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ऐ बारिश …

शिवदत्त डोंगरे
पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
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ऐ बारिशों
तुम इंसाँ न बनो
यूँ मत करो
कि जब ज़मीं की साँसें
प्यास से थमने लगें
दरिया के दीदे सूख जाएँ
पेड़ों की हथेलियाँ दुआ में
उठकर बिखर जाएँ
तब तुम कहीं समंदर की
छतों पर
गीत गाती फिरो।

और फिर एक रोज़
अचानक इस
कदर टूटकर बरसो
कि बस्तियाँ डूब जाएँ
घरोंदे टूट जाएँ
ख़्वाब छूट जाएँ,
और इंसाँ तुम्हें
इंसाँ होने की दुहाई दें।

यह हुनर तो
इंसानों का है
ज़रूरत के वक़्त
साथ न देना
और जब ज़रूरत
गुज़र जाए
तो एहसानों की
बारिश लेकर
बरसते हुए
लौट आना।

तुमने देखा तो होगा
रिश्तों को
सूखी धरती सा
तड़पते हुए,
तेरी बूंदों सा बिखरते हुए
एक हाथ, एक साथ
की आस में
रिश्तों के आसमाँ को
तकते हुए।

इंसाँ आए भी तो ऐसे
जैसे सैलाब हो लिए
सूखे में बारिश का
ख़ाब हो लिए
साथ कम देते हैं
हिसाब ज़्यादा
छोड़ जाते हैं।

ऐ बारिशों
तुम्हारे हिस्से में
दुआएं लिखी हैं
इस ज़मीं के संग
वफाएं लिखी हैं
तुम्हारे क़दमों को
छूकर मिट्टी महकती है
और इंसानी मिज़ाज की
धूल सूखती है।

अब बरसना तो
इस तरह बरसना
कि किसी किसान के
माथे की शिकन
मुस्कान में बदल जाए
ख़ाक से उठी दुआ
आसमाँ में घुल जाए।

बच्चों की काग़ज़ की
कश्ती चले
आसमानी दुआ
ज़मीं पर फले
और अगर कभी ठहरना
तो किसी उदास दिल की
देहरी पर ठहरना
जहाँ बरसों से कोई
मौसम नहीं बदला।

ऐ बारिशों
तुम इंसाँ
कभी न बनना।
दुनिया पर बेवक़्त
सैलाब न करना
वक़्त पर बरसती रहमत
रहना तुम
जो साथ निभाएं
जो प्यास बुझाएँ
और चले भी जाएँ
तो मिट्टी की सौंधी
महक छोड़ जाएँ।

परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक)
पिता : देवदत डोंगरे
जन्म : २० फरवरी
निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है।


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