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राधा और द्वारिकाधीश संवाद

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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एक दिन साथ विचरण करते
राधा ने कृष्ण से पूछा,
कैसे हो द्वारकाधीश
कृष्ण आहत हुए
सोचने लगे ” राधा तो
कान्हा कह कर पुकारती हैं
फिर ये द्वारिकाधीश
संबोधन क्यों.
स्वयं को सम्भालते कृष्ण बोले
आओ कुछ पल साथ बैठते हैं!
कुछ मैं अपनी कहूँगा
कुछ तुम अपनी सुनाना
एक दूसरे के सुख दुःख बांटते हैं।

कृष्ण बोले जब-जब
तुम्हारी याद आइ
आँखों से अश्रु बहते थे
जीवन सूना सा था तुम्हारे बिन।
राधा मुस्काई-
तुम तो मेरे नैनो में बसे हो,
मैं तो तुम्हें भूली ही कहां
जो अश्रु बन बह जाने देती
इन नैनो से तुमको।

कृष्ण ने पूछा-
हम तो सदैव से
तुम्हारे कान्हा रहे हैं
ये द्वारिकाधीश का
संबोधन क्यूँ?

राधा पुनः मुस्कराई बोली-
जब तुम प्रेम से बंधे थे
तो कान्हा थे, तुम्हारे हाथों में
मधुर संगीत वाली
बाँसुरी सुशोभित थी,
सारा संसार
उस धुन से मोहित था .
तुम द्वारिकाधीश बने,
प्रेम बिसर गया
इन्हीं हाथों ने
सुदर्शन चक्र उठा लिया,
संहार के लिए।
तुम्हारी एक ऊंगली ने
प्रेम में ही पर्वत उठाया,
जीव-जन के संरक्षण के लिए।

तुम प्रेम से ओतप्रोत
कान्हा होते तो,
सुदामा के पास तुम स्वयं जाते
सुदामा तुम्हारे पास ना आते।
यदि तुम प्रेम से भरे
कान्हा होते तो तुम्हें,
यमुना का मीठा जल
बिसरा कर समुद्र का
खारा पानी रास नहीं आता।

प्रेम को भूल गए,
युद्ध में लीन हो गए
जिसके तुम सारथी बने
उसको प्रेम की जगह
युद्ध सिखाया,
वो संहार करता रहा
और तुम देखते रहे।

तुम अब कान्हा नहीं रहे,
द्वारिकाधीश बन गए हो
संसार
गीता ज्ञान को अपनाता है,
अपने जीवन मे उसका
मनन-चिंतन करता है,
किन्तु कोई युद्ध वाले
द्वारिकाधीश को नहीं भजता,
ब्रम्हांड कान्हा का दीवाना है।
गीता में मेरा नाम कहीं नहीं आता,
किन्तु जन-मानस निरन्तर
उसे भजता है और अंत मे
राधे-राधे ही बोलता है।।

परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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