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आप भी चखकर देखो स्वाद

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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संविधान के होते हुए भी
क्या क्या नहीं कर जाते हैं आप,
अपनी उसी सड़ी गली
मानसिकता का
यदा कदा दिखा जाते हो छाप,
विदेशों में आपके
हरकतों का कर दे इस्तेमाल
तो तुरंत नस्लवाद का
राग अलापते हो,
वही सब कुछ रोज
आग बना तापते हो,
क्या कभी चखा है
आपने स्वाद
मानव के गंदे पेशाब का,
कभी नहीं निकालते
दो शब्द पश्चाताप का,
उत्तर से लेकर दक्षिण तक,
पूरब से लेकर पश्चिम तक,
वही गंदी हरकत
रोज कही न कहीं,
अपने इस आतंकवाद
से क्यों थकते नहीं,
जाति की अकड़ दिखाने
किसी को भी पीट जाते हो,
जूतों में पेशाब भर
पीड़ितों को पिलाते हो,
मानाकि जानवरों के
पेशाब आराम से पी लेते हो,
तो आओ कभी पीड़ित बन
देख लो चखकर
मानव मूत्र का स्वाद,
तब कहना यदि
बदल न जाये आपका अंदाज,
ऐसा न हो कि वही सब हरकत
आपकी नस्लों को
झेलना पड़ जाये,
वही सब कारगुजारी
कोई आप पर दोहराये।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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