
डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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आज तड़के ही पड़ोसी शर्मा जी आ धमके। हाथ में मेरा वही अख़बार था, जिसे वे रोज़ की तरह “पढ़ने के लिए उधार” ले गए थे और पढ़कर अब “ज्ञान बाँटने” लौटाए थे। अख़बार के भीतर से एक पम्पलेट भी झाँक रहा था, मानो वह स्वयं शर्मिंदा हो कि अख़बार के साथ ग़लती से लौट आया है। हमारे शर्मा जी पड़ोसी धर्म का पूरा निर्वाह करते हैं, अख़बार मेरा, पढ़ते वे; चाय मेरी, पीते वे; और अखवार की ख़बरें ऐसी सुनाते हैं जैसे स्वयं
रिपोर्टर हों।
आज चाय की पहली चुस्की के साथ उन्होंने पम्पलेट मेरी ओर बढ़ाया, “आप तो वैसे भी अख़बार नहीं पढ़ते, कम से कम पम्पलेट ही देख लिया करो। शहर में बड़ा ज़रूरी कार्यक्रम होने जा रहा है।”
मैंने सहज अनुमान लगाया,
“कोई नया शो-रूम, चमत्कारी वैद्य, असफल प्रेम को सफल करने का कोर्स, या फिर किसी डॉक्टर की ‘हर रविवार उपलब्ध’ वाली सूचना, यही सब कुछ होगा और क्या?”
शर्मा जी के चेहरे पर उपेक्षा का भाव उभरा,
“नहीं-नहीं गर्ग साहब! यह तो बिल्कुल अलग स्तर की चीज़ है। शहर में प्रसिद्ध चिंतामणि बाबा द्वारा चिंता शिविर लगाया जा रहा है।”
मैं चौंका।
“चिंता… शिविर?” पम्पलेट को ध्यान से देखा। मोटे अक्षरों में कैप्शन चमक रहा था,
‘चिंता दिखाओ, लाइमलाइट पाओ।’
अब तक चिंतन शिविर सुने थे, ध्यान शिविर देखे थे, पर यह नई खोज थी। शर्मा जी पूरे आत्मविश्वास से बोले, “आज के ज़माने में चिंता करना बहुत ज़रूरी है। चिंता नहीं करोगे तो लोग तुम्हें गैर-जिम्मेदार समझेंगे। देखो न, सरकारें देश चिंता से चलाती हैं, चैनल चिंता से टीआरपी बढ़ाते हैं और नेता चिंता से चुनाव जीतते हैं। चिंता अब कला है, इसे सीखना पड़ता है।” इसलिए चिंता शिविरों की ज़रूरत है। वहाँ सिखाया जाएगा, कितना मुँह लटकाना है, कब आह भरनी है,और किस कैमरे की तरफ़ देख कर चिंता जतानी है l
मैंने उन्हेंशिविर में नहीं जा पाने की मजबूरी के साथ विदा किया, तो शर्मा जी को एक और मौका मिल गया मेरी बदनसीबी पर चिंता करने को ल पर उनका छोड़ा हुआ विषय मुझे पकड़ कर बैठ गया। सच ही तो है, इस देश में काम भले न हो, चिंता की कोई कमी नहीं। हर गली-कूचे में चिंता बिखरी पड़ी है। संसद में चिंता है, सड़क पर चिंता है, स्टूडियो में तो चौबीसों घंटे चिंता लाइव चलती रहती है। कहीं पुल गिरा, चिंता। सरकार गिरी, महाचिंता। रुपया गिरा, राष्ट्रीय चिंता।
बस आम आदमी को देश की चिंता नहीं होती। उसे तो बस एक ही चिंता होती है, आज शाम चूल्हा जलेगा या नहीं। लेकिन उसकी चिंता को ‘चिंता’ नहीं माना जाता, क्योंकि उसके लीड रोल को सपोर्ट देने के लिए न भाषण है, न बैनर है , न कैमरा है। इसलिए चिंता का ठेका बड़े-बड़े लोगों ने ले रखा है। मेरा एक मित्र सरकारी दफ्तर में बाबू है, अत्यंत चिंताशील। उसका सिद्धांत साफ़ है, काम मत करो, बस काम की चिंता करो। सुबह बॉस के सामने ऐसा चिंतित चेहरा लेकर बैठता है कि बॉस खुद हल्का महसूस करने लगता है। धीरे-धीरे बॉस की निजी चिंताएँ भी उसी के हवाले हो जाती हैं। बॉस निश्चिंत भय, बाबू प्रमोटेड भय, चिंता के बल पर सब कुछ संभव हुआ। नेताओं की चिंता तो अलग ही स्तर की होती है। उनके चेहरे पर स्थायी करुणा चिपकी रहती है। आँखों में देश, दिल में चुनाव और भाषण में जनता। उनके आँसू इतने प्रैक्टिस्ड होते हैं कि गिरते भी कैमरे के एंगल देख कर ही। कहते हैं, “चिंता चिता समान होती है।” बिल्कुल सही, चिंता नेता करते हैं, चिता जनता की जलती है। शर्मा जी भी चिंता-साधना में निपुण होते जा रहे हैं। उनके चेहरे पर चिंता ऐसा स्थायी भाव बन चुकी है कि घर में घुसते ही पत्नी पानी का गिलास ले आती है। एक बार गलती से वे मुस्कराते हुए घर आ गए। बस, वही दिन और आज का दिन, उसके बाद उन्होंने कसम खा ली कि खुशी के साथ घर में कदम नहीं रखेंगे। अब वे चिंता को धारण करने का विशेष प्रशिक्षण ले रहे हैं। लगता है, रिटायरमेंट के बाद राजनीति में आने की पूरी तैयारी है।
आज चिंता भी एक उद्योग बन चुकी है। मंचों पर फूल-मालाओं से लदे चिंता-ठेकेदार जब बोलते हैं, तो जनता भावुक हो जाती है। बुद्धिजीवी समाज की चिंता तो करते हैं, लेकिन उस से भे ज्यादा अपने ट्वीट के लाइक्स की गिनती की करते हैं । धर्मगुरु पापों की चिंता करते हैं, पर भक्तों की गिनती पर नज़र रखते हैं। खैर इस रचना को पढ़कर आप भे चिंता में पड़ गए तो मेरा लिखना सार्थक हुआ l
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन) किताबगंज प्रकाशन, गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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