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भारत के आत्मगौरव और स्वामी विवेकानंद की ऐतिहासिक यात्रा
आलेख

भारत के आत्मगौरव और स्वामी विवेकानंद की ऐतिहासिक यात्रा

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत के इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना में अमिट स्मृति बन जाती हैं। ३१ मई १८९३ ऐसी ही एक तिथि है। यह वह दिन था जब भारतभूमि का एक युवा संन्यासी, साधारण गेरुआ वेशभूषा में, सीमित संसाधनों के साथ, परंतु असीम आत्मविश्वास और अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति को अपने भीतर समेटे हुए, भारतभूमि से विश्व मंच की ओर प्रस्थान कर रहा था। वह कोई राजा नहीं था, न किसी साम्राज्य का दूत और न ही किसी राजनीतिक शक्ति का प्रतिनिधि। वह भारत की आत्मा का वाहक था। वह थे "स्वामी विवेकानंद।" उस समय भारत अंग्रेज़ी दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। चारों ओर निराशा, हीनभावना और सांस्कृतिक असुरक्षा का वातावरण था। पश्चिमी सभ्यता की चमक के सामने भारतीय समाज अपनी ही परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लगाने लगा था। भारत की...
पिता
कविता

पिता

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** पापा मैं ढूंढता हूं, दिन-रात पिता के पर्याय... शब्दकोशों में, पांडुलिपियों में, और दुनियाभर के ग्रन्थों में। लेकिन आज तक रत्तीभर भी, नहीं मिला पिता के समकक्ष। पिता की अद्भुत कहानी, सुशोभित है छंद अलंकारों से। कठिन है इसकी परिभाषा। परिवार और संतान के लिए, सर्वस्व त्याग कर्ता संन्यासी, कौन है बड़ा इस बैरागी से। असंख्य दुखों का भार, पिता कैसे सह लेते है। क्यों नहीं टूटकर बिखरते है ? कैसे दबा लेते है बेबसी, झलकती नहीं शिकन तक, अपने को वज्र कैसे बना लेते है। हर घर में निश्चित है कोना, जहां दुनिया-भर के सभी पिता, बरसकर "जी" हल्का कर लेते है। जिससे उनमें आ जाती है, लड़ने की हिमगिरि सी अटलता, और पुरुष का कवच धर लेते है। समाज की रीति-नीति से, लौह आवरण चढ़ा है, उनकी मोम सी आत्मा पर। सिसकती अधूरी ...
दीवारों की आड़
कविता

दीवारों की आड़

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** दीवारों की आड़ बड़ी है, आपस में मिल करती बात कभी समय था खुले थे आंगन समय बैठकर कर लेती थी गपशप, अब समय कैसा है आया? नहीं पड़ोसी नहीं है आंगन मन चित् की नहीं बात होती, बंदीशो की आवाज है होती, समय नहीं कटता लंबी है रात। अब समय विचित्र है बहना अकेला जीवन अकेला ही रहना, नहीं परिवार का है अब साथ, देश-विदेश में रहते बच्चे करती आस पड़ोस से बात, नहीं काम का मुझे सहारा जैसे तैसे जीवन कटता, खुशियां लंबी दूर दराज। नहीं दिवाली की रौनक है, नहीं है होली लाल गुलाल खाली घर फीका त्यौहार करती मन की बातें चार। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मं...
सच्ची इंसानियत
कविता

सच्ची इंसानियत

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** मानव सेवा सबसे बड़ी, इससे बड़ा कोई धर्म नहीं। दीन-दुखी का कष्ट हरे,1204 इससे बड़ा कोई कर्म नहीं। इंसानियत को भूल जाए, इससे बड़ा कोई जुर्म नहीं। मानव बन जो संकट हरे, उससे बड़ा कोई सुरम (श्रेष्ठ)नहीं। मन में रखे न द्वेष-भाव, इससे बड़ा कोई मर्म नहीं। औरों के हित जो जिए, इससे बड़ा कोई पर्व नहीं। मिटा दे जो खुद का अहंकार, इससे बड़ा कोई मार्ग नहीं। बांटे जो जग में प्यार सदा, उससे बड़ा कोई पुरुषार्थ नहीं। परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "नोहरी" पिताजी का नाम : श्री भानीराम सिहाग माताजी का नाम : कांता देवी अर्धांगिनी का नाम : माया देवी जन्म दिनांक : १३/०७/१९९१ सम्प्रति : शिक्षक शिक्षा : दो बार स्नातकोत्तर, बीएड निवासी : गोरखाना तहसील नोहर ज़िला- हनुमानगढ़ (राजस्थान...
रोटी से आगे
कविता

रोटी से आगे

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** रोटी से आगे भूख लगी हो तो रोटी ही सबसे बड़ा सत्य लगती है। पर जीवन केवल रोटी से नहीं चलता। मनुष्य को सम्मान भी चाहिए, अपनापन भी, और यह विश्वास भी कि उसका होना किसी के लिए मायने रखता है। कई लोग भरपेट भोजन के साथ भी अधूरे रहते हैं। और कई लोग कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराते हैं। क्योंकि शरीर की भूख अन्न से मिटती है, पर आत्मा की भूख प्रेम, सम्मान और संवेदना से। यही कारण है कि सभ्यता की सबसे बड़ी चुनौती रोटी देना नहीं, मनुष्यता बचाए रखना है। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज" शामिल हैं। रुचि :...
जय मां ज्वाला
भजन

जय मां ज्वाला

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जग में कहां ऐसा, सबका नसीब है, ज्वाला के हाथों में, मेरी तक़दीर है।।टेक।। कांटों भरे हों चाहे, रास्ते हमारे, तोड़ के आएंगे, बंधन सारे। तेरी कृपा हो तो कांटा भी फूल है। ज्वाला के हाथों में मेरी तक़दीर है। कोटि जतन करें पापी हारें, भक्ति की ज्योत मैया जलती जाए। हारा है जीवन मैंने, यही मेरी जीत है। ज्वाला के हाथों में मेरी तक़दीर है। तेरे भवन में मैया, भक्त पुकारें, कष्ट निवारो मैया आए हैं द्वारे। आशाओं भरी है झोली, नैनों में नीर है। ज्वाला के हाथों में मेरी तक़दीर है। जग में कहां ऐसा किसका नसीब है। ज्वाला के हाथों में मेरी तक़दीर है। परिचय : आशा शर्मा पति : श्रीहनुमान प्रसाद शर्मा निवासी : धरमपुरी सांवेर रोड इंदौर (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : शिक्षिका हायरसैकैंडरी स्कूल साहित्यिक परिचय ...
खयालो में
कविता

खयालो में

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आते हो यूँ हीं खयालो में हरदम सताते हो यूँ हीं खयालो में हरदम जानते हो कि खयालो की मन्जिल आसमां से दूर कहीं दूर, दूर तक नहीं हैं हां, फिर भी चाहते हो पालु उसे खयालो की फिजाओं में उडती फिरु। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्मान २०२३" से सम्मानित हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्...
रंगत से अधिक संगत को संभालिए
कविता

रंगत से अधिक संगत को संभालिए

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** रंगत तो पल में बदल जाए, संगत जीवन गढ़ जाती है, अच्छे लोगों की छाया में, किस्मत भी मुस्काती है। रंगत चेहरे की धूप-छाँव, समय के संग ढल जाती है, संगत सच्ची मिल जाए तो, राह नई बन जाती हैl रंगत बाहरी चमक-दमक, मन को कहाँ सजाती है, संगत सच्ची हो अगर, आत्मा भी महक जाती है। रंगत झूठी दिखावा है, जो क्षण भर में मिट जाती है, संगत सच्ची दीपक बन, हर अंधेरा हर जाती है। रंगत से मत धोखा खाना, यह तो आँख भरमाती है, संगत की पहचान करो, यही राह दिखलाती है। रंगत से रिश्ते ना जोड़ो, ये अक्सर टूट जाते हैं, संगत सच्ची निभ जाए तो, जीवन फूल खिलाते हैं। रंगत चाहे जैसी हो, दिल को क्या समझाती है, संगत अच्छी हो तो जीवन, खुशियों से भर जाती है। रंगत के पीछे भागे जो, अक्सर पछताते हैं, संगत सही चुनने वाले, मंजिल तक जाते हैं। रंगत त...
बेरोजगार हूँ साहब …
कविता

बेरोजगार हूँ साहब …

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** बेरोजगार हूँ साहब! मै बेईमान तो नहीं दिल में मेरे हजारों अरमान तो नहीं..!! नौकरी सबूत नहीं है अच्छे इंसान होने का इंसान हूँ मैं इंसानों से अलग तो नहीं..!! अपनी जिंदगी कि मैं लड़ाई लड़ रहा हूँ सपनों के लिए बस आशियाना बुन रहा हूँ..!! अपनों से गीला नहीं गैरो से शिकवा नहीं रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहा हूँ..!! भविष्य की चिंता मुझे सताती है हरपल जख्म मेरे रोज़ नए हो जाते है पल पल..!! सहम सा जाता हूँ लोगों का सवाल सुनकर ना पूछा कर क्या कर रहा है आज कल ? ना देश लूट रहा हूँ, ना देश चला रहा हूँ ना हत्या कर रहा हूँ, ना फरेब कर रहा हूँ..!! ना कोई गुनाह किया हूँ ,ना गुनहगार हूँ रोजगार की तलाश करता मैं बेरोजगार हूँ..!! आखिर ये सवाल क्यों पूछते है लोग मुझसे क्या रिश्ता है जमाने में उनका और ...
अब्राहम अकॉर्ड्स: बदलती वैश्विक राजनीति का दर्पण
आलेख

अब्राहम अकॉर्ड्स: बदलती वैश्विक राजनीति का दर्पण

किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया (महाराष्ट्र) ******************** ट्रम्प बनाम मौजतबा खामनेई और बदलती मिडिल ईस्ट जियोपॉलिटिक्स -पश्चिम एशिया में नई ध्रुवीय राजनीति का उदय? अब्राहम अकॉर्ड्स केवल एक शांति समझौता नहीं, बल्कि २१वीं सदी की नई जियोपॉलिटिकल व्यवस्था का प्रतीक बन चुका है। अब्राहम अकॉर्ड्स में संभावतः तेल, व्यापार मार्ग, सैन्य प्रभाव हथियारों का बाजार, चीन-रूस की बढ़ती मौजूदगी और वैश्विक शक्ति संतुलन की लड़ाई भी छिपी हुई है- वैश्विक स्तरपर पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां कूटनीति, धर्म, सुरक्षा, ऊर्जा और वैश्विक शक्ति संतुलन एक-दूसरे से टकराते हुए नजर आ रहे हैं। इसी बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के केंद्र में है अब्राहम अकॉर्ड्स एक ऐसा समझौता जिसे अमेरिका ने इजरायल और अरब देशों के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी खत्म करने के लिए तैयार करा...
कहें सुधीर कविराय …
छंद

कहें सुधीर कविराय …

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** रोला छंद श्रम साधक मजदूर, रात दिन मेहनत करता। कब कहता मजबूर, रोज रोटी को खटता।। कहें मित्र यमराज, यही है इनका सावन। नहीं मानते हार, भाव रखते मन पावन।। कैसा इनका हाल, आप हम सब ही जानें। बात अलग है और, नहीं सरकारें मानें।। कहें मित्र यमराज, नहीं अब और रुलाओ। श्रम साधक मजदूर, मान-सम्मान बढ़ाओ।। अपनों का अब प्यार, आज कोई ना चाहे। बेईमानी की ओट, रोज ले बढ़ते राहें।। कहें मित्र यमराज, गजब है लीला न्यारी। अपने होते दूर, यही है माया भारी।। सहता है आरोप, बड़ा जो बेटा घर का। उसे नहीं है ज्ञान, भाग्य फल कैसा उसका।। यह कैसा है दस्तूर, हमें भी आप बताओ। क्या मेरा अपराध, बड़े होना समझाओ।। करते रहें प्रयास, हार को पीछे छोड़ो। पूरी होगी आस, जीत से रिश्ता जोड़ो।। कहें मित्र यमराज, दूर होंगी बाधाएँ। सदा जगाए ज...
सतरंगी दुनिया – २५
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया – २५

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  आज प्रधानमंत्री द्वारा देश की जनता से जो निवेदन किया गया, उसका असर अब दिखने लगा है। आज सुबह-सुबह कामवाली बाई का फोन आया- बर्तन, कपड़े मेरे घर-घर भेज दो। मोदी जी ने वर्क फ्राम होम का आर्डर दिया है। *जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, छोटे अक्षर दिखाई नहीं देते। शायद यह एक इशारा ही है, कि बढ़‌ती उम्र के साथ छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करें।* इस दुनिया में खुश वही लोग हैं, जो स्वयं का मूल्यांकन करते हैं, और दुखी वो हैं, जो दूसरों का मूल्यांकन करते हैं। अजीब बात है कि एक पत्थर एक बार मंदिर जाने पर भगवान बन जाता है, परन्तु इंसान हजार बार मंदिर जाता है पर इंसान नहीं बन पाता है। अपने रिश्तों की बगिया में एक रिश्ता नीम के पौधे जैसा भी रखिए, जो सीख भले ही कड़वी देता है, पर तकलीफ में मरहम का काम करता है। *आधुनिक युग मिलावट का युग है। सब...
नमो भारत : भारत की आधुनिक और तेज़ रफ्तार परिवहन क्रांति
आलेख

नमो भारत : भारत की आधुनिक और तेज़ रफ्तार परिवहन क्रांति

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** भारत तेज़ी से आधुनिक परिवहन व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। इसी दिशा में दिल्ली-मेरठ रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) के अंतर्गत चल रही “नमो भारत” रैपिड रेल ने नया इतिहास रच दिया है। यह केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि भविष्य की स्मार्ट, सुरक्षित और तेज़ यातायात व्यवस्था का प्रतीक बन चुकी है। इसकी गति और आधुनिक सुविधाओं ने पारंपरिक मेट्रो प्रणालियों के कई रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिए हैं। “नमो भारत” भारत की पहली क्षेत्रीय त्वरित परिवहन प्रणाली (RRTS) है, जिसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम (NCRTC) द्वारा विकसित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य दिल्ली, गाज़ियाबाद और मेरठ जैसे शहरों के बीच तेज़, आरामदायक और समयबद्ध यात्रा उपलब्ध कराना है। मेरठ से दिल्ली की मेरी हाल की यात्रा इस बार कुछ अलग और यादगार रही। वर्षों से सड़क के लंबे जाम, धूल, धक्का-म...
वो आ रहे हैं देखने के लिए
व्यंग्य

वो आ रहे हैं देखने के लिए

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “सुनो, आज शाम चार बजे दूसरी पार्टी आ रही है… देखने के लिए।” “अच्छा...! फिर वही घबराहट शुरू हो गई। कहीं ये भी पहली पार्टियों की तरह...! देखो, ऑफिस से किसी को भेज दो, उन्हें रास्ते से ही ले आए। कहीं लोकेशन पूछते-पूछते पड़ोसियों के चंगुल में न फँस जाएँ। मुझे डर है कि वहाँ पहुँचकर कहीं आसपास पड़ोस से पूछताछ न कर लें, पहले की तरह... उन्हें बहका न दे... पड़ोसी बदनाम करने में सबसे आगे रहते हैं... पहले भी न जाने कितनी पार्टियों को बहकाया है।” बात सही थी। कई पार्टियाँ पहले भी आईं। चाय पी, नाश्ता किया, मुस्कराईं, कागज़ देखे और जाते-जाते कह गईं, “मीडिएटर को बता देंगे।” मीडिएटर ने भी जाते-जाते ऐसा आश्वासन दिया, जैसे बारात बस दरवाज़े पर ही खड़ी है। पर चार दिन बीत गए, न हाँ आई, न ना। अब आदमी इंतज़ार...
किताब कब खींचेंगी तुम्हें…?
कविता

किताब कब खींचेंगी तुम्हें…?

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** किताब होती ही है पाठक वर्ग को खींचने वाले, होता है इनका नशा चाहे खा रहे हों निवाले, ये किताबों की ही ताकत थीं जो अपना मस्तिष्क गिरवी रख चलते रहे कुछ अति चालक लोगों के बताए हुए ऊल-जलूल राहों पर, पकड़ नहीं बन पा रही समान दिखते बाहों पर, खैर ज्ञान की ललक वालों को किताबें खींचती रहती है विद्यालय, मदरसे, कॉलेज की ओर, पढ़ते ही नहीं लगाना पड़ता अतिरिक्त जोर, ले जाता है ज्ञान विज्ञान की धरा पर, सच और झूठ समझने करता है असर, मगर अंधभक्ति में डूबे वंचित लोग, जातियता में फंसे बहुजन लोग, दिखावे में डूबे सर्वजन लोग, आस्था में डूबी दुनिया की शिक्षित आधी आबादी, कब सोचोगे धन व समय की बर्बादी, सभी धर्मों के सार को पकड़ो, मानवता और मेलमिलाप की तार में ज़कड़ो, पुस्तकों के चुंबकत्व में खींचे जाओ, नश...
गहरे बन जाते रिश्ते
कविता

गहरे बन जाते रिश्ते

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** रिश्ते अपने हैं या पराये पर ये रिश्ते ही रिश्ते की सशक्त डोर बनकर सच्चे गहरे रिश्ते बन जाते है। कब कहाँ कैसे किस मौड़पर कौन अपना बन जाये बस मिलकर रिश्ते बन जाते है न जाने यह किस अदृश्य चमत्कारी शक्ति का परिणाम रिश्ते की सशक्त सच्ची डोर सख्त बनाते है ये रिश्ते ही अपनों से अपनों के टूटकर बिछुड़कर दरकिनार हो जाते हैं, खून के रिश्ते अपने बनकर भी अपने से अपनापन के सगे रक्त के रिश्ते रहकर भी अपनापन का अहसास भाव अक्सर निभा नहीं पाते हैं। किसी अनजान गली मोहल्लों में किसी गांव से शहर में किसी महफ़िल, सभाओं, यात्रा में, किसी भी अनजान जगहों में खून के गहरे संबंध से गहरे रिश्ते बेजोड़ बबनाकर क्या खूब लोग बखूबी रिश्ते की परिभाषा निभाते रिश्ते का सच्चा अर्थ बताते हैं। रिश्ते में सच्चाई स्नेह प्रेम ममत्...
अमराई की छाँव
मुक्तक

अमराई की छाँव

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** अमराई की छाँव सुहाती, मृदु अहसास कराती। शीतलता देकर के हमको, भावों में ले जाती। तपन भले ही पीड़ादायक, पर अमराई भाये, मोहक छाँव मनुज के तन को, राहत से सहलाती।। अमराई की छाँव स्वर्ग-सी, सपनों में ले जाती। मधुर हवा तो गीत सुनाकर, सबको है दुलराती। मौसम को खुशहाल बनाती, मस्ती को है देती, बहुत सुहानी होती छैयाँ, मंगल भाव सजाती।। अमराई की छाँव खोजकर, सीखो समय बिताना। खुशियों से दामन को भरकर, उत्फुल्लित हो जाना। अमराई की बात निराली, आकर्षण यौवन पर, हरियाली से नेह लगाकर, उसके ही हो जाना।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य श...
उँगलियाँ
कविता

उँगलियाँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** बोझिल मन विचारों से द्वंद कर रहा था इसी उधेड बुन में अचानक उँगलियाँ छील ली हमने !! पुरानी यादों को रफू करने की उम्मीद जागी थी, रिश्तों की ऊधडती सियन को सिलने की तमन्ना हुई थी, कुछ स्मृतियों के बटन टांकने थे, स्वयं को इनमे भुलाकर अंगुलियां छील ली हमने!! काश हम भी खुशनुमा पट्टियों को इन घावों पर बाँध पाते, दौड़ते-भागते ज़ख्मों को सूकून की छाँव में सुला पाते, पल-पल रंग बदलते सम्बन्धों की तरह खुद को बदल पाते, इन्हीं नादानियों में अंगुलियाँ चोटिल कर ली हमने ! छिली उंगलियों का दर्द सवाल कर रहा था, रोज-रोज क्यूँ जख्मी होती हैं हम ऐसे, क्यों नहीं डरा पाते दर्द को किसी मासूम परिंदे की तरह, क्यूँ नही रंग भर पाते बेरंग जीवन मे इन्द्रधनुषी रंगों की तरह? तभी हल्की सी आहट से ...
प्यास का रेगिस्तान
कविता

प्यास का रेगिस्तान

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** नलों में पानी नहीं, धूप का कोई सानी नहीं। गंदा ही पानी सही, मगर पीने को पानी नहीं। झुलस रही है धरती सारी, जैसे तपती कोई भट्टी हो, कंठ सूखकर काँटा हुआ, चाहे गूँजती कोई पुकार खट्टी हो। बूंद-बूंद को तरसती आँखें, बादल अब मिलते नहीं, पत्थर दिल है ये मौसम भी, ज़ख्म यहाँ अब सिलते नहीं। सूख गए हैं ताल-तलैया, सूख गई है मन की आशा, घड़े पड़े हैं औंधे मुँह, मौन खड़ी है सबकी प्यासा। अमृत सा वो शीतल जल, अब केवल इक कहानी है, मृगतृष्णा की राहों में, बस यादों का ही पानी है। नलों में पानी नहीं, धूप का कोई सानी नहीं। गंदा ही पानी सही, मगर पीने को पानी नहीं। परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "नोहरी" पिताजी का नाम : श्री भानीराम सिहाग माताजी का नाम : कांता देवी अर्धांगिनी का ...
अनुभुति
कविता

अनुभुति

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कष्ट साध्य कष्ट सीमा कष्ट जीवन का मन्थन् कष्ट कुण्ठा कष्ट तृष्णा कष्ट जीवन का चन्दन। कष्ट फुहार दुख बरखा की कष्ट जीवन की हैं संगिनी कष्ट कन्दराओ का घुप्प अंधेरा कष्ट जीवन का कहर बवन्डर। कष्ट अगवानी करता सुख की कष्ट जीवन का हैं सम्बल कष्ट कमल किचड़ में खिलता कष्ट जीवन की सागर लहर कष्ट के निर्वाण में सुख की अनुभूति है परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्र...
सशक्त लेखनी
कविता

सशक्त लेखनी

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** लेखनी जब सत्य की अग्नि में तपकर निकलती है, तो सोई हुई चेतना भी जागकर संभलती है। शब्दों की शक्ति तलवार से भारी होती है, सशक्त लेखनी ही समाज की प्रहरी होती है। कलम जब अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाती है, हर मौन आत्मा में नई हिम्मत जगाती है। लेखनी केवल अक्षरों का श्रृंगार नहीं होती, यह मानवता की राह दिखाने वाली ज्योति होती। जिसके शब्दों में संवेदना और सम्मान होता है, उसकी लेखनी से ही राष्ट्र का उत्थान होता है। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन का कार्य शुरू किया। धर्म...
जय महाकाल
स्तुति

जय महाकाल

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** विकराल काल, त्रिनेत्र विशाल, नरमुंड माल, गले सर्पों का हार, हे दिगंबर वेष, अंग भस्म का लेप, शिव जटाजुट, उद्विग्न गंग, कर्पूर अंग, बिच्छू है कर्ण, शीश अर्धचंद्र, डमरू की धुन। शिव हे नटराज, भंयकर तांडव, भस्म रमैया शमशान में वासन, भक्तन प्रतिपालक, तारक संहारक, ऐसे हैं ब्रह्माण्ड के नायक, जय महाकाल, जय महाकाल, जय महाकाल, जय महाकाल। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्राष्ट्रीय समान २०२४" से सम्म...
श्रद्धा
लघुकथा

श्रद्धा

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** यह कोई कहानी नहीं, सत्य घटना है। मेरे जीवन में ऐसी कई घटनाएं हुई जो हृदय को छू गई। कुछ सिखा दिया, कुछ अच्छा करवा दिया, ईश्वर कृपा रही है। नवरात्रि की नवमी तिथि थी। मैं उस स्थान पर कुछ समय पहले ही रहने आई थी। मेरी एक परिचित को मैंने कहा कि कन्या भोजन के लिए तुम कन्याओं को बुला लाओ। उन्हीं कन्याओं में तीन बहनें थीं, उनकी मां उन्हें लेकर आई। मैंने कहा आप भी भोजन कर लें, वह बोली नहीं मां को हलवा का भोग लगाकर ही हमेशा पूजन करने के बाद व्रत खोलती हूं। यह कहते-कहते उसकी आंखें भर आईं, मैंने पूछा तो आपने अभी तक भोग क्यूं नहीं लगाया, वह जो बोली उसे सुनकर मैंने अपने आपको मुश्किल से आंसू बहने से रोका था। उसने कहा कि मेरे पति का एक्सीडेंट हो गया है। कमाई का साधन नहीं है। मेरे पास टंकी है, स्टोव है, पर पैसा नहीं कि मैं तेल लगाकर य...
जनगणना- प्रथम चरण
कविता

जनगणना- प्रथम चरण

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जनगणना प्रगणकों की सूची जारी, प्रशिक्षण की मजबूत तैयारी, प्रशिक्षकों ने बताया कि कार्य में पूरी तरह जान डालना है, एक-एक तथ्य खोज निकालना है, न रह जाए कोई कमी, आबंटित हुआ है आपका क्षेत्र आपकी जमीं, घर-घर हर घर जाना है, मुखिया से शालीनता से बतियाना है, पूछना है निर्धारित चौंतीस सवाल, आंखों देखी का रखना है खयाल, कमरे कितने गर एक भवन, मुखिया को करना है उत्तर का चयन, है आवासीय भवन या ग़ैर आवासीय, है उस घर में कितने निवासी, मालिक है या फिर किरायेदार, रहते हैं कितने परिवार, भोजन पकने का क्या है आधार, बिजली ढिबरी क्या प्रकाशित करता यार, शौचालय लिखना भूल न जाना, दीवाल देख कर है बतलाना, साइकिल, बाइक या फिर है कार, होगा तो न लिखना निराधार, पानी पीने का जो स्रोत बताए, एचएलओ एप अंकित कर जाए, अंत में मो...
हल्दीघाटी- अमर स्वाभिमान
आलेख

हल्दीघाटी- अमर स्वाभिमान

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** १८ जून भारतीय इतिहास की वह अमर तिथि है,जो केवल एक युद्ध का स्मरण नहीं कराती बल्कि त्याग, स्वाभिमान, साहस और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण की गाथा सुनाती है। यह वह दिन है जब मेवाड़ की धरती पर एक ऐसा संघर्ष हुआ, जिसने इतिहास के पन्नों में वीरता की अमिट छाप छोड़ दी। वर्ष १५७६ में "हल्दी घाटी" के रूप में लड़ा गया यह युद्ध केवल तलवारों की टकराहट नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता और अधीनता, स्वाभिमान और सत्ता के बीच का निर्णायक संघर्ष था। 'राजस्थान की अरावली पर्वतमालाओं के बीच स्थित हल्दीघाटी' आज भी उस ऐतिहासिक दिन की मौन साक्षी है। इसकी पीली मिट्टी मानो आज भी उन वीरों के रक्त से रंजित गौरवपूर्ण स्मृतियों को अपने भीतर संजोए हुए है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का मूल्य समझा...