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मेरी माँ ने ही मुझे कविता-प्रेम दिया

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
मंडला, (मध्य प्रदेश)
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मैं मध्यप्रदेश के गुना जिले (अब अशोकनगर) की चन्देरी तहसील के गाँव प्राणपुर का रहने वाला हूँ। छोटा-सा गाँव है। तब तो बहुत ही छोटा था।उन दिनों गाँव में भौतिक तरक्की तो बिल्कुल नहीं थी, पर प्रेम व अपनापन बहुत था। लोग बहुत ही हिल-मिलकर रहते थे।

मेरे पिताजी शासन की राजस्व सेवा में थे, और माताजी गृहिणी थीं। हालांकि माताजी मात्र आठवीं तक ही पढ़ी थीं, पर उनकी नोलेज ज़बरदस्त थी। रामायण, महाभारत, वेद-पुराणों सबका उन्हें गहरा ज्ञान था। मुझे वे पौराणिक गाथाएँ व प्रसंग सुनाती रहती थीँ। उन्हें भजन व कविताएं भी बहुत सारी याद थीं। माँ ख़ुद भी कविताओं को गढ़ लेती थीं, और तुक मिलाकर मुझे सुनाया करती थीं। जिससे मेरा सहज ही कविता के प्रति अनुराग हो गया। माँ के निर्देश पर मैं रोज़ाना शाम को रामायण भी पढ़ता था, जिससे मुझे धर्म के प्रति अनुराग हुआ। माँ मीरा बाई के भजनों को बख़ूबी गाया करती थीं, और गाते समय एकदम भावुक हो जाती थीं। वे मुझसे भी कविताओं का अभ्यास कराती थीं, और हर कक्षा की बाल भारती हिंदी की सारी कविताएं याद करा देती थीं, और सुनाने को कहती थीं।

इस कारण से मेरी कविताओं के प्रति सहज अनुरक्ति हो गई। पाठशाला में हर शनिवार को होने वाली बालसभा में मैं रुचि लेकर कविताएँ-भजन सुनाया करता था। माताजी कविताओं की प्रस्तुति का अभ्यास भी कराती रहती थीं। धीरे-धीरे मैं काव्य पाठ में न केवल निपुण हो गया, बल्कि ख़ुद भी कविता रचने की कोशिश करने लगा। पहले कविताओं में कच्चापन दिखता था, बाद मे कविताएँ परिपूर्णता के साथ लिखी/रची जाने लगीं। माँ वर्तनी को शुद्ध ढंग से लिखना भी सिखाती थीं, और हर शब्द का भाव भी समझाती थीं। इस कारण से कविताओं पर मेरी पकड़ अच्छी हो गई। तबसे कविताएँ रचने का जो सिलसिला शुरु हुआ वह माँ के आशीर्वाद से आज भी चल रहा है। साहित्य में मैं आज जो कुछ भी हूँ उसका श्रेय माँ को ही जाता है। कविता लिखना मुझे मेरी माँ ने ही सिखाया है।

परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
जन्म : २५-०९-१९६१
निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश)
शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास)
सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय
प्रकाशित रचनाएं व गतिविधियां : पांच हज़ार से अधिक फुचकर रचनाएं प्रकाशित
प्रसारण : रेडियो, भोपाल दूरदर्शन, ज़ी-स्माइल, ज़ी टी.वी., स्टार टी.वी., ई.टी.वी., सब-टी.वी., साधना चैनल से प्रसारण।
संपादन : ९ कृतियों व ८ पत्रिकाओं/विशेषांकों का सम्पादन। एम.ए.इतिहास की पुस्तकों का लेखन
सम्मान/अलंकरण/ प्रशस्ति पत्र : देश के लगभग सभी राज्यों में ७०० से अधिक सारस्वत सम्मान/ अवार्ड/ अभिनंदन। म.प्र.साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी अवार्ड (५१०००/ रु.)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।


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