजा दशरथ की सारथी बनकर उनके साथ रहीं। जब महाराज दशरथ घायल हो गए, तो कुशल राजनीतिज्ञ की भांति उन्हें सुरक्षित बचाकर ले आई थी। एक युद्ध में रावण ने जब उनके रुप और सौंदर्य पर कटाक्ष किया तो, उन्होंने कहा कि इक्ष्वाकु वंश में जन्मा बालक ही तुझे मृत्यु की गोद में सुलाएगा। मेरा यह वचन है। तेरे समूल वंश को मिटा देगा और इस अपमान का जवाब तुझे अवश्य देगा। समय बीतता गया जब भगवान राम का अवतार हुआ कैकयी की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। वे जानती थी कि यह नारायण हैं। माता कौशल्या से भी अधिक प्रेम वे राम से करती थी। जब रामजी के राज तिलक की घोषणा हुई तो वे माता कैकेई स...
घटा सावन की
कविता

घटा सावन की

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** पहले सावन की सन्ध्या आंचल पसार रही रजनी गन्धा वृक्षों के झुरमुट में खग वृन्द बोलते पी को पुकारते मधुर स्वर में गाते। दामिनी दमक रही चम्पई सन्ध्या हैं पहले सावन के घिर आए मेघ हैं बह रही मन्द पवन जैसें कुछ गाती नीर कण बौछारें सिहर-सिहर जाती। कन्दुभी रंग सजा मेघों के भाल पर गा रहे, नाच रहे मयुर मधुर ताल पर तरु तड़ाग पल्लवित हैं चम्पई शाम आ रहीं पहले सावन की घटा बार-बार छा रही। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरक...
पिता होते हैं महान
कविता

पिता होते हैं महान

आशा जाकड़ 'आस' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** समुद्र से गम्भीर हिम से अटल दुःखों में होते कभी न विचल ऊपर से कठोर अन्दर  कोमल हृदय से विशाल, मन के सरल सिखाते त्याग बलिदान। पिता होते हैं महान।। माँ धरा तो पिता आकाश बच्चों का है आत्मविश्वास मांँ दीपक तो पिता प्रकाश माँ जीवन पिता देता स्वाँस अनेक गुणों की खान। पिता होते हैं महान।। पिता मुख से बोलते नहीं मन की बात जान लेते हैं। बच्चों की हर ख्वाहिश को पूरा करने की ठान लेते हैं देते हैं  अपूर्व  ज्ञान। पिता होते हैं महान।। पिता होते हैं वेद-पुराण करते संस्कार-निर्माण हर समस्या का समाधान संग पिता, साथ भगवान ईश्वर का हैं वरदान। पिता होते हैं  महान।। बच्चों के सुख के लिए चलते रहते अथक पाँव हर मुश्किल आसाँ करते नहीं देखते धूप और छाँव करते श्रम का अनुदान। पिता तुम हो महान।। पिता गाइड है और रक्षक आल...
कमियों सहित स्वीकार्यता
कविता

कमियों सहित स्वीकार्यता

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** पूर्ण कहाँ इस जगत में, मानव का आकार। गुण-अवगुण के संग बना, जीवन का संसार॥ अस्सी गुण हों यदि किसी, बीस रहें कमजोर। उन कमियों को मानकर, बढ़ता प्रेम का दौर॥ चालीस गुण यदि मिलें, साठ रहें अनजान। फिर भी उसमें ढूँढ़िए, मानवता की शान॥ दोष न गिनते रहिए सदा, गुण पर दीजै ध्यान। कमियों संग जो अपनाए, वही बड़ा इंसान॥ चाँद स्वयं निष्कलंक कब, दाग लिए मुस्काय। फिर मानव से पूर्णता, क्यों जग आशा लगाए॥ रिश्तों की मधुरता तभी, रहती सदा अटूट। जब कमियों को छोड़कर, गुणों से जाएँ छूट॥ स्वीकारों के फूल से, महके हर व्यवहार। त्रुटियाँ भी प्रिय लगें, जब हो सच्चा प्यार॥ शिव ही केवल पूर्ण हैं, शेष सभी अपूर्ण। कमियों सहित जो मान ले, उसका जीवन पूर्ण॥ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निव...
मानवता बनाम युद्ध
कविता

मानवता बनाम युद्ध

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** मानवता और युद्ध एक दूसरे के विपरीत शब्द है मानवता युद्ध में समाप्त हो जाती है। युद्ध में लाभ नहीं हानि ही हानि है प्रकृति की हानि जनहानि आर्थिक हानि मानवता की हानि। युद्ध किसी विषय का समाधान नहीं, शांति और संवाद युद्ध का परिणाम है, मानसिक अशांति, डर, द्वेष और जन हानि यही युद्ध के परिणाम है। बम, गोला, बारूद, मिसाइल, यह कोई शांति के प्रतिक नहीं, प्रेम भाईचारा आपसी सौहार्द देश की उन्नति के प्रतीक है नहीं युद्ध। युद्ध से आर्थिक उन्नति पीछे धकेल जाती है जिससे गरीबी भुखमरी उन्नति व्यापार सब चीज पीछे रह जाती है। आदमी जीने को मजबूत हो जाता है। गति प्रगति स्थित हो जाती है। मानवता युद्ध का परिणाम नहीं प्रेम का विध्वंस है। मानवता का अंत है। प्रगति मै अवरोध है। आर्थिक उन्नति का...
२ जून की रोटी
कविता

२ जून की रोटी

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** मैं बेच देता हूं अपना ईमान, अपना सत्य, नैतिकता और खुद को भी...!! मैं पशु, पक्षी, जानवर नहीं, इंसान हूं, केवल इंसान ! दो जून की रोटी के खातिर ?? नीचता कि हद तक गिरकर... मैं बेच देता हूं, अपना अस्तित्व।। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 6036...
संकल्प
गीत

संकल्प

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** एक नया संकल्प मनुज लो, मूल मंत्र को याद करो। आदर्शों की गंग बहाकर, सच्चाई आबाद करो।। बलवानी संकल्प सदा हों, उत्कर्षों की हो छाया। लक्ष्य ध्यान में रखकर मानव, जीवन में सबकुछ पाया।। दृढ़ प्रतिज्ञा श्रेष्ठ चुनो तुम, एक योग्य उस्ताद करो। निठुर नियति आघात बहुत हैं, हार नहीं लेकिन मानो। संघर्षों की डोर पकड़ लो, मंज़िल अपनी पहचानो। हर पड़ाव पर जय पाओगे, श्रम सीकर हो नाद करो। करो मनोरथ पूर्ण सभी तुम, सदाचार की हो माला। दूर रहो छल छद्म कपट से, ओढ़ दुशाला सत् वाला।। चिंतन रथ बैठो उत्साही, पूरी हर फ़रियाद करो। करो अध्ययन सद्ग्रंथों का, औरों की हर लो पीड़ा। पथ प्रशस्ति का होगा हासिल, आज उठा लो फिर बीड़ा।। सारा जीवन आनंदित हो, सदा उच्च संवाद करो। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" नि...
आपबीती
कविता

आपबीती

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** रिश्ते मजबूर है हमसे, इसीलिए सब दूर है हमसे, जो नादानियां नहीं की हमने कहा उसका सुरूर है हमसे, पलकों पर बिठाये, खिलाये, पिलाये, वो दिखाते गुरूर है हमसे, अन्न की कमी का अहसास होने नहीं दिया कभी हमने, हमी को कहते मगरूर हमसे, कांधे पर बिठाया, पढ़ाया लिखाया, अब उन्हें शिकवा भरपूर है हमसे, दिल में बसे रहे रात दिन जो पता नहीं क्यों दूर है हमसे, जा ले ले घर जमीं और खुशियां अब बता भी जा क्या फितूर है हमसे, वारने ही वाला था सब कुछ हर सितम ढाना मंजूर है हमसे, आपबीती सुनाऊं और कितना कहा सबने यही दस्तूर है हमसे। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया...
कब तक बली की वेदी पर चढती रहेंगी बेटियाँ
कविता

कब तक बली की वेदी पर चढती रहेंगी बेटियाँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** सजती है नुमाइश समाज मे बेटियों की और लगती है बोलियां बेटों की, अखिर कब तक बेटियों को सिसकते मौत को गले लगाता देखते रहेंगे उनके परिजन? माता-पिता बन दुलार दिया बेटे-बेटी को बराबर का, फिर क्यूँ घर आई बेटी की बलि चढाते है दहेज और नफरत की बेदी पर? धधक रही हैं घरों और रसोई में ना जाने कितनी बेटियाँ, कब तक जकडी रहेंगी अत्याचार और खौफ की ये बेड़ियाँ? क्यूँ तौलते हैं उस दौलत के तराजू पर बेटियों को, जहां चंद सिक्कों के लिए बेच देते हैं लोग सम्मान को। लाजो से पली राजकुमारी एक दिन भेंट चढ़ जाती हैं दहेज के दानव पर और राख हो जाती हैं अग्नि में एक तिनके की तरह। बेटी कोई वस्तु नहीं उनका कोई मोल नहीं इतिहास भरे हैं इनकी करुणा और वीरता की सच्ची कथाओं से। अब तो उठो समाज के पहरेदारों...
जीवन में इतना सीखा
ग़ज़ल

जीवन में इतना सीखा

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** जीवन में इतना सीखा। सच को सच कहना सीखा। फूलों से रिश्ता जोड़ा, काँटों से बचना सीखा। थी जितनी कुव्वत अपनी, दम उतना भरना सीखा। छोड़ बदी के बहकावे, नेकी पर चलना सीखा। मन ने जो अहसास दिया, तन ने वो सहना सीखा। भूली - बिसरी बातों को, यादों में रखना सीखा। दूरी, मंज़िल , राहों पर, सूरज से तपना सीखा। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास : अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति : शिक्षक प्रकाशन : देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान : साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी र...
स्वप्न सुख
कविता

स्वप्न सुख

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** सपनों का अपना अहसास होता है इसीलिए ये असल से खास होता है रोकेगा कौन दिल को झूमने से रोकेगा कौन लबो के चूमने से हवायें चले या ना चले मगर मादकता का मन अहसास होता है कोई मौसम नहीं कलियाँ फूटने का कोई वक्त नहीं कोयल कूकने का जिस वक्त भी मन करे अपना सुर संगीत का आगाज होता है बिन मौसम बादल गरजते हैं गौरी खड़ी सामने वे बरसते हैं भिगो जाते प्रिये की कोमल काया संग भीगें, अंदाज अलग होता है मिल लेते हैं बेझिझक सपनों में मन खोया रहे प्रीत के सपनों में वास्तव में क्या होगा, कौन जाने यहां मन चाहा मिलाप होता है सुख ही सुख, कहां दुख सपनों में ना अलगाव की चर्चा है अपनो में हकीकत में नहीं, सपनों में ही सही अरमान पूराने का अहसास होता है परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, द...
पिता होना आसान नहीं होता
कविता

पिता होना आसान नहीं होता

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** गगन चूमती इमारत का नीव का पत्थर होना आसान नहीं होता।। कि अपने मुस्कुराते अधरों से, हलाहल पीना आसान नहीं होता।। रात को शीतल चांद,दिन को सूरज सा तपना आसान नहीं होता। कि इस मायावी जग में, निस्वार्थ प्रेम करना आसान नहीं होता ।। अपने खून पसीने से एक कोरी किताब लिखना आसान नहीं होता।। कि साध कर भागते समय को, गीता बाँचना आसान नहीं होता।। निर्मल कोमल हृदय को सक्ता का, आवरण ओढ़ना आसान नहीं होता। कि घर बाहर की जिम्मेदारियों को, कांधे ढोना आसान नहीं होता।। नर्म नर्म कलियों को सहेज, ओक में भरना आसान नहीं होता। कि लड़खड़ाते कदमों को, एक सही दिशा देना आसान नहीं होता।। जीवन के खेल में, जीतकर भी हारना आसान नहीं होता। बैठ कर जमीन पर दिन में तारे देखना आसान नहीं होता।। फटे हाल घिसे जूते लिए, कड़ी धूप में...
अपना अद्भुत योग
दोहा

अपना अद्भुत योग

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** ऋषि मुनियों की देन है, अपना अद्भुत योग। इसके नित व्यवहार से, तन- मन हो नीरोग।। नित अनुलोम-विलोम कर, करिए प्राणायाम। मिले आत्म परमात्म से, सफल सभी आयाम। योग करे हर अंग में, प्राणवायु संचार। करें निरोगी देह को, हरे समस्त विकार।। स्वस्थ सुभग काया सदा, देती सुखमय भोग। तन बलिष्ठ मन चुस्त हो, है प्राचीन प्रयोग।। तन के हरे विकार सब, योग दवा ही जान। प्राण शक्ति नित ही बढ़े, होता रोग निदान।। सबको करना चाहिए , प्रातः प्रतिदिन योग। मन को रखता शांत ये , रखे देह नीरोग।। मिट जाती है योग से, तन-मन की हर व्याधि। योग गुरू की साथ में, मिलती मुफ्त उपाधि।। ध्यान योग करिए सदा, तन- मन रहे निरोग। योग दिवस शुभकामना, स्वस्थ सुखी हो लोग। परिचय :- श्रीमती शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" निवासी : ग...
मनुष्य बचा रहे
कविता

मनुष्य बचा रहे

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** युद्धों से नहीं, प्रेम से चलती है पृथ्वी। तलवारें सीमाएँ बना सकती हैं, घर नहीं। घृणा भीड़ जुटा सकती है, समाज नहीं। मैंने देखा है- एक सैनिक की माँ सीमा के दोनों ओर एक जैसी रोती है। एक बच्चे का भय किसी धर्म का नहीं होता। एक भूखे मनुष्य की रोटी किसी राष्ट्र की नहीं होती। फिर हम क्यों नामों, झंडों और दीवारों में मनुष्य को बाँटते हैं? समय की सबसे बड़ी आवश्यकता नई विजय नहीं, मनुष्य का बचा रहना है। क्योंकि यदि प्रेम हार गया, तो जीतकर भी हम हार जाएँगे। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज"...
सपन सलोने
कविता

सपन सलोने

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** सपन सलोने लगे सुहाने, मौसम प्रीति पुनीत। राग वसंती गूँज रहा है, गाती कोयल गीत।। कोमल कलियाँ चिंता करतीं, खिलता बेला फूल। धवल मनोहर छवि भी न्यारी। चुभे न कोई शूल।। भ्रमर लालची मँडराता है, माली भी भयभीत। बाँहें फैलाए नभ आया, धरती है बेचैन। चली झूम मुस्काती पुरवा, मिले किसी से नैन।। प्रणय सितारे हर्षित होते, आया है मनमीत। प्यासे अधरों प्रीति सजी है, प्रेम सुरभि का ताज। महक रही है फुलवारी भी, मदमाता ऋतुराज ।। सागर से संगम को व्याकुल, मिले नदी को जीत। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृ...
वैभव
कविता

वैभव

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** यह विचित्र-सा लाड़ला, वैभव किया कमाल। खेल-जगत में छा गया, आज बिहारी लाल।। माता गृहिणी आरती, पितु संजीव सुजान। मोतीपुर से यह निकल, बना बिहारी शान।। वैभव कम वय में किया, जादू-टोना यार। छक्का-चौका मार कर, चौंकाया संसार।। दिग्गज सब हैरान हैं, वैभव यह अवतार। गेंदबाज जितने बड़े, डाले हैं हथियार।। सूर्यवंश का यश खिला, छाया देश-विदेश। वैभव एक मिसाल को, किया जगत में पेश।। गाँव-गली में खेलते, पाया श्रेष्ठ मुकाम। विश्वपटल पर गूँजता, वैभव का यश-नाम।। कीर्तिमान वैभव गढ़ा, रचा नया इतिहास। चकित आज संसार है, यह बालक है खास।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (पी.एन.बी.) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्व...
तिलचट्टे
गीत

तिलचट्टे

भीमराव 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** लगे बिलबिलाने तिलचट्टे, पाँव जमा के पक्के। नई दवा भी लगे खोजने, नेता हक्के - बक्के।। खोल लिए है सबने तरकश, तीखे लाँछन वाले। छेद रहे सपनों के तन को, लेकर निर्मम भाले।। अपने पिच पर लगा रहे सब, लंबे चौके-छक्के।। शतरंजी चालों पर भारी, राजा जी के घोड़े। नग्न पीठ पर लगे बरसने, तिकड़म वाले कोड़े।। इन कीड़ों पर फिर छल-छंदी, विष छिड़केंगे पक्के।। गली-गली में भेज दिए हैं, परचे लेकर प्यादे।। भक्तों को बैकुंठ दिखाने, करना तगड़े वादे।। इनके जेबों में डाले कुछ, काजू और मुनक्के।। क्रांतिकारियों के स्वागत में, सजी नई बन्दूकें। दमनकारियों के घर पहुँची, भरी बड़ी सन्दूकें।। छिप जायेंगे फिर तिलचट्टे, कल खाने को धक्के।। परिचय :- भीमराव 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी य...
पर्यावरण पर प्रहार
कविता

पर्यावरण पर प्रहार

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** मत करो प्रकृति पर प्रदूषण से प्रहार, करो मत प्रदूषण से मोहमाया, न बनो मित्र, यार प्रकृति पर भरती जख्म प्रदूषण कितना बुरा कितना बदरंग पर्यावरण पर प्रहार से प्रकृति की स्वच्छता में हरियाली साफ गुल वायुमंडल पर प्रदूषण का तेजतर्रार तीखा हमला, प्रकृति में प्रदूषण का घुलता खतरनाक विषैला जहर वृहत दमघोंटू प्रदूषण परिवार में जानलेवा नाशक जहर, नष्ट करता जीवन क्यों फिर प्रदूषण को खुला निमंत्रण, घनिष्टता फिर क्यों ? सचेतक फिर भी नहीं, क्यों ? शुद्ध पर्यावरण की चाहत जीवन जीने में, जागरूक फिर भी नहीं क्यों ? जागना तो होगा आज नहीं तो कल थाम लो प्रदूषण का खतरा, वरना जीवन सुरक्षित बचेगा न आज फिर आने वाले कल परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक...
चिंता शिविर
व्यंग्य

चिंता शिविर

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज तड़के ही पड़ोसी शर्मा जी आ धमके। हाथ में मेरा वही अख़बार था, जिसे वे रोज़ की तरह “पढ़ने के लिए उधार” ले गए थे और पढ़कर अब “ज्ञान बाँटने” लौटाए थे। अख़बार के भीतर से एक पम्पलेट भी झाँक रहा था, मानो वह स्वयं शर्मिंदा हो कि अख़बार के साथ ग़लती से लौट आया है। हमारे शर्मा जी पड़ोसी धर्म का पूरा निर्वाह करते हैं, अख़बार मेरा, पढ़ते वे; चाय मेरी, पीते वे; और अखवार की ख़बरें ऐसी सुनाते हैं जैसे स्वयं रिपोर्टर हों। आज चाय की पहली चुस्की के साथ उन्होंने पम्पलेट मेरी ओर बढ़ाया, “आप तो वैसे भी अख़बार नहीं पढ़ते, कम से कम पम्पलेट ही देख लिया करो। शहर में बड़ा ज़रूरी कार्यक्रम होने जा रहा है।” मैंने सहज अनुमान लगाया, “कोई नया शो-रूम, चमत्कारी वैद्य, असफल प्रेम को सफल करने का कोर्स, या फिर किसी ...
आप भी चखकर देखो स्वाद
कविता

आप भी चखकर देखो स्वाद

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** संविधान के होते हुए भी क्या क्या नहीं कर जाते हैं आप, अपनी उसी सड़ी गली मानसिकता का यदा कदा दिखा जाते हो छाप, विदेशों में आपके हरकतों का कर दे इस्तेमाल तो तुरंत नस्लवाद का राग अलापते हो, वही सब कुछ रोज आग बना तापते हो, क्या कभी चखा है आपने स्वाद मानव के गंदे पेशाब का, कभी नहीं निकालते दो शब्द पश्चाताप का, उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूरब से लेकर पश्चिम तक, वही गंदी हरकत रोज कही न कहीं, अपने इस आतंकवाद से क्यों थकते नहीं, जाति की अकड़ दिखाने किसी को भी पीट जाते हो, जूतों में पेशाब भर पीड़ितों को पिलाते हो, मानाकि जानवरों के पेशाब आराम से पी लेते हो, तो आओ कभी पीड़ित बन देख लो चखकर मानव मूत्र का स्वाद, तब कहना यदि बदल न जाये आपका अंदाज, ऐसा न हो कि वही सब हरकत आपकी नस्लों को झेलना पड़ जाय...
गधे बहुत नादान
दोहा

गधे बहुत नादान

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** कॉकरोच पार्टी बनी, बाॅंट रही है ज्ञान। ज्ञानी समझे ज्ञान को, गधे बहुत नादान।। बूढ़ा तो चालाक था, अनशन थी इक चाल। सभी फस गए चाल में, अब हैं सब बेहाल।। वह भी उल्लू बन गए, जिनको था सब ज्ञान। हम अज्ञानी क्या करें, हम तो थे नादान।। जंगल का राजा गधा, उल्लू बना वज़ीर। हंस मर रहे भूख से, कव्वा खाए खीर।। ताज हरदम रहा नहीं, सदा किसी के पास। झगड़े वाली चीज़ है, मत रख इसकी आस।। परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) भारत शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित हैं। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख...
शख्स
कविता

शख्स

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** एक शख्स है जो तुम्हारे इंतजार में बैठा है मोहब्बत न सही दोस्ती के इजहार में बैठा है। एक शख्स है जो सुनता नहीं कभी किसी की भी मगर तुम्हारी हर बात सुनने के इंतजार में बैठा है। एक शख्स है जो सोचता नहीं कभी किसी का भी वो हर जगह हर लम्हा तेरा एहसास लेकर बैठा है। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में...
माहवारी
कविता

माहवारी

अन्नपूर्णा रामटेके डुमरडीह- दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** मत समझो इसको बोझ कभी, यह नारी जीवन की धारा है। माँ बनने का वरदान यही, सृष्टि का सुंदर सितारा है।! जिससे जीवन अंकुर फूटे, वह प्रक्रिया क्यों शर्म बने? जिससे जग में खुशियाँ आएँ, वह कारण क्यों भ्रम बने? कुछ दिन की पीड़ा सहकर भी, नारी मुस्कान सजाती है। धरती जैसी सहनशील बन, हर रिश्ता प्रेम निभाती है।! माहवारी कोई रोग नहीं, यह प्रकृति का उपहार है। ज्ञान, स्वच्छता, जागरूकता, हर बेटी का अधिकार है।! संकोचों की दीवार गिराओ, खुलकर अब संवाद करो। स्वास्थ्य, सफाई, सही समझ से, जीवन को आबाद करो।! ना टोको उसको मंदिर में, ना सपनों पर रोक लगाओ। नारी शक्ति का मान करो, सम्मान का दीप जलाओ।! हर माँ, बहना और बेटी को, सम्मान भरा व्यवहार मिले। माहवारी पर मौन नहीं अब, जागरूकता का प्रचार मिले।! प...
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मेरे विचार

प्रतियोगिता

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** याद आते हैं बचपन के वो दिन जब हम विद्या अध्यन के लिए स्कूल जाते थे। विद्यालय मे वर्ष मे एक दो बार विद्यार्थियों मे बोलने की कला सीखने के लिए वाद विवाद प्रतियोगिता आयोजित की जाती थी। एक निश्चित विषय के ऊपर स्कूल के होनहार छात्र पक्ष अथवा विपक्ष मे बोलने के लिये भाग लेते थे। हम केवल श्रोता की श्रेणी मे आते थे, प्रतियोगिता मे भाग लेने की योग्यता नहीं थी, लेकिन इस प्रतियोगिता से कभी कोई मन मे कड़वाहट नहीं आती थी। संयोग से ग्यारहवीं कक्षा पास होते ही स्थानीय शासकीय विभाग मे नौकरी प्राप्त हो गई। जहाँ हमें विभाग के एक उच्च अधिकारी महोदय के स्थानान्तरित होने पर अपने विचार व्यक्त करने के लिये कहा गया। संकोच वश न चाहते हुए भी जीवन में पहली बार हमने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, हमारे साहब हमसे बिदा होकर जा रहे है, आप बहुत अच्छे व्यक्ति थ...