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कविता

कभी छोटी थी मैं
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कभी छोटी थी मैं

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** जब छोटी सी हुआ करती थी मैं बहुत ज्यादा बाते किया करती थी पूरा घर सर पर उठाए रहती थी थोड़ा बड़ी हुई, सबने कहा थोड़ा कम बोला करो नासमझ थी समझ नहीं पाती थी कि, पहले तो मेरे बोलते रहने से सभी खुश हुआ करते थे अभी कह्ते है, कम बोला करो थोड़ा और बड़ी हुई, घर बदला लोग बदले बोलना अपने आप कम हो गया फिर भी डांट मिली मैं और भी चुप हो गई ना बोलने को लोगों ने बेवकूफ और मंद बुद्धि की उपमा मिली कभी कुछ बोलना चाहा तो जवाब मिला तुम जानती ही क्या हो तुम चुप रहो, बच्चे आए, बड़े हुए मैंने फिर बोलना शुरू किया किन्तु फिर से चुप करा दिया गया तुम चुप रहो, बुढ़ी हो गई हो कुछ याद नहीं रहता तुमको अब तुम आराम करो ! चुप रहते रहते आत्मा में कहीं सब कुछ दबा दबा सा रह गया है अब तो जाने का वक्त आ रहा है कुछ बोलूँ इसक...
पता है …
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पता है …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* मन में कई बार कितना गुबार भरा होता है शब्दों का मगर होंठ ऐसे जमे होते हैं मानो सिल गए हों। आंखे इतनी बोझिल होती हैं आंसुओं के बोझ से कि सब धुंधला धुंधला सा नज़र आने लगता है लेकिन फिर भी एक बूंद भी मजाल क्या जो आंखों से कतरा बनकर बह जाए। कितनी कठोरता होती है उस तकलीफ में जिसे बस मौन रहकर सह लिया जाता है जिसमें मन को चीखें बस मन के अंदर ही किसी कोने में दबकर रह जाती हैं। जीवन में पीड़ाओं का होना आम बात है किंतु कुछ पीड़ाएं गहरे घाव के साथ हृदय को असहाय बना देती हैं कहते हैं कि व्यक्त करने से पीड़ा का बोझ कम हो जाता है मगर कुछ पीड़ाएं है जो बार बार दोहराने से हृदय को छलनी करती हैं आत्मा पर एक नया बोझ बन जाती हैं। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : ...
मोदी जी के जन्मदिवस पर
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मोदी जी के जन्मदिवस पर

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** जिस मां ने ये लाल जना है, उन चरणों में नमन हमारा। ऐसा पालन किया पूत का, उसने सबकुछ राष्ट्र पे वारा। जिस मां ने... घर छोड़ा, परिवार भी छोड़ा, एक झोला ले निकल पड़ा वो। मानव सेवा ध्येय था उसका, उस पर ही बस अडिग रहा वो। ईश्वर रीझ गया सेवा से, प्रतिपल उसको दिया सहारा। जिस मां ने... आज *लाल* का जन्मदिवस है, सब मिल प्रभु से अरज लगाए। उसके सब संकल्प सफल हों, सभी विरोधी मुंह की खाएं। सबका साथ विकास सभी का, उसका है बस एक ही नारा। जिस मां ने... भारत विश्व गुरु बन जाए, ये बस *मोदी* कर सकता है। जो निष्काम भाव सेवक हो, उसके आगे जग झुकता है। *हीरा* मां तेरा सपूत है, नभमंडल में ध्रुव सा तारा। जिस मां ने... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मे...
हिंदी से मेरी बातचीत
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हिंदी से मेरी बातचीत

चित्रलेखा व्यास कानोड़, उदयपुर (राजस्थान) ******************** मैंने पूछा- “हिंदी! कहो, क्या तुम्हें कभी राष्ट्रभाषा कहा जाएगा?” वह मुस्कुराई- “नहीं, अभी तो मेरे हिस्से में बस प्रतीक्षा का वनवास है।” मैंने फिर पूछा- “फिर तुम्हारा भविष्य क्या है, कहाँ तक जाएगी तुम?” बोली- “जहाँ तक अपनी मिट्टी की गंध को संजोए मनुष्य जाएगा, मैं भी वहीं रहूँगी।” संस्कृत की गोद से निकली, प्राकृत की गलियों में पली, अपभ्रंश की देहरी लाँघकर, जन-जन की वाणी बनी, कबीर की साखी और तुलसी के मानस में ढलकर। पर सत्ता के गलियारों में पराई चमक ने जब अपना सिंहासन सजाया, तब अपने ही घर में मुझे कभी-कभी मौन, उपेक्षित और विस्मृत पाया। मैंने पूछा- “हिंदी, तुम बीच राह में कहाँ गुम हो गई थीं?” वह बोली- “गुम नहीं हुई थी, तुम्हारी ज़ुबानों पर चुपचाप जीवित थी।” “तुमने मुझे बाज़ार में छोड़ा...
चुनावी मौसम
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चुनावी मौसम

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** चुनाव आया, मौसम बदला, नेता जी का चेहरा चमका। कल तक जनता याद न थी, आज हर घर में रिश्ता पक्का। हाथ जोड़कर नेता बोले “आप ही मेरे माई-बाप!” पाँच साल तक फोन न उठाया, अब रोज़ पूछें—“कैसे हैं आप?” घोषणाओं की ऐसी बारिश, बादल भी शरमा जाएँ, हर गली में पुल बन जाएँगे, बस नदियाँ खोजी जाएँ। बेरोज़गार को नौकरी देंगे, किसान की किस्मत बदलेंगे, महँगाई को दूर भगाकर सपनों में भी दाम घटेंगे। भाषण में बिजली चौबीस घंटे, सड़कें होंगी चकाचक, नेता जी के भाषण सुनकर जनता बोले“वाह! क्या पटकथा!” पोस्टर में मुस्कान बड़ी है, वादों का आकार निराला, वोट पड़ते ही जनता ढूँढे “अरे, नेता जी कहाँ गए भला?” फिर पाँच बरस बाद अचानक फिर से दर्शन हो जाते हैं, जो कल तक थे “जनसेवक”, आज फिर “सेवक” हो जाते हैं। ...
हिंदी का गुरुत्व सम्मान
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हिंदी का गुरुत्व सम्मान

डॉ. विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** हिंदी पर अभिमान हमको हिंदी शान में गोष्ठी कर लेना। मगर हिंदी दिवस मनाने जरूरी पहल अनूठी कर लेना। रस्साकसी के खेल जैसे राज्य भाषा हिंदी फसी पड़ी है। संस्कारित संस्कृत से उदित हिंदी भाषा महिमा बड़ी है। तुलसी भारतेंदु रचित संसार में हिंदी कोहिनूर जड़ी है। राष्ट्र आन बान शान जन गण मन वंदे मातरम गा लेना। हिंदी पर अभिमान हमको हिंदी शान में गोष्ठी कर लेना। मगर हिंदी दिवस मनाने जरूरी पहल अनूठी कर लेना। कुरीति दोहन शोषण की रचनाएं सर चढ़कर जो बोली। साहित्य कला कौशल से अन्याय जगत की डगर डोली। देश प्रेम के गीतों नारों ने गुलामी पटकथा गठान खोली। नवोदित सृजन लेखन में हिंदी संकल्प शक्ति जड़ लेना। हिंदी पर अभिमान हमको हिंदी शान में गोष्ठी कर लेना। मगर हिंदी दिवस मनाने जरूरी पहल अनूठी कर लेना। हिंदी दिवस शुद्ध हिंदी प्रेम ...
क्या डर …?
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क्या डर …?

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** बरसात का मुझे क्या डर? जब नहीं है मेरा अपना घर जब हूं मैं सड़क पर जब हूं मैं फुटपाथ पर तो मुझे क्या डर है लुट जाने का? जब नहीं है छत मेरे ऊपर तो छत टूट जाने का क्या डर? कैसा डर? क्यों डर? परिचय :-  सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' निवासी : गुदरी सिंह के टोला, पांडे पुर, बैरिया, बलिया, (उत्तरप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को खोलकर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद...
श्रीगणेश
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श्रीगणेश

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा फतेहाबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) ******************** जय-जय श्रीगणेश मूषक वाहन, गजमुख दर्शन शुभ-सुख। रिद्धि -सिद्धि दाता लड्डू भोग लगाता।। जय-जय श्रीगणेश सर्व विघ्नहर्ता शुभ मंगल कर्ता। शिवसुत बुद्धिदाता प्रथमपूज्य वर दाता।। जय-जय श्रीगणेश गणनायक देवा स्वीकार करो सेवा। मां पार्वती के प्यारे सबके राजदुलारे।। जय-जय श्रीगणेश तुम्हीं सर्व सहारा लगा जय-जयकारा। प्रभु छवि उजियारी शुभ मंगलकारी।। परिचय :- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा निवासी : फतेहाबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को खोलकर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कव...
उम्र का तकाज़ा
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उम्र का तकाज़ा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सफेद बालों को देखकर अपनी पत्नी से कह दिया कि अब तो तुम बूढ़ी हो रही हो, अपने आज में खो रही हो, उसने तपाक से कहा, बुढ़ापे की निशानी तुम पर भी बहुत भारी है, बताओ क्या करने की तैयारी है? मैंने हँसकर फिर धीमे से कहा, चाह रहा हूँ बच्चे बड़े हो जाएं, अपने पैरों पर खड़े हो जाएं, पर ये बड़े होना क्यों नहीं चाह रहे? समुद्र से भी गहरे जीवन को क्यों नहीं थाह रहे? बचपन की उस मासूम छांव में न जाने क्या ढूंढ रहे हैं, कागज़ की कश्तियों से अपनी खुशियों को मूंद रहे हैं, ज़िम्मेदारी के इस लंबे सफ़र से शायद ये थोड़े अनजान हैं, तभी तो खिलौनों की दुनिया में इनके बसते अभी प्राण हैं, चलो, वक़्त को अपनी रफ़्तार चलने दें, इनकी नादानियों को कुछ दिन और पलने दें, जब वक़्त का थपेड़ा आएगा, यह समंदर इन्हें खुद तैरना...
प्रधान सेवक मोदीजी
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प्रधान सेवक मोदीजी

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** जिनको सब याद करें, जिनको सब प्यार करे, ऐसे यशस्वी मोदीजी को हर कोई लाइक करे। "क्यों ना" लाइक करे दुनिया? दुनिया मै प्यार लुटाया है, शांति के मसीहा, क्राँति के विपक्ष धार, हे सबको जोड़ सबको परख कर हाथ बढ़ाया दोस्ती का। भारत को सोने की चिड़ियाँ कर दी ऐसे सपूत अपनी मैया का। कह कर नही करके दिखलाया कायाकल्प बदल दी भारत की ऐसे निडर बहादुर यशस्वी प्रधानमंत्री जी को लाखों बार बधाई। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्...
बदलते युग में भारत भूमि की पुकार
कविता

बदलते युग में भारत भूमि की पुकार

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मैंने वो देखा है, जो शायद किसी ने नहीं देखा। युग बदलेगा, बदला भी है, सुन रही हूं। पर मैंने तो इंसान बदलते देखा है। पैबंद लगे थे मेरे जंफर में, और पेट मेरा, पकवानों से भरा था। हर कोई शामिल था, मेरी दावत में, पर अंदर सभी के जहर भरा था। मिठास भर सकूंगी, पकवानों से, और जहर के लिए जगह ही नहीं होगी। भूल जाऊंगी मैं, पैबंध लगे जंफर को, और मेरे चारो ओर, खुशी की चुनरी होगी। पर बह गया सब आंसुओं में, मैंने जो देखा। युग तो युग, मैंने तो इंसान बदलते देखा। इंसान बदलते देखा। परिचय : आशा शर्मा पति : श्रीहनुमान प्रसाद शर्मा निवासी : धरमपुरी सांवेर रोड इंदौर (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : शिक्षिका हायरसैकैंडरी स्कूल साहित्यिक परिचय : कविता, भजन, लघुकथा, लेख, आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। शिक...
महादेवी वर्मा जी को श्रद्धांजलि
कविता

महादेवी वर्मा जी को श्रद्धांजलि

चेतना सिंह प्रकाश "चितेरी" प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** स्त्री होकर स्त्री को समझा, आँखों में आँसू जब छलका, निर्मोही बादल बनकर बरसा, आँगन की तुलसी को सींचा। साध्वी-सा जीवन जीकर, एक सीधी-सी रेखा खींची। स्मृतियाँ सदैव बनती रहीं, उर में दीपक सदा जलता रहा। मन-मस्तिष्क में चेतना का अंतर्द्वंद्व चलता रहा। प्रश्न पर प्रश्न पूछती रहीं, कौंधकर बिजली चमकती रही, स्त्री की अस्मिता को स्वर देती रहीं। “कितनी करुणा कितने संदेश, पथ में बिछ जाते बन पराग।” “बीन भी हूँ मैं तुम्हारी, रागिनी भी हूँ!” “मैं नीर भरी दुःख की बदली, परिचय इतना इतिहास यही।” जैसी प्रसिद्ध पंक्तियाँ हृदय में गूँजती रहीं। नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत में सजती रहीं। छायावाद की सुदृढ़ स्तंभ थीं, आधुनिक युग की मीरा, वीणापाणि की साधना में विरह-वेदना, करुण-भावना थी। दी...
गोसइनीन गियाँ के परछो
आंचलिक बोली, कविता

गोसइनीन गियाँ के परछो

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) मोर गोसइनीन गियाँ ह, आज मइके जाहूँ कहिथे। नइ भेजँव कहिथंव त, मुँह-कान ल फूलोए रहिथे।। ओहा का करथे कहिके, ओखर लेवत हवँव परछो। तीजा तिहार ल मनाए बर, ओला भेज दुहूँ परसो।। मुँह ल मुरेर-मुरेर के, थारी-लोटा मन ल पटकत हे। आभा-ताना मार-मार के, एती-ओती मटकत हे।। झगरा करत हे खुरखेद, बात के खोदी निकाल के। रोवत हवय कुरिया म, जिनिस मन ल पसार के।। बोलत नइहे मोर मेर, कलेचुप भात-साग ल रांधथे। गोबर-खरसी निकाल के, गाय-गरुवा मन ल बाँधथे।। लइका ल चेचकारत हे, तोर ददा के बाढ़े हे फाल। नइ जावव तुमन ममागाँव, घर म रइहव ए साल।। मोला खाए ल नइ देवत हे, हेर के मँय ह खाए हँव। चल झटकुन तियार हो कहिके, ओला मनाए हँव।। अतका कहेंव त, ओखर खुशी के नइहे ठिकाना। कहिथे- तोर सही जोड़ीदार हर जनम म हे पाना।। जोर डरिस लुगरा ...
गवां बैठे
कविता

गवां बैठे

प्रतिभा दुबे "आशी" ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** वो ज़माने हम गंवा बैठे, वो ख़ज़ाने हम गंवा बैठे आज कुछ नहीं जोड़ने को, सलीक़े पुराने हम गंवा बैठे।। महफ़िलें तो सजी हैं आज बहुत, पर वो हँसने के बहाने हम गंवा बैठे ईंट-पत्थर के मकां तो बना लिए, मिट्टी के वो घराने हम गंवा बैठे।। जिसे ढूँढती है आज ये दुनिया, वो सुकून-ए-दिल हम गंवा बैठे रफ़्तार तो मिल गई है ज़िंदगी को, ठहरने के वो ज़माने हम गंवा बैठे।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे "आशी" (स्वतंत्र लेखिका) निवासी : ग्वालियर (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को खोलकर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित ...
हिंदी हमारी है भाषा
कविता

हिंदी हमारी है भाषा

आशा जाकड़ 'आस' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** अरे! भारतवासी जागो विदेशी सभ्यता छोड़ो भारतीय संस्कार सीखो बड़ों का सम्मान सीखो भारत की संस्कृति पुरानी, हम हैं हिंदुस्तानी ... हम हिंदी प्रेम से सीखे यह जन-जन को जोड़ें जीवन में खुशहाली लाए हिन्दी कण-कणमें घोलें हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा हम हैं हिंदुस्तानी ... आओ हँस के करे नमस्ते अब हाथ मिलाना छोड़ें बड़ों के हम पैर छुएगे उनका आशीर्वाद लेवें यह संस्कार की है रवानी, हम हैं हिंदुस्तानी ... हमारा प्यारा भारत देश अनेक भाषा अनेक वेश भिन्न धर्म के फूल खिले पर मिलकर रहते हैं एक एकता ही है निशानी, हम हैं हिंदुस्तानी ... इंग्लिश-विंग्लिश छोड़ो हिंदी से नाता जोड़ो विदेशी सभ्यता छोड़ो भारतीय संस्कार सीखो संस्कार की अपनी कहानी, हम हैं हिंदुस्तानी ... हिंदी है हमारी भाषा संस्कारों की है भाषा प्रेम दया, म...
ज्ञानदीप का उजियारा
कविता

ज्ञानदीप का उजियारा

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** अज्ञान-तिमिर में डूबी धरा को, प्रज्ञा की ज्योति से अलख जगा दो। कण-कण में बसी चेतना, उसे सत्य-मंत्र से महका दो। जो भाव छुपा है हृदय-तल में, उसे प्रेम-सुधा से सजा दो। ईर्ष्या, घृणा, द्वेष की कालिख को, करुणा-नीर से धो, बहा दो। सौहार्द, एकता, बंधुत्व का, अमृत-घृत हर दीप में मिला दो। शब्दों में शक्ति भरें, हर वाणी को महामंत्र बना दो। सत्य जहाँ मौन पड़ा हो, वहाँ धर्म का शंख बजा दो। न कोई बैरी, न कोई पराया, सब में अपना रूप दिखा दो। अंधकार मिटाकर, हर हृदय में ज्ञान द्वीप का उजियारा कर दो। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को खोलकर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख क...
क्या पहाड़ बूढ़ा हो गया
कविता

क्या पहाड़ बूढ़ा हो गया

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जो कल तक था अडिग पहाड़, वो आज बोझ बन गया, बदले वक्त के इस दौर में, बाबा आदम की खोज बन गया, जिस कंधे पर बैठकर कभी तुम मेला देखा करते थे, आज वो कंधा कांप रहा, तो तुम दूर हटा करते थे, तुम्हारी एक हंसी की खातिर, वो सौ-सौ बार मरा होगा, फट गई थीं बिवाइयां पैर की, पर वो मीलों चला होगा, तुम्हें सूट और बूट पहनाकर, खुद फटे कुरते में जिया, स्वाभिमान बेचकर अपना, उसने तुम्हारी फीस का कर्ज दिया, वो धूप में जला,वो रातों को जागा, ताकि तुम्हारा कल संवर सके, तुम बड़े शहर के साहिब बनो, और दुनिया में तुम्हारा नाम चल सके, पर आज जब उसकी आंखों का पानी, थोड़ा सा धुंधलाया है, तुम्हें उसका कांपता हाथ और बूढ़ा चेहरा, पुराना सा साया नजर आया है, जिंदगी भर जो ढाल बना, हर मुश्किल को हंसकर झेला था, सोचो जरा उस बूढ़े दि...
है हिंदी हमारी पहचान
कविता

है हिंदी हमारी पहचान

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** है हिंदी हमारी शान है हिंदी हमारी पहचान हैं हिंदी में, दिनकर, मैथिली शरण और रसखान है हिंदी के पट्ट पर, पंत, प्रसाद, निराला का निशान है हिंदी के पट्ट पर, कबीर, तुलसी, महादेवी का निशान है हिंदी में सुभद्रा कुमारी चौहान हैं हिंदी में 'सहज' के मधुमय गान हिंदी से करेंगे हम नव निर्माण है हिंदी से हिंदुस्तान का सम्मान है हिंदी जन जन की भाषा है हिंदी हमारे मन की भाषा है हिंदी हमारे नील गगन की भाषा हैं हमारी सारी भाषाएं पल्लवित पुष्प, हजारों पुष्पों से बनी यह माला है है हिंदी हमारे भारत मां का मुकुट हिंदी ने हम सबको संभाला है है हिंदी हमारी विशाल समंदर समाती सारी नदियां इसके अंदर बोलूंगा हिंदी, लिखूंगा हिंदी सीखूंगा हिंदी,सिखाऊंगा हिंदी है हिंदी हमारे अंदर है हिंदी हमारी अवनी और अंबर।...
हिंदी
कविता

हिंदी

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा फतेहाबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) ******************** मां के आंचल सी पावन हिंदी आंगन में तुलसी सी महके हिंदी। गंगा की निर्मल धारा सी बहती हिंदी दादी मां की मीठी लोरी सी हिंदी। भारत भू के माथे पर सजी हिंदी जन-जन के हृदय में बसी हिंदी। मीरा के भजन सी मधुर हिंदी प्रेमचंद की कथा-व्यथा कहती हिंदी। आज हमारी अमिट पहचान बनी हिंदी आओ राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाएं हिंदी। लाल किले से दहाड़ती शेरनी सी हिंदी देश-दुनिया में परचम लहराती हिंदी। खेतों में खलिहानों में चहकती हिंदी नगरों में महानगरों में बुलंद होती हिंदी। कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्यारी हिंदी हैं हम बहुभाषी, एकसूत्र में पिरोती हिंदी। आओ सब जन मिल गुणगान करें हिंदी सब मतभेद भूल, मान बढाएं हिंदी। परिचय :- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा निवासी : फतेहाबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र...
हमारे बाबू जी
कविता

हमारे बाबू जी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन का आधार हमारे बाबू जी सबसे करते प्यार हमारे बाबू जी घबराते न कभी मुश्किल में साहस रख तोडें हर दीवार हमारे बाबू जी सीख सदा ही उत्तम देते हैं हमको जीवन का है सार हमारे बाबू जी चलते सच्चाई पर हरिमोहन जैसे लगते हैं करतार हमारे बाबू जी सबका ध्यान रखें नैतिक शिक्षा देते करते हैं उपकार हमारे बाबू जी पार लगाते नैय्या हरदम बच्चों की तूफाँ में पतवार हमारे बाबू जी पावन हैं मनभावन हैं न्यारे सब से गंगा की रसधार हमारे बाबू जी मेरे जीवन दाता घर के रखवाले रब के हैं उपहार हमारे बाबू जी चरणों में हम शीश झुकाते हैं उनके जिसके हैं हकदार हमारे बाबू जी परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मो...
अधूरे चाँद जैसा इश्क़
कविता

अधूरे चाँद जैसा इश्क़

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** सूनी डगर पे मैं तेरा नाम लेता रहा हाँ... नाम लेता रहा... तू ग़ैरों की महफ़िल में, मैं तन्हाई सहता रहा बेवफ़ा... तन्हाई सहता रहा। तड़पता छोड़ के मुझको, तेरा कारवाँ चल दिया अधूरे चाँद जैसा, मेरा इश्क़ रह गया अधूरे चाँद जैसा, मेरा इश्क़ रह गया। मिले न मौत मुकम्मल, न चैन पूरा आया कफ़न मिला न मुझको, न तेरा साया आया। ज़िंदा जला दिया मुझे तेरी बेरुख़ी ने इस क़दर कि मेरी राख से भी बस, तेरी ही वफ़ा का धुआँ आया। तू मुकम्मल कहानी किसी और की बन गई मैं अधूरा सा अफ़साना तेरा रह गया। तेरी डोली उठी तो मेरा जनाज़ा भी सज गया तू हँस के रुख़्सत हुई, मेरा ख़ुदा भी रो दिया। तड़पता छोड़ के मुझको, तेरा कारवाँ चल दिया... अधूरे चाँद जैसा, मेरा इश्क़ रह गया... परिचय :- बाल कृष्ण मिश्रा निवासी : रोहिणी, (दिल्ली) घोषण...
पेंसिल से लिखा अतीत
कविता

पेंसिल से लिखा अतीत

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** जब पेंसिल बचपन में हाथों में पकड़ी जब मुझे मालूम नहीं था। पेंसिल से लिखा क्या था अतीत मेरा। कागज़ पर थोड़ा धुंधला-धुंधला सा। कुछ नाम थे जो घिस गए लिखते-लिखते, कुछ वादे थे जो हल्के पड़ गए। कुछ हँसी के निशान रह गए कोने में, कुछ आँसू थे जो कागज़ में धँस गए। जैसे बचपन की वो अधूरी लकीरें, मन आज भी वहीं रह जाता। पेंसिल का अतीत यही सिखाता, हर चीज़ पक्की नहीं होती। कुछ यादें धुंधली ही अच्छी लगती। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपन...
स्वयंभू भगवानों से सवाल
कविता

स्वयंभू भगवानों से सवाल

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** थोड़ा देकर ज्यादा छीन लेते हो, कम रहता है उसे बहुत गिन देते हो, संवैधानिक हक़ को अहसान बताते हो, गाहे-बगाहे इसे हर मंच से सुनाते हो, हे तथाकथित स्वयंभू भगवानों, नागरिकों को बेवकूफ न जानो, जो खून-पसीना बहाकर टैक्स चुकाता है, वो दो वक़्त की रोटी को तरसाया जाता है, तुम देकर चंद टुकड़े मुफ़्त की खैरात के, दावा करते हो जैसे पाल रहे हो कायनात के, अपनी ही जेब से हम लुटते आ रहे हैं, और तुम हर चौराहे पर ढोल बजा रहे हो, हक़ मांगें तो लाठियां और जेल मिलती है, तुम्हारी चौसर की बिसात पर ज़िंदगी ढलती है, अब आँखों से ये भरम का पर्दा हटेगा, तुम्हारी झूठी रहमतों का ये खेल मिटेगा, ये देश किसी की बपौती या जागीर नहीं, जनता ही लिखेगी अब अपनी तक़दीर नई, उतर जाओ कुर्सी के झूठे गुमान से, बात करो अब अदब और संविधान से, वक़्त बद...
बधाई
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बधाई

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** यमुना की लहरों से पूछा मैंने तुम इतनी क्यों उछल रही हो? लहरों से आवाज है आई, कृष्ण जन्म की देवु बधाई, मेरे द्वार पर कान्हा आए, मेरे प्राण मेरे है स्वामी क्यों ना आज में चरण पखारू, इस अवसर को धन्य कर जाऊ, इस कारण में उछल रही हूं। उछल-उछलकर यमुना है बहती, कान्हा से वह यूं है कहती! एक बार प्रभु चरण धुलवाओ, मेरा जीवन धन्य कर जाओ। कान्हा ने है चरण बढाये, यमुना जल तक प्रभु ले जाए, धन्य हुई यमुना महारानी , चरण पखारे देखो रानी, शांत हुई देखो पटरानी। कान्हा ले वसुदेव है आये, नन्द भवन मै बँटे बधाई, आज गोकुल मे बजे शहनाई। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्र...
भारत की आन बान शान है हिंदी
कविता

भारत की आन बान शान है हिंदी

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** सजे नारी के शीश ज्यों बिंदी, विराजे भारत के शीर्ष यूं हिंदी। ऋषि मुनियों और विद्वानों के, लेखन का श्रृंगार है भाषा हिंदी। जन मानस की बोल चाल में, सहज सरल औ आम है हिंदी। संप्रेषण और जनसंचार का, सबसे सशक्त माध्यम है हिंदी। वीणा के तारों से झंकृत करती, महाग्रंथों में अलंकृत है हिंदी, कवि और लेखकों के सृजन को, कृत कृत्य करती है भाषा हिंदी। कोकिल कंठ सी लगे कर्णप्रिय, मिश्री की डली सी लगती हिंदी, सभी भाषाओं की सिरमौर बनी, हमारी मातृभाषा कहलाती हिंदी। विश्वबंधुत्व औ एकता का भाव, जन-जन में नित जगाती हिंदी। नदी की पावन धारा सी निर्मल, झरने सी शीतल है भाषा हिंदी। प्रगति के नए सोपान है रचती, भारत का मान है बढ़ाती हिंदी, जन जन के मन में है बिराजती, देश की आन बान शान है हिंदी। परिचय :- ...