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कविता

उसे राजा बनाना होगा
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उसे राजा बनाना होगा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** गधे को गधा मत बोलो, वह भी प्यार का हकदार है, उसकी भी अपनी दुनिया, उसकी अपनी सरकार है। इज्जत अगर न दोगे तुम, इज्जत कहाँ से पाओगे, दिन-रात खटते रहोगे, और “गधा” कहलाओगे। गुस्से से भर जाओ तो, गुस्सा बाहर निकालो जी, मन फिर भी शांत न हो तो, गधों की परेड करा लो जी। राजनीति में आने का, सब गधों को अधिकार है, क्या जंगल, क्या ये समाज, सबको यह स्वीकार है। बंदर-भालू को मदारी, इशारों पर नचवाता है, लेकिन स्वाभिमानी गधे को, वह कभी नहीं झुकाता है। जंगल-भक्ति दिखलाने को, सब पशुओं को आना होगा, अगर चढ़ जाए भक्ति सिर पर, गधे को राजा बनाना होगा। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं...
समय का पन्ना
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समय का पन्ना

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** बुढ़ा बच्चा स्वभाव सरीखा अक्सर हम सुनते आए। जिद और अकल दोनों अब अंबर तक उड़ते जाए। रट्टू तोता जैसा डायलॉग रोज कोई दोहराता है। गिनी चुनी सोच प्रशंसा लाभ जग को सुनवाता है। जागो उठो सुनो सभी ट्रंप चाल का भय दिखलाए। जिद और अकल दोनों अब अंबर तक उड़ते जाए। दुनिया लोहा मान समझौता रूप स्वीकार किया। फिर धीरे से आँख दिखा छवि में बट्टा लगा दिया। झेंप खीझ बेचैनी मिटाने फर्श पे ही लुढ़कते जाए। जिद और अकल दोनों अब अंबर तक उड़ते जाए। बरसों बरस की साख मिटती कैसे दुनिया ने जाना। जल थल नभ अंतरिक्ष शक्तिमान का बहक जाना। एक खिलौना खेलने बच्चे को ट्रंप इक्का ललचाए। जिद और अकल दोनों अब अंबर तक उड़ते जाए। रट्टू तोता कुछ तय शब्दों से अपनी शान दिखाता। अपनी बोली में फिर निज उर बोली भी फिसलाता। समर्थ राष्ट्र अर्थ तंत्र शस्त्र प्रगति...
बेटिया
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बेटिया

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** बेटिया तो मां-बाप की परछाई होती है, हर वक्त वो उनके साथ रहती है। कहीं कष्ट ना आये वह हरदम ध्यान रखती है। ठंड गर्मी हो या बारिश समय का ध्यान रखती है, समय पर खा लेना पापा वह हरदम ख्याल रखती है। तुम पुराने कपड़े-जूते तो ना पहनो पापा, फटी बनियान पर वह ध्यान रखती है। यदि बीमार हो जाए दौड़ी आती है वो बेटियां, अच्छे स्पेशलिस्ट को बताना है लिस्ट देखती है बेटियां। कहां जाना नहीं जाना हर सुविधा जुटाती है बेटियां। कही बीमार ना पड़ जाए वह सदा ध्यान रखती है बेटिया। कहीं भी देश या विदेश जाए उनका ध्यान रखती एसी ही मै जाना है टिकट तैयार रखती है। उनके स्वास्थ का हर पल ध्यान रखती है बेटियां, मन की बात वो समझे तन का हाल वो समझे हर परिस्थिति में वह ढल जाती है बेटियां। परिचय : किरण विजय पोर...
ज्ञात नहीं
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ज्ञात नहीं

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हमें लगता है शायद घाटी से घहराते नीचे आते पाषाण का अवसान हो गया परन्तु नहीं पाषाण के जीवन का आरम्भ है, यह उपर घाटी पर निश्तेज, निरीह, निश्चल, निर्विकल्प सा पडा वह बदलते मौसम के झंझावातों से झुकता हुआं पडा था अपनी जगह बनाएं हुए एक कूप मंडूक की भांति परन्तु अब उसका भविष्य उज्जवल है सोचता है वह, हां वह सोचता है शायद देवो में पूजा जाऊं या किसी राजा की पहचान का प्रहरी बन जाऊं पर, पर उसे यह ज्ञात नहीं वर्तमान में मानव कितना कठोर है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृ...
मन की मुराद
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मन की मुराद

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** मन की मुरादों में बसता प्रेम का मधुर उजास, जिससे महक उठता जीवन, जैसे सावन की मिठास। परिवार के स्नेह से सजता हर आँगन का द्वार, अपनों के संग ही मिलता जीवन को सच्चा प्यार। माँ की ममता, पिता का आशीष अमृत बन जाता, संस्कारों का दीप हृदय में उजियारा फैलाता। देशभक्ति की ज्योति जले तो मन वीर बन जाए, मिट्टी की सौंधी खुशबू जीवन का गौरव कहलाए। तिरंगे की शान हेतु जो सपनों को अर्पित करते, वही राष्ट्र के इतिहास में स्वर्णिम अक्षर भरते। मन की मुराद यही कि हर नारी को मान मिले, उसके श्रम, साहस और सपनों को सम्मान मिले। नारी केवल कोमलता नहीं, शक्ति की पहचान, उसके चरणों से ही खिलता जीवन का मधुबन महान। मन चाहे ऊँचाइयों का हर शिखर सरल हो जाए, मेहनत के हर पथ पर सफलता मुस्कुराए। सत्य, प्रेम और करुणा से जीवन का श्रृंगार ह...
बरखा की आस
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बरखा की आस

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** दिनकर की किरणों का, फैला चहुं ओर है ताप। गर्मी और उमस का है, झेल रहा मानव संताप। धरती का अंतस फटा। चुभ रहे हृदय में शूल। आसमां से नाता तोड़, बदरा गए रास्ता भूल। वृक्षों पर बैठे पंछी भी, रहे सभी हैं अकुलाय। अमवा की डाल-डाल, कोयल रही है बौराय। उमस भरे से दिन लगे, अब शीतल भई शाम। शीतल जल और पेय, भाने लगे अब आम। ताल तलैया सब सूखे, नदिया रही हैं सुखाय। गर्मी औ उमस से अब, जियरा रहा अकुलाय। गर्मी से नित बढ़ रही, वातावरण में है तपन। गर्म हवा लू लपटों से, तन में लग रही अगन। टूट रहा पल-पल अब, मानव मन का विश्वास। जेठ मास में है लग रही, अब बरखा की है आस। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति म प्र., ...
भूलना क्या था भूल गया
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भूलना क्या था भूल गया

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** उसी पल बहुत कुछ उड़ धूल गया, अजीब मुसीबत आन पड़ी यारों, भूलना क्या था, भूल गया। दिमाग पर उस झोंके का ऐसा असर पड़ा, खुद भी न समझ पाया मैं कहाँ खड़ा। बस निरंतर चलता जा रहा हूँ, कोई विशेष नारा दोहराए जा रहा हूँ। प्रशिक्षित अंधभक्त कहलाए जा रहा हूँ, घर-परिवार, रिश्ते-नाते भूल चुका हूँ, अजीब से झूलों में झूल चुका हूँ। कोई किसी नाम से पुकारे, सुनता जा रहा हूँ, कभी सीधे, कभी गोल घूमता जा रहा हूँ। नशा किसी मादक पदार्थ का किया नहीं, फिर भी अजीब से नशे में झूमता जा रहा हूँ। किसका अंधभक्त हूँ, पता नहीं, मगर उसकी बुराई सुनना मंजूर नहीं। लोग कहते हैं- “कैसा हो गया तू? था पहले तो इतना मगरूर नहीं।” किस बंधन में बंध गया, किस झूले में झूल गया, अजीब मुसीबत आन पड़ी यारों, भूलना क्या था, भूल गया। ...
क्यों भूल जाते है
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क्यों भूल जाते है

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** आधी उम्र जीवन के पार हो गए! माँ-बाप अब तो उम्रदराज हो गए। बिन सहारे उनसे चला नहीं जाता, सहारे की उम्र में किनारे हो गए।। वृद्धाश्रम अब उनका घर हो गए! अपने ही घर से अब बेघर हो गए। कभी रहे नहीं बच्चे माँ-बाप बिना, माँ-बाप से दूर रहते वर्षों हो गए।। साल में एक दिन अब याद आते है! स्टेटस लगाकर बच्चे प्यार जताते है। माँ-बाप का दर्द अब कौन समझेगा, बच्चे माँ-बाप को क्यों भूल जाते है।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच प...
तलाक
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तलाक

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** रिश्तों में संवाद का दीप जब धीमे-धीमे बुझ जाता है, तब साथ रहते हुए भी मन का आँगन सूना रह जाता है। अहंकार की ऊँची दीवारें दिलों के बीच खड़ी हो जाती हैं, "मैं" की जिद में "हम" की डोर अक्सर टूट सी जाती है। विश्वास की नींव हिलते ही घरौंदा बिखरने लगता है, शंका का एक बीज भी जीवन को ज़हर करने लगता है। समय की कमी और व्यस्तता रिश्तों को दूर कर देती है, पास रहकर भी दूरी, जीवन को मजबूर कर देती है। अपेक्षाओं का बोझ जब हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तब प्रेम का कोमल पौधा भी मुरझा सा जाता है। धैर्य और सहनशीलता आज कम होती जा रही है, छोटी-छोटी बातों पर भी डोर टूटती जा रही है। (उपाय) यदि संवाद का दीप फिर से दोनों मिलकर जलाएं, तो बिखरे हुए रिश्ते भी मुस्कुराकर फिर जुड़ जाएं। (उपाय) अहंकार को त्याग कर यदि प्रेम को स्थान द...
एक, एक पल
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एक, एक पल

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** एक, एक दिन एक, एक पल शाम बितती है ज़िन्दगी यू हीं फिसलती जाती है जनाजे के किसी को करते हुए रुखसत ज़िन्दगी के अरमानों का गला घुटता है मचलते जज्बातों की मशाल धधकती है। धड़कनों के कहकहे सुनता है आफताब भी उन्हीं कहकहों में डुबता हैं सूरज कहीं मोहब्बत और प्यार से पालने वाले दिलदार न जाने कब, कैसे इस दुनिया से विदा हो गये। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप ...
राधा और द्वारिकाधीश संवाद
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राधा और द्वारिकाधीश संवाद

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक दिन साथ विचरण करते राधा ने कृष्ण से पूछा, कैसे हो द्वारकाधीश कृष्ण आहत हुए सोचने लगे " राधा तो कान्हा कह कर पुकारती हैं फिर ये द्वारिकाधीश संबोधन क्यों. स्वयं को सम्भालते कृष्ण बोले आओ कुछ पल साथ बैठते हैं! कुछ मैं अपनी कहूँगा कुछ तुम अपनी सुनाना एक दूसरे के सुख दुःख बांटते हैं। कृष्ण बोले जब-जब तुम्हारी याद आइ आँखों से अश्रु बहते थे जीवन सूना सा था तुम्हारे बिन। राधा मुस्काई- तुम तो मेरे नैनो में बसे हो, मैं तो तुम्हें भूली ही कहां जो अश्रु बन बह जाने देती इन नैनो से तुमको। कृष्ण ने पूछा- हम तो सदैव से तुम्हारे कान्हा रहे हैं ये द्वारिकाधीश का संबोधन क्यूँ? राधा पुनः मुस्कराई बोली- जब तुम प्रेम से बंधे थे तो कान्हा थे, तुम्हारे हाथों में मधुर संगीत वाली बाँसुरी सुशोभित ...
उसने ख़ुद को लिखा
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उसने ख़ुद को लिखा

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** उसने ख़ुद को लिखा, रोटी बनाते- बनाते..... चौके में बिखरे आटेख़ुद से, और झट से मिटा दिया।। उसने ख़ुद को लिखा, कुर्सी-मेज दरवाज़े-खिड़की पे जमी धूल से.... और झट से मिटा दिया।। उसने ख़ुद को लिखा, समन्दर की रेत पे और देखा तेज़ बहाव को, मिटाते हुए उसका अस्तित्व, उसने भीगी पलकों में समेट लिया अपना लिखा।। उसने "जग" को लिखा, "जगदीश्वर" को..... शायद वह इक बेहतरीन लेखिका रही होगी न, झांककर खिड़की से बाहर... उसने ख़ुद को... कहां... कहां लिखा! पर ख़ुद को "कहां" लिखा...????? परिचय :- इंदौर (मध्य प्रदेश) की निवासी अपने शब्दों की निर्झर बरखा करने वाली शशि चन्दन एक ग्रहणी का दायित्व निभाते हुए अपने अनछुए अनसुलझे एहसासों को अपनी लेखनी के माध्यम से स्याह रंग कोरे कागज़ पर उतारतीं हैं, जो उन्हें खुशियों के आसमान...
नींद से जागने के बाद
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नींद से जागने के बाद

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** ऊपर से नीचे तक कसीदे गढ़ रहे हैं, किसी को नहीं पता किस ओर बढ़ रहे हैं। राजा दिन को रात कह रहा है, और हम भी सिर झुकाकर वही कह रहे हैं। दिल, जिगर, शरीर छलनी पड़ा हुआ है, राजा का सैनिक हर घर में खड़ा हुआ है। जो कुछ भी घर में है, बस खाते जाओ, चरण-चाटन संग स्तुति-गान गाते जाओ। बर्बादी में भी बदलाव का नारा गूंज रहा है, डंका कब, कहाँ, कैसे बज रहा है- दुनिया सारा देख रहा है। झूठों के बाजार बड़े सजे हुए हैं, भोले-भाले खरीददार बीच फँसे हुए हैं। राशन तो लेना है, मगर कैसे लूँ? झोले में आभास भरा जा रहा है, बताओ-उसके पैसे कैसे दूँ? भविष्य के सुनहरे खयालों के सहारे, खाली पेट बच्चे ज़िंदगी कैसे गुज़ारें? अरमानों की पटरी पर धड़ाधड़ दौड़ रही रेल, किस वक्त में फँस गया हूँ मैं, क्या चल रहा यह खेल? ...
माँ की ममता
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माँ की ममता

प्रभात कुमार "प्रभात" हापुड़ (उत्तर प्रदेश) ******************** माँ तेरी ममता का, कैसे करूँ बखान। तेरे चरणों में बसा, मेरा सकल जहान।। जन्म दिया तूने मुझे, जीवन दिया महान।। अपने सपनों से रचा, मेरा उज्ज्वल मान।। मेरे हित हर श्वास में, तेरा रहा अनुराग। अपने सुख सब त्यागकर, रखा सदा ही ध्यान।। भोर हुई या रात हो, थकना तुझको नाय। मेरे उज्ज्वल भविष्य हेतु, दीप हृदय में जलाय।। शिक्षा मेरी हेतु तू, करती रही पुकार। ईश्वर से माँगा सदा, जीवन में उजियार।। मेरी छोटी भूल पर, डाँटा भी कई बार। किन्तु डाँट के बीच भी, बरसा माँ का प्यार।। मेरी पीड़ा देखकर, रोता तेरा मन। मेरे दुःख की आँच से, द्रवित हुआ जीवन।। चाह न थी वैभव की, न ऊँचा सम्मान। मैं जीवन में बढ़ सकूँ, बस यह तेरा अरमान।। जब तक तेरे शीश पर, आशीषों का हाथ। जीवन-पथ आसान था, मिला सदा विश्वास।। आज ...
जीवन का पड़ाव
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जीवन का पड़ाव

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन के इन पन्नों पे लिखते हैं हम दासता? खुशी के पल लिखूं या ग़मों की दास्ताँ। बचपन के दिन थे नहीं बोझ नहीं ग़म कोई, हंसते-खेलते बीत गया नहीं बोझ था जीवन में। आगे बड़े किशोर अवस्था दबिश रहती अंकुश अपार नये जीवन की शुरुआत? "वयस्क की गिनती की शुरुआत" एक-एक कर आता जाता है दुनिया का झमेला, कुछ पल सुकून के ढूंढते है हम पर वक्त निकल जाता था। कभी शुभ यात्रा कर लेते थे मन में आता थोड़ा सुकून अच्छे लोग, अच्छे विचार, नया उत्साह, नई प्रभात। खूब मौज में बीते कुछ दिन पल, पर फिर आए वही डंडा-गुल्ली खड़े थे स्वागत में गमों को देने वाले? पूरा जीवन निकल गया सुख-दुख की परछाई में। यह कोई एक मन की बात नहीं यह सैकड़ो दिलों की कहानी है, थोड़ी कम थोड़ी ज्यादा यही जीवन की कहानी है। दुख तो हर पल खड़ा ...
ज़िन्दगी
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ज़िन्दगी

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ज़िन्दगी के किसी कोने में धुआ भरा है जो कभी बाहर निकल कर घुटन, घबराहट में बदलकर मेरी छोटी ज़िन्दगी के कुछ दिन और कम कर जाता है और और मैं घुटकर रह जाती हूं मन मसोस कर चुप रहकर सब सहती हूं क्यों कि मैं जानती हूं कि जिंदगी का कोई कोना धुआं उगल सकता है मै फिर घुट जाउंगी। फिर भी जीवन जीती हूं इस जिंदगी को भोगने के लिए अपने भोग पुरे करने के लिए। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्...
बेटियां
कविता

बेटियां

आयुषी दाधीच भीलवाड़ा (राजस्थान) ******************** माँ का प्रश्न तो पिता का उत्तर होती हैं बेटियां, माँ की चाल तो पिता की उड़ान होती हैं बेटियां, माँ का स्वार्थ तो पिता का संतोष होती हैं बेटियां, हां, यही तो होती हैं बेटियां। माँ की चिंता तो पिता का प्यार होती हैं बेटियां, माँ की दुलारी तो पिता की परी होती हैं बेटियां, माँ की ममता तो पिता का अपनापन होती हैं बेटियां, हां, यही तो होती हैं बेटियां। माँ की सीख तो पिता की दिशा होती हैं बेटियां, माँ की गोद तो पिता की दुनिया होती हैं बेटियां, माँ की आस तो पिता का विश्वास होती हैं बेटियां, हां, यही तो होती हैं बेटियां। माँ की परछाई तो पिता का गर्व होती हैं बेटियां, माँ की हमदर्द तो पिता की दवा होती हैं बेटियां, माँ की अश्रुधारा तो पिता की धड़कन होती हैं बेटियां, हां, यही तो होती हैं बेटियां। परिचय :-  आयुषी दाधीच शि...
माता
कविता

माता

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** सुख देती बच्चों को माता। जग की देखो वही विधाता।। माँ ही जानो होती अम्बे। करे कृपा माता जगदम्बे।। स्वर्ग मिले चरणों में उसके। कर सेवा बच्चों जी भर के।। माता सीता माँ अनुसुइया मां जशुदा है माँ कौशल्या। आशीषों की है फुलवारी। बच्चों की करती रखवारी।। सद्गुण हमको मातु सिखाती। बच्चों को वह अमृत पिलाती।। मात हृदय को तुम न दुखाओ। बच्चों उसका साथ निभाओ।। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सतर्कता समिति जबलपुर की भूतपूर्व चेयरपर्सन। प्रकाशित ...
मेरी पसंद
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मेरी पसंद

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** माता दुर्गा की पूजा की श्री राम ने, वह तट पसंद है, माता सीता ने वनवास काटा, वह पंचवटी पसंद है। हनुमाना ने लंका की उजाड़ी, वह वाटिका पसंद है, राम-सीते का मिलन हुआ, वह वाटिका पसंद है। लव-कुश का जन्मोत्सव हुआ, वह आश्रम पसंद है, रामकृष्ण परमहंस ने ज्ञान दिया, वह आश्रम पसंद है। मीरा की भक्ति से पावन हुई, वह धरती पसंद है, कृष्ण ने गोपियों संग लीला की, वह धरती पसंद है। तुलसी ने रामचरित रची, वह गंगा तट पसंद है, श्रीराम ने जलसमाधि ली, वह सरयू घाट पसंद है। कपिश्वर लाए संजीवनी, वह पाषाण पसंद है, कृष्ण ने रक्षा हेतु उठाया, वह गोवर्धन पाषाण पसंद है। जिस रज पर जीवन संभव, वह धरती पसंद है, जिस रज पर मैं चरण रखूँ, वह अपनी धरती पसंद है। परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "नोहरी" ...
मां शब्द की अभिव्यक्ति
कविता

मां शब्द की अभिव्यक्ति

प्रतिभा दुबे "आशी" ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** मां शब्द की अभिव्यक्ति क्या करूं,1132 क्या लिखूं माँ पर कोई एक रचना! विधाता का श्रेष्ठ सृजन हमारे लिए, माँ के रूप में खुद आए हमारे लिए मां के दुलार बिन रह न पाया, हर जगह मौजूद मां का ही साया! कभी सोने न दिया भूखे पेट मुझे उठाकर नींद में, निवाला खिलाया।। मैं ईश्वर का नाम लूं न लूं दुआएं तेरी हमेशा लगती मुझे झोली में तेरी सदैव रहती मन्नतें, धागे बांधे न जाने कितने मेरे लिए।। लाख कोशिश कर लूं फिर भी, तेरा ऋण मैं उतार न पाऊंगी सलामत रहो बस मेरे लिए तुम तुम्हारी दुआओं से, यश पाऊंगी।। क्या लिखूं माँ तेरे लिए मैं शब्दों से तेरा ही दिया हुआ, ये जीवन हैं मेरा तुम्हारी स्वयं कि, मैं हूं एक रचना आज मां बनकर ही एहसास हुआ।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे "आशी" (स्वतंत्र लेखिका) ...
जीवन की पहचान
कविता

जीवन की पहचान

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** चित्र नही चरित्र बनाये, फोटो नही मुस्कान बढाये, द्वेष नही स्नेह बढाये, राग नही अनुराग बढाये। घृणा नही प्रेम बढाये, अपमान नही सम्मान बढाये, अकेला नही समूह बनाये, धोखा नही विश्वास बनाये। बेसहारो का सहारा बन जाये, बेरोजगारी नही रोजगार बढाये, माँ मातृभूमि, और जन्मभूमि का मान बढाये, जिसका खाये उसका गाऐ। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्राष्ट्रीय समान २०२४" से सम्मानित ४. १५००+ कविताओं की रचना व भ...
घाम पियास
कविता

घाम पियास

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** लकलक-लकलक घाम करत हे। घाम पियास म मनखे मरत हे। काटें काबर रुख-राई ल संगी, ताते-तात आज हवा चलत हे।। बर पिपर के छईयाँ नँदागे। बिन छईयाँ के चिरई उडा़गे। आगी अँगरा कस भुइयाँ लागे, भोंमरा जरई म गोड़ भुँजागे।। नदियाँ, नरवा, अउ तरिया अटागे। जंगल झाड़ी, रुख राई कटागे। घाम पियास म सबला बचइया, हरियर धरती घाम म सुखागे ...।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिं...
पिता की रौशनी
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पिता की रौशनी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हाँ बेटा, मैं तुझे अंधेरे से बचाना चाहता हूँ, जीवन के कुछ मूल सूत्र समझाना चाहता हूँ। ये सही है, मेरा बार-बार टोकना तुझे शायद अच्छा नहीं लगता, मुझसे खुलकर बात करने का मन अक्सर ही कतराता, भटकता। मेरी डाँट, मेरे शब्द तुझे जैसे चाकू-छुरा लगते हैं, पर इन्हीं में छुपे भाव मेरे तेरे भविष्य के रक्षक बनते हैं। तू क्यों नहीं समझ पाता है इन बातों की गहराई को, बात पूरी सुने बिना ही छोड़ देता है सच्चाई को। जल्दबाज़ी छोड़, धैर्य का ताप सहना सीख, अपने पैरों पर चलना, खुद को गढ़ना सीख। हर एक फरमाइश के पीछे कितनी मेहनत झेल रहा कोई, अपनी ही ज़िंदगी, अपने ही तन से कितना खेल रहा कोई। वक़्त किसी के लिए नहीं ठहरता, ये सच्चाई याद रखना, जो पसीने से खेलते हैं उनके पाँव में छाले भी हार मानते ये बात ...
धीरे-धीरे हँसना प्रिये …
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धीरे-धीरे हँसना प्रिये …

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** धीरे-धीरे हँसना प्रिये, मेरा मुझसे ही कहना प्रिये। सोणी-सोणी है मेरी नार, सच्चा-सच्चा है तेरा मेरा प्यार।। तुझको मेरे पास रहना है, सच्चा साथ निभाना है। धीर धारण करके रहना है, मुझे महकाते रहना है। मुझसे ही है तेरा श्रृंगार, मेरे बिना श्रृंगार है बेकार। धीरे-धीरे हँसना प्रिये, मेरा मुझसे ही कहना प्रिये। सोणी-सोणी है मेरी नार, सच्चा-सच्चा है तेरा मेरा प्यार।। रातें काली-काली होती हैं, फिर भी सुंदर सुबह होती हैं। रातों में मीठी-मीठी बातें होती हैं, मगर अधूरी रह जाती हैं। मेरी परछाई बनना प्रिये, मरने से पहले साथ रहना प्रिये। इस जीवन में मेरी हो प्रिये, फिर कहना मेरा ये ही है प्यार। सबको सच्च कहना, इसको ही कहते है सच्चा दिलदार। धीरे-धीरे हँसना प्रिये, मेरा मुझसे ही कहना प्रिये। स...
मां तो मां होती है
कविता

मां तो मां होती है

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** आंचल के छांव में, ममता के मोह में, मां तो सब सह जाती है। मां तो मां ही होती है।। स्नेह भाव, मम्मत्व से भरी। पुत्र प्रेम में सब भूल सारे कष्ट सहकर भी हंसकर जीती जाती है। बिटिया से करे हंसी ठिठोली, आंखों ही आंखों में सब कुछ समझाती। मां तो मां ही होती है।। पाल पोस कर किया बड़ा अब फिर भी सीने से लगाती है। सपने देखे बहुओं का, दामाद ढूंढे भविष्य के सपने बुने, घर को स्वर्ग बनाती है। घर संभाले, बच्चों की इच्छा पूरी करें, लाड़ लुटाए लड़के पर इतनी इतराती है। मां तो मां होती है।। सब कुछ सह कर भी जीवन नौछावर कर जाती है। ‌मिला न कोई अपना सा, अब तो मां की यादों में रहता हूं, सपनों में जीता हूं, अकेले में ही मां से बातें करता हूं ‌।‌ मां तो मां होती है।। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प...