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कविता

पशुपतिनाथ
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पशुपतिनाथ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** अद्भुत सौंदर्य उतरा था धरा पर एक रात हमने देखा, जहाँ मौन था किंतु शब्द बोल रहे थे, प्रकृति की सुन्दरता भिन्न-भिन्न रूप रंग में अपनी छटा बिखेर रही थी , तारे भी इस मनमोहक छवि को निहार रहे थे, शांत निस्सीम क्लांत रात गौशाला की रात थी !! तभी एक शब्द कानो में पड़ा गौ माता पुकार रही थीं, कह रही थीं सो जाओ बहुत रात हो चुकी है , उनकी आवाज सुन बत्तखों ने गान शुरू कर दिया , बाकी पक्षी भी सुर ताल में गीत गुनगुनाने लगे ! कुछ जीव सूकून की नींद सो रहे थे कुछ विचरण कर रहे थे, मंद-मंद मलय उनको सहला रही थी ! अचानक सूकून की तंत्रा भंग हुई, कोई जीव करूण गुहार लगा रहा था, वो दर्द में था उसके साथ बहुत से जीव जो असहाय थे नेत्रहीन थे, जो हड्डी हड्डी हो चुके थे वो भी जाग रहे थे ! उनकी तकलीफें...
लम्हा-लम्हा चुराना पड़ता है
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लम्हा-लम्हा चुराना पड़ता है

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन कोई आसान सफर नहीं, काँटों पर चलकर मंजिलों को छूना पड़ता है। गिरते हैं, संभलते हैं, फिर बढ़कर, मेहनत से तकदीर बनती है। उम्मीद का दिया कभी बिना बुझे, अँधेरे में भी रौशनी बनकर, खुद चमकना पड़ता है। समय कभी साथ दे, कभी परीक्षा ले, किस्मत साथ ना दे। शिद्दत से जो जुड़कर, कभी न हारा, हर लम्हा एक लड़ाई है, हर साँस एक कहानी है। जो समय चुराकर मेहनत कर ले, उसी के नाम तारीखें और जवानी है। मंजिल पूछती है मेहनत का हिसाब, और सपने माँगते हैं वक्त की कुर्बानी। जो आज पसीना बहा दे मेहनत में, कल दुनिया उसी की जुबानी को गले लगाता है। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचन...
यमराज का ग़ुस्सा
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यमराज का ग़ुस्सा

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** पहली वारिश और ये हाल हर ओर सुनाई पड़ रहा त्राहि माम बेचारा यमराज है परेशान लोग उसे बेवजह कर रहे बदनाम। सुनकर उसे भी गुस्सा आया जोर से भन्नाया-इज्जत का फालूदा बनाया। कहने लगा- ये सब विकास की माया है कमीशन जमकर खाया गया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई नदी, नाले, तालाबों पर अतिक्रमण अनियोजित शहरीकरण, गाँवों से पलायन आधुनिकता की आँधी और नित नव सुविधाओं का लोभ बढ़ता प्रदूषण, बिगड़ता मौसम चक्र ऊपर से स्वार्थ, लोभ की विकृति मानसिकता मरती संवेदनाएं, जहरीली होती भाव-भंगिमाएं यही है आज का मानव समाज। बदले में रोता है, खूब खोता है, जो बोता है, वही तो काटता है फिर भी जमकर अफसोस करता और घड़ियाली आँसू बहाता है, मगर खुद को बदलने का विचार भूलकर भी मन में नहीं लाता है, बस! दोष पर दोष सिर्फ औरों को ...
भीड़ का आदमी
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भीड़ का आदमी

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** सबके साथ चलता हुआ आदमी धीरे-धीरे अपने साथ चलना भूल गया। वह हर बात पर सहमति में सिर हिलाता रहा, यह जाने बिना कि एक दिन उसका अपना सिर उसकी अपनी बात के लिए बचा ही नहीं। अब वह भीड़ में है, सुरक्षित भी, स्वीकार भी। बस, आदमी नहीं रहा। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज" शामिल हैं। रुचि : हिंदी एवं हरियाणवी भाषा में काव्य लेखन के साथ पटकथा लेखन, संवाद लेखन तथा स्वतंत्र फिल्म निर्देशन में भी रुचि रखते हैं। विशेष : आपकी रचनाओं के केंद्र में मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन, करुणा, पर्याव...
मन की मुराद
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मन की मुराद

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन की मुरादों में बसता प्रेम का मधुर उजास, जिससे महक उठता जीवन, जैसे सावन की मिठास। परिवार के स्नेह से सजता हर आँगन का द्वार, अपनों के संग ही मिलता जीवन को सच्चा प्यार। माँ की ममता, पिता का आशीष अमृत बन जाता, संस्कारों का दीप हृदय में उजियारा फैलाता। देशभक्ति की ज्योति जले तो मन वीर बन जाए, मिट्टी की सौंधी खुशबू जीवन का गौरव कहलाए। तिरंगे की शान हेतु जो सपनों को अर्पित करते, वही राष्ट्र के इतिहास में स्वर्णिम अक्षर भरते। मन की मुराद यही कि हर नारी को मान मिले, उसके श्रम, साहस और सपनों को सम्मान मिले। नारी केवल कोमलता नहीं, शक्ति की पहचान, उसके चरणों से ही खिलता जीवन का मधुबन महान। मन चाहे ऊँचाइयों का हर शिखर सरल हो जाए, मेहनत के हर पथ पर सफलता मुस्कुराए। सत्य, प्रेम और करुणा से जीवन का श्रृंगार...
आज और कल
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आज और कल

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** चौपालों की दशा आज और कल का चौपाल बडा सा बरगद का पेड़ पेड़ के चारों ओर बना बडा सा चबुतरा प्रतिदिन आबाद रहता था। प्रातः काल में बचपन खेलें दोपहरी में महतारी बतियातीं सन्ध्या लगतीं बैठक वृद्धों की। खूब खेल होते बरगद के फूल और पत्तों से। बनती रोटियां बरगद की छाया में ले हाथ में रोटी का टुकडा थामे हाथ मां का आंचल चबाता हैं रोटी का टुकडा। चौपाल पर चढकर गोल-गोल चक्कर काटता है लाला पर, अब हां पर अब न चौपाल हैं न बरगद का पेड न पिपल की पिपरी न नीम की ठंडी छाया। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचन...
जरा आगे बढ़कर तो देखो
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जरा आगे बढ़कर तो देखो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** परंपराओं से आगे ज़रा बढ़कर तो देखो, पुरातन झंझावातों से थोड़ा उबरकर तो देखो। बदल दो उस व्यवस्था को, जो रोकती हो आगे बढ़ जाने से, समय के साथ कदमताल मिलाने से। हर व्यवस्था समय के साथ बदलती है, हर युग अपनी नई मान्यताएँ गढ़ती है। यदि जकड़े रहोगे बीते हुए विचारों में, तो जड़ता किसी की भी चेतना को ही कुतरती है। पगडंडियों और बैलगाड़ियों से निकलकर, हम रेल और हवाई सफ़र तक आ गए। जिन्होंने समय की चाल पहचानी, वे दुनिया भर में अपनी पहचान बना गए। जब उड़ने को नए पंख निकल आते हैं, घिसी-पिटी राहें फिर कहाँ सुहाते हैं। जब व्यवस्था किसी योग्य को ठुकरा देती है, तभी एक नया विचार जन्म लेता है, और संभावनाओं का नया आकाश देता है। न्यूटन, डार्विन, आइंस्टीन आज भी इसलिए याद हैं, क्योंकि उनके विचा...
ऐ बारिश …
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ऐ बारिश …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* ऐ बारिशों तुम इंसाँ न बनो यूँ मत करो कि जब ज़मीं की साँसें प्यास से थमने लगें दरिया के दीदे सूख जाएँ पेड़ों की हथेलियाँ दुआ में उठकर बिखर जाएँ तब तुम कहीं समंदर की छतों पर गीत गाती फिरो। और फिर एक रोज़ अचानक इस कदर टूटकर बरसो कि बस्तियाँ डूब जाएँ घरोंदे टूट जाएँ ख़्वाब छूट जाएँ, और इंसाँ तुम्हें इंसाँ होने की दुहाई दें। यह हुनर तो इंसानों का है ज़रूरत के वक़्त साथ न देना और जब ज़रूरत गुज़र जाए तो एहसानों की बारिश लेकर बरसते हुए लौट आना। तुमने देखा तो होगा रिश्तों को सूखी धरती सा तड़पते हुए, तेरी बूंदों सा बिखरते हुए एक हाथ, एक साथ की आस में रिश्तों के आसमाँ को तकते हुए। इंसाँ आए भी तो ऐसे जैसे सैलाब हो लिए सूखे में बारिश का ख़ाब हो लिए साथ कम देते हैं हिसाब ज...
उसूल भूल गए…?
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उसूल भूल गए…?

संजय एम तराणेकर इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** सादगी की राहों पर जो चुपचाप बढ़ गया, ईमान का दीप बनकर अँधेरों से लड़ गया। जिनके महलों में भी "सेवा" का ही शोर है, इस हिसाब में हर सुविधा का कोई छोर है। कुर्सी मिली तो जनता का ही नाम भूल गए, भत्तों की 'फेहरिस्त' में सारे उसूल भूल गए। एक जनाब पैदल चलकर मिसाल लिख रहे, बाकी तो लाल बत्ती में भी सवाल लिख रहे। रिश्वत की धूल से जब 'आईना' धुंधला हुआ, सच का चेहरा देख के हर चेहरा मिला हुआ। यहाँ गांधी के नाम पे भाषण तो रोज़ हो गए, गांधी के रास्ते मगर आज भी कम से हो गए। परिचय :- संजय मुरलीधर तराणेकर एक स्वतंत्र कवि, लेखक व फ़िल्म समीक्षक हैं। आप साधारण परिवार में जन्मे मूलतः मध्य प्रदेश के इन्दौर के निवासी हैं। आपका सन १९९० के दशक से लेखन में मन रमने लगा और ‘पत्र संपादक के नाम‘ से अपनी लेखन यात्रा ...
समय
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समय

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** समय का कारवां बढता गया मैं पिछे रह गई क्योंकि समय के पंख लगे थे और... और मैं, थी पंख विहिन। समय को साधा नहीं अवसर के सन्धान से काश... समय पंख कटा होता मैं पिछे मुडकर नहीं देखतीं। जग के झंझावातों मैं कब, कैसे समय हाथ से निकल गया मैं समझ नहीं पाई समय के बढ़ते कारवां के इशारों को। मैं समय को झेल न पाई कोई कह भी रहा था मुझे चल दो, कारवां के साथ। पर मैं पकड़ न पाई समय को झुककर प्रणाम करता समय मेरे पास से गुजर गया गुजरते समय के प्रणाम का मैं उत्तर न दे पाई। देखो... हां देखो वह आज मुझे अतीत बन चिढा रहा है और...मै... समय की सीमा पर हाथ मलती रह गई। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रच...
कतरा-कतरा सागर का
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कतरा-कतरा सागर का

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कतरा-कतरा सागर बनता, बूँद-बूँद में शक्ति समाई, छोटे-छोटे शुभ प्रयासों से जीवन ने मंज़िल पाई। हर अनुभव एक मोती बनकर मन की माला में जुड़ जाता, संघर्षों की हर छोटी लहर साहस का दीपक बन जाता। प्रेम, दया, करुणा के कतरे जब मानव-हृदय में खिलते हैं, सूखी धरती जैसे सावन पाकर हरियाली से मिलते हैं। ज्ञान की हर छोटी किरण अज्ञान का तम हर लेती है, सत्कर्मों की हर बूँद मिलकर जीवन-गंगा भर देती है। आओ हम भी कतरा-कतरा मानवता का सागर भर जाएँ, अपने शुभ कर्मों की लहरों से जग में प्रेम-सुगंध फैलाएँ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथ...
आत्म-मंथन
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आत्म-मंथन

आरुषि कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं-मैं में नहीं, मुझसे हूँ। हिम्मत नहीं है मुझमें फिर भी कहूँगी। समझ नहीं है मुझमें फिर भी लिखूँगी। अक्सर लोग निकाल देते हैं मेरे विचार को दिमाग से क्योंकि मैं-मैं में नहीं मुझसे हूँ। चाहती तो हूँ दुनिया से दूर रहना फिर सोचती हूँ मैं ही क्यों? क्यों कोई और नहीं? बस ऐसी ही बेतुकी-भरी ख़्वाहिशों में उलझी रहती हूँ। फिर मायूस होकर, गुमसुम-सी, मैं ख़ुद को ही अपने में समेट लेती हूँ। परिचय :- आरुषि शिक्षा : १२वीं कक्षा की छात्रा राजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गाहलियां निवासी : कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को ...
जन्मदिवस
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जन्मदिवस

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बढ़ता चला जा रहा हूँ के करीब, शनैः शनैः,अनवरत- आगे बढ़ने की प्रक्रिया जारी है सतत... दिन-ब-दिन कुछ खोते हुए, सबकी बधाइयाँ लेते हुए, काफी समय बाद जब देखता हूं पीछे मुड़कर, लगता है जैसे बचपन से बुढ़ापे में आ गया हूँ उड़कर। खेलकूद, शिक्षा, प्रेयसी, पत्नी, पुत्र और पुत्री- जीवन चलता रहा मानो एक ही सूत्र में बँधी कड़ी। मौके आए कई अच्छे पद के, पर आड़े आईं सीमाएँ मेरी औकात और सामाजिक स्थिति की- वही सरहदें जो हर कदम पर मुझे रोकती रहीं, तोड़ती रहीं। भरोसा दिलाने वाले अपने एक-एक कर मुकर गए, अपनी जिम्मेदारियों का बोझ मुझ पर छोड़कर उबर गए। फिर शुरू हुआ दौर संघर्ष का- चंद सिक्के कमाने का, और शिक्षा के विमर्श में खुद को बचाए रखने का। राहें गुज़रीं कठिन परिश्रम से, मैं दूर होता गया अप...
नदी किनारे
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नदी किनारे

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कहीं कोई मिलता है बिछुड जाने के लिए क्यों हुक सी उठती है, फिर मिलने के लिए। तमाम शब खोया रहा खयाल में उसके जैसें चांद खो जाता है घटाओं में जैसें न जाने कब तक रोती रही आंखें बेदर्द हाल मेरा देख, दिवारे भी शिकवे करने लगी उसके कहीं कोई बीता लम्हा, बीता अरसा सावन बीता, भादौ बीता चंचल किरणों संग पुनम बीती अंधियारी बीती रिती रिती। हर कोई था यहां सबका अपना नदी किनारे मैं ही था, सिर्फ प्यासा, प्यासा। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियो...
हक और शक
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हक और शक

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** एक धोबी की आवाज़ पर बिना जाँच पड़ताल घर से निकाला माता सीता को मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने न जाने कैसी ये मर्यादा थी राम की या फिर था पुरुषोचित मन का शक.... भरे दरबार में स्वयंबर की आड़ में परम ज्ञानी, अति बलशाली प्रतापी भीष्म ने तलवार की नोक पर अम्बे, अम्बिका और अम्बालिका तीनों को इच्छा के विरुद्ध उठा लिया.... शायद... मर्यादा की छाँव में रहा हो पुरुषोचित हक..... सभी परिवार प्रमुखों के समक्ष धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर ने द्यूत क्रीड़ा में स्व भार्या द्रोपदी को बिना उसकी मर्जी जाने लगा दिया दाव पर मन कहाँ समझ पाया कि स्वांग था मर्यादा का या फिर पांडवों का पुरुषोचित हक..... कौरवों के राज दरबार में नीति कुशल विदुर द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म जैसे अजेय व्यक्तित्वों के साम...
मन का कुरुक्षेत्र
कविता

मन का कुरुक्षेत्र

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन के भीतर रोज ही, छिड़ता नया संग्राम। अर्जुन-सा संशय खड़ा, कृष्ण बने सतनाम॥ लोभ-मोह की सेनियाँ, घेरे चारों धाम। विवेक धनुष जब तान दे, मिट जाए अंधियाम॥ क्रोध दुर्योधन बन गया, अहंकारी बलवान। प्रेम-सुदर्शन घूमकर, करे उसे निष्प्राण॥ ईर्ष्या की गांधारियाँ, बाँधे मन के नेत्र। सत्य सूर्य जब उग पड़े, जगमग हो कुरुक्षेत्र॥ कामनाओं के चक्र में, उलझे जीवन-तंतु। संयम बन अभिमन्यु जब, तोड़े सारे बंधु॥ धैर्य भीष्म-सा अटल हो, श्रद्धा बने कवच। विपदा कितनी भी बढ़े, न डिगे मन का रथ॥ सद्गुण पांडव बन खड़े, दुर्गुण कौरव जान। जीत उसी की अंत में, जो रखे धर्म विधानl मन का कुरुक्षेत्र है, जीवन का विस्तार। जो खुद को ही जीत ले, उसका हो उद्धार॥ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध...
इंसान में भगवान समाए हैं
कविता

इंसान में भगवान समाए हैं

डॉ. रमेशचंद्र मालवीय इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हम मंदिर-मंदिर में भगवान ढूंढते हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। हम इधर-उधर ही भटकते रहते हैं अपनी ही उलझन में अटकते रहते हैं आशा और निराशाओं के झूले पर हम हर दिन-रात हीलटकते रहते हैं हम तीर्थ और धामों में घूम आए हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। हम नहीं जानते कि भगवान कहां है हम नहीं जानते उनकी पहचान कहां है कहते हैं कि वो कण-कण में समाया है लेकिन उनकी धरती-आसमान कहां है हम उनको मूर्तियों में सजाए हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। आखिर भगवान को हम कब पहचानेंगे वो हृदय में बसे है ऐसा हम कब मानेंगे हर इंसान के हृदय में भगवान विराजे हैं इंसान में है भगवान उसे हम कब जानेंगे हम पत्थर में ही भगवान को पाए हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। परिचय :- डॉ. रमेशचंद्र मालवीय निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषण...
मरुधरा रा मान-धणी
कविता

मरुधरा रा मान-धणी

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** (राजस्थानी भाषा) जेता-कूंपा री तलवार घणै, थर-थर कांपै बैरी सारा, मालदेव रा दाह्या-बायां, गूंज्या रण में जकां रा नारा। मारवाड़ री माटी रा वे, मान-बढावण हार, रण में जुंझार बण'र लाड्या, धरम रा राखां धार। चित्तौड़गढ़ रो ऊंचो धज, गौर-बादल री ओळखांण, रतन सिंह रा अंगरक्षक, राख्यो कुल-मर्यादा रो मांण। केसरिया बाना पेर'र वे, रण-खेत में कीनो प्रवेश, छाती ठोक'र मिटा दियो, दुश्मन रो अळगौ भेष। उदय सिंह रा ओजस्वी वे, जयमल-फत्ता अणखिला, चित्तौड़ री प्राचीर माथै, सावळ बण'र उभा खिला। धड़ लड्या अर शीश कड्या, पर पग पाचो नी दियो, वीरता री ओ मूंछ्याळी गाथा, इतिहास माथै लिख दियो। महोबा रा आन-बाण, आल्हा-ऊदल रो प्रताप, रण-भेरी बाज्या पछै, दुश्मन पावै घणो संताप। पृथ्वीराज सूं भिड्या रण में, ओ तो अजब खेल दिखाय...
जीवित रहने के मायने
कविता

जीवित रहने के मायने

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां देखा है मैंने लोगों को जीवित रहने के लिए करते हुए कवायद, दुआओं से लेकर अपने इष्ठों से करते खुशामद, धन, दौलत, जमीन, घर व बर्तन, सब बेच चाहते हैं रखना स्वस्थ अपना तन-मन, मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारों के साथ ही लगाते रहते हैं इस डॉक्टर से उस डॉक्टर के घर आंगन के निश दिन चक्कर, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक रूप से डटकर, सिर्फ बेहतर स्वास्थ्य के लिए, इनके तन-मन की पीड़ा किया जा सकता है महसूस, नजर आते कोई प्रसन्न तो लगते दिखते कई तो नाखुश, क्या नहीं आता होगा उनके मन में अपनी इह लीला समाप्त कर लेने का ख्याल, संघर्ष कर उबरने का मौका देता कुदरत बेमिसाल, तो बताओ अरबों खरबों के इस अमूल्य तन को समाप्त कर लेने के लिए हम खुदकुशी जैसा वाहियात कदम उठाएं क्यों, अपनी आंतरिक शक्ति को ...
स्त्री
कविता

स्त्री

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** सच में अगर हम कविता रचते स्त्री पर रचे वो प्रकृति का साक्षात् रूप होती कविता और स्त्री दोनों ही सृजन करती और दोनों के बिना तो यह धरती बंजर होने में देर नहीं लगती I कविता और स्त्री जगह पर तमाम मोहक रूपों में दिखती और हम अभिभूत होते जाते जीवन चक्र की भाति। परिचय : संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता : श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि : २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा : आय टी आय निवासी : मनावर, धार (मध्य प्रदेश) व्यवसाय : ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन : देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार पत्रों में निरंतर पत्र और रचनाओं का प्रकाशन, प्रकाशित काव्य कृति "दरवाजे पर दस्तक", खट्टे मीठे रिश्ते उपन्यास कनाडा-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व के ६५ रचनाकारों में लेखनीयता में सहभागिता सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी र...
भरोसा टूटे तो …
कविता

भरोसा टूटे तो …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* भरोसा टूटे तो एक दफ़ा फिर उठ खड़े होना साथी को बिना कोसे बिना कुछ कहे। दुनिया बहुत बड़ी है बहुत से लोग हैं, जो शायद तुम्हें ही ढूँढ़ रहे हों आशा के मोती एक बार फिर पिरो लेना और विश्वास की एक मज़बूत माला बना लेना। यह नितांत व्यक्तिगत है कि तुम फिर कभी किसी को न चाहो या अपना मन किसी और को सौंपने का साहस न कर सको लेकिन, यदि कभी लगे कि साथ की आवश्यकता है तो अपनी इस अनुभूति से लज्जित मत होना उसे आकार देना, एक और प्रतिमा गढ़ना जिसे 'प्रेम' कहा जाए जिसे 'साथ' पुकारा जाए जिसे फिर से खड़े हो जाने का पर्याय माना जा सके। एक बार स्वयं पर यह उपकार करना अपने नए सृजन पर गर्व करना कृतज्ञ रहना उस नए आदम के प्रति जो तुम्हारे अधरों की मुस्कान का कारण बना मन धीरे-धीरे रमेगा तुम थ...
बढ़ती जनसंख्या
कविता

बढ़ती जनसंख्या

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (११ जुलाई विश्व जनसंख्या दिवस) जनसंख्या में देश हमारा, विश्व में अव्वल होगा ! हम दो हमारे दो से इस समस्या का हल होगा !! बेटा-बेटी दोनों को समान शिक्षा व अधिकार दो हर परिवार का हो एक ही नारा हम दो हमारे दो !! बेटा की चाहत में अपने परिवार को ना बढ़ने दो शिक्षा, और संस्कार के लिए बच्चों को खूब पढ़ने दो !! भुखमरी और बेरोजगारी से लोगों की जान बचायेंगे ! छोटा परिवार के नारे को सच कर हम दिखायेंगे !! छोटा सा परिवार हमारा, खुशियाँ का आधार हैं ! मिल जुल कर हम रहते है यही हमारा प्यार है !! शिक्षा-दीक्षा देकर बच्चों को काबिल हम बनायेंगे ! अशिक्षा को दूर भगाकर, शिक्षा की अलख जगायेंगे !! बेटा-बेटी दोनों अच्छा उसमें ना तुम भेद करो ! बेटियाँ, बेटों से कम नहीं यह सच स्वीकार करो ...
आसार
कविता

आसार

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मुझे नफ़रत ज़रा सोच समझ कर करना मोहब्बत होने के आसार होते हैं। मेरी बात औरों से ज़रा सोच समझ कर करना इश्क होने पर सब कुर्बान होते हैं। दिल की बात सोच समझ कर करना अपनों में भी कई गद्दार होते हैं। हमराही को हमसफर सोच समझकर बनाना धोखा मिलने के भी आसार होते हैं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाई...
सफलता की ओर
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सफलता की ओर

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** विपदाओं से लड़कर, जय को तुम पा जाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। वरना कहते रह जाओगे, हाथ न कुछ आया। जो करना चाहा था, वो कर नहीं पाया।। विपदाएँ तो नित ही मंगलगान सुनाती हैं। संघर्षों के भावों को, वे रोज़ जगाती हैं। जीवन हो खुशहाल, यही सबकी है चाहत, जो डर जाता उसको ही,वे रोज़ सताती हैं। साहस से प्रियवर तुम तो पूरे भर जाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। वरना कहते रह जाओगे, हाथ न कुछ आया। जो करना चाहा था, वो कर नहीं पाया।। आपदाएँ कहती हैं बल को लेकर बढ़ना। एक नई गाथा को लेकर खुशियाँ गढ़ना। कभी न पीछे क़दम हटाना,कर्म यही है, अंधकार में उजियारे का वंदन करना। उल्लासित होकर प्रियवर मंगल बरसाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। वरना कहते रह जाओगे, हाथ न कुछ आया। जो करना चाहा था, वो कर नहीं पाया।।...
मैं नहीं मासूम या भोला
कविता

मैं नहीं मासूम या भोला

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मत कह मुझे सीधासाधा, भोला या मासूम, वक्त पड़े तो दिखा सकता हूँ अपना अनदेखा रौद्र रूप। कर लो जितनी मनमानियाँ करनी हैं, जो कर रहे हो, करते रहो, औरों के हिस्से छीनकर अपने महल सजाते रहो। मैं उस दिलासे में नहीं जीता कि ऊपर बैठा कोई देख रहा है, या कहीं छिपकर तुम्हारे कर्मों पर आँखें सेंक रहा है। जिस दिन मैंने देखना शुरू कर दिया, हिसाब लगाना शुरू कर दिया, उस दिन से उठ सकता है ऐसा सैलाब जो बड़े-बड़ों को बहा सकता है, सच, हकीकत और व्यवहार का आईना दिखा सकता है। मैं प्रारंभ से ही खोता आया हूँ जिसे तुमने सहेज रखा है डर, धमकी और दंभ के सहारे। मेरी चुप्पी मेरी कमजोरी नहीं, सहन करना कोई सीनाजोरी नहीं। जिस दिन अपने नुकसान की कीमत ठीक-ठीक आँक लूँगा, उखाड़ दूँगा तुम्हारी किस्मत और भाग्य की जड़ें। ...