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उसूल भूल गए…?

संजय एम तराणेकर
इन्दौर (मध्यप्रदेश)
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सादगी की राहों पर जो चुपचाप बढ़ गया,
ईमान का दीप बनकर अँधेरों से लड़ गया।

जिनके महलों में भी “सेवा” का ही शोर है,
इस हिसाब में हर सुविधा का कोई छोर है।

कुर्सी मिली तो जनता का ही नाम भूल गए,
भत्तों की ‘फेहरिस्त’ में सारे उसूल भूल गए।

एक जनाब पैदल चलकर मिसाल लिख रहे,
बाकी तो लाल बत्ती में भी सवाल लिख रहे।

रिश्वत की धूल से जब ‘आईना’ धुंधला हुआ,
सच का चेहरा देख के हर चेहरा मिला हुआ।

यहाँ गांधी के नाम पे भाषण तो रोज़ हो गए,
गांधी के रास्ते मगर आज भी कम से हो गए।

परिचय :- संजय मुरलीधर तराणेकर एक स्वतंत्र कवि, लेखक व फ़िल्म समीक्षक हैं।
आप साधारण परिवार में जन्मे मूलतः मध्य प्रदेश के इन्दौर के निवासी हैं। आपका सन १९९० के दशक से लेखन में मन रमने लगा और ‘पत्र संपादक के नाम‘ से अपनी लेखन यात्रा प्रारंभ की। समाचार-पत्रों में आपके कई पत्र प्रकाशित हुए हैं। फिल्मी कलाकारों की तरफ झुकाव हुआ तो आपने फिल्मों पर आलेख लिखना प्रारंभ किये। विशेषकर पुराने फिल्मी कलाकारों के जीवन से सम्बंधित आलेखों पर आपका ज्यादा ध्यान आकर्षित रहा। इसके साथ ही आप लघु कथा, कविता (आकाशवाणी इन्दौर में कविता पाठ) के अलावा सामयिक, सामाजिक एवं राजनैतिक विषयों पर समय-समय पर अपनी लेखनी को आयाम देने का प्रयास करते रहे हैं। अब तक कई समाचार-पत्रों में आपके आलेखों का प्रकाशन हो चुका है, जिनमें राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित होने वाले बॉलीवुड के परिशिष्ट जैसे पंजाब केसरी व दैनिक ट्रिब्यून के “मनोरंजन”, राजस्थान पत्रिका के “बॉलीवुड”, लोकमत समाचार के “शो टाइम” व “आकर्षण”, दैनिक भास्कर के “नवरंग”, हिंदुस्तान के “रंगोली”, राज एक्सप्रेस के “राज सिनेमा”, सी एक्सप्रेस, बीपीएन टाइम्स, दैनिक लोकदशा और “स्वतंत्र वार्ता” में नियमित कई वर्षों तक सिनेमा से सम्बंधित आलेखों का प्रकाशन होता रहा है। वहीं दैनिक हिन्दी “मिलाप” में प्रति रविवार फिल्म समीक्षा का कॉलम का लेखन भी किया। इसके अलावा कैसेट व सीडी (संगीत) समीक्षा के साथ पुस्तक समीक्षा का भी प्रकाशन विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में होता रहा हैं। आपको २०२४ में सेंधवा (मध्य प्रदेश) की संस्था ‘सबरंग द्वारा फ़िल्म समीक्षक हेतु सम्मानित किया गया। साझा संकलन “मेघ पुष्प” के अलावा “अल्फाज-ए-दिल” भी प्रकाशित हो चुका हैं।

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